सभी धर्मों के सदस्यों को संविधान सभा में प्रतिनिधित्व दिया गया। अनुसूचित जातियों के 20 सदस्य थे। जहाँ तक राजनीतिक दलों का सवाल है विभाजन के बाद संविधान सभा में काँग्रेस का वर्चस्व था और उसे 82 प्रतिशत सीटें प्राप्त थीं। काँग्रेस स्वयं विविधताओं से भरी हुई एक ऐसी पार्टी थी जिसमें लगभग सभी विचारधाराओं की नुमाइंदगी थी।
कैबिनेट मिशन (1946) ने संविधान सभा (सीए) की स्थापना का प्रस्ताव पारित किया। इसके सदस्य 1935 में स्थापित प्रांतीय विधान सभाओं के सदस्यों द्वारा अप्रत्यक्ष विधि से चुने गए।
प्रांतों को 292 सदस्य चुनने थे जबकि देशी रियासतों ने 93 सदस्यों को नामांकित किया था।
भारतीय संविधान शक्ति को एक समान धरातल पर विधयिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका जैसी संस्थाओं और स्वतंत्र संवैधानिक निकाय जैसे निर्वाचन आयोग आदि में बाँट देता है। अवरोध और संतुलन के कुशल प्रयोग ने भारतीय संविधान की सफलता सुनिश्चित की है।
संविधान को किसी के द्वारा पलटने से रोकने का सबसे अच्छा तरीका यह है कि, उसकी (किसी लोकतांत्रिक संस्था की) रचना इस प्रकार की जाय ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि किसी एक संस्था का सारी शक्तियों पर एकाधिकार न हो। यह विभिन्न संस्थाओं में शक्तियों के बँटबारा द्वारा किया जा सकता है।
कोई भी संविधान अपने सभी नागरिकों की स्वतंत्रता और समानता की जितनी अधिक सुरक्षा करता है उसकी सफलता की संभावना उतनी ही बढ़ जाती है। कोई भी संविधान खुद से न्याय के आदर्श स्वरूप की स्थापना नहीं करता लेकिन उसे लोगों को विश्वास दिलाना पड़ता है कि वह बुनियादी न्याय को प्राप्त करने के लिए ढाँचा उपलब्ध कराता है।
भारतीय संविधान उन लोगों द्वारा तैयार किया गया, जिनको जनता का व्यापक विश्वास प्राप्त था। ये लोग समाज के विभिन्न वर्गों के नुमाइंदगी कर रहे थे जिसमे सभी धर्म, क्षेत्र, जाति, वर्ग, यहां तक कि व्यवसायी और महिलाएँ भी सम्मिलित थी।
सार्वभौम मताधिकार का प्रावधान बिना किसी बहस के पारित हुआ था जो संविधान सभा की लोकतांत्रिक प्रतिबद्धता का साक्षी है।
संविधान के माध्यम से ही किसी समाज की एक सामूहिक इकाई के रूप में पहचान होती है। कुछ बुनियादी नियमों और सिद्धांतों पर सहमत होकर हम अपनी मूलभूत राजनीतिक पहचान बनाते हैं।
राजनीतिक आपातकाल अथवा संविधान में उल्लिखित कोई और विशेष स्थिति के दौरान ही सिर्फ मौलिक अधिकारों को सीमित किया जा सकता है।
संविधान लोगों को मौलिक अधिकार प्रदान करता है। अगर किसी को लगता है कि उनके मौलिक अधिकारों का उल्लंघन हुआ है, तो वे इसके खिलाफ उच्च न्यायालय या सर्वोच्च न्यायालय जा सकते हैं।
एक तरह से संविधान सभा केवल उन सिद्धांतों को मूर्त रूप और आकार दे रही थी जो उसने राष्ट्रीय आंदोलन में प्राप्त किए थे। राष्ट्रीय आंदोलन में उन प्रश्नों पर चर्चा हुई थी जो संविधान बनाने के लिए प्रासंगिक थे, जैसे - भारत में सरकार का स्वरूप और संरचना किसी होनी चाहिए, हमें किन मूल्यों का समर्थन करना चाहिए, किन असमानताओं को दूर किया जाना चाहिए आदि। उन बहसों से प्राप्त निष्कर्षों को ही संविधान में अंतिम रूप प्रदान किया गया।
भारतीय संविधान कठोर और लचीला दोनों है। इसका अर्थ यह है कि संविधान के कुछ प्रावधान समय की जरूरत के अनुसार बदले जा सकते हैं, जबकि कुछ अन्य जो ‘मूल ढाँचे’ के हैं उन्हें आसानी से नहीं बदले जा सकते हैं। प्रावधानों में परिवर्तन और ऐसे परिवर्तन पर सीमा लगाकर, संविधान ने सही संतुलन कायम करके यह सुनिश्चित किया है कि यह लोगों द्वारा सम्मानित दस्तावेज़ के रूप में जीवित रहेगा। अतः इसे “जीवंत दस्तावेज” के रूप में वर्णित किया गया है।
भारतीय संविधान सरकार को वह सामर्थ्य प्रदान करता है जिससे वह कुछ सकारात्मक लोक-कल्याणकारी कदम उठा सके, जैसे कि समुचित जीवन-स्तर प्रदान करना। भारतीय संविधान के अध्याय 4 में उल्लिखित राज्य के नीति-निर्देशक तत्व भी सरकार से लोगों की कुछ आकांक्षाएँ पूरी करने की अपेक्षा करता है।
सांख्यिकी आंकड़ों के संकलन, विश्लेषण, निर्वचन या स्पष्टीकरण और प्रस्तुति से संबंधित एक गणितीय विज्ञान है।
निम्नसांख्यिकी की सीमाएं हैं-
· व्यक्तिगत इकाइयों के लिए उपयोगी नहीं होती-यह ''तथ्यों के समूह'' से संबंधित है। एक व्यक्तिगत तथ्य का अध्ययन सांख्यिकी के क्षेत्र से बाहर होता है।
· गुणात्मक पहलू का अध्ययन नहीं करती-इसे केवल मात्रात्मक आंकडों पर लागू किया जा सकता है।यह बुद्धि, ईमानदारी, निर्धनता, सुन्दरता, कल्याण आदि गुणात्मक तथ्यों को पेश नहीं करती ।
· सांख्यिकी औसत से संबंधित है-हम आंकडों की सहायता से केवल औसत की गणना कर सकते हैं। उदाहरण के लिए, पिछले दस वर्षों में गेहूं का औसत उत्पादन 250 क्विंटलहै। इसका यह मतलब नहीं है कि गेहूं का उत्पादन हर वर्ष बराबर था। इसलिए, सांख्यिकीय ज्ञान औसत जानने के लिए उपयोगी है।
· सांख्यिकी का दुरूपयोग किया जा सकता है- सांख्यिकी का जानबूझ कर आंकडों को घुमाकर या हेरफेर कर दुरूपयोग किया जा सकता है जैसे एक वकील अपनी बात साबित करने के लिए नियमों में हेरफेर कर सकता है तथा अनुभवहीन और अप्रशिक्षित व्यक्ति गलत निर्णय दे सकते हैं।
· परिणाम गलत साबित हो सकते हैं-सांख्यिकीय नियम प्रकृति में संभाव्यता वाले होते हैं। सांख्यिकी के परिणाम केवल अनुमान पर आधारित होते हैं न कि परिशुद्ध पर, उदाहरण के लिए, यदि एक सिक्के को एक बार उच्चाहलने पर चित आने की संभावना आधी है, तो इसका अर्थ यह नहीं है कि यदि हम सिक्के को 10 बार उछाले, तो हमें हमेशा 5 बार चित और 5 बार पटप्राप्त होगा।
सांख्यिकी का कार्यक्षेत्र-
· व्यापारिकपूर्वानुमान- सांख्यिकीय विधियां व्यापारिक पूर्वानुमानों के लिए उपयोगी होती हैं। एक उद्यमी को बिक्री, संप्राप्ति, कीमत, मांग आदि के संबंध में अपनी भावी योजनाओं के पूर्वानुमान के लिए पिछली अवधि के आंकडों का उचित विश्लेषण करना चाहिए।
· निर्णय लेना- किसी व्यवसाय को शुरू करने से पहले, एक व्यापारी को कच्चे माल, मजदूरी दर आदि जैसी आदानों की कीमतों से संबंधित पर्याप्त आंकडें एकत्रित करने होते है।
· गुणवत्ता नियंत्रण- किसी भी उत्पाद का गुणवत्ता नियंत्रण उपयुक्त सांख्यिकीय आंकडों पर आधारित होता है। एक उत्पाद की विभिन्न उत्पादन प्रक्रियाओं की जांच करने केलिए विभिन्न सांख्यिकीय उपकरणों का प्रयोग किया जाता है।
· नये उद्यम की खोज- आधुनिक व्यवसायिक गतिविधियों में, एक नये उत्पाद की मांग और पूर्ति के संबंध में सूचनाओं का अध्ययन करना महत्वपूर्ण हो गया है।
· व्यापार चक्रों का अध्ययन- सांख्यिकीय विधियां व्यापार चक्रों के अध्ययन के लिए बहुत उपयोगी है। सांख्यिकीय उपकरणों की सहायता से, हम किसी भी देश की मुद्रास्फीति और अपस्फीति स्थितियों का मूल्यांकन कर सकते हैं।
· योजना के लिए उपयोगी-सांख्यिकीय उपकरण निर्यात, आयात, उत्पादन आदि के संबंध में विभिन्न निणयों को लेने में सरकार की मदद करते हैं। इन तथ्यों और आंकडों के आधार पर योजनाओं को क्रियान्वित किया जाता है। राष्ट्रीय संसाधनों का समुचित उपयोग करने के लिए नियोजन सबसे अच्छा तरीका है।
प्रतिचयन त्रुटियाँ, प्रतिदर्श सर्वेक्षण में होती है। ये त्रुटियाँ संयोगवश होती हैं|
यादृच्छिक प्रतिचयन विधि में, जनसंख्या से प्रतिदर्श यादृच्छिकता से लिए जाते हैं जिसमें जनसंख्या के सभी तत्वों के चयनित होने की समान संभावना होती है।
A.
अनुत्तर संबंधी त्रुटियाँ
B.
प्रतिचयन त्रुटियाँ
C.
प्रतिदर्श अभिनति
D.
आँकड़े अर्जन में त्रुटियाँ
कभी कभी अन्वेषक की लापरवाही की वजह से प्रतिक्रियाएं सही दर्ज नहीं होतीं। यह त्रुटि आँकड़े अर्जन में त्रुटियों के रूप में जानी जाती है।
एक जनगणना व्यवस्थित जनसंख्या के बारे में जानकारी प्राप्त करने की प्रक्रिया है।
बहुविकल्पी प्रशनों में प्रश्न के कुछ संभव उत्तर दिए होते हैं तथा उत्तरदाताओं को उनमें से किसी पर निशान लगाना होता है।
A.
अप्रतिचयन त्रुटियां
B.
निष्पक्ष त्रुटियां
C.
माप त्रुटियां
D.
समूह त्रुटियां
अप्रतिचयन त्रुटियाँ सांख्यिकी में गलती, गलत अवलोकन, उपयोग हुआ गलत सूत्र या अधूरे आँकड़ों के कारण होती हैं।
A.
भारत के महापंजीकार
B.
भारत के क्षेत्रीय जनरल।
C.
भारत के रजिस्ट्रार राज्यपाल
D.
भारत के क्षेत्रीय गवर्नर।
RGI एक राष्ट्रीय स्तर की संस्था है जो विभिन्न महत्वपूर्ण आर्थिक एवं सामाजिक मुद्दों पर आँकड़ों का संग्रहण , संशाधन और सारणीयां करती है |
प्रगणक वह व्यक्ति होता है जो क्षेत्र में जाकर प्रत्यक्ष रूप से सांख्यिकीय सूचना जमा करता है। प्रगणक द्वारा एकत्र आँकड़े प्राथमिक आँकड़े होते हैं।
आंकड़ो का तालिकाओं के रूप में प्रस्तुतिकरण और आयोजन को आँकड़ों का संगठन कहा जाता है।
अगर उत्तरदाता शिक्षित हों, तब प्रश्नावली भेजकर आँकड़ों का संग्रह करने की विधि उपयोग हो सकती है।
व्यक्तिक साक्षात्कार के माध्यम से साक्षात्कारकर्ता अध्ययन का उद्देश्य समझा जा सकता है और प्रतिवादी के प्रश्नों का जवाब भी डे सकता है।
मतदान केंद्रों से बाहर निकल रहे मतदाताओं से यादृच्छिक रूप से उनकी प्राथमिकता पूछ कर उसके आधार पर चुनाव के परिणाम की भविष्यवाणी करने को निर्गम निर्वाचन या एग्जिट पोल कहा जाता है।
A.
अप्रतिचयन त्रुटियाँ
B.
प्रतिचयन त्रुटियाँ
C.
माप में त्रुटियाँ
D.
निष्पक्ष त्रुटियाँ
अप्रतिचयन त्रुटियाँ आमतौर पर माप उपकरणों में त्रुटि से आती हैं। जैसे - मापन के साधन या आँकड़ों को संभालने की प्रणाली में कोई गलती या प्रयोगकर्ता द्वारा अस्पष्ट परिभाषाओं, दोषपूर्ण प्रश्नावली, अपर्याप्त और अकुशल शोधकर्त्ता का प्रयोग।
यादृच्छिक प्रतिचयन विधि में, जनसंख्या से प्रतिदर्श यादृच्छिकता से लिए जाते हैं जिसमें जनसंख्या के सभी तत्वों के चयनित होने की समान संभावना होती है।
A.
यादृच्छिक सर्वेक्षण
B.
जानबूझकर सर्वेक्षण
C.
टेलीफोन पर साक्षात्कार
D.
संवाददाता विधि
टेलीफोन साक्षात्कार विधि में अन्वेषक लोगों से फोन पर सवाल पूछते हैं। यह विधि सस्ती है और एक छोटी समय अवधि में आयोजित किया जा सकता है।
A.
सरल आँकड़े
B.
कच्चे आँकड़े
C.
द्वितीयक आँकड़े
D.
प्राथमिक आँकड़े
प्राथमिक आँकड़ें प्रगणकों को नियुक्त करके सीधा क्षेत्र से एकत्रित किये जाते हैं तथा इसका उद्देश्य है विशेष जाँच।
प्रतिचयन सर्वेक्षण में जनसंख्या के एक भाग यानि प्रतिदर्श से आँकड़े संग्रह करके और उसका अध्ययन करके कोई निष्कर्ष निकाला जाता है।
A.
अन्वेषक
B.
प्रगणक
C.
प्रतिवादी
D.
साक्षात्कारकर्ता
अपेक्षित जानकारी या कुछ समस्या के बारे में आँकड़े उपलब्ध कराने व्यक्ति प्रतिवादी कहलाता है|
बारंबारता बहुभुज असतत और सतत श्रृंखला के चित्रीय प्रदर्शन की एक विधि है। बारंबारंता बहुभुज एक क्षेत्रफल चार्ट है जिसको आयत में सभी आयतों के ऊपरी छोर के मध्य बिंदुओं को जोडकर बनाया जाता है। यदि श्रेणी के मध्य बिंदु दिये हुये है तो बारंबारता बहुभुज का आयत के बिना भी निर्माण जा सकता है। जब कई बारंबारता वितरणों की एक ही ग्राफ पर तुलना करनी होती है तो बारंबारता बहुभुज का आयत के पार भी एक लाभ है।
एक दंड आरेख एक आयमी होता है क्योंकि दंड कीऊंचाईमहत्वपूर्णहोती है न कि दंड की चौडाई। एक आयत चित्र द्विआयमी होता है क्योंकिआयतकीऊंचाईआवृत्तिको दर्शाती है जबकि आयत की चौडाई वर्ग अंतराल को दर्शाती है। एक दंड आरेख का आरेखीय प्रस्तुतिकरण होता है जबकि आयत चित्र एक सतत श्रृंखला के एक आवृत्ति वितरण का चित्रमय प्रदर्शन है।
आयत चित्र एक क्षेत्रफल चार्ट है जिसमें एक दंड का क्षेत्रफल उसी अंतरालों से जुड़ी बारंबारताओं को प्रदर्शित करता है। एक आयात चित्रX-अक्ष से लिये गये वर्ग अंतरालों के स्तम्भों पर लम्बवत् दंडों से बना होता है और उनकी संबंधित आवृत्तियों कोY-अक्ष पर बनाया जाता है। फिर दंडों कीऊंचाईआवृत्तियों के जमाव की माप है। आयत चित्र आवृत्ति वितरण को प्रदर्शित करने के लिए सबसे लोकप्रिय उपकरणों में से एक है।
आरेखों के निम्नलिखित मुख्य लाभ हैं-
1) आकर्षक और लोकप्रिय- एक साधारण आदमी भी जिसकी कोई सांख्यिकीय पृष्ठिभूमि नहीं है वह भी आरेखों को आसानी से समझ सकता है। आरेख विभिन्न क्षेत्रों जैसे आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक तथा अन्य क्षेत्रों में भी लोकप्रिय हैं। आरेखों के संदर्भ में, 'एक चित्र की 1000 शब्दों के बराबर अहमियत होती है', यह बहुत सही प्रतीत होता है।
2) सारणियों की अपेक्षा आरेख अधिक प्रभावी होते हैं क्योंकि वे मन पर अधिक स्थायी प्रभाव डालते हैं।
3) तुलनात्मक अध्ययन करने के लिए आरेख हमारी मदद करते हैं।
4) आरेखीय प्रस्तुतिकरण समय, श्रम और धन में मामलें में किफायती है।
5) आरेख आगामी प्रवृत्ति के पूर्वानुमान लगाने में मदद करते हैं।
6) अपनी सादगी, आकर्षक प्रस्तुतिकरण और आरेखीय प्रस्तुति के मनोरंजक मानों के कारण आंकडों की सार्वभौमिक स्वीकार्यता है।
वृत्त आरेख में, एक चर के विभिन्न भागों को एक गोले के टुकडों द्वारा विभिन्न भागों में दर्शाया जा सकता है। यह एक वृत्त आरेख है क्योंकि पूरा ग्राफ एक वृत्त की तरह लगता है और इसके घटक वृत्त से कटे हुए टुकडों के समान होते हैं। इस आरेख में दी हुयी सभी मदों को 360 डिग्री के बराबर हैं और अनुपातिक रूप से परिकलित कोणों की डिग्री विभिन्न मदों का प्रतिनिधित्व करती हैं। जब मानों के वितरित प्रतिशत को आरेखीय रूप में प्रस्तुत करना होता है तब वृत्त आरेख का प्रयोग किया जाता है। वृत्त आरेखों को वृत्तीय चार्ट भी कहा जाता है। उदाहरण भोजन, वस्त्र, किराया, शिक्षा ईंधन आदि जैसी विभिन्न मदों पर एक परिवार द्वारा किये गये व्यय को एक वृत्त आरेख द्वारा प्रस्तुत किया जा सकता है।
ज्यामितीय आरेख को दो प्रकार से वर्गीकृत किया जा सकता है- दंड आरेख और वृत्त आरेख।
दंड आरेख- दंड आरेख को तैयार करना बहुत सरल है। दंडों की एकसमान चौडाई होनी चाहिए। दंड आरेख तीन प्रकार के हो सकते हैं- सरल दंड आरेख, बहु दंड आरेख, घटक दंड आरेख।
वृत्त आरेख- यह आरेख सम्पूर्ण और घटक दोनों क्षेत्र को दिखा सकता है। वृत्त आरेख के एक गोले का क्षेत्रफल अपनी त्रिज्या के वर्ग के समानुपाती होता है। इस विधि में मान को प्रतिशत के आधार पर प्रयोग किया जाता है न कि निरक्षेप आधार पर।
आरेखों की सीमाओं में से एक सीमा यह है कि आरेख उतने शुद्ध नहीं होते है जितनी कि सारणी इसलिए वे केवल सही के लगभग अनुमान देते हैं। इसलिए, जहां अधिक शुद्धता की आवश्यकता होती है वहां आरेख उपयुक्त नहीं होते हैं। हालांकि, आरेखों का सबसे महत्वपूर्ण लाभ यह है कि आरेख सारणियों की अपेक्षा आंकडों को अधिक प्रभावी ढंग से प्रस्तुत करते हैं क्येांकि आरेख आंकडों की मुख्य विशेषताओं के समझने को सुगम बनाते हैं।
|
आरेखीय प्रस्तुतिकरण दंड आरेखों, आयतों, चित्रों, मानचित्रों आदि जैसे आरेखीय रूपों में आंकडों को प्रस्तुत करने की विधि है। आरेखीय प्रस्तुतिकरण सांख्यिकीय आंकडों को एक आकर्षक ढंग से दिखलाने की सबसे लोकप्रिय विधि है।
आरेख संख्यात्मक आंकडों के सम्पूर्ण अर्थ को एक झलक में देखने के लिए हमारी मदद करते हैं। आरेखों को बनाते समय निम्नलिखित सामान्य नियमों पर ध्यान दिया जाना चाहिए-
1) शब्दों के न्यूनतम उपयोग और उचित आकार के साथ साफ सुथरे अर्थात् आकर्षक होने चाहिए।
2) शीर्षक उपयुक्त होना चाहिए।
3) आरेख उचित और सही पैमाने के चयन से बनाए जाने चाहिए।
4) पाद टिप्पणी आरेख के निचले भाग में दी जानी चाहिए।
5) परिक्षेपण को स्पष्ट करने के लिए अनुक्रमणिका महत्वपूर्ण होती है।
6) आरेख बाये से दायें या नीचे से ऊपर की ओर बनाए जाने चाहिए।
तोरण आंकडों के एक दिये हुये समुच्चय के लिए एक संचयी आवृत्ति वक्र है। संचयी आवृत्तियों पर निर्भर तोरण दो प्रकार के होते हैं- से कम और से अधिक।
से कम तोरण- से कम तोरण को वर्ग अंतरालों की ऊपरी सीमा के समाने आलेखित किया जाता है।
से अधिक तोरण- से अधिक तोरण को वर्ग अंतरालों की निम्नतम सीमा के सामने आलेखित किया जाता है।
एक अच्छी सांख्यिकीय सारणी की आवश्यक बातें निम्नलिखित हैं-
1) एक सांख्यिकीय सारणी संक्षिप्त, आसानी से समझ में आने वाली और संभ्रमों से मुक्त होनी चाहिए। जब भी आवश्यक हो इसका स्पष्टीकरण देना चाहिए।
2) स्पष्ट, निश्चित और स्वयं व्याख्यित शीर्षक होना चाहिए।
3) उपशीर्षक और अवशीर्ष स्पष्ट और संक्षिप्त तथा सुव्यस्थित होने चाहिए।
4) हैड नोट्स स्पष्ट और इकाइयों को दर्शाने वाले होने चाहिए।
5) विचारों में समानता होनी चाहिए।
6) सारणी की लंबाई और चौडाई संतुलित होनी चाहिए।
7) शब्दों के संक्षिप्त नामों से प्रयोग नहीं होना चाहिए।
8) सम्पूर्ण योग को दर्शाने के लिए योगों और उप योगों को सारणी में दिखाया जाना चाहिए।
दण्ड आरेख से अभिप्राय ऐसे चित्र से है जिसमें आंकडों को दण्डों या आयतों के रूप में प्रकट किया जाता है।
दण्ड आरेखों के प्रकार-
(1) सरल दण्ड आरेख-सरल दण्ड आरेख वे चित्र होते हैं जो एक ही प्रकार के संख्यात्मक तथ्यों के विभिन्न मूल्यों को दण्ड के द्वारा प्रकट करते हैं। दण्डों की चौड़ाई एक समान होती है किन्तु दण्डों की लम्बाई में मूल्यानुसार परिवर्तन होता है। दण्ड आरेख के द्वारा केवल एक ही प्रकार के आंकडों को प्रस्तुत किया जा सकता है। सरल दण्ड आरेख दो प्रकार के होते हैं-
(क) उदग्र या खडें दण्ड आरेख- जब दण्डों को सीधे या खडें रूप में बनाया जाता है तो ऐसे आरेख को उदग्र या खडे दण्ड आरेख कहते है।
(ख) क्षैतिज दण्ड आरेख- जब दण्डों को सीधे लेटी दशा में बनाया जाता है तो ऐसे आरेख को क्षैतिज दण्ड आरेख कहते हैं।
(2) बहुगुणी दण्ड आरेख-एक ही समय में दो या दो से अधिक तथ्यों सम्बन्धी आंकड़ों के तुलनात्मक अध्ययन के लिए बहुगुणी दण्ड आरेख का प्रयोग किया जाता है। इनका प्रयोग विभिन्न तथ्यों जैसे- जन्मदर एवं मृत्यु दर की तुलना करने के लिए किया जाता है। एक ही समय से संबंधित सभी दण्डों को साथ-साथ मिलाकर बनाया जाता है। फिर थोडा खाली स्थान छोड़कर दूसरे समय के दण्ड आरेख बनाये जाते है। दण्डों की लंबाई पदों के मूल्य पर निर्भर करती है। चरों में अंतर स्पष्ट करने के लिए विभिन्न तथ्यों संबंधी दण्डों को अलग-अलग रंग या शेड भरकर दर्शाया जाता है।
(3) उप विभाजित या अन्तर्विभक्त दण्ड आरेख-उप विभाजित दण्ड आरेख ऐसा दण्ड आरेख होता है जिसमें किसी तथ्य के कुल मूल्य तथा उप-विभाजित को प्रदर्शित किया जाता है। ऐसे आरेख में सम्पूर्ण मूल्य का एक दण्ड बनाकर उसका उप-विभाजन कर दिया जाता है। प्रत्येक दण्ड के विभिन्न भागों को अलग अलग दिखाने के लिए उनमें विभिन्न रंग भर दिये जाते हैं।
A.
1
B.
4
C.
3
D.
2
कार्ल पियर्सन के अनुसार असमितीय वितरण के माध्य, मध्यिका तथा बहुलक के बीच में एक आनुभाविक संबंध होता है, जो इस प्रकार है | बहुलक = 3 मध्यिका – 2 माध्य
A.
क्रौक्सटन
और कॉडन
B. कैनी
C. कार्ल पियर्सन
D. मार्शल
कार्ल पियर्सन के अनुसार असमितीय वितरण के माध्य, मध्यिका तथा बहुलक के बीच में एक आनुभाविक संबंध होता है, जो इस प्रकार है | बहुलक = 3 मध्यिका – 2 माध्य
समूहन विधि द्वारा बहुलक का अभिकलन तब किया जाता है जब •एक शृंखला के मद एक से अधिक मान पर केंद्रित हों| •अधिकतम बारंबारता तथा अगली अधिकतम बारंबारता में अंतर बहुत कम हों|
वह मान या मद का मूल्य जो श्रृंखला में सबसे अधिक बार दोहराया जाता है बहुलक कहलाता है| बहुलक सर्वाधिक प्रेक्षित आंकड़ा मान है|
निरिक्षण विधि के द्वारा यह ज्ञात होता है कि बहुलक 22 है |
A.
25 % मदों
का मान Q3 से कम
होता है
आंकड़ों
में 75 % मदों
का मान Q3
से
कम और 25 % मदों का
मान Q3
से
अधिक होता है |
B.
बहुलक
C.
माध्य
D.
आलेख
चतुर्थक
वे माप है जो
आंकड़ों को
चार बराबर
भागों में
विभाजित
करते है और
प्रत्येक
भाग में
प्रेक्षणों की
संख्या
बराबर होती
है|
प्रतिचयन
त्रुटियों
को निम्नलिखित
सोपानों की
सहायता से नियंत्रित
किया जा सकता
है:- 1.
प्रतिदर्श
सावधानी के
साथ चुने
जाने चाहिए। 2. अन्वेषक
को अच्छी
तरह से
प्रशिक्षित
किया जाना
चाहिए ताकि वह
प्रतिदर्श
का चयन करते
समय
त्रुटियां न
करें। 3.
यादृच्छिक
आधार पर
परीक्षण की
एक जांच यह देखने
के लिए की जा
सकती है कि एक
प्रतिनिधि
जनसंख्या
को
प्रतिदर्श
में शामिल
किया गया है
या नहीं।
प्रश्नों
की प्रकृति तथा
प्रकार इस
प्रकार हो
सकते हैं: वैकल्पिक
प्रश्न- इस प्रकार
के सवालों में,
उत्तर
हाँ या ना के रूप
में होता है। बहुविकल्पी
प्रश्न- इसमें प्रश्न
के कुछ संभव उत्तर
दिए होते हैं तथा
उत्तरदाताओं
को उनपर निशान
लगाना होता है। विशिष्ट
उत्तर के साथ प्रश्न
- इन प्रश्नों
का उत्तर केवल
एक ही तरह दिया
जा सकता है तथा
इसका और कोई उत्तर
नहीं हो सकता,
जैसे
जन्म तिथि। खुले
उत्तर वाले प्रश्न-
इसमें
उत्तरदाता एक
ही प्रकार से जवाब
देने के लिए बाध्य
नहीं होता। 1. प्रकाशित स्रोत- 2. अप्रकाशित स्रोत- कभी कभी शोध कार्य प्रकाशित नहीं होते हैं। ये द्वितीयक आंकड़ों के महत्वपूर्ण स्रोत हो सकते हैं। डाक द्वारा प्रश्नावली भेजकर आँकड़े संगृहीत करने की विधि के लाभ इस प्रकार हैं: •जब जाँच का क्षेत्र बड़ा होता है, तब यह विधि काफ़ी उपयोगी साबित होती है। •इस प्रकार की जाँच से समय और पैसे बचते हैं क्योंकि डाक करने का खर्चा व्यक्तिगत उपस्थिति से कम होता है। •इस विधि द्वारा आँकड़ों का संग्रह वास्तविक होता है तथा शोधकर्त्ता के अनुसार होता है। •चूँकि सूचना उत्तरदाता द्वारा ही दी गई होगी इसलिए यह शोधकर्त्ता की अभिनति से मुक्त होगी। इस विधि की कुछ हानियाँ इस प्रकार हैं: •अगर उत्तरदाता अशिक्षित हो, तब यह विधि असफल हो जाएगी। •यह संभव है कि उत्तरदाता समय से प्रश्नावली वापस न करें या उन्हें भेजे ही नहीं। •अपर्याप्त जानकारी की स्थिति में, अन्य प्रश्नों को पूछना संभव नहीं होता। •क्योंकि जाँच के विषय में समझाने के लिए कोई भी नहीं होता है, अतः ऐसा हो सकता है की सूचनादाता को प्रश्न समझ ना आए। प्रेक्षण प्रश्नावली विधि में शोधकर्त्ता जांच के क्षेत्र से संबंधित सवालों की एक सूची तैयार करके उत्तरदाताओं को डाक. ईमेल या संक्षिप्त सन्देश सेवा (SMS) द्वारा भेजता हैऔर भरी हुई प्रश्नावली गोपनीय रूप से एक निर्धारित समय अवधि के भीतर उत्तरदाताओं द्वारा शोधकर्त्ता को वापस भेज दी जाती है। इस विधि को प्रयोग करते समय निम्न बातों का ध्यान रखा जाना चाहिए: आँकड़ों के विभिन्न प्रकाशित स्रोत निम्न हैं: सरकारी प्रकाशन: भारत में केंद्र और राज्य सरकार विभिन्न प्रकार के आँकड़े प्रकाशित करते हैं, जैसे कि आर्थिक सर्वेक्षण, पंचवर्षीय योजना, वेतन पर सांख्यिकीय सार जनगणना के आँकड़े, राष्ट्रीय आय तथा उत्पादन के आँकड़े आदि। अर्द्ध-सरकारी प्रकाशन- विभिन्न अर्द्ध सरकारी संगठन जैसे वाणिज्य मण्डल, बीमा कंपनियां, व्यापार संघ आँकड़ों का संग्रहण तथा प्रकाशन करते हैं जिनका उपयोग अन्य विभागों या संगठनों द्वारा द्वितीयक आँकड़ों के रूप में किया जाता है। समितियों और आयोगों की रिपोर्टें: विशेष क्षेत्र के संबंध में सूचना संग्रहित करने के लिए सरकार विभिन्न समितियों तथा आयोगों को संगठित करती है। इस तरह के आकंड़ों को नीति निर्माण और कानूनों के निर्माण के लिए एकत्रित किया जाता है। पत्रिकाएँ तथा अखबार: दैनिक अख़बार तथा पत्रिकाएँ पर्याप्त मात्रा में आँकड़े प्रदान करते हैं। अनुसंधान संस्थानों का प्रकाशन: शोधार्थी अपने अध्ययन के क्षेत्र में, अनुसंधान संगठनों और संस्थाओं से विभिन्न आँकड़े एकत्रित करते हैं तथा अन्य शोधकर्ताओं या संगठनों के अनुसंधान को सुविधा प्रदान करते हैं। अंतर्राष्ट्रीय निकायों का प्रकाशन: विभिन्न अंतर्राष्ट्रीय निकाय जैसे अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष, अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन, विश्व स्वास्थ्य संगठन, आदि अपने निष्कर्ष और टिप्पणियाँ आवर्त रिपोर्टों के माध्यम से प्रकाशित करते हैं। इलेक्ट्रॉनिक संचार माध्यम से आँकड़ों के संग्रह के निम्नलिखित लाभ होते हैं: •दुनिया के किसी भी दूरस्थ कोनों से किसी भी प्रकार की सूचना कम समय में प्राप्त की जा सकती है। •पैसे, समय और श्रम के परिप्रेक्ष्य से यह विधि किफ़ायती है। •एकत्र तथ्य, विषय के अनुसार प्रामाणिक और विश्वसनीय होते हैं। •यह विधि किसी भी प्रकार के अधिमान से मुक्त है तथा इसमें पक्षपात की भी गुंजाईश नहीं है। इलेक्ट्रॉनिक संचार माध्यम से आँकड़ों के संग्रह की निम्नलिखित हानियाँ हैं: अविकसित क्षेत्रों में, लोग नवीनतम तकनीकों का उपयोग करने के लिए साक्षर या जागरूक नहीं होते हैं।
एक
अच्छी
प्रश्नावली
के गुण इस
प्रकार हैं: 1.
प्रश्नों
की सीमित
संख्या:
प्रश्नों
की संख्या
सीमित होनी
चाहिए। अत्यधिक
प्रश्न
प्रतिक्रिया
की दर को कम कर
सकते हैं। 2.
सरलता: प्रश्न
छोटे, सरल और
प्रासंगिक
होने चाहिए।
हमें
अनावाश्यक
शब्दों और
वाक्यांशों
से बचना
चाहिए। 3.
गणना: प्रश्नों
की गणना होनी
चाहिए और उत्तरदाओं
की ओर से बहुत
अधिक मानसिक
कार्य से जुडे
प्रश्नों से
बचा जाना
चाहिए। 4.
दोहरी
नकारात्मकता:
दोहरी
नकारात्मकता
वाले प्रश्नों
से बचा जाना
चाहिए।
उदाहरण के
लिए, क्या यह
सही है कि
आपने कल
अखबार नहीं
पढ़ा था| 5.उचित
क्रम: प्रश्न
सामान्य से
विशिष्ट की
ओर बढ़ने
चाहिए।
उदाहरण के
लिए, क्या
आपने
वार्षिक
छुट्टियां
फ्रांस में
बितायी?' दो
भागों में
पूछा जाना
चाहिए। 'क्या
आप हर वर्ष
वार्षिक
छुट्टी लेते
हो?'
द्वितीय, क्या
आपने कभी
वार्षिक
छुट्टियां
फ्रांस में बिताई|
द्वितीयक आँकड़े संग्रह विधि के कुछ मौलिक लाभ इस प्रकार हैं: द्वितीयक आँकड़ों के संग्रहण की कुछ हानियाँ इस प्रकार हैं : आँकड़ों के प्राथमिक स्रोतों के कुछ मौलिक लाभ इस प्रकार हैं: •प्राथमिक आँकड़े अधिक सटीक होते हैं क्योंकि ये क्षेत्र से संग्रहित किये जाते हैं। •प्राथमिक आँकड़े वास्तविक होते हैं तथा ये प्रत्यक्ष रूप से प्राप्त सूचना पर आधारित होते हैं। •प्राथमिक आँकड़े अधिक विश्वसनीय होते हैं क्योकि शोधकर्त्ता आँकड़ों को सीधे स्रोत से संग्रहित करता है। •प्राथमिक आँकड़े कुछ विशेष उद्देश्य के लिए एकत्रित किये जाते हैं। •प्राथमिक आँकड़े क्षेत्र स्रोत से विस्तृत जानकारी के साथ एकत्र किये जाते हैं। प्राथमिक आँकड़े अधिक प्रामाणिक और विश्वसनीय होते हैं परन्तु इसकी कुछ हानियाँ भी हैं जो इस प्रकार हैं: •प्राथमिक आँकड़ों का संग्रह एक महंगी प्रक्रिया है। •प्राथमिक आँकड़ों का संग्रह करने के लिए कई प्रगणकों को नियुक्त करने की आवश्यकता होती है। •प्राथमिक आँकड़ों को स्रोत से सीधा संग्रहित किया जाता है अतः इनका संग्रह अधिक समय लेता है। •प्राथमिक आँकड़ों को एकत्र करने के लिए शोधकर्त्ता को अत्यधिक कुशल होना चाहिए। •कई स्थितियों में आँकड़े उपस्थित नहीं होते हैं इसलिए प्राथमिक आँकड़ों का सग्रहण संभव नहीं हो पाता। प्राथमिक आँकड़ें वे आंकड़ें होते हैं, जिन्हें अनुसंधानकर्ता अपने उद्देश्य के लिए सबसे पहले प्रारम्भ से अंत तक स्वंय एकत्रित करता है। प्राथमिक आंकड़ों के संकलन की प्रमुख विधियां निम्नांकित हैं- (1) प्रत्यक्ष व्यक्तिगत अनुसंधान- इस विधि के अनुसार अनुसंधानकर्ता स्वयं अनुसंधान क्षेत्र में जाकर सूचना देने वालों से प्रत्यक्ष तथा सीधा सम्पर्क स्थापित करके आंकड़ें एकत्रित करता है। अर्थात् अनुसंधानकर्ता प्रत्यक्ष रूप से प्रत्येक व्यक्ति के पास जाकर उससे अनुसंधान संबंधी प्रश्न पूछता है और आवश्यक सूचनाएं प्राप्त करता है। (2) अप्रत्यक्ष मौखिक अनुसंधान- इस विधि में अनुसंधानकर्ता वास्तविक सूचना देने वालों के पास न जाकर ऐसे व्यक्तियों या साक्षियों से सम्पर्क स्थापित करता है, जो मांगी गई सूचना से प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से संबंधित हैं। (3) स्थानीय स्रोतों से सूचना प्राप्ति - इस विधि में अनुसंधानकर्ता अनुसंधान क्षेत्र के विभिन्न भागों से सूचना प्राप्त करने हेतु स्थानीय प्रतिनिधि या एजेन्ट नियुक्त करता है। ये एजेन्ट संवाददाता कहलाते हैं जो समय-समय पर अपने ढंग से सूचनाएं एकत्रित करके अनुसंधानकर्ता के पास भेजते रहते हैं। (4) सूचकों से प्रश्नावलियां भरवाना- आंकड़े एकत्रित करने की यह एक वैज्ञानिक विधि है। इस विधि में अनुसंधानकर्ता जांच से संबंधित एक प्रश्नावली तैयार करता है। प्रश्नावली में प्रत्येक प्रश्न के उत्तर के लिए रिक्त स्थान छोड़ा जाता है। प्रश्नावली की अनेक प्रतियां छपवा ली जाती है। फिर उन्हें सूचना देने वाले के पास डाक द्वारा भेज दिया जाता है। इसके साथ एक अनुरोध पत्र भी भेजा जाता है जिसमें प्रश्नावली को एक निश्चित तिथि तक भरकर भेजने की प्रार्थना की जाती है। इसे डाक विधि भी कहते हैं। (5) गणकों द्वारा अनुसूचियां भरवाना - इस विधि के अनुसार अनुसंधानकर्ता अनुसंधान से संबंधित प्रश्नों की अनुसूची तैयार करता है। इन अनुसूचियों को प्रत्यक्ष रूप से सूचकों के पास नहीं भेजा जाता वरन् कुछ गणक नियुक्त कर दिये जाते हैं, जो घर-घर जाकर सूचकों से पूछताछ करके स्वयं अनुसूचियां भरते हैं। दों विधियाँ B. तीन विधियाँ C. चार विधियाँ D. पांच विधियाँ वर्ग सीमा के निर्धारण की दो विधियाँ हैं, एक समावेशी विधि और दूसरी अपवर्जी विधि|
वर्ग के दो छोर वर्ग सीमा कहलाते हैं| निम्नतम मान निम्न वर्ग सीमा होती है और उच्चतम मान उच्च वर्ग सीमा होती है|
सांख्यिकीय आंकडें B. अपरिष्कृत आँकड़े C. संगठित आँकड़े D. पूर्ण आंकडें अपरिष्कृत आँकड़े अत्यधिक असंगठित होते हैं,
इनको संभालना दुष्करहैं , और अपरिष्कृत आँकड़ों से कोई अर्थपूर्ण निष्कर्ष निकालना कठिन है|
वर्गीकरण वह प्रक्रिया है जिसमे सभी मदों को विभिन्न वर्गों में उनकी विशेषताओं के अनुसार व्यवस्थित किया जाता है|
अपरिष्कृत आँकड़े अत्यधिक असंगठित होते हैं इसलिए आंकड़ों को एकत्रित करने के बाद, अगला चरण होता है उन्हेंसंगठित करना तथा वर्गीकृत रूप में प्रस्तुत करना|
विविक्त
चरवह चर है जो
दो मानों के
बीच सभी संभव
मानोंको नहीं
ले सकता|
उदाहरण
के लिए: एक
कक्षा में
विद्यार्थियों
की संख्या, एक
घर में कमरों
की संख्या
आदि| यह 1.2, 2/6 आदि
जैसे मान
नहीं ले सकते
हैं|
एक-विचर
बारंबारता
वितरण वह
बारंबारता
वितरण है
जिसमे केवल
एक चर होता है|
उदाहरण
के लिए: सारणी
बारंबारता के
एक चर को
दर्शाती है|
बारंबारता
B.
चर
C.
श्रेणी
D.
बारंबारता
प्रोफेसर
एच.
सेक्रिस्ट
के अनुसार:
एक
श्रेणी का
वस्तुओं को
परिभाषित
करने के लिए
सांख्यिकीय
प्रयोग हो
सकता है या
वस्तुओं की विशेषताओं
के अनुसार
कुछ तार्किक
क्रम में व्यवस्था
की जा सकती
है।
एकल
चर के
बारंबारता
वितरण (जैसे, छात्रों
के कुल अंक) को
एकविचर कहा
जाता है।
एक
विशेष
अनुक्रम या
क्रम में
आंकडों की
सुव्यवस्थित
व्यवस्था
को
सांख्यिकीय
श्रेणी के
रूप में जाना जाता
है।
कुछ
विशेषताओं के
आधार पर किये
गये
वर्गीकरण जिन्हें
ऊंचाई,भार,आय
आदि जैसी कुछ
विशेषताओं
के आधार पर
मापा जा सकता
है उनको
मात्रात्मक
वर्गीकरण
कहते है।
अपने
मूल रूप में
आंकडों को
अपरिष्कृत
आंकडें कहा
जाता है। आम
तौर पर ये
आंकडें असंगठित
होते हैं।
समावेशी
श्रृंखला के
अंतर्गत, वर्गों
की उच्च
वर्ग सीमाओं
को उनसे
संबंधित
वर्गों में
सम्मिलित
किया जाता
है। उदाहरण
के लिए, 11-15, 16-20,
21-25 इत्यादि।
एक
चर एक
विशेषता को
दर्शाता है
जिसे मापना
संभव है और
समय के साथ
इसके मान में
परिवर्तन होता
है।
वर्गीकरण
एक
प्रक्रिया
को दर्शाता
है जिसके द्वारा
संग्रहित
आंकडों को
उनके गुणों
और विशेषताओं
के अनुसार
वर्गों में
समूहित किया
जाता है। एक चर के अधिकतम और न्यूनतम मान के बीच अंतर की गणना करके वर्ग को प्राप्त किया जा सकता है। वर्ग के उच्चतम और न्यूनतम मान के बीच के अंतर को वर्ग विस्तार या वर्ग अंतराल कहते है। एक वर्ग के उच्चतम मान को ऊपरी वर्ग सीमा और वर्ग के निम्नतम मान को निम्न वर्ग सीमा कहा जाता है।
चर-
सांख्यिकी
में चर शब्द
का प्रयोग उन
प्रेक्षणों
के लिए किया
जाता है जिन्हें
संख्यात्मक
रूप से मापा
जा सकता है।
इस प्रकार
परिवारों की
आय, वस्तुओं की
कीमत, परिवारों
के आकार आदि
सभी चर हैं।
अपने
उद्देश्य
की निर्भरता
के आधार पर कई
अलग अलग
तरीकों से
समूहन या
वर्गीकरण
किया जा सकता
है।
सरल
रूप में तथ्यों
को प्रस्तुत
करना: वर्गीकरण
का मुख्य
उद्देश्य
आँकडों को सरल,
संक्षेप तथा
तार्किक रूप
में प्रस्तुतकरनाहोता
है ताकि एक
सामान्य
व्यक्ति
आँकड़ों को एक
नज़र में समझ
सके| उदाहरण
के लिए: ·
जनगणना
में एकत्रित
आँकड़े विशाल
और अव्यवस्थित
होते हैं। ·
इन
आँकड़ों से
कोई भी निष्कर्ष
निकालना
बहुत कठिन होता
है| ·
परन्तु
जब आँकड़े कुछ सामान्य
विशेषताओं
के आधार पर
वर्गीकृत
किये जाते हैं
जैसे आयु,
व्यवसाय आदि| ·
आँकड़ों
को आसानी से
समझा जा सकता
है|
एक
बारंबारता वितरण
मानों को व्यवस्थित
करने का एक
तरीका है
जिसमें एक या
एक से अधिक
चरों को
वितरण में
लिया जाता
है। बारंबारतावितरण
दो प्रकार के
होते हैं- विविक्तबारंबारता
वितरण- प्रत्येक
मान कितनी
बार एक
श्रेणी में
आया है मात्रा
के अनुसार एक
क्रम के रूप
में दिखाने
के लिए प्राय:इन
वितरणों को प्रस्तुत
किया जाता
है। संतत
बारंबारतावितरण- ये
वितरण उन
चरों पर ध्यान
देते है जो
निरंतरऊंचाई, भार
आदि जैसी
संख्या में
होते हैं।
भौगोलिक
वर्गीकरण या
स्थानिक
वर्गीकरण:इसके
अंतर्गत
आंकड़ो का
वर्गीकरण भौगोलिक
स्थितियों जैसे
महाद्वीपों, देशों,
राज्यों, शहरों, आदिके
आधार पर किया
जाता है | यह
वर्गीकरण
निम्न के
आधार पर किया
जा सकता है: संदर्भ
के लिए
वर्णमाला
क्रम में यातुलना
के लिए मानों
के आकार के
क्रममें|
वर्गीकरणकी
विशेषताएँ
इस
प्रकारहैं: ·
वर्गीकरण
का आधार
विविधता में
एकता है। ·
तथ्यों
को सजातीय
वर्गों में
वर्गीकृत
किया जाता है| ·
वर्गीकरण
या तो विशेषताओं
या गुणों या मापों
के अनुसार हो
सकता है| ·
वर्गीकरण,
वास्तविक या
काल्पनिक हो
सकता है। वर्गीकरणके
निम्नउद्देश्यहैं: ·
सरल
रूप में तथ्यों
को प्रस्तुत
करना ·
तुलनायोग्य
बनाना ·
समानता
और विषमताओं
के बिंदुओं
पर प्रकाश डालना
·
एक
संबंध
स्थापित
करना ·
आँकड़ों
को आसानी से
समझने लायक
बनाना, तथा ·
सारणी
के लिए आधार
तैयार करना संचयी बांरबारता श्रेणी में बारंबारताओं का क्रमिक जोड़ है। संचयी बारंबारता के प्रकार हैः यह वर्ग मान के सभी मानों जिससे यह संबंधित है उससे कम या बराबर कुल बारंबारता का प्रतिनिधित्व करती है। यह वर्ग मान के सभी मानों जिससे यह संबंधित है उससे अधिक या बराबर कुल बारंबारता का प्रतिनिधित्व करती है।
एक-विचर
बारंबारता
वितरण: वह
बारंबारता
वितरण है
जिसमे केवल
एक चर होता है| उदाहरण
के लिए: सारणी
बारंबारता के
एक चर को
दर्शाती है| जबकि, द्विचर
बारंबारता
वितरण: वह
बारंबारता
वितरण है
जिसमे दो चर
होते हैं| उदाहरण
के लिए: 20 कंपनियों
के द्विचर विक्रय
तथा
विज्ञापन
व्यय का बारंबारता
वितरण|
चर
एक वस्तु या
विशेषताओं
को संदर्भित करता
है, जिनको मापा
जाना संभव है
और जिसके मान
समय के साथ
बदलते रहते
है। दो
प्रकार के चर
हैं: संतत
चर:
यह वह
चर होते हैं जो
दो दिए गए मानों
के बिच से
किसी भी मानको
ले सकते हैं| उदाहरण
के
लिए: पूर्णाक मान
जैसे 1,
2, आदि| विविक्त
चर:
यह
वह चर है जो दो
मानों के बीच
सभी संभव
मानोंको
नहीं ले
सकता|यह
सामान्तः
भिन्नात्मक
नहीं होते
हैं| उदाहरण
के लिए: एक
कक्षा में
विद्यार्थियों
की संख्या, एक
घर में कमरों
की संख्या
आदि| यह 1.2,
2/6 आदि जैसे
मान नहीं ले
सकते हैं|
सामान्य
विशेषताओं
के आधार पर
निम्नलिखित
श्रेणीयां
होती हैं: काल-श्रेणी: यह
काल में क्रमागत
बिंदुओं के
कुछ चर के
मानों की
श्रेणी है| आँकड़े
कुछ समय इकाईजैसे
की वर्ष, माह, सप्ताह या
दिन के
संदर्भ में
प्रस्तुत
किये जाते
हैं।उदाहरण
के लिए: एक
कारखाने का
चीनी उत्पादन| स्थानिक
श्रेणी:यह
भौगोलिक
स्थिति के
अनुसार चरों
के मानों की
श्रेणी है| आँकड़ेकुछ
भौगोलिक
भागों के
संदर्भ में
प्रस्तुत किये
जाते हैं
जैसे देश,
राज्य, शहर
आदि|उदाहरण
के लिए:विद्यालयों
की संख्या| स्थिति
श्रेणी: यह
स्थिति के
अनुसार कुछ
चरों के
मानों की श्रेणी
है| आँकड़े
कुछ स्थिति
के संदर्भ
में
प्रस्तुत किये
जाते हैं,
जैसे कद, आयु,
वजन, आय आदि| उदाहरण
के लिए:100 श्रमिकों
की
साप्ताहिक
आय|
वर्गीकृत
आकड़ें कई
मायनों में
निश्चत रूप
से
अवर्गीकृत
आंकड़ों से
बेहतर होते हैं। 1.
वर्गीकरण एक
पद का पता
लगाने को
आसान बनाकर हमारे
समय को
बचता है। यदि
हम 1000 छात्रों
के अंकों में
से एक छात्र
के उच्चतम
अंक का पता
लगाना चाहते
हैं तो हमें
सम्पूर्ण
अवर्गीकृत
आंकड़ों में
जाना
पड़ेगा। यह
एक बहुत
थकाने वाला
काम होगा।
लेकिन यदि इसे
हम विभिन्न
वर्गों के
अंतर्गत
आरोही या
अवरोही क्रम
में वर्गीकृत
करते हैं तो
हम इसका
आसानी से पता
लगा सकते हैं। 2.
वर्गीकरण
समूहों में
सरल रूप से
आंकड़ों को संक्षिप्त
करता है। यह
आंकड़ों को
देखने और अन्य
समूहों के
साथ इसकी
तुलना करने
को आसान बनाता
है। आगे
कोई भी सुव्यवस्थित
सांख्यिकीय
विश्लेषण किये
जाने से पहले उचित
संगठन आवश्यक
होता है जैसे
कि औसतों का
वर्गीकृत
आंकड़ों से
परिकलन नहीं
किया जा सकता
है।
यदि
चर xविविक्त
है और हमारे
पास प्रत्येक
मान के
अनुरूप बारंबारताएंहै तो
हमें एक बारंबारता
सारणीलेते
हैं। इसमें
कोई वर्ग
अंतराल नहीं
होते हैं। मान
लो 100 परिवारों
का एक
सर्वेक्षण
उनके आकार के
बारे में
जानकारी
प्राप्त
करने के लिए
किया जाता
है।
सर्वेक्षण
का परिणाम एक बारंबारता
सारणीके रूप
में
वर्गीकृत
किया
जायेगा। (1) x 1 2 3 4 5 6 7 8 (2) परिवारों
की संख्या f 5 14 23 38 10 5 3 2 स्तम्भ
(1) जो कि x चर है वह
परिवारों के
आकार से लिये
गये मानों को
देता है और स्तम्भ
(2) इससे
संबंधित बारंबारताओं
को
देता है। एक
बारंबारतावितरण
मात्रात्मक
चर के अपरिष्कृत
आंकडों को
वर्गीकृत
करने का एक
विस्तृत
तरीका है। यह
दिखाता है कि
एक चर के
विभिन्न
मान उनकी
वर्ग बारंबारताओं
के
साथ विभिन्न
वर्गों में
कैसे वितरित
होते हैं। 100
छात्रों और
उनके अंकों
का एक सर्वेक्षण
इस तरह से
दिखेगा- वर्ग 0-10 10-20 20-30 30-40 40-50 50-60 60-70 70-80 80-90 90-100 आवृत्ति 1 8 6 7 21 23 19 6 5 4 5 15 25 35 45 55 65 75 85 95
संतत
बारंबारतावितरण
विभिन्न
प्रकार के हो
सकते हैं- समावेशी-
समावेशी
विधि में, एक
वर्ग अंतराल
की उच्च
सीमा अगले
वर्ग की एक
निम्न सीमा
के रूप में
नहीं दिखाई
देगी। अपवर्जी-
अपवर्जी
विधि में, एक
वर्ग अंतराल
की उच्च
सीमा अगले
वर्ग अंतराल
की निम्न
सीमा होती
है। खुले सिरे
वाली विधि-
खुले सिरे का
अर्थ है कि प्रथम
वर्ग अंतराल
की निम्न
सीमा और
अंतिम वर्ग
अंतराल की
उच्च सीमा
वितरण में
नहीं दी हुयी
होती है।
इसका क्रमशः से
कम और से अधिक
के रूप में
उल्लेख
किया जाता
है। संचयी
वितरण- संचयी
वितरण में,आवृत्तियां
उत्तरोत्तर
संचयी होती
है। प्रथम
वर्ग अंतराल
की आवृत्ति
स्वत ही
संचयी होती
है और दूसरी
संचयी बारंबारतापहली
और दूसरी बारंबारताका
योग होती है, और
इसी तरह जारी
रहती है। मध्यमान
वितरण- मध्यमान
श्रृंखला
में,
एक
वर्ग अंतराल
का मध्यमान
और उससे
संबंधित बारंबारताएं
दी
हुयी होगी
तथा वर्ग
अंतराल के
तदनुसार गणना
की जानी
चाहिए।
बारंबारतावितरण
तैयार करते
समय, निम्न चार
प्रश्नों
पर ध्यान
दिया जाना
चाहिए- 1.
हमें कितने
वर्ग रखने
चाहिए? अधिसंख्य
वर्गों वालाबारंबारतावितरण
बहुत बडा
दिखेगा।
दूसरी ओर
बहुत कम वर्गों
होने के कारण
सूचना की
हानि होगी।
सामान्यता 5
से 15 के बीच
वर्गों की
संख्या को
अच्छा माना
जाता है। 2. एक वर्ग
का आकार क्या
होना चाहिए? यह
उच्चतम मान
और निम्नतम
मान या चर की
सीमा के बीच
के अंतर पर
निर्भर
होगा। R सीमा और n
वर्गों की
संख्या का
पता लगाकर हम
वर्ग के विस्तार
के रूप में h
प्राप्त
करते हैं। H = R / n 3.
हमें वर्ग
सीमाएं कैसे
निर्धारित
करनी चाहिए? सामान्यता
बारंबारताका
निम्नतम
मान वर्गों
की निम्नतम
सीमा होती
है। फिर हम ऊपरी
सीमा प्राप्त
करने के लिए
इसमें वर्ग
अंतराल को
जोड देते
हैं। उदाहरण
के लिए यदि 0
निम्नतम
प्राप्त
अंक है तब
हमारा प्रथम
वर्ग 0-10 के रूप
में हो सकता
है। अगला
वर्ग 10-20 होगा।
सीमाएं
अपवर्जी या समावेशी
हो सकती हैं। 4.
हमें प्रत्येक
वर्ग की बारंबारताकैसे
प्राप्त
करनी चाहिए? जब
आंकडों को
वर्गों में
समूहित किया
जाता है तब
वर्ग बारंबारताएक
विशिष्ट
वर्ग में
मानों की
संख्या को
दर्शाती है।
गिनती उस
वर्ग के
सामने मिलान
चिन्हों को
लगाकर की
जाती है। तीन चरों को B. केवल एक चर को C. दो या दो से अधिक चरों को D. किसी भी चर को नहीं सरल दंड-आरेख प्रस्तुत करता हैं केवल एक चर को
वृत्तीय आरेख B. दण्ड आरेख C. आयत चित्र D. बहुभुज वृत्त आरेख एक ऐसा वित्तिय आरेख हैए जिसके क्षेत्र को आनुपातिक रूप से क्षेत्रों या घटकों में विभाजित किया जाता हैए जिन्हें यह दर्शाता है।
वृत्त चार्ट या पाई आरेख भी कहते हैं
दण्ड आरेख B. आयत चित्र C. वृतिय (पाई) आरेख D. दोनों (1) तथा (3)
अंकगणितीय रैखिक आलेख:
· इसको काल श्रेणी आलेख भी कहते हैं|
· काल को X-अक्ष पर आलेखित किया जाता है|
· चर का मान Y-अक्ष पर आलेखित किया जाता है|
दण्ड उध्र्वाधर या क्षैतिज दोनों ही प्रकार के हो सकते हैं B. दण्डों की चैड़ाई एक जैसी नहीं रहती है। C. सभी दण्ड एक ही आधार रेखा पर स्थित नहीं होते है। D. उपरोक्त सभीSOLUTION
A.
मध्यिका
SOLUTION
B.
C.
D.
Right Answer is: BSOLUTION
B.
C.
D.
Right Answer is: SOLUTION
B.
C.
D.
Right Answer is: SOLUTION
B.
C.
D.
Right Answer is: SOLUTION
B.
C.
D.
Right Answer is: SOLUTION
B.
C.
D.
Right Answer is: SOLUTION
B.
C.
D.
Right Answer is: SOLUTION
B.
C.
D.
Right Answer is: SOLUTION
वहाँ हार्डवेयर की उपलब्धता में भी कमी हो सकती है जैसे फ़ोन, कंप्यूटर या इंटरनेट की सुविधा न होना।
B.
C.
D.
Right Answer is: SOLUTION
B.
C.
D.
Right Answer is: SOLUTION
B.
C.
D.
Right Answer is: SOLUTION
B.
C.
D.
Right Answer is: SOLUTION
B.
C.
D.
Right Answer is: SOLUTION
A. SOLUTION
Right Answer is: A
SOLUTION
A. SOLUTION
SOLUTION
Right Answer is: B
SOLUTION
A.
B.
C.
D.
Right Answer is: BSOLUTION
A.
B.
C.
D.
Right Answer is: ASOLUTION
A.
SOLUTION
B.
C.
D.
Right Answer is: SOLUTION
B.
C.
D.
Right Answer is: SOLUTION
B.
C.
D.
Right Answer is: SOLUTION
B.
C.
D.
Right Answer is: SOLUTION
B.
C.
D.
Right Answer is: SOLUTION
B.
C.
D.
Right Answer is: SOLUTION
B.
C.
D.
Right Answer is: SOLUTION
B.
C.
D.
Right Answer is: SOLUTION
B.
C.
D.
Right Answer is: SOLUTION
गुण-
कुछ
प्रेक्षण
ऐसे होते हैं
जिन्हें
संख्यात्मक
रूप से नहीं
मापा जा सकता
है जैसे
लोगों की आकृति, संगीत
के प्रति
लगाव। इन्हें
गुण कहा जाता
है। गुणों को
श्रेणी दी जा
सकती है
लेकिन मापा
नहीं जा सकता
है।
B.
C.
D.
Right Answer is: SOLUTION
उन्हें
समय के
अनुसार
समूहित किया
जा सकता है।
ऐसे प्रकार
के वर्गीकरण
को कालानुक्रमिक
वर्गीकरण के
रूप में जाना
जाता है। इस
प्रकार के
वर्गीकरण
में,
आंकडों
को समय के
संदर्भ जैसे-
वर्षों, महीनों, दशकों
आदि के रूप
में आरोही या
अवरोही क्रम
में
वर्गीकृत
किया जाता
है। विशेष
वर्गीकरण में
आंकडों को
भौगोलिक
स्थितियों
जैसे कि देशों, राज्यों, शहरों, बस्तियों
आदि के
संदर्भानुसार
वर्गीकृत किया
जाता है।
B.
C.
D.
Right Answer is: SOLUTION
B.
C.
D.
Right Answer is: SOLUTION
B.
C.
D.
Right Answer is: SOLUTION
B.
C.
D.
Right Answer is: SOLUTION
B.
C.
D.
Right Answer is: SOLUTION
B.
C.
D.
Right Answer is: SOLUTION
B.
C.
D.
Right Answer is: SOLUTION
B.
C.
D.
Right Answer is: SOLUTION
B.
C.
D.
Right Answer is: SOLUTION
B.
C.
D.
Right Answer is: SOLUTION
परिवारों
का आकार
वर्ग
अंक
B.
C.
D.
Right Answer is: SOLUTION
B.
C.
D.
Right Answer is: SOLUTION
A. SOLUTION
A. SOLUTION
A. SOLUTION
Right Answer is: D
SOLUTION
A.