प्रकीर्ण आरेख के कुछ अवगुण इस प्रकार हैं:
i) सटीकता में कमी: एक प्रकीर्ण आरेख सहसंबंध सटीकता से मापन नहीं कर सकता। अर्थात प्रकीर्ण आरेख सहसंबंध का मात्रात्मक माप नहीं है।
ii) अनुमानित सहसंबंध: एक प्रकीर्ण आरेख सहसंबंध का एक अनुमानित विचार देता है।
iii) सीमित उपयोगिता: दो से अधिक चरों के मामले में प्रकीर्ण आरेख से सहसंबंध को मापना संभव नहीं है।
स्पीयरमैन का कोटि सहसंबंध निम्न चरणों के द्वारा परिकलित किया जाता है:
चरण 1: चरों के विभिन्न मदों की कोटियाँ निर्धारित करें|
चरण 2: कोटियों के बीच अंतर पता करके इसे DD से सूचित करें।
चरण 3: इन अंतरों के वगों का योह निकलें।
चरण 4: उसके बाद निम्न सूत्र का प्रयोग करें:
r = 1-6∑D2/ N (N2-1)
जहां: r = सहसंबंध का गुणांक
∑D2= संबंधित कोटियों के अंतरों के वर्गों का योग
N= अवलोकनों के जोड़ों की संख्या।
स्पीयरमैन का कोटि सहसंबंध दो चरों में विविध मद मूल्य की कोटियों पर आधारित है। यह निम्नलिखित परिस्थितियों में उपयोगी होता है-
· जब हमें वभिन्न गुणवत्ताओं के बीच संबंध को परिमाणीकृत करने की आवश्यकता होती है|
· जब चरों के चरम मानों का कार्ल पियरसन सहसंबंध गुणांक चरम मानों से रहित सहसंबंध गुणांक से काफी भिन्न हो तब कोटि-सहसंबंध चरों के बीच संबंध का बेहतर माप होता है|
· जब चरों के वास्तविक परिमाण या मूल्य नहीं पाए जा सकते हों| जैसे अगर हमें वजह और लम्बाई में सहसंबंध जानना हो लेकिन हमारे पास इनको मापने का कोई साधन न हो तब हम इनको कोटिबद्ध करके इनका स्पीयरमैन कोटि सहसंबंध निकाल सकते हैं|
कार्ल पियरसन के द्वारा सुझाया गया ‘r’ अर्थात सहसंबंध का गुणांक साहचर्य के लिए मुख्य है क्योंकि:
यह दो विभिन्न आंकड़ों के बीच तुलना करता है। सहप्रसरण की गणना करने के लिए निम्न सूत्र का प्रयोग किया जाता है:
X और Y का गुणांक= ∑ xy /N
सहप्रसरण संबंध को मापने का एक निरपेक्ष माप है। जबकि सहसंबंध का गुणांक संबंध का एक सापेक्ष मापन है जो मापन की इकाई से मुक्त है।
इस प्रकार संबंध मापने के लिए कार्ल पियरसन सहसंबंध को महत्ता दी जाती है।
सहसंबंध कार्य कारण संबंध को लागू नहीं करता है। जब दो चरों को सहसंबंध परिकलित किया जाता है, तो इसका अर्थ है कि दो चर धनात्मक या ऋणात्मक रूप से जुड़े हुए हैं। जब दो चरों में सहसंबंध होता है तो इसका अर्थ यह नहीं होता कि उनमें से एक कारण है और दूसरा प्रभाव है।
उदाहरण के लिए, शिशुओं की मृत्यु और बारिश के बीच सहसंबंध हो सकता है, मगर यह कहना सही नहीं होगा की मौसम की वजह से शिशुओं की मृत्यु होती है। बारिशों संकरात्मक बिमारियां जैसे मलेरिया,डेंगू आदि का खतरा बढ़ जाता है और इस वजह वर्षा के मौसम में शिशुओं की मृत्यु अधिक हो सकती है|
सरल सहसंबंध गुणांक की तुलना में कोटि सहसंबंध निम्न परिस्थितियों में अधिक उपयुक्त है:
i) जब आंकड़े गुणवत्तापरक प्रवृत्ति के होते हैं जैसे सौंदर्य, ईमानदारी आदि, क्योंकि इन्हें अर्थपूर्ण तरीके से मापा नहीं जा सकता है।
ii) जब विभिन्न मद मूल्यों की कोटि चर में दी जाती है।
iii) जब चरम मूल्य उपस्थित होते हैं।
कार्ल पियरसन के सहसंबंध के गुणांक ( r ) की कोई इकाई नहीं होती है। यह एक शुद्ध संख्या है।
सहसंबंध के गुणांक को निम्न पद्धतियों से परिकलित किया जा सकता है:
1. संशोधित विधि

जहाँ
X = Xश्रंखलाओं की मदें
Y = Y श्रंखलाओं की मदें
x=X- X का माध्य और y=Y- Y का माध्य
2. प्रत्यक्ष विधि
N = अवलोकनों की संख्या
3. पद विचलन विधि

जहाँ

यहाँ पर A तथा C क्रमशः X तथा Y के कल्पित मान हैं। h तथा k समापवर्तक हैं।
| अर्थशास्त्र में अंक | 24 | 26 | 32 | 33 | 35 | 30 |
| पढने के घंटे | 12 | 35 | 19 | 30 | 30 | 15 |
|
अर्थशास्त्र में अंक |
पढने के घंटे |
x=X- Xका माध्य |
y=Y-Yका माध्य |
x2 |
y2 |
xy |
|
24 |
20 |
-6 |
-5 |
36 |
25 |
30 |
|
26 |
30 |
-4 |
5 |
16 |
25 |
-20 |
|
32 |
20 |
2 |
-5 |
4 |
25 |
-10 |
|
33 |
30 |
3 |
5 |
9 |
25 |
15 |
|
35 |
30 |
5 |
5 |
25 |
25 |
25 |
|
30 |
20 |
0 |
-5 |
0 |
25 |
0 |
|
|
|
|
|
|
|
|



=
0.344
कोटि सहसंबंध 0.344 है जो अर्थशास्त्र में हासिल अंक और अध्ययन पर बिताया गया समय का सम्बन्ध बताता है।
|
पहले निर्णायक द्वारा दी गई कोटियाँ |
दूसरे निर्णायक द्वारा दी गई कोटियाँ |
D |
D2 |
|
1 |
2 |
-1 |
1 |
|
2 |
3 |
-1 |
1 |
|
3 |
5 |
-2 |
4 |
|
4 |
1 |
3 |
9 |
|
5 |
6 |
-1 |
1 |
|
6 |
4 |
2 |
4 |
|
|
|
|
|

r = 1-[(6 X 20)/(63-6)] = 0.43
कोटि सहसंबंध 0.43 है| यह दो न्यायाधीशों की कोटियों के बीच धनात्मक सहसंबंध बताता है।
स्पीयरमैन के कोटि सहसंबंध के गुण निम्नलिखित हैं:
i) यह कार्ल पियरसन की पद्धति की तुलना में समझना और परिकलित करना आसान है।
ii) जब आंकड़े गुणवत्तात्मक प्रवृत्ति के होते हैं जैसे सौंदर्य, ईमानदारी, बुद्धिमत्ता आदि, तो इसे सफलता से प्रयोग किया जा सकता है।
iii) जब वास्तविक आंकड़ों के स्थान पर चरों में विभिन्न मूल्य मदों की श्रेणियां दी जाती हैं, यह सहसंबंध के परिमाण का पता लगाने के लिए इकलौती पद्धति है।
स्पीयरमैन के कोटि सहसंबंध के अवगुण निम्नलिखित हैं:
i) इस पद्धति को समूहीकृत पुनरावृत्त वितरणों में सहसंबंध की गणना करने के लिए प्रयोग किया जाता है। यह केवल व्यक्तिगत अवलोकनों पर लागू होती है।
ii) अगर मूल्यों की संख्या बहुत बड़ी हो अर्थात 30 से अधिक हो, तो कोटियाँ और उनके अंतरों को जानना बहुत कठिन हो जाता है।
iii) इस पद्धति में कार्ल पियरसन की पद्धति की तुलना में शुद्धता की कमी होती है। यह केवल कोटियों का ही प्रयोग करती है। वास्तविक मूल्यों को संज्ञान में नहीं लिया जाता है।
प्रकीर्ण आरेख दो चरों के बीच संबंध का रेखीय विश्लेषण करने के लिए एक सांख्यिकीय उपकरण है।
प्रकीर्ण आरेख में, प्रकीर्ण बिंदुओं के सामीप्य की कोटि और उनकी व्यापक दिशा के आधार पर चरों के आपसी संबंध की जानकारी प्राप्त की जाती है।
यदि सभी बिंदु एक ही सीधी रेखा पर आते हैं, तो सहसंबंध पूर्ण होता है। जब रेखा नीचे के कोने से ऊपर दाएं की तरफ जाती है, तो सहसंबंध धनात्मक होता है और जब यह शीर्ष बाएँ से नीचे दाएँ की तरफ आती है तो यह ऋणात्मक होता है।
सामान्य रूप से सहसंबंध पूर्ण से कम होता है। जितने अधिक बिंदु सीधी रेखा के नज़दीक होंगे, उतना ही सहसंबंध दृढ़ होगा। और जब प्रकीर्ण बिंदु सरल रेखा के चारों तरफ फैले हुए होते हैं तब सहसंबंध शून्य माना जाता है।
| वर्ष | 2009 | 2010 | 2011 | 2012 | 2013 | 2014 |
| जन्म दर | 24 | 27 | 32 | 33 | 35 | 30 |
| मृत्यु दर | 15 | 20 | 22 | 24 | 27 | 24 |
|
X |
Y |
x |
y |
x2 |
y2 |
xy |
|
24
27
32
33
35
30 |
15
20
22
24
27
24 |
- 9
- 6
- 1
0
2
-3 |
- 9
- 4
- 2
0
3
0 |
81
36
1
0
4
9 |
81
16
4
0
9
0 |
81 24 2 0 6 0 |
|
∑x = -17 |
∑y= -12 |
∑x2 =131 |
∑y2= 110 |
∑XY = 113 |


r =0.93
सह-संबंध का मूल्य 0.93 है, जो यह बताता है कि मृत्यु दर और जन्म दर के बीच लगभग पूर्ण सहसंबंध है|
दो मूल्यों के बीच संबंधों का निर्धारण सहसंबंध गुणांक के परिणामात्मक मूल्यों के द्वारा किया जा सकता है। सहसंबंध के परिमाण को निम्न मदों के अंतर्गत अध्ययन किया जा सकता है:
सहसंबंध के परिमाण
|
परिमाण |
धनात्मक |
ऋणात्मक |
|
+1 +0.75 और +1 के बीच +0.25 और +0.75 के बीच 0 और +0.25 के बीच शून्य |
-1 0.75 और -1 के बीच -0.25 और -0.75 के बीच -0 और –0.25 0 के बीच शून्य |
समान्तर माध्य वह संख्या है जो किसी श्रृंखला के सभी मदों के मूल्यों के जोड़ को उनकी कुल संख्या से भाग देने पर प्राप्त होती है। संक्षेप में, समान्तर माध्य किसी श्रृंखला की सभी मदों का एक औसत मान होता है।
समान्तर माध्य के गुण-
1. सरल- इस माध्य को समझना बहुत आसान है।
2. सभी मूल्यों पर आधारित- यह श्रेणी के सभी मूल्यों पर आधारित होता है इसलिए यह एक प्रतिनिधि माध्य है।
3. स्थिर- यह निदर्शन के परिवर्तनों से बहुत कम प्रभावित होता है।
4. बीजगणितीय विवेचन- समान्तर माध्य का बीजगणितीय विवेचन संभव है इसलिए इसको उच्चतर सांख्यिकीय विश्लेषण में बहुत अधिक प्रयोग किया जाता है।
5. निश्चित- इसका मूल्य हमेशा निश्चित रहता है। श्रेणी चाहे जिस क्रम में लिखी जाए, समान्तर माध्य सदैव एक ही रहता है।
6. तुलना का आधार- इसके आधार पर समूह की तुलना करना आसान होता है।
समान्तर माध्य के दोष-
1. हास्यास्पद
परिणाम- इसके
द्वारा कभी
कभी भ्रमात्मक
एवं असंगत
निष्कर्ष
निकल आते हैं
जो हास्यास्पद
होते हैं।
उदाहरण के
लिए यदि एक
परिवार में 4
बच्चें है
और दूसरे में 3,
तो उनका
समान्तर
माध्य
बच्चे हुआ।
जो एक अवास्तविक
औसत माप होगी, क्योंकि
बच्चों को
अंशों में
विभाजित
नहीं किया जा
सकता।
2. चरम मूल्यों का प्रभाव- समान्तर माध्य पर चरम मूल्यों का अधिक प्रभाव पड़ता है। श्रेणी में आने वाली बड़ी संख्या माध्य को अपनी ओर खींच लेती है।
3. प्रतिनिधि
तथा अवास्तविक-
समान्तर
माध्य वह
मूल्य हो
सकता है
जिसका
श्रेणी में
बिल्कुल ही
अस्तित्व न
हो। उदा0 4, 8
और 9 का औसत
है
जो कि श्रेणी
की कोई मद ही
नहीं है।
4. गणना संबंधी कठिनाइयां- इसकी गणना किसी एक मद या मूल्य की कमी होने पर नहीं की जा सकती।
5. मूल्यों का समान महत्व- समान्तर माध्य में सभी मूल्यों को समान महत्व या भार दिया जाता है जो कि अवास्तविक और त्रुटिपूर्ण है।
6. भ्रमात्मक निष्कर्ष- कभी कभी समान्तर माध्य के आधार पर निकाले गये निष्कर्ष गलत एवं भ्रमात्मक होते हैं। इनसे श्रेणी की रचना या बनावट का ज्ञान नहीं हो पाता।
| वर्ग-अन्तराल | आवृति |
| 10 - 20 | 4 |
| 20 - 30 | 12 |
| 30 - 40 | 40 |
| 40 - 50 | 41 |
| 50 - 60 | 27 |
| 60 - 70 | 13 |
| 70 - 80 | 9 |
| 80 - 90 | 4 |
प्रत्यक्ष विधि द्वारा समान्तर माध्य की गणना-
|
वर्ग-अन्तराल (x) |
आवृति (f) |
मध्य-मान (m) |
मध्य मान तथा आवृतियों का गणनफल (fm) |
|
10 - 20 |
4 |
15 |
60 |
|
20 - 30 |
12 |
25 |
300 |
|
30 - 40 |
40 |
35 |
1400 |
|
40 - 50 |
41 |
45 |
1845 |
|
50 - 60 |
27 |
55 |
1485 |
|
60 - 70 |
13 |
65 |
845 |
|
70 - 80 |
9 |
75 |
675 |
|
80 - 90 |
4 |
85 |
340 |
|
|
|

A.
25
B. 35.
C. 60.
D. 80.
परास= L - S अर्थात श्रंखला में सबसे अधिक और सबसे कम मान के बीच अंतर। तो इस प्रकार यहाँ। परास = 100 – 20 = 80
A.
केंद्रीय
प्रवृत्ति
का माप
B. परिक्षेपण का माप
C. सारणीकरण
D. प्रस्तुतीकरण
परिक्षेपण का माप आंकड़ों के दो या अधिक समूहों की संगतता और एकरूपता का निर्धारण करने में उपयोगी होता है।
A.
मानक
विचलन
B. माध्य विचलन
C. विचरण
D. चतुर्थक विचलन
विचरण का गुणांक = (मानक विचलन/ माध्य) ×100
A.
मानक
विचलन
B. माध्य विचलन
C. सहसंबंध
D. परास
परिक्षेपण के माप हैं: परास, चतुर्थक विचलन, माध्य विचलन, और मानक विचलन|
A.
लारेंज
वक्र
B. आवृत्ति वक्र
C. वितरण वक्र
D. परिक्षेपण वक्र
लारेंज वक्र हमेशा ही समान वितरण रेखा के नीचे रहता है, जब तक वितरण एकरूप न हो। यदि वितरण एकरूप है तो लारेंस वक्र समान वितरण के साथ जुड़ जाएगा। लारेंस वक्र वितरण रेखा से जितना अधिक दूर होगा, उतना ही अधिक परिक्षेपण होगा।
A.
चतुर्थक
विचलन गुणांक
B. मानक विचलन
C. माध्य विचलन
D. केंद्रीय विचलन
QD या चतुर्थक विचलन को अर्द्ध –अंतर-चतुर्थक परास भी कहा जाता है। उच्च चतुर्थक (Q3) और निम्न चतुर्थक(Q1) के आधे को चतुर्थक विचलन कहा जाता है। प्रतीकात्मक रूप से इसे लिखते हैं: चतुर्थक विचलन = (Q3- Q1)/2
A.
उच्च
माध्य
B. निम्न माध्य
C. उच्च परिक्षेपण
D. निम्न परिक्षेपण
अंतर-चतुर्थक परास के आधे को चतुर्थक विचलन कहा जाता है। जितना कम चतुर्थक विचलन का माप होगा उतना ही कम परिक्षेपण होगा।
A.
दंड
आरेख
B. तोरण
C. लारेंज़ वक्र
D. बारंबारता बहुभुज
समान वितरण की रेखा से लारेंज़ वक्र का पलायन परिक्षेपण की सीमा को इंगित करेगा।
A.
केवल
ऊपरी सीमा का
निर्धारण
किया गया है
B. केवल निचली सीमा
C. या तो निचली सीमा को परिभाषित किया गया है या ऊपरी
D. दोनों ऊपरी और निचली सीमा को परिभाषित किया गया है
परास को मुक्तांत आवृत्ति वितरण के लिए परिकलित नहीं किया जा सकता है। मुक्तांत वितरण वे हैं जिनमें या तो निम्न वर्ग की निम्न सीमा को या उच्च वर्ग की उच्च सीमा का या फिर किसी का भी निर्धारण नहीं किया गया हो।
परिक्षेपण, आंकड़ों के अवलोकनों की उसके औसत से दूरी तथा फैलाव को परिभाषित करता है।
A.
मानक
विचलन
B. माध्य विचलन
C. परास
D. चतुर्थक विचलन
मानक विचलन श्रृंखला के समूह में सभी अवलोकनों का प्रयोग करता है| इसमें वितरण के सभी मद सम्मिलित होते हैं और यह हमेशा समांतर माध्य से ही परिकलित्त किया जाता है|
A.
चतुर्थक
विचलन में
B. मानक विचलन में
C. माध्य विचलन में
D. समांतर माध्य में
QD या चतुर्थक विचलन को अर्द्ध –अंतर-चतुर्थक परास भी कहा जाता है। उच्च चतुर्थक (Q3) और निम्न चतुर्थक(Q1) के आधे को चतुर्थक विचलन कहा जाता है. प्रतीकात्मक रूप से इसे लिखते हैं: चतुर्थक विचलन = (Q3- Q1)/2
A.
परास
B. निरपेक्ष माप
C. सापेक्ष माप
D. धनात्मक माप
चूंकि सापेक्ष माप श्रृंखला की इकाइयों से मुक्त होते हैं, तो उन्हें कई समूहों की तुलना करने के लिए प्रयोग किया जा सकता है, जिनकी माप की इकाइयां भिन्न होती हैं।
A.
कम
B. अधिक
C. स्थाई
D. लचीला
माध्यिका से लिए गए विचलनों का माप समांतर मान से लिए गए विचलनों के माप से कम होता है क्योंकि माध्यिका से निरपेक्ष परिक्षेपण का माप माध्य से निरपेक्ष विचलनों के योग से कम होता है।
A.
परास
B. चतुर्थक विचलन
C. माध्य विचलन
D. मानक विचलन
मुक्तांत विचलन वे विचलन हैं जिनमें या तो न्यूनतम श्रेणी की न्यूनतम सीमा या उच्चतम श्रेणी की उच्च सीमा स्पष्ट नहीं होती है।
A.
1.25
B. 1.
C. 0.9.
D. 0.8.
A.
कुछ
ख़ास मानों से
B. श्रृंखला के किसी एक मान से
C. श्रृंखला के सभी मानों से
D. श्रृंखला के किन्ही दो मानों से
हमें किसी ख़ास मान से परिक्षेपण का माप करना चाहिए, क्योंकि किसी ख़ास मान से परिक्षेपण का माप परास से परिक्षेपण के मान से बेहतर है।
भारत सरकार ने विदेशी व्यापार और विदेशी निवेश पर कुछ व्यापार बाधाओं को तय कर रखा है जिससे भारतीय व्यापारियों को विदेशी प्रतिस्पर्धा से बचाया जा सके और विदेशी व्यापार को नियमित किया जा सके।
मूल्य में कोई भी परिवर्तन किसी सूचकांक में प्रतिबिंबित हो सकता है और नहीं भी। एक सूचकांक औसत के आधार पर परिवर्तन प्रदर्शित करता है। उदाहरण के लिए जब यह कहा जाता है कि वर्ष 2012-13 में सूचकांक 110 तक बढ़ गया तो इसका अर्थ है कि सभी वस्तुओं और सेवाओं के मूल्य सामूहिक रूप से 10% तक बढ़ गए हैं। हालांकि इसका अर्थ यह नहीं होता कि सभी वस्तुओं और सेवाओं के मूल्य एकसमान रूप से 10% तक बढे हैं। किसी वस्तु का मूल्य 10% से कम बढ़ सकता है या 10% से कम हो सकता है।
‘सरल समूहित कीमत सूचकांक एक अभारित या सरल सूचकांक है। इस खास सूचकांक के निर्माण की पद्धति निम्न सूत्र के माध्यम से दी गई है:
सूचकांक (P01 )= ∑P1/∑P0×100
जहाँ ‘0’ आधार वर्ष है और ‘1’ उस वर्ष के लिए है जिसके लिए सूचकांक का निर्माण किया जाना है अर्थात चालू वर्ष।
∑P1= चालू वर्ष के लिए विभिन्न वस्तुओं के मूल्यों का योग।
∑P0= आधार वर्ष के लिए विभिन्न वस्तुओं के मूल्यों का योग।
हालांकि यह एक सरल पद्धति है और इसे समझना भी सरल है, मगर इसके अपने कुछ गुण और अवगुण हैं। आम तौर पर विविध वस्तुओं के मूल्य के माप की इकाई समान नहीं होती है। (वे रु।/किग्रा। रु/मीटर, और रु।/लीटर आदि) तो सरल समूहीकृत कीमत या परिणामात्मक सूचकांक का सीमित प्रयोग होता है। इसमें मदों को उनकी महत्ता के आधार पर भार भी नहीं प्रदान किए जाते हैं।
सूचकांक का फिशर का सूत्र है: –
P01= √ (∑p1q0/∑p0q0×∑p1q1/∑p0q1)×100
जहाँ,‘0’ आधार वर्ष के लिए है और ‘1’ चालू वर्ष के लिए है, और ‘p’ कीमत के लिए और ‘q’ वस्तुओं की मात्रा ।
मूल्यानुपातों की सामान्य विधि सरल सूचकांक का परिकलन करने की एक विधि है। इस विधि के अंतर्गत सभी मूल्यानुपातों को विविध मदों से हासिल कर लिया जाता है और फिर इन अनुपातों का औसत किसी भी केन्द्रीय प्रवृत्ति के मापन के प्रयोग कर परिकलित किया जाता है अर्थात समांतर माध्य, माध्यिका, ज्यामितीय माध्य या हारमोनिक माध्य। जब समांतर माध्य को इन अनुपातों के औसत प्राप्त करने के लिए प्रयोग किया जाता है तो सूचकांक की गणना करने के लिए सूत्र है:
मूल्य समानुपात (R) = P1/P0×100
इसके उपरान्त, इन मूल्यानुपातों के औसत को हासिल किया जाता है:
P01=∑R/N
जहाँ, N= वस्तुओं की संख्या
P1= चालू वर्ष के मूल्य
P0= आधार वर्ष के मूल्य
गुण:
i) सूचकांक चरम मदों से प्रभावित नहीं होता है। प्रत्येक मद को समान महत्ता दी जाती है।
ii) सूचकांक उन इकाइयों के द्वारा प्रभावित नहीं होते हैं जिसमें मूल्य प्रदर्शित होते हैं या अन्य शब्दों में, हम इस मामले में व्यक्तिगत मूल्यों का निरपेक्ष स्तर देख सकते हैं।
अवगुण:
i) समानुपातों में समान महत्व का अनुमान किया जाता है। यह अनुमान हमेशा सही नहीं हो सकता है।
ii) एक उचित औसत का चयन करना भी समस्या हो सकती है।
औद्योगिक उत्पादन सूचकांक के निर्माण में निम्नलिखित कदम संलग्न हैं:
i) उद्योगों का वर्गीकरण: मुख्य उद्योगों को निम्न मुख्य मदों के अंतर्गत समूहीकृत किया जाता है: क) खनन और उत्खनन ख) विनिर्माण, ग) विद्युत्
ii) आधार वर्ष का चयन: आधार वर्ष आर्थिक स्थिरता का वर्ष होना चाहिए। यह चालू वर्ष से बहुत दूर या बहुत पास नहीं होना चाहिए।
iii) औद्योगिक उत्पादन से सम्बन्धित आंकड़े| विभिन्न उद्योगों के उत्पादन से संबंधित आंकड़े एकत्र किए जाते हैं।
iv) भार: भार विभिन्न उद्योगों की सापेक्ष महत्ता के आधार पर प्रदान किए जाते हैं। ये भार विभिन्न उद्योगों के शुद्ध निर्गत के मूल्यों, निवेश की गयी पूंजी और राष्ट्रीय आय में उनके योगदान पर आधारित होते हैं।
v) सूत्र: औद्योगिक उत्पादन पर सूचकांक का परिकलन निम्नलिखित सूत्र के प्रयोग से किया जाता है:
सूचकांक= ∑ (q1/q0) W¨×100/ ∑W
जहां, q1= चालू वर्ष की मात्रा
q0= आधार वर्ष की मात्रा
W = भार
सूचकांक की मुख्य विशेषताएं निम्नलिखित हैं:
1.सूचकांक परिमाण के परिवर्तन मापने में सक्षम होते हैं जो घटना की जटिल एवं सघन विशेषताओं के कारण प्रत्यक्ष रूप से मापन योग्य नहीं होते हैं। उदाहरण के लिए, किसी भी देश में किसी व्यापारिक गतिविधि में परिवर्तन का प्रत्यक्ष मापन नहीं किया जा सकता है, मगर सूचकांक की सहायता से व्यापारिक गतिविधि में सापेक्ष परिवर्तन का अध्ययन करना संभव है।
2.सूचकांक को प्रतिशत के आधार पर व्यक्त किया जाता है। वे समय में या स्थानों के बीच चरों में होने वाले सापेक्ष परिवर्तनों को मापते हैं। सूचकांक एक समयावधि में परिवर्तनों को मापने के लिए प्रयोग किए जाते हैं। इस प्रकार हम कृषि उत्पादन, औद्योगिक उत्पादन, आयात, निर्यात आदि की तुलना दो भिन्न समयावधि में कर सकते हैं।
3.सूचकांक किसी चर या चरों के समूह में निवल परिवर्तनों को मापते हैं। वे एक एकल संख्या में शुद्ध परिवर्तनों का वर्णन करती हैं।
4. सूचकांक विशेष औसत होते हैं। सरल औसतों के बदले सूचकांक को उन स्थितियों में तुलना के उद्देश्य के लिए प्रयोग किया जाता है जहां दो या अधिक श्रंखलाएँ विभिन्न इकाइयों में व्यक्त की जाती हैं।
भारित सूचकांकों का निर्माण करने के लिए दो प्रविधियां हैं:
i) मूल्यानुपातों की माध्य विधि: इस विधि के अंतर्गत वस्तुओं को उनकी मात्रा के अनुसार ही भार प्रदान किए जाते हैं। मूल्य समानुपातों के भार को भारों के कुल योग से विभाजित किया जाता है। इस प्रकार:
P01=∑RW/∑W
यहाँ, W= भार
R= मूल्य सापेक्ष= P1/ P0
ii) भारित समूहित विधि: इस विधि के अंतर्गत वस्तुओं को खरीदी गयी मात्रा के अनुसार ही भार प्रदान किया जाता है। निम्नलिखित लोकप्रिय विधियां हैं:
a) जब आधार वर्ष की मात्राएँ भार के रूप में प्रयोग की जाती हैं तो इस विधि को लेस्पेयर विधि कहते हैं। इसका सूत्र निम्न प्रकार है:
P01= ∑p1q0/∑p0q0×100
b) जब चालू वर्ष की मात्राओं को भार के रूप में प्रयोग किया जाता है, तो इस विधि को पाशे की विधि के रूप में जाना जाता है। इसका सूत्र निम्न प्रकार है:
P01=∑p1q1/∑p0q1×100
c) जब आधार और चालू वर्ष की मात्राओं को भार के रूप में प्रयोग किया जाता है तो इसे फिशर की विधि कहते हैं। इस विधि में लेस्पेयर और पाशे की विधि संयुक्त होती है। इसका सूत्र निम्न प्रकार है:
P01= √ (∑p1q0/∑p0q0×∑p1q1/∑p0q1)×100 = √ (L×P)
जहां ‘0’ आधार वर्ष के लिए है और 1 उस वर्ष के लिए है जिस वर्ष के लिए सूचकांक का निर्माण करना है, अर्थात चालू वर्ष।
उपभोक्ता कीमत सूचकांक वह सूचकांक है जो उपभोक्ता के जीवन यापन के मानकों का आधार वर्ष के साथ तुलना में चालू वर्ष के मूल्य स्तर में परिवर्तन के प्रभावों का मापन करता है। उपभोक्ता कीमत सूचकांक को उपभोक्ता द्वारा दी गयी वस्तुओं और सेवाओं के लिए दिए गए मूल्य में समय के साथ औसत परिवर्तन को मापने के लिए बनाया है। ऐसे सूचकांक जीवन निर्वाह की लागत में दिशा और मात्रा को बताते हैं और इस प्रकार इन्हें जीवन निर्वाह लागत सूचकांक भी कहते हैं।
निम्नलिखित बिंदु उपभोक्ता कीमत सूचकांक की उपयोगिता की व्याख्या करते हैं:
i) उपभोक्ता कीमत सूचकांक वस्तुओं और सेवाओं की दी गयी मात्रा की खुदरा कीमतों को मापते हैं।
ii) उपभोक्ता कीमत सूचकांक मजदूरी मोल-भाव और महंगाई भत्ता आदि का निर्धारण करने में सहायक होते हैं।
iii) सरकार वेतन नीति, मूल्य नीति, किराया नियंत्रण, कराधान और आर्थिक नीतियों का गठन करने के लिए ऐसे सूचकांकों का प्रयोग कर सकते हैं।
iv) ऐसे सूचकांकों को विशेष वस्तुओं के बाज़ार रुझानों का विश्लेषण करने के लिए प्रयोग किया जाता है।
ये सूचकांक धन और वास्तविक आय की क्रय शक्ति में परिवर्तन को मापने में सहायता करते हैं।
थोक कीमत सूचकांक उस सूचकांक को परिलक्षित करता है जो थोक के मूल्य में औसत परिवर्तन का मापन करता है।यह सामान्य मूल्य स्तर में परिवर्तन का संकेतक होता है। इसकी रचना वस्तुओं के साथ संलग्न उचित भार के द्वारा होती है जिन्हें तीन समूहों में विभाजित किया गया है:
i) प्राथमिक वस्तुएं जैसे खाद्य एवं अखाद्य वस्तुएं
ii) ईंधन, शक्ति, प्रकाश और स्नेहक
iii)विनिर्मित उत्पाद
थोक कीमत सूचकांक के निम्नलिखित प्रयोग हैं:
a) इसे वस्तुओं के विभिन्न समूहों या फिर पूर्ण के रूप में मुद्रास्फीति की दर को मापने के लिए प्रयोग किया जाता है।
b) इसे भविष्य के मूल्यों की भविष्यवाणी करने के लिए प्रयोग किया जा सकता है।
c) इसे भविष्य की मांग और पूर्ति की स्थितियों का अनुमान लगाने के लिए प्रयोग किया जा सकता है।
इसे समुच्चय पर कीमतों में परिवर्तन के प्रभाव को समाप्त करने के लिए प्रयोग किया जा सकता है जैसे राष्ट्रीय आय, राष्ट्रीय गठन आदि।
सूचकांक के निर्माण की सीमाएँ
· आधार अवधि का चुनाव : वह अवधि होनी चाहिए जिसमे आर्थिक गतिविधियां सामान्य हो। वह अवधि होनी चाहिए जो चालू वर्ष के न तो बहुत करीब हो और न ही बहुत दूर हो । उदाहरणः वर्ष 2001 और वर्ष 2005 के बीच की तुलना वर्ष 1950 और वर्ष 2005 के बीच की तुलना में अधिक सार्थक है।
· उद्देश्य : सूचकांक का निर्माण अध्ययन के उद्देश्य से प्रभावित होते हैं। हमें ध्यानपूर्वक सूचकांक के प्रकार के बारे में निर्णय लेना चाहिए। उदाहरणः यदि हमारा उद्देश्य मुद्रा के मूल्य में परिवर्तन के प्रभाव का अध्ययन करना है तो हम उपभोक्ता कीमत सूचकांक का प्रयोग करेंगे।
· वस्तुओं का चयन : वस्तुएं उद्देश्य के अनुसार समूह का प्रतिनिधित्व करने वाली होनी चाहिए। चयनित इकाइयों का व्यापक रूप से उपभोग किया जा रहा हो । यदि हम औद्योगिक श्रमिकों के लिए जीवन निर्वाह लागत सूचकांक का निर्माण करना चाहते हैं। तो हमे इन श्रमिकों द्वारा उपभोग की जाने वाली वस्तुओं और सेवाओं का चयन करना चाहिए।
· सूत्र का चयन : सूत्र का चयन उद्देश्य पर निर्भर करता है। सामान्य अध्ययन के लिए, साधारण औसत का प्रयोग किया जा सकता है और गहन अध्ययन के लिए एक उपयुक्त भारित माध्य का प्रयोग किया जाना चाहिए।
· कीमत का चयन : उन वस्तुओं और सेवाओं की कीमतें सूचकांक में शामिल होनी चाहिए, जिनका आमतौर पर उन लोगों द्वारा उपयोग किया जाता है जिनके लिए सूचकांक तैयार किया जा रहा है।
सूचकांक वह सांख्यकीय साधन हैं जो चुने गए आधार वर्ष के संबंध में एक चर के परिमाण में अंतरों को मापता है। वे दो भिन्न स्थितियों में संबंधित चरों के समूह में औसत परिवर्तन का मापन करते हैं। मापे गए अंतर समय या स्थान के अनुसार मापे जाते हैं। इन्हें प्राय: प्रतिशत में व्यक्त किया जाता है।
सूचकांक सर्वाधिक प्रयुक्त किया जाने वाला सांख्यकीय साधन है। सूचकांक को आर्थिक बैरोमीटर भी कहा जाता है। सूचकांक की महत्ता को निम्नलिखित बिंदुओं से आंका जा सकता है:
1. मुद्रा के मूल्य में परिवर्तन को मापने में सहायक: सूचकांक को मुद्रा के मूल्य में परिवर्तन के मापन के में सर्वाधिक प्रयोग किया जाता है। मुद्रा का मूल्य उसकी क्रय शक्ति पर निर्भर करता है जो बदले में वस्तुओं के मूल्य पर निर्भर करती है।
मुद्रा की
क्रय शक्ति =1/उपभोक्ता
कीमत सूचकांक
वास्तविक आय
या मजदूरी =
मुद्रा आय या
मजदूरी उपभोक्ता
कीमत सूचकांक
× 100।
मूल्य
में
परिवर्तन
मुद्रा के
मूल्य को
प्रभावित करेगा।
इस प्रकार,
कीमत
सूचकांक मुद्रा
के मूल्य में
होने वाले
परिवर्तन पर
प्रकाश डाल
सकता है।
2. नीति निर्माताओं के लिए सहायक: सूचकांक व्यापारिक समुदाय को उनके निर्णय की योजना बनाने के लिए एक उपयोगी दिशानिर्देश के रूप में कार्य करते हैं। नियोक्ता अपने कर्मचारियों के महंगाई भत्ता में वृद्धि करने जीवन निर्वाह लागत सूचकांक पर निर्भर होते हैं। सूचकांक मुद्रास्फीति, बेरोजगारी, कृषि, औद्योगिक उत्पादन आदि के लिए नीति निर्माण में आवश्यक दिशानिर्देश की भूमिका निभाते हैं।
3. कुछ ऐसे भी परिवर्तन होते हैं जिनका माप सूचकांक के बिना संभव ही नहीं हैं। वे प्रासंगिक चरों के समूह के सापेक्ष परिवर्तनों के मापन को संभव करते हैं।
4. सूचकांक की सहायता से, दो चरों के परिवर्तनों का तुलनात्मक अध्ययन सरल हो जाता है।
5. सूचकांक किसी परिघटना के सामान्य रुझानों का अध्ययन करने में सहायता करता है जिससे कुछ महत्वपूर्ण निष्कर्ष प्राप्त किए जा सकें।
6. सूचकांक प्रति व्यक्ति आय में वास्तविक वृद्धि या गिरावट निर्धारित करने में सहायता करता है।
) भार का चयन: मूल्यों के भारित सूचकांक की प्रक्रिया में, भार को उनकी सापेक्ष महत्ता के अनुसार विभिन्न वस्तुओं के लिए लिया जाता है।
भार
दो प्रकार के
हो सकते हैं:
i)परिमाणात्मक
भार: यहाँ
परिमाण भार
का आधार होते
हैं।
ii)मात्रा भार: यहाँ भार का आधार मूल्य होता है।
भार वास्तविक या अनुमानात्मक हो सकते हैं। भार का आंकलन करने के लिए कई प्रविधियां होती हैं जैसे लेस्पेयर विधि, पाशे विधि, फिशर विधि आदि|
b) वस्तुओं का चयन: वस्तुओं के प्रतिदर्श का चयन करने के लिए निम्न बिंदुओं को संज्ञान में रखना चाहिए:
i)वस्तुएं सूचकांक के उद्देश्य के लिए प्रासंगिक होनी चाहिए।
ii)चयनित
वस्तुओं की
संख्या
वस्तुओं की
प्रतिनिधित्व
विशेषता को
सुनिश्चित
करने के लिए
पर्याप्त
होनी चाहिए।
परन्तु
संख्या इतनी
अधिक न हो कि परिकलन
बहुत लम्बा
और जटिल हो
जाए।
iii)चयनित
वस्तुओं के
कई प्रकार का
चयन करना
चाहिए। जिस
प्रकार की
वस्तु की
मांग सबसे
अधिक हो, उसे
संख्या में
सम्मिलित
करना चाहिए।
iv)
वस्तुओं
को मानकीकृत
होना चाहिए
और उसका
विवरण करना
और समझना सरल
होना चाहिए।
A.
लक्षित
समूह का चयन
B. रिपोर्ट की तैयारी
C. रिपोर्ट के लिए किसी शीर्षक शीर्षक का चयन
D. आंकड़ों को एकत्र करना
किसी भी परियोजना रिपोर्ट को तैयार करने में निम्न कदम महत्वपूर्ण होते हैं: (1) परियोजना रिपोर्ट तैयार करने के चरण निम्नलिखित हैः (2) अध्यनन का क्षेत्र या समस्या को पहचानना (3) लक्ष्य समूह का चुनाव (4) आंकड़ों का संकलन (5) आंकड़ों का संगठन एवं प्रस्तुतीकरण (6) आंकड़ों का विश्लेषण एवं व्याख्या (7) उपसंहार (8) ग्रंथ सूची
A.
आंकड़ों
को एकत्र
करने में
B. लक्षित समूह को पहचनाने में
C. सर्वे का उद्देश्य निश्चित करने में
D. आंकड़ों की व्याख्या करने में
केन्द्रीय प्रवृत्ति, परिक्षेपण और सह सम्बन्ध के माप को आंकड़ों के विश्लेषण और व्याख्या के लिए प्रयोग किया जाता है।
A.
पत्रिकाएँ,
समाचार पत्र
आदि
B. साक्षात्कार, ईमेल, फोन आदि
C. किताबें, ब्रोशर आदि
D. अप्रत्यक्ष शोध
आंकड़ों को एकत्र करने की दो पद्धतियाँ हैं प्राथमिक और द्वितीयक आंकड़े।
A.
किसान
B. व्यापारी
C. मछली निर्यात
D. मछुआरे
एक मछली पकड़ने वाली नाव के निर्माता की परियोजना रिपोर्ट के लिए मछुआरों से आंकड़ों को एकत्र करना चाहिए क्योंकि मछुआरें मछली पकड़ने के उपकरणों प्रयोग करते हैं।
A.
आंकड़े
B. फाइल
C. रिपोर्ट
D. फोल्डर
वह दस्तावेज जो किसी संस्थान, सरकारी गतिविधी, व्यापार, उत्पाद आदि के विकास के बारे में सूचना देता है, उसे रिपोर्ट कहते हैं।
सुरक्षित पेयजल की उपलब्धता को सुनिश्चित करने के लिए लक्षित समूह है ग्रामीण और शहरी जनसँख्या। यह लक्षित समूह सभी वर्गों का प्रतिनिधित्व करता है |
A.
माध्य विचलन
B.
सूचकाँक संख्या
C.
ग्रंथावली
D.
माध्य
आंकड़ों के विस्तार को जानने के लिए, हम माध्य विचलन, मानक विचलन और विचरण के गुणांक का प्रयोग करते हैं।
जिन आंकड़ों में सबसे कम विचरण हो, वे सबसे अच्छे आंकड़े होते है ।
सर्वे करने से पूर्व उसका उद्देश्य स्पष्ट होना सबसे अधिक आवश्यक है।
आंकड़ों के विश्लेषण के बाद अगला चरण आंकड़ों का निष्कर्ष निकालना होता हैं।
A.
आंकड़ों को सारांशित करना
B.
आंकड़ों को वर्गीकृत करना
C.
आंकड़ों को प्रस्तुत करना
D.
आंकड़ों को सारणीकृत करना
आंकड़ों को आंकड़ों को एकत्र करने के बाद अगले चरण के रूप में विशेषताओं के अनुसार वर्गीकृत किया जाता है। वे संख्याएं जिन्हें जांचकर्ता द्वारा एकत्र किया जाता है उन्हें सम्पादन, वर्गीकरण और सारणीकृत करने के द्वारा आयोजित करने की आवश्यकता होती है ।
A.
प्रत्यक्ष निजी साक्षात्कार
B.
प्रश्नावली पद्धति
C.
टेलेफोनिक साक्षात्कार
D.
मेल की गयी प्रश्नावली
द्वितीयक आंकड़े के प्रयोग से समय और धन की बचत होती हैं। प्राथमिक आंकड़े के संकलन में धन और समय का अधिक व्यय होता है।
A.
केन्द्रीय प्रवृत्ति की माप के
B.
परिक्षेपण के माप के
C.
सहसम्बन्ध
D.
प्रकीर्ण आरेख के
औसत और संबंधों परिकलन करने के लिए कई प्रकार के उपकरण होते हैं। केन्द्रीय प्रवृत्ति की माप माध्य या औसत का परिकलन करने में सहायता करती है।
A.
नीति
B.
सारणी
C.
आरेख
D.
चित्र
परियोजना रिपोर्ट सरकार और निजी संस्थानों के द्वारा नीति निर्माण में सहायता करती हैं।
A.
आंकड़ों को एकत्र करना
B.
आंकड़ों की व्याख्या
C.
आंकड़ों का प्रस्तुतिकरण
D.
लक्षित समूह की पहचान करना
सारणियाँ और आरेख आंकड़ों के प्रस्तुतिकरण और संघटन में प्रयोग किए जाते हैं।
A.
प्राथमिक आंकड़े
B.
द्वितीयक आंकड़े
C.
तृतीयक आंकड़े
D.
आर्थिक आंकड़े
सरकारी प्रकाशन और निजी प्रकाशन द्वितीयक आंकड़ों के स्रोत हैं। द्वितीयक आंकड़ों से अर्थ उन आंकड़ों से है जिन्हें किसी और संस्था के द्वारा एकत्र किया जाता है और उसे समय, धन और मानवश्रम बचाने के लिए प्रयोग किया जाता है।
A.
नियम के अनुसार
B.
याद्रच्छिक रूप
C.
सावधानी से
D.
लापरवाही से
किसी भी प्रतिदर्श को बहुत ही याद्रच्छिक रूप से और बहुत ही सावधानीपूर्वक चुना जाता है क्योंकि यह समूह की हर मद का प्रतिनिधित्व करता है। खराब प्रतिदर्श को चुनने से गलत निष्कर्ष निकल सकता है।
A.
लक्षित समूह का विश्लेषण
B.
लक्षित समूह का चयन
C.
आंकड़ों को एकत्र करना
D.
आंकड़ों को बनाना
लक्षित समूह को चुनना वह दूसरा कदम होता है जो सर्वे के उद्देश्य को तय करने के बाद लिया जाता है। उद्देश्यों के अनुसार उचित प्रश्नों को तय करना बहुत ही महत्वपूर्ण होता है।
A.
स्थानीय नागरिक
B.
सुदूर रहने वाले नागरिक
C.
केवल माताएं
D.
केवल बच्चे
लक्षित समूह से अभिप्राय उन लोगों से हैं जिनसे सूचना एकत्र होती है।
A.
प्राथमिक आंकड़े
B.
द्वितीयक आंकड़े
C.
तृतीयक आंकड़े
D.
झूठे आंकड़े
प्रश्नावली प्राथमिक आंकड़ों को एकत्र करने का एक उपकरण है। यह प्राथमिक आंकड़ों को एकत्र करने का सबसे आम और लोकप्रिय उपकरण है।
द्वितीयक आंकड़ों के स्रोत हैं: क-सरकारी प्रकाशन ख- अर्द्धसरकारी प्रकाशन, ग- अंतर्राष्ट्रीय प्रकाशन घ- शोधकर्ताओं के द्वारा किए गए अध्ययन आदि|
सांख्यिकी को संख्यात्मक आंकड़ों के संकलन, प्रदर्शन, विश्लेषण तथा निर्वचन के विज्ञान के रूप में परिभाषित किया जा सकता है।
भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड, से.बी. और क्रेडिट रेटिंग कंपनियां, क्रिसिल दो ऐसे संगठन है जिनसे किसी कंपनी की के साख पात्रता के बारे में जानकारी प्राप्त की जा सकती है |
भारतीय वाणिज्य और उद्योग संघ (फिक्की) और भारतीय उद्योग परिसंघ (सी.आई.आई) दो ऐसे संघठन है लिखिए जिनसे भारत के व्यवसायिक / उद्योगों से सम्बंधित आंकड़े प्राप्त किये जा सकते है |
एक परियोजना एक पूरी तरह से एक सामाजिक परिवेश में की जाने वाली उद्देश्यपरक गतिविधि होती है।
परियोजना पर किए जाने वाले कार्य को परियोजना कार्य कहते हैं।
एक प्रश्नावली किसी पूछताछ के विषय पर जांचकर्ता के द्वारा तैयार प्रश्नों की एक सूची है, जिसमे उत्तर देने वाले को प्रश्नों के उत्तर देने होते हैं।
तीन सांख्यकीय उपकरण हैं:
· समान्तर माध्य
· माध्य विचलन और
· मानक विचलन
साधारण सूचकांक एक ऐसा सूचकांक है जिसे बिना किसी अतिरिक्त भार के बनाया जाता है। सूचकांक के निर्माण में सम्मिलित वस्तुएं हैं: भोजन, वस्त्र, आवास, प्रकाश, ईंधन, आदि, और इन्हें समान महत्ता दी गयी है।
A.
मूल्य
सूचकांक
B. मात्रा सूचकांक
C. संवेदी सूचकांक
D. मूल्य और मात्रा सूचकांक
मात्रा सूचकांक उत्पादन, निर्माण या रोजगार में होने वाले परिवर्तनों को मापती हैं।
औद्योगिक श्रमिकों के लिए एक उपभोक्ता कीमत सूचकांक जन साधारण की जीवन निर्वाह लागत पर मूल्य वृद्धि के प्रभाव अर्थात मुद्रास्फीति के प्रभाव का मापन करता है।
मानव विकास सूचकांक जीवन प्रत्याशा, शिक्षा और प्रति व्यक्ति आय की संयुक्त सूची है। इस उपाय को किसी देश के कुल विकास को मापने के लिए प्रयोग किया जाता है।
भारत
में तीन
प्रकार के
कीमत
सूचकांक का
निर्माण
किया जाता
है। उनमें से
दो हैं:
(a) औद्योगिक
श्रमिकों के
लिए कीमत
सूचकांक
(b) कृषि
श्रमिकों के
लिए कीमत
सूचकांक
कृषि उत्पादों का सूचकांक कृषि उत्पादों में परिवर्तन अभिलेखित करता है। इसे एक अवधि से किसी और अवधि तक उपज के बढ़ने और कम होने के अध्ययन के लिए प्रयोग किया जाता है।
सरल सूचकांक वह सूचकांक हैं जिसमें एक श्रृंखला के सभी मदों को समान भार (महत्व) प्रदान किया जाता है।
भारित सूचकांक वह सूचकांक है जिसमें विभिन्न भार के आधार पर विभिन्न मदों को विभिन्न महत्व दिया जाता है।
भारित विधि में भी दो उपविधियां है
· भारित समूहित विधि
· भारित मूल्यानुपातों की माध्य विधि
दो प्रकार के कीमत सूचकांक हैं: क)- थोक कीमत सूचकांक और ख- उपभोक्ता कीमत सूचकांक|
कीमतों में निरपेक्ष अंतर से अभिप्राय चालू वर्ष और आधार वर्ष की कीमतों में अंतर से है ।
सूचकांक एक ऐसा सांख्यिकीय उपकरण है जो संबंधित चर या चर मूल्यों के समूह में होने वाले परिवर्तनों को मापता है।
विभिन्न श्रेणियों के उपभोक्ताओं के लिए विभिन्न उपभोक्ता कीमत सूचकांक होना इसलिए आवश्यक है क्योंकि विभिन्न आर्थिक स्थिति से उपभोक्ताओं की उपभोग टोकरी की प्रवृत्ति भिन्न होती है।
आधार वर्ष वह अवधि है जिसके सन्दर्भ में चालू वर्ष की तुलना की जाती है।
कीमतों में सापेक्षिक अंतर से अभिप्राय आधार वर्ष की तुलना में कीमतों में अंतर से है |
सूचकांक निर्माण की पाशे की विधि को निम्नलिखित सूत्र के द्वारा व्यक्त किया गया है:।
P01=∑p1q1/∑p0q1×100
जहां‘0’ आधार वर्ष को बतलाता है और 1 उस वर्ष के लिए है जिसके लिए सूचकांक का निर्माण किया जाना है अर्थात चालू वर्ष।
किसी भी अर्थव्यवस्था की स्थिति को समझने के लिए कुछ सूचकांक हैं, संवेदी सूचकांक, मानव विकास सूचकांक, उत्पादक कीमत सूचकांक, (यह बाद में थोक कीमत सूचकांक को बदल देगा)। औद्योगिक उत्पादन सूचकांक, कृषि उत्पादन सूचकांक।
i) सरल सूचकांक वह सूचकांक है जिसका निर्माण बिना किसी अतिरिक्त भार दिए हो रहा है। सूचकांक के निर्माण के लिए सम्मिलित वस्तुओं जैसे भोजन, आवास, वस्त्र, प्रकाश, ईंधन आदि को समान महत्व प्रदान किया जाता है। भारित सूचकांक वह सूचकांक है जिसका निर्माण समूह में वस्तुओं को उनके प्रासंगिक महत्व के अनुसार अतिरिक्त भार प्रदान करने के बाद हुआ है। इसके परिणामस्वरूप भारित सूचकांक को घटना के स्तर में औसत परिवर्तनों के एक उचित प्रतिनिधि के रूप में जाना जाता है।
आधार वर्ष वह अवधि है जिसके सन्दर्भ में चालू वर्ष की तुलना की जाती है। आधार वर्ष का चयन करते समय निम्न बिंदुओं को संज्ञान में रखना चाहिए:
i) आधार वर्ष सामान्य वर्ष होना चाहिए।
ii) आधार वर्ष में किसी भी प्रकार से युद्ध, अकाल, सूखे, भूकंप, मंदी आदि की स्थिति नहीं होनी चाहिए।
iii) आधार वर्ष चालू वर्ष से बहुत दूर भी नहीं होना चाहिए।
एक कीमत सूचकांक मूल्य से सम्बन्धित होता है और दो अवधियों में कीमत में परिवर्तन का मापन करता है। एक परिणामात्मक सूचकांक उत्पादन, बिक्री, उपभोग आदि का मापन करता है और मात्रा से सम्बन्धित होता है। एक परिणामात्मक सूचकांक उत्पादन की भौतिक मात्रा में परिवर्तन का मापन करता है।
व्यक्तियों को द्वितीयक आंकड़ों के प्रयोग से पहले विश्वसनीयता, शुद्धता और उपयुक्तता की जांच करनी चाहिए। ऐसा इसलिए किया जाता क्योंकि आंकड़े एकत्र करने का उद्देश्य एकत्रित द्वितीयक आंकड़ों के उद्देश्य से पृथक होता है।
आंकड़ों के द्वितीयक स्रोतों का प्रयोग किया जाता है जब समय, धन और मानव श्रम की कमी होती है और आवश्यक सूचना किसी अन्य स्रोत से बहुत ही आसानी से उपलब्ध हो जाती है।
अमेरिका में डब्ल्यू. एच. क्लिपत्रिक ने परियोजना और परियोजना कार्य की अवधारणा का प्रतिपादन किया।
प्राथमिक आंकड़े वे आंकड़े हैं जिन्हें जांचकर्ता के द्वारा पहली बार इकट्ठा किया जाता है जैसे जनगणना ।
इस परियोजना में समाज का मध्यम आय और अधिक आय वाला लक्षित समूह होगा।
शोध के उद्देश्य के अनुसार लक्षित समूह की पहचान या विकल्प किसी भी प्रश्नावली के लिए उचित प्रश्न बनाने के लिए सबसे महत्वपूर्ण है।