A.
10,200 रु
B.
9,800 रु
C.
10,000 रु
D.
10,100 रु
पासबुक शेष 9,800 रु होगा। बैंक प्रभार बैंक द्वारा डेबिट किया गया है। यह पासबुक शेष को घटाता है तथा रोकड़ बही को समान रहता है। अतः, यह पासबुक के शेष को घटाता है।
A.
समयांतराल।
B.
त्रुटि।
C.
राशि।
D.
अभिलेखन।
यह अंतर समयांतराल के कारण उत्पन्न होता है क्योंकि इन्हें पहले से जारी किया जा चुका है परंतु प्रस्तुत नहीं किए गये हैं।
A.
शामिल किया जाना चाहिए।
B.
घटाया जाना चाहिए।
C.
जोड़ा जाना चाहिए।
D.
ध्यान में नहीं रखा जाना चाहिए।
रोकड़ शेष ज्ञात करने के लिए जारी परंतु भुगतान के लिए अप्रस्तुत चेकों को पासबुक शेष से घटाया जाना चाहिए।
A.
रोकड़ बही के क्रेडिट पक्ष में।
B.
रोकड़ बही के डेबिट पक्ष में।
C.
पासबुक के क्रेडिट पक्ष में।
D.
पासबुक के डेबिट पक्ष में।
बैंक में चुकता परंतु अभी तक भुगतान नहीं हुए चेकों को पहले से रोकड़ बही के डेबिट पक्ष में रिकॉर्ड किया गया है। परंतु बैंक अन्य बैंकों से चैकों की स्वीकृति प्राप्त करने के पश्चात् ग्राहक का खाता क्रेडिट करता है।
A.
ग्राहक का।
B.
आपूर्तिकर्ता का।
C.
क्रेता का।
D.
बैंक का।
यदि बैंक राशि संग्रहित करता है, तो यह आपूर्तिकर्ता का खाता क्रेडिट करेगा।
A.
बैंक द्वारा।
B.
फर्म द्वारा।
C.
फर्म के लेखाकार द्वारा।
D.
रोकड़ बही में।
बैंक द्वारा ग्राहक को ब्याज देने की स्थिति में, इस प्रविष्टि को पहले बैंक द्वारा रिकॉर्ड किया जाता है तथा आगामी तिथि को पासबुक अपडेट की जाती है।
A.
पासबुक में डेबिट किया जाएगा।
B.
पासबुक में क्रेडिट किया जाएगा।
C.
रोकड़ बही में डेबिट किया जाएगा।
D.
रोकड़ बही में क्रेडिट किया जाएगा।
जब बैंक ब्याज तथा लाभांशों का संग्रहण करता है तो इसे पहले पासबुक में क्रेडिट किया जाता है। तत्पश्चात् बैंक प्रभावित ग्राहक को आवश्यक सूचना भेजता है। ग्राहक बैंक से सूचना प्राप्त करने के बाद इसे रोकड़ बही में रिकॉर्ड करता है।
A.
500 रु
B.
600 रु
C.
400 रु
D.
100 रु
डेबिट किये गये परंतु बैंक को नहीं भेजे गये चेक को पासबुक शेष ज्ञात करने के लिए घटाया जाएगा।
A.
चेक द्वारा किये गये भुगतानों का पता लगाने के लिए।
B.
बैंक में शेष का पता लगाने के लिए।
C.
पासबुक में त्रुटियों का पता लगाने के लिए।
D.
अंतर को सुनिश्चित करने के लिए पासबुक के साथ रोकड़ बही की तुलना करना।
बैंक समाधान विवरण एक विशेष तिथि को तैयार किया गया ऐसा विवरण है जिसे रोकड़ बही के शेष तथा पासबुक के अनुसार शेष में अंतर को सुनिश्चित करने के लिए पासबुक के साथ रोकड़ बही की तुलना करने के लिए तैयार किया जाता है।
A.
डेबिट शेष।
B.
अनुकूल शेष।
C.
क्रेडिट शेष।
D.
प्रतिकूल शेष।
रोकड़ बही के अनुसार क्रेडिट शेष तथा पासबुक या बैंक विवरण के अनुसार डेबिट शेष अर्थात एक प्रतिकूल शेष। यह ऋणात्मक शेष को इंगित करता है।
A.
डेबिट शेष।
B.
उपभोक्ता के पास शेष।
C.
अधिविकर्ष।
D.
बैंकर के पास शेष।
जब एक रोकड़ बही का बैंक कॉलम क्रेडिट शेष प्रदर्शित करता है तो यह अधिविकर्ष अर्थात बैंक का बकाया होता है। यह एक ऋणात्मक शेष होता है।
जब ग्राहक अपने चालू खाते में जमा राशि से अधिक राशि निकालता है, तो इस दशा को बैंक अधिविकर्ष कहा जाता है ।
बैंक समाधना विवरण द्वि-अंकन प्रणाली का भाग नहीं है।






|
|
Cash Book-Starting Balance |
Pass book-Starting Balance |
||
|
Particulars |
Favourable Balance (Dr. Balance) |
Overdraft (Cr. Balance) |
Favourable Balance (Dr. Balance) |
Overdraft (Cr. Balance) |
|
1. Cheques issued but not yet presented for payment. काटे गए चेक जो भुगतान के लिए प्रस्तुत नहीं हुए। |
+ |
- |
- |
- |
|
2. Cheques deposited into bank but not yet collected. बैंक में जमा किए गए चेक जिनका संग्रह नहीं हुआ। |
- |
+ |
+ |
- |
|
3. Interest allowed by bank, but not entered in Cash Book. बैंक द्वारा दिया गया ब्याज जिसका रोकड़ बही में लेखा नहीं हुआ। |
+ |
- |
- |
- |
|
4. Bank Charges not entered in Cash Book बैंक व्यय जिनका लेखा रोकड़ बही में नहीं हुआ। |
- |
+ |
+ |
- |
|
5. Direct deposit into the bank by a customer ग्राहक द्वारा बैंक में सीधा जमा। |
+ |
- |
- |
+ |
|
6. Direct payments by bank not entered in cash Book. बैंक द्वारा सीधा भुगतान जिनका लेखा रोकड़ बही में नहीं हुआ। |
- |
+ |
+ |
- |
|
7.
Direct collections made by bank not entered in Cash Book |
+ |
- |
- |
+ |
|
8. Cheque issues and payment received by the creditor but not entered in Cash Book लेनदार को जारी किए गए चेक एवं प्राप्त भुगतान जिनका लेखा रोकड़ बही में नहीं हुआ। |
- |
+ |
+ |
- |
|
9. Cheque paid into bank but omitted to be entered in Cash Book. चेक बैंक में जमा कराए गए परन्तु लेखा रोकड़ बही में नहीं हुआ। |
+ |
- |
- |
+ |
|
10. Dishonour of a cheque and bill discounted with bank. बैंक द्वारा चेक व बिल का अनादरण |
- |
+ |
+ |
- |
|
11. Cheque entered in Cash Book but not sent to bank. चेक रोकड़ बही में लिखे गए परन्तु बैंक में नहीं भेजे। |
- |
+ |
+ |
- |
रोकड बही तथा बैंक पास-बुक के शेषों में अन्तर प्रायः निम्नलिखित कारणों से हो सकता है-
(1.) चैक निर्गमित किए गए हों परन्तु भुगतान के लिए बैंक में प्रस्तुत ही न किए गए होः- कभी-कभी ऐसा होता है कि व्यापारी अपने किसी लेनदार को अथवा माल के भुगतान में विक्रेता को चैक काटकर देता है परन्तु मिलान की तिथि तक वे भुगतान के लिए उपस्थित नहीं किए जा सके हो तो ऐसी दशा में दोनों बाहियों में अन्तर होगा। इसका प्रमुख कारण यह है कि व्यापारी जब चैक काटकर देता है तो उसका लेखा तुरन्त ही अपनी रोकड़ बही में कर लेता है, परन्तु पास-बुक में उसका लेखा मिलान करते समय तक नहीं हो पाता अर्थात रोकड़ पुस्तक में बैंक का शेष कम हो जाता है, जबकि बैंक अपने ग्राहक के खाते में से वह रकम तब तक कम नहीं करता है जब तक कि उस चैक का भुगतान नहीं कर देता, अतः दोनों शेषों में अत्तर हो जाता है।
(2.) बैंक चैक में वसूली के लिए भेजे परन्तु अभी तक वसूल नहीं हुएः- व्यापारी को जब भुगतान में अथवा अपने देनदार से चैक प्राप्त होते हैं तब वह उनको वसूली के लिए बैंक में भेज देता है तथा बैंक का शेष उतनी रकम से बढा लेता है, परन्तु बैंक अपने ग्राहक के खाते अर्थात पास-बुक का शेष उस समय तक नहीं बढाता जब तक कि वह उन चैकों का भुगतान वसूल नहीं कर लेता है। इस प्रकार रोकड़ बही के बैंक खाने का शेष बढ जाता है, जबकि पास-बुक में यह उतना ही बना रहता है।
(3.) बैंक द्वारा वसूल की गई रकमेः- बैंक अपने ग्राहक की ओर से कुछ भुगतान प्राप्त करता है, जैसे - ब्याज, लाभ एवं प्राप्य बिल आदि। इनका लेखा बैंक द्वारा पास-बुक में तो रकम प्राप्त होते ही कर दिया जाता है, परन्तु ग्राहक, बैंक से कोई सूचना प्राप्त न होने के कारण रोकड़ बही में इसका लेखा नहीं कर पाता है।
(4.) किसी ग्राहक द्वारा व्यापारी के बैंक खातें में सीधा रूपया जमा कर देनाः- कभी-कभी कोई ग्राहक या देनदार व्यापारी को भुगतान सीधे न देकर उसके बैंक खाते में जमा कर देता है, ऐसी रकम पास-बुक में तो जमा हो जाती है, परन्तु रोकड़ बही में उसका लेखा उस समय तक नहीं हो पाता है, अर्थात बाद में सूचना प्राप्त होने पर होता है।
(5.) बैंक द्वारा ग्राहक के आदेशानुसार भुगतान करनाः- कभी-कभी बैंक अपने ग्राहक के पूर्व आदेशानुसार कुछ भुगतान कर देता है- जैसे चन्दा, बीमा की किस्त, देय बिल आदि। इनका लेखा बैंक भुगतान करते समय ही पास-बुक में कर देता है, परन्तु ग्राहक इनका लेखा अपनी रोकड बही में सूचना प्राप्त होने पर ही करता है। इस प्रकार रोकड़ बही के शेष व पास-बुक के शेष में अन्तर बना रहता है।
(6.) वसूली के लिए भेजे गए चैक अथवा विनिमय-विरत्रों का अनादृत होनाः- कभी-कभी व्यापारी द्वारा वसूली के लिए भेजे गए चैक, विनिमय-विपत्र एवं हुण्डी आदि तिरस्कृत हो जाते हैं। इनका लेखा रोकड़ बही में तो इनको बैंक भेजते समय ही कर दिया जाता है, जबकि इनके तिरस्कृत हो जाने पर इनका लेखा पास-बुक में नहीं किया जाता अथवा ऐसे चैक या विनिमय-विपत्रों, जिनको हमने बैंक से तो भुना लिया है, परन्तु जिनका भुगतान तिथि पर बैंक को भुगतान नहीं मिला है की रकम बैंक ग्राहक के खाते में से तो कम कर देता है, लेकिन रोकड बही में सूचना न मिलने के कारण शेष कम नहीं होता, अतः अन्तर बना रहता है।
A. केवल व्यापार खाता।
B. केवल लाभ-हानि खाता।
C. केवल स्थिति-विवरण।
D. अन्तिम खाते।
तलपट की सहायता से अन्तिम खातों को तैयार किया जाता है (जिसमें व्यापार खाता, लाभ-हानि खाता एवं आर्थिक चिट्ठे होते हैं )।
A. क्रय खाते को डेबिट तथा उचंती खाते को 4,500 रु से क्रेडिट किया जाता है।
B. उचंती खाते को डेबिट तथा क्रय खाते को 4,500 रु से क्रेडिट किया जाता है।
C. क्रय खाते को डेबिट तथा उचंती खाते को 500 रु से क्रेडिट किया जाता है।
D. क्रय खाते को डेबिट तथा उचंती खाते को 5,000 रु से क्रेडिट किया जाता है।
क्रय खाते को डेबिट तथा उचंती खाते को क्रेडिट किया जायेगा क्योंकि यह एक पक्षीय अशुद्धि है। हमने केवल क्रय खाते में गलत राशि प्रविष्टि की है।
A. मजदूरी खाता।
B. रोकड़ खाता।
C. भवन खाता।
D. छाया का निर्माण खाता।
छाया के निर्माण के लिये चुकता मजदूरी को भवन खाते में डेबिट किया जाना चाहिए। छाया का निर्माण भवन का एक भाग होता है। यह एक पूँजीगत व्यय है। अतः इसे भवन खाते में डेबिट किया जाना चाहिए।
A. विक्रय बही का योग 1,000 रु से कम लगाया गया।
B. मधु द्वारा 1,000 रु की विक्रय वापसी को रिकाॅर्ड नहीं किया गया।
C. मधु द्वारा 1,000 रु की विक्रय वापसी को 100 रु से रिकाॅर्ड किया गया।
D. मधु द्वारा 1,000 रु की विक्रय वापसी को क्रय वापसी बही में रिकाॅर्ड किया गया।
इस त्रुटि को उचंती खाते का उपयोग करते हुए सुधारा जायेगा क्योंकि सभी एक पक्षीय त्रुटियों को उचंती खाते में प्रविष्टि करते हुए सुधारा जाता है।
A. हिसाब की अशुद्धि।
B. भूल की अशुद्धि।
C. क्षतिपूरक अशुद्धि।
D. सैद्धांतिक अशुद्धि।
ये ऐसी त्रुटियाँ होती है जो गलत लेनदेन की गलत खतौनी, खातों के गलत शेष या योग, सहायक बहियों के गलत राशि लिखने से होने वाली त्रुटियाँ होती है।
A. मजदूरी खाता।
B. मशीनरी खाता।
C. पूँजी खाता।
D. रेाकड़ खाता।
इसे मशीनरी खाते में डेबिट किया जाना चाहिए, क्योंकि किसी भी सम्पत्ति पर किया गया अतिरिक्त व्यय उसी सम्पत्ति का एक भाग होता है तथा इसे सम्पत्ति खाते में शामिल किया जाता है।
A. खाता है।
B. विवरण है।
C. प्रारम्भिक लेखे है।
D. खाताबही है।
प्रारम्भिक लेखे की पुस्तकों में लिखे गए व्यवहारों की खाताबही में खतौनी कर चुकाने के पश्चात यह सुनिश्चत करना आवश्यक है कि लेखांकन कार्य में कोई अशुद्धि तो नहीं हुई है। इस हेतु एक निश्चित तिथि को विभिन्न खातों के योग अथवा शेषों के द्वारा एक सूची या विवरण-पत्र बनाया जाता है जिसे तलपट या परीक्षा-सूची कहा जाता है।
A. क्रेडिट शेष।
B. शून्य शेष।
C. डेबिट शेष।
D. ऋणात्मक शेष।
आवक वापसी खाता या विक्रय वापसी खाता हमेशा डेबिट शेष प्रदर्शित करता है, इसलिए, इसे तलपट के डेबिट काॅलम में प्रदर्शित किया जाता है।
A. क्रेडिट शेष।
B. शून्य शेष।
C. डेबिट शेष।
D. ऋणात्मक शेष।
प्रारंभिक रहतिया एक डेबिट शेष प्रदर्शित करता है, जिसे तलपट के डेबिट काॅलम में दिखाया जाता है।
A. पूँजी खाता।
B. आहरण खाता।
C. विक्रय खाता।
D. क्रय खाता।

A. त्रुटियों का संशोधन।
B. अशुद्धियों का सुधार।
C. द्विप्रविष्टि प्रणाली।
D. एकल प्रविष्टि प्रणाली।
अशुद्धियाँ चाले तलपट को प्रभावित करे या नहीं करे उनका पता लगाना तथा सुधारना आवश्यक होता है। लेखों में हुयी अशुद्धियों को सही करने के लिए तथा लेखांकन रिकाॅर्डों को सही करने के लिए अपनायी गई प्रक्रिया को अशुद्धियों का सुधार कहा जाता है।
A. तीन वर्गों में।
B. पांच वर्गों में।
C. चार वर्गों में।
D. चार वर्गों में।
सभी अशुद्धियों को चार वर्गों में वर्गीकृत किया जा सकता है: सैद्धांतिक अशुद्धि, भूल की अशुद्धि, हिसाब की अशुद्धि तथा क्षतिपूरक अशुद्धि।
Journal
|
S.N. |
Particulars |
L.F. |
Dr. |
Cr. |
|
i. |
Sundry Debtors Dr. |
|
200 |
|
|
|
To Suspense A/c |
|
|
200 |
|
|
(Sales wrongly credited to debtors, now rectified) |
|
|
|
|
ii. |
Sales A/c Dr. |
|
180 |
|
|
|
To Suspense A/c |
|
|
180 |
|
|
(Excess posting in sales account, rectified) |
|
|
|
|
iii. |
Bills Receivable A/c Dr. |
|
100 |
|
|
|
Bills Payable A/c Dr. |
|
100 |
|
|
|
To Harish’s A/c |
|
|
200 |
|
|
(Bills receivable received passed through bills payable book, now rectified) |
|
|
|
तलपट के उद्देश्य:
1) खाताबही खातों की गणितीय शुद्धता को सुनिश्चित करने के लिए: तलपट यह बताने में सक्षम होता है कि खतौनी तथा काम में ली गयी लेखांकन प्रक्रियाओं में कोई गणितीय त्रुटि है या नहीं।
2) अंतिम खाते तैयार करने में सहायता के लिए: वित्तीय विवरणों को तलपट के आधार पर तैयार किया जाता है। बिना तलपट को तैयार करे यह कार्य कठिन हो सकता है, इसलिए, यह तलपट तैयार करने का दुसरा उद्देश्य होता है।
3) प्रत्येक खाते का सारांश: तलपट खाताबही खातों का सारांश पेश करता है। खाताबही को केवल तब देखा जाता है जब एक खाते से संबंधित अधिक जानकारियों की आवश्यकता होती है।
4) त्रुटियों का पता लगाने में सहायता के लिए: पुस्तपालन कार्य में त्रुटियों का पता लगाने में तलपट मदद करता है। हालांकि यह देखा गया है कि यह पुस्तपालन की सभी त्रुटियों का खुलासा नहीं परंतु केवल गणितीय त्रुटियों का पता लगाता है।
|
Name of Account
|
L.F.
|
Dr.
![]() |
Cr.
![]() |
|
Cash in Hand
|
|
4,100
|
|
|
Machine
|
|
25,000
|
|
|
Purchase
|
|
66,200
|
|
|
Sundry Debtors
|
|
24,300
|
|
|
Carriage Inward
|
|
1,800
|
|
|
Carriage Outward
|
|
|
700
|
|
Wages
|
|
17,500
|
|
|
Rent and Taxes
|
|
5,300
|
|
|
Sundry Creditors
|
|
|
17,000
|
|
Discount Allowed
|
|
|
1,200
|
|
Return Outward
|
|
2,400
|
|
|
Return Inward
|
|
|
9,600
|
|
Capital
|
|
30,000
|
|
|
Drawings
|
|
|
6,300
|
|
Bank Loan
|
|
10,000
|
|
|
Interest on Loan
|
|
1,500
|
|
|
Opening Stock
|
|
|
26,200
|
|
Sales
|
|
|
1,28,700
|
|
Discount Received
|
|
1,600
|
|
|
Total
|
|
1,89,700
|
1,89,700
|
|
Name of Account
|
L.F.
|
Dr.
![]() |
Cr.
![]() |
|
Cash in Hand
|
|
4,100
|
|
|
Machine
|
|
25,000
|
|
|
Purchase
|
|
66,200
|
|
|
Sundry Debtors
|
|
24,300
|
|
|
Carriage Inward
|
|
1,800
|
|
|
Carriage Outward
|
|
700
|
|
|
Wages
|
|
17,500
|
|
|
Rent and Taxes
|
|
5,300
|
|
|
Sundry Creditors
|
|
|
17,000
|
|
Discount Allowed
|
|
1,200
|
|
|
Return Outward
|
|
|
2,400
|
|
Return Inward
|
|
9,600
|
|
|
Capital
|
|
|
30,000
|
|
Drawings
|
|
6,300
|
|
|
Bank Loan
|
|
|
10,000
|
|
Interest on Loan
|
|
1,500
|
|
|
Opening Stock
|
|
26,200
|
|
|
Sales
|
|
|
1,28,700
|
|
Discount Received
|
|
|
1,600
|
|
Total
|
|
1,89,700
|
1,89,700
|
जब खाताबही में सभी लेनदेनों की खतौनी कर ली जाती है तथा खातों के शेष निकाल लिये जाते हैं, तो डेबिट तथा क्रेडिट के शेषों को प्रदर्शित करने के लिए तैयार किया गया एक विवरण होता है। ऐसे विवरण को तलपट कहते हैं। एक तलपट के डेबिट पक्ष का योग इसके क्रेडिट पक्ष के योग के बराबर होना चाहिए। यदि तलपट के डेबिट पक्ष का योग इसके क्रेडिट पक्ष के योग के बराबर है तो इससे यह सिद्ध होता है कि खतौनी तथा खाताबही खातो के शेष में कोई कमीं नहीं है अर्थात पुस्तकें गणितीय रूप से सही है।
एक तलपट के उद्देश्य हैं:
यदि एक तलपट के दोनों पक्षों का योग समान हो, तो यह सिद्ध होता है कि:
(अ) लेखे गणितीय रूप से सही है;
(ब) सभी लेनदेनों के दोनों पक्षों को रिकॉर्ड कर लिया गया है तथा
(स) डेबिट तथा क्रेडिट दोनों प्रविष्टियों को खता दिया गया है।
एक तलपट अंतिम खाते अर्थात व्यापारिक, लाभ एवं हानि खाता तथा चिट्ठा तैयार करने में मदद करता है।
तलपट की विशेषताऐं:
1. यह सभी खाताबही खातों तथा रोकड़ बही के शेषों की एक सूची होती है।
2. यह पुस्तपालन की दोहरा लेखा प्रणाली का एक भाग नहीं होता है। यह केवल एक कार्यशील कागज होता है।
3. इसे किसी भी तिथि को तैयार किया जा सकता है।
4. यह जर्नल से खाताबही में प्रविष्टियों की खतौनी की गणितीय शुद्धता को सुनिश्चित करता है।
5. यह लेखा पुस्तकों की शुद्धता का एक सारांशित साक्ष्य नहीं होता है क्योंकि तलपट कुछ त्रुटियों का खुलासा नहीं करता है।
जब खाताबही में सभी लेनदेनों की खतौनी कर ली जाती है तथा खातों के शेष निकाल लिये जाते हैं, तो डेबिट तथा क्रेडिट के शेषों को प्रदर्शित करने के लिए तैयार किया गया एक विवरण होता है। ऐसे विवरण को तलपट कहते हैं। एक तलपट के डेबिट पक्ष का योग इसके क्रेडिट पक्ष के योग के बराबर होना चाहिए। यदि तलपट के डेबिट पक्ष का योग इसके क्रेडिट पक्ष के योग के बराबर है तो इससे यह सिद्ध होता है कि खतौनी तथा खाताबही खातो के शेष में कोई कमीं नहीं है अर्थात पुस्तकें गणितीय रूप से सही है।
एक तलपट के उद्देश्य हैं:
यदि एक तलपट के दोनों पक्षों का योग समान हो, तो यह सिद्ध होता है कि:
(अ) लेखे गणितीय रूप से सही है;
(ब) सभी लेनदेनों के दोनों पक्षों को रिकॉर्ड कर लिया गया है तथा
(स) डेबिट तथा क्रेडिट दोनों प्रविष्टियों को खता दिया गया है।
एक तलपट अंतिम खाते अर्थात व्यापारिक, लाभ एवं हानि खाता तथा चिट्ठा तैयार करने में मदद करता है।
तलपट की विशेषताऐं:
1. यह सभी खाताबही खातों तथा रोकड़ बही के शेषों की एक सूची होती है।
2. यह पुस्तपालन की दोहरा लेखा प्रणाली का एक भाग नहीं होता है। यह केवल एक कार्यशील कागज होता है।
3. इसे किसी भी तिथि को तैयार किया जा सकता है।
4. यह जर्नल से खाताबही में प्रविष्टियों की खतौनी की गणितीय शुद्धता को सुनिश्चित करता है।
5. यह लेखा पुस्तकों की शुद्धता का एक सारांशित साक्ष्य नहीं होता है क्योंकि तलपट कुछ त्रुटियों का खुलासा नहीं करता है।
Rectifying Journal Entries
|
Particulars |
LF |
Dr. (Rs) |
Cr. (Rs) |
|||||
|
a) Purchases Return A/c |
Dr |
|
2,000 |
|
||||
|
Sales Return A/c |
Dr |
|
2,000 |
|
||||
|
|
To Surinder |
|
|
4,000 |
||||
|
(Being the rectification of returns from Surinder wrongly passed through purchases return book.) |
|
|
|
|||||
|
b) Mohinder |
Dr |
|
10,000 |
|
||||
|
|
To Sales Return A/c |
|
|
5,000 |
||||
|
|
To Purchases Return A/c |
|
|
5,000 |
||||
|
(Being the rectification of purchase returns to Mohinder wrongly passed through sales return book.) |
|
|
|
|||||
|
c) Mahesh |
Dr |
|
3,000 |
|
||||
|
|
To Purchases |
|
|
3,000 |
||||
|
(Being the rectification of a purchase of Rs 6,500 from Mahesh wrongly passed as Rs 9,500) |
|
|
|
|||||
|
d) Shyam |
Dr |
|
1,500 |
|
||||
|
|
To Allowance A/c |
|
|
1,500 |
||||
|
(Being dishonour of cheque received from Shyam wrongly debited to Allowance a/c) |
|
|
|
|||||
|
e) Drawing A/c |
|
|
500 |
|
||||
|
|
To Purchases A/c |
|
|
500 |
||||
|
(Being goods drawn by proprietor not entered, recorded now) |
|
|
|
|||||
|
|
|
|
|
|||||
Rectifying Journal Entries
|
Particulars |
LF |
Dr. (Rs) |
Cr. (Rs) |
|||||
|
a) Bills Receivable A/c |
Dr |
|
6,000 |
|
||||
|
Bills Payable A/c |
Dr |
|
6,000 |
|
||||
|
|
To Joginder |
|
|
12,000 |
||||
|
(Being the rectification of Bills receivable from Joginder passed through Bills Payable Book.) |
|
|
|
|||||
|
b) Mukesh |
Dr |
|
22,000 |
|
||||
|
|
To Sales A/c |
|
|
11,000 |
||||
|
|
To Purchases A/c |
|
|
11,000 |
||||
|
(Being the correction of wrong entry in Purchases Book of a credit sale of goods to Mukesh) |
|
|
|
|||||
|
c) Anand |
Dr |
|
6,500 |
|
||||
|
|
To Sales |
|
|
6,500 |
||||
|
(Being the rectification of a sale of Rs 13,000 to Anand recorded at Rs 6,500 in books) |
|
|
|
|||||
|
d) Alok |
Dr |
|
300 |
|
||||
|
|
To Bad Debts Rec. A/c |
|
|
300 |
||||
|
(Being Bad Debts recovered from Alok wrongly debited to his Personal A/c) |
|
|
|
|||||
|
e) Repairs A/c |
|
|
540 |
|
||||
|
|
To Purchases A/c |
|
|
450 |
||||
|
|
To Mukesh |
|
|
90 |
||||
|
(Being amount payable to Mukesh Rs 540 for repairs to machine wrongly entered in purchase book as Rs 450) |
|
|
|
|||||
|
|
|
|
|
|||||
|
Debit Balances |
(Rs.) |
Credit Balances |
(Rs.) |
|
Opening Stock |
1,04,000 |
Creditors |
80,000 |
|
Furniture |
20,000 |
Sales |
8,58,000 |
|
Purchases |
5,80,000 |
Wages |
10,000 |
|
Cash |
1,000 |
Capital |
2,00,000 |
|
Debtors |
2,80,000 |
Discount Allowed |
3,000 |
|
Trade Expenses |
30,000 |
Drawings |
40,000 |
|
Closing Stock |
98,000 |
Carriage Outward |
20,000 |
|
Motor Cycle |
50,000 |
||
|
11,68,000 |
12,11,000 |
त्रुटियाँ एवं सही दृष्टिकोण:
1. अंतिम रहतियों खरीदे गये माल के ऐसे भाग को प्रदर्शित करता है जिसे अभी बेचा नहीं गया है। जैसा कि क्रयों को तलपट में लिया जा चुका है तो, अंतिम रहतिये को दौबारा लेने की आवश्यकता नहीं होती है।
2. मजदूरी, जारी बट्टा तथा जावक भाड़ा व्यय होते हैं, इसलिए इन्हें डेबिट पक्ष में दिखाया जाना चाहिए।
3. आहरण पूँजी को कम करता है तथा इसे डेबिट काॅलम में दिखाया जायेगा।
Corrected Trial Balance:
|
Debit Balances |
(Rs.) |
Credit Balances |
(Rs.) |
|
Opening Stock |
1,04,000 |
Creditors |
80,000 |
|
Furniture |
20,000 |
Sales |
8,58,000 |
|
Purchases |
5,80,000 |
Capital |
2,00,000 |
|
Cash |
1,000 |
||
|
Debtors |
2,80,000 |
||
|
Trade Expenses |
30,000 |
||
|
Wages |
10,000 |
||
|
Drawings |
40,000 |
||
|
Motor Cycle |
50,000 |
||
|
Carriage Outward |
20,000 |
||
|
Discount Allowed |
3,000 |
||
|
11,38,000 |
11,38,000 |
|
Purchases |
1,70,000 |
Drawings |
7,700 |
|
Stock (April 1, 2010) |
24,000 |
Return Inward |
3,500 |
|
Sales |
1,05,000 |
Premises |
5,28,000 |
|
Sundry Debtors |
23,800 |
Sundry Creditors |
16,100 |
|
Discount received |
3,500 |
Discount Allowed |
2,800 |
|
Carriage Outward |
700 |
Carriage Inward |
1,400 |
|
Cash in Hand |
3,500 |
Cash at Bank |
17,500 |
|
Machinery |
1,24,500 |
General Expenses |
2,100 |
|
Provision for Depreciation on Machinery |
24,200 |
Bad Debts Written off |
2,450 |
|
|
|
Provision for Doubtful Debts |
2,380 |
|
|
4,79,200 |
|
5,83,930 |
|
Name of Accounts |
Dr. Balance Rs. |
Cr. Balance Rs. |
|
Purchases Stock(April 1,2010) |
1,70,000 24,000 |
|
|
Sales |
|
1,05,000 |
|
Sundry Debtors |
23,800 |
|
|
Discount Received |
|
3,500 |
|
Carriage Outward |
700 |
|
|
Cash in Hand |
3,500 |
|
|
Machinery |
1,24,500 |
|
|
Provision for Depreciation |
|
24,200 |
|
Drawings |
7,700 |
|
|
Return Inward |
3,500 |
|
|
Premises |
5,28,000 |
|
|
Sundry Creditors |
|
16,100 |
|
Discount Allowed |
2,800 |
|
|
Carriage Inward |
1,400 |
|
|
Cash at Bank |
17,500 |
|
|
General Expenses |
2,100 |
|
|
Bad Debts Written Off |
2,450 |
|
|
Provision for Doubtful Debts |
|
2,380 |
|
Capital (Balancing Figure) |
|
7,60,770 |
|
|
9,11,950 |
9,11,950 |







| Heads of Accounts |
Dr. |
Cr. |
| Capital A/c | 40,000 | |
| Cash A/c | 22,280 | |
| Purchases A/c | 39,500 | |
| Sales A/c | 25,000 | |
| Drawings A/c | 750 | |
| Discount Received A/c | 270 | |
| Salaries A/c | 1,000 | |
| Input CGST A/c | 1,320 | |
| Input SGST A/c | 1,320 | |
| Input IGST A/c | 2,100 | |
| Output CGST A/c | 1,500 | |
| Output SGST A/c | 1,500 | |
| Total | 45,760 | 90,780 |
|
Trial Balance of Mohit & Co. |
|||
|
Heads of Accounts |
L.F. |
Dr. |
Cr. |
|
Capital A/c |
40,000 |
||
|
Cash A/c |
22,280 |
||
|
Purchases A/c |
39,500 |
||
|
Sales A/c |
25,000 |
||
|
Drawings A/c |
750 |
||
|
Discount Received A/c |
270 |
||
|
Salaries A/c |
1,000 |
||
|
Input CGST A/c |
1,320 |
||
|
Input SGST A/c |
1,320 |
||
|
Input IGST A/c |
2,100 |
||
|
Output CGST A/c |
1,500 |
||
|
Output SGST A/c |
1,500 |
||
|
Total |
68,270 |
68,270 |
|
Rectifying Journal Entries
|
Particulars |
LF |
Dr. (Rs) |
Cr. (Rs) |
|||||
|
a) Purchases Return A/c |
Dr |
|
2,000 |
|
||||
|
Sales Return A/c |
Dr |
|
2,000 |
|
||||
|
|
To Surinder |
|
|
4,000 |
||||
|
(Being the rectification of returns from Surinder wrongly passed through purchases return book.) |
|
|
|
|||||
|
b) Mohinder |
Dr |
|
10,000 |
|
||||
|
|
To Sales Return A/c |
|
|
5,000 |
||||
|
|
To Purchases Return A/c |
|
|
5,000 |
||||
|
(Being the rectification of purchase returns to Mohinder wrongly passed through sales return book.) |
|
|
|
|||||
|
c) Mahesh |
Dr |
|
3,000 |
|
||||
|
|
To Purchases |
|
|
3,000 |
||||
|
(Being the rectification of a purchase of Rs 6,500 from Mahesh wrongly passed as Rs 9,500) |
|
|
|
|||||
|
d) Shyam |
Dr |
|
1,500 |
|
||||
|
|
To Allowance A/c |
|
|
1,500 |
||||
|
(Being dishonour of cheque received from Shyam wrongly debited to Allowance a/c) |
|
|
|
|||||
|
e) Drawing A/c |
|
|
500 |
|
||||
|
|
To Purchases A/c |
|
|
500 |
||||
|
(Being goods drawn by proprietor not entered, recorded now) |
|
|
|
|||||
|
|
|
|
|
|||||
Rectifying Journal Entries
|
Particulars |
LF |
Dr. (Rs) |
Cr. (Rs) |
|||||
|
a) Bills Receivable A/c |
Dr |
|
6,000 |
|
||||
|
Bills Payable A/c |
Dr |
|
6,000 |
|
||||
|
|
To Joginder |
|
|
12,000 |
||||
|
(Being the rectification of Bills receivable from Joginder passed through Bills Payable Book.) |
|
|
|
|||||
|
b) Mukesh |
Dr |
|
22,000 |
|
||||
|
|
To Sales A/c |
|
|
11,000 |
||||
|
|
To Purchases A/c |
|
|
11,000 |
||||
|
(Being the correction of wrong entry in Purchases Book of a credit sale of goods to Mukesh) |
|
|
|
|||||
|
c) Anand |
Dr |
|
6,500 |
|
||||
|
|
To Sales |
|
|
6,500 |
||||
|
(Being the rectification of a sale of Rs 13,000 to Anand recorded at Rs 6,500 in books) |
|
|
|
|||||
|
d) Alok |
Dr |
|
300 |
|
||||
|
|
To Bad Debts Rec. A/c |
|
|
300 |
||||
|
(Being Bad Debts recovered from Alok wrongly debited to his Personal A/c) |
|
|
|
|||||
|
e) Repairs A/c |
|
|
540 |
|
||||
|
|
To Purchases A/c |
|
|
450 |
||||
|
|
To Mukesh |
|
|
90 |
||||
|
(Being amount payable to Mukesh Rs 540 for repairs to machine wrongly entered in purchase book as Rs 450) |
|
|
|
|||||
|
|
|
|
|
|||||
|
Debit Balances |
(Rs.) |
Credit Balances |
(Rs.) |
|
Opening Stock |
1,04,000 |
Creditors |
80,000 |
|
Furniture |
20,000 |
Sales |
8,58,000 |
|
Purchases |
5,80,000 |
Wages |
10,000 |
|
Cash |
1,000 |
Capital |
2,00,000 |
|
Debtors |
2,80,000 |
Discount Allowed |
3,000 |
|
Trade Expenses |
30,000 |
Drawings |
40,000 |
|
Closing Stock |
98,000 |
Carriage Outward |
20,000 |
|
Motor Cycle |
50,000 |
||
|
11,68,000 |
12,11,000 |
त्रुटियाँ एवं सही दृष्टिकोण:
1. अंतिम रहतियों खरीदे गये माल के ऐसे भाग को प्रदर्शित करता है जिसे अभी बेचा नहीं गया है। जैसा कि क्रयों को तलपट में लिया जा चुका है तो, अंतिम रहतिये को दौबारा लेने की आवश्यकता नहीं होती है।
2. मजदूरी, जारी बट्टा तथा जावक भाड़ा व्यय होते हैं, इसलिए इन्हें डेबिट पक्ष में दिखाया जाना चाहिए।
3. आहरण पूँजी को कम करता है तथा इसे डेबिट काॅलम में दिखाया जायेगा।
Corrected Trial Balance:
|
Debit Balances |
(Rs.) |
Credit Balances |
(Rs.) |
|
Opening Stock |
1,04,000 |
Creditors |
80,000 |
|
Furniture |
20,000 |
Sales |
8,58,000 |
|
Purchases |
5,80,000 |
Capital |
2,00,000 |
|
Cash |
1,000 |
||
|
Debtors |
2,80,000 |
||
|
Trade Expenses |
30,000 |
||
|
Wages |
10,000 |
||
|
Drawings |
40,000 |
||
|
Motor Cycle |
50,000 |
||
|
Carriage Outward |
20,000 |
||
|
Discount Allowed |
3,000 |
||
|
11,38,000 |
11,38,000 |
|
Purchases |
1,70,000 |
Drawings |
7,700 |
|
Stock (April 1, 2010) |
24,000 |
Return Inward |
3,500 |
|
Sales |
1,05,000 |
Premises |
5,28,000 |
|
Sundry Debtors |
23,800 |
Sundry Creditors |
16,100 |
|
Discount received |
3,500 |
Discount Allowed |
2,800 |
|
Carriage Outward |
700 |
Carriage Inward |
1,400 |
|
Cash in Hand |
3,500 |
Cash at Bank |
17,500 |
|
Machinery |
1,24,500 |
General Expenses |
2,100 |
|
Provision for Depreciation on Machinery |
24,200 |
Bad Debts Written off |
2,450 |
|
|
|
Provision for Doubtful Debts |
2,380 |
|
|
4,79,200 |
|
5,83,930 |
|
Name of Accounts |
Dr. Balance Rs. |
Cr. Balance Rs. |
|
Purchases Stock(April 1,2010) |
1,70,000 24,000 |
|
|
Sales |
|
1,05,000 |
|
Sundry Debtors |
23,800 |
|
|
Discount Received |
|
3,500 |
|
Carriage Outward |
700 |
|
|
Cash in Hand |
3,500 |
|
|
Machinery |
1,24,500 |
|
|
Provision for Depreciation |
|
24,200 |
|
Drawings |
7,700 |
|
|
Return Inward |
3,500 |
|
|
Premises |
5,28,000 |
|
|
Sundry Creditors |
|
16,100 |
|
Discount Allowed |
2,800 |
|
|
Carriage Inward |
1,400 |
|
|
Cash at Bank |
17,500 |
|
|
General Expenses |
2,100 |
|
|
Bad Debts Written Off |
2,450 |
|
|
Provision for Doubtful Debts |
|
2,380 |
|
Capital (Balancing Figure) |
|
7,60,770 |
|
|
9,11,950 |
9,11,950 |
A.
व्यापारिक खाते में।
B. आय विवरण में।
C. तलपट में
D. पूँजी खाते में।
लाभ एवं हानि खाते के शेष को चिट्ठे में स्वामी के खाते में हस्तांतरित किया जाता है। इसे पूँजी खाते में जोड़ दिया जाता है। शुद्ध लाभ को पूँजी में जोड़ दिया जाता है जबकि शुद्ध हानि को पूँजी से घटाया जाता है।
A.
पूँजीगत व्यय
B. पूँजीगत प्राप्ति
C. आयगत व्यय
D. आयगत प्राप्ति
आयगत व्यय व्यवसाय के संचालन में किया जाने वाला व्यय होता है। एक सम्पत्ति का मूल्यह्रास या समाप्ति मूल्य आयगत व्यय का उदाहरण होता है।
A.
क्रय।
B. विक्रय।
C. क्रय वापसी।
D. जावक वापसी।
A.
काल्पनिक सम्पत्ति।
B. मूर्त सम्पत्ति।
C. अमूर्त सम्पत्ति।
D. चालू सम्पत्ति।
अमूर्त सम्पत्तियाँ वे सम्पत्तियाँ होती है जिनका कोई भौतिक अस्तित्व नहीं होता है। उदाहरण के लिए - ख्याति, पेटेंट, ट्रेडमार्क आदि।
A.
अमूर्त सम्पत्ति का।
B. चालू दायित्व का।
C. चालू सम्पत्ति का।
D. मूर्त सम्पत्ति का।
मूर्त सम्पत्तियाँ वे सम्पत्तियाँ होती है जिनका कोई भौतिक अस्तित्व होता है। उदाहरण के लिए - भूमि एवं भवन, प्लांट तथा मशीनरी आदि।
A.
आयगत प्राप्ति।
B. पूँजीगत व्यय।
C. आयगत व्यय।
D. पूँजीगत प्राप्ति।
यह सेवा तथा माल के विक्रय द्वारा सामान्य तथा निरंतर प्राप्त राशि होती है। व्यवसाय द्वारा व्यावसायिक माल के विक्रय से प्राप्त राशि का आयगत प्राप्ति होती है। उदाहरण के लिए एक फर्नीचर विक्रेता के लिए टेबल तथा कुर्सियों के विक्रय से प्राप्त राशि आयगत प्राप्ति होती है।
A.
तलपट तथा चिट्ठा।
B. व्यापारिक, लाभ एवं हानि खाता तथा चिट्ठा।
C. जर्नल, खाताबही तथा तलपट।
D. लाभ एवं हानि खाता तथा चिट्ठा।
वित्तीय विवरणों में व्यापारिक, लाभ एवं हानि खाता तथा चिट्ठा शामिल होता है। वित्तीय विवरणों को खाताबही तथा रोकड़ बही से तैयार किये गये तलपट से तैयार किया जाता है।
A.
सकल लाभ - क्रय + प्रत्यक्ष व्यय।
B. विक्रय - क्रय - प्रत्यक्ष व्यय।
C. सकल लाभ + अन्य आयें - अप्रत्यक्ष व्यय।
D. शुद्ध विक्रय - परिचालन लागत।
शुद्ध लाभ अर्थात व्ययों तथा हानियों पर अतिरिक्त आय। शुद्ध लाभ = सकल लाभ + अन्य आयें - अप्रत्यक्ष व्यय।
A.
आय विवरण।
B. पूँजीगत प्राप्ति।
C. आयगत प्राप्ति।
D. आस्थगित आयगत व्यय।
आय विवरण के दो भाग होते हैं, एक व्यापारिक खाता जो सकल लाभ एवं हानि को प्रदर्शित करता है तथा दूसरा लाभ एवं हानि खाता जो शुद्ध लाभ एवं हानि प्रदर्शित करता है।
A.
लाभ एवं हानि खाते में।
B. तलपट में।
C. व्यापारिक खाते में।
D. चिट्ठे में।
शुद्ध विक्रय तथा बिके माल की लागत को केवल व्यापारिक खाते में रिकॉर्ड किया जाता है। सभी प्रकार की प्रत्यक्ष लागतों को व्यापारिक खाते में रिकॉर्ड किया जाता है। यह हमें सकल लाभ एवं हानि के बारे में बताता है।
A.
आयगत प्राप्ति।
B. पूँजीगत व्यय।
C. पूँजीगत प्राप्ति।
D. आयगत व्यय।
यह व्यवसाय की आय क्षमता में वृद्धि करता है। वहीं दूसरी तरफ आयगत व्यय लाभ कमाने के लिए किये जाते हैं।
A.
खाताबही।
B. तलपट।
C. अंतिम खाते।
D. लाभ एवं हानि खाता।
जब दो विवरण (आय विवरण तथा चिट्ठा) एक साथ होते हैं, तो उन्हें अंतिम खातों के रूप में जाना जाता है। इसे अंतिम खाते कहलाते हैं क्योंकि यह अंत में खाते तैयार करने की प्रक्रिया है। यह सभी व्यावसायिक लेनदेनों का सारांश होता है।
A.
गोदाम व्यय।
B. विक्रय पर भाड़ा।
C. अंकेक्षण शुल्क।
D. ऐजेंट का कमीशन।
प्रशासनिक एवं कार्यालय प्रबंधन व्यय में अंकेक्षण शुल्क, कार्यालय वेतन, मुद्रण तथा स्टेशनरी, डाक तथा टेलीफोन शुल्क आदि शामिल होता है।
A.
लाभ एवं हानि खाता।
B. चिट्ठा।
C. व्यापारिक खाता।
D. तलपट।
लाभ एवं हानि का निर्धारण करने के लिए एक व्यवसाय द्वारा लाभ एवं हानि खाता तैयार किया जाता है तथा अवधि के अंत में वित्तीय स्थिति का पता लगाने के लिए चिट्ठा तैयार किया जाता है।
A.
सकल लाभ के।
B. सकल हानि के।
C. शुद्ध हानि के।
D. परिचालन लाभ के।
सकल लाभ को निम्नलिखित समीकरण के प्रारूप में दिखाया जा सकता है: सकल लाभ = शुद्ध विक्रय - बिके माल की लागत। इसकी गणना व्यापारिक खाता तैयार कर की जाती है। व्यापारिक खाते में शुद्ध विक्रय तथा उत्पादन की सभी प्रत्यक्ष लागतें शामिल होती है।
A.
तलपट।
B. व्यापारिक खाता।
C. चिट्ठा।
D. लाभ एवं हानि खाता।
सकल लाभ का निर्धारण व्यापारिक खाता तैयार कर किया जाता है तथा तत्पश्चात् इसे लाभ एवं हानि खाते के क्रेडिट पक्ष में हस्तांतरित किया जाता है।
A.
विक्रय।
B. समायोजित विक्रय।
C. क्रय।
D. समायोजित क्रय।
समायोजित क्रय = शुद्ध क्रय + प्रारंभिक रहतिया - अंतिम रहतिया। इसे व्यापारिक खाते में दिखाया जाता है।
A.
आयगत व्यय।
B. पूर्वदत्त व्यय।
C. पूँजीगत व्यय।
D. आयगत प्राप्ति।
व्यापारिक या लाभ एवं हानि खाते में दिखाये गये व्यय आयगत व्यय होते हैं। ऐसे व्ययों के लाभ एक वर्ष के भितर समाप्त हो जाते हैं। हालांकि पूँजीगत व्ययों को चिट्ठे में दिखाया जाता है।
A.
आयगत व्यय।
B. पूँजीगत व्यय।
C. आयगत प्राप्ति।
D. पूँजीगत प्राप्ति।
कारखाने द्वारा प्रयुक्त एक उपकरण के निर्माण के लिए कर्मचारी को चुकायी गई मजदूरी पूँजीगत व्यय होता है, क्योंकि इसके लाभ एक से अधिक वर्षों के लिए प्राप्त होंगे।
A.
लाभ एवं हानि खाते में।
B. मोटर कार खाते में।
C. मूल्यह्रास खाते में।
D. रोकड़ खाते में।
सभी हानियों तथा व्ययों को लाभ एवं हानि खाते में डेबिट किया जाता है। इसलिए, एक पुरानी मोटर कार के विक्रय या हानि को लाभ एवं हानि खाते में डेबिट किया जाता है।







Journal
|
Date |
Particulars |
L.F. |
Dr. |
Cr. |
|
|
Suspense A/c Dr. To Vendor’s a/c (Being vendro’s a/c underposted) |
|
91 |
91 |
|
|
Suspense A/c Dr. To Discount Received a/c (Being Dis. Rec. A/c ommited to rocord) |
|
1200 |
1200 |
|
|
Plant A/c Dr. Suspense A/c Dr. To Carriage a/c (Being carriage over casted) |
|
1279 18 |
1297 |
|
|
Suspense A/c Dr. To Purchase a/c (Being purchase book over casted) |
|
1800 |
1800 |
Suspense a/c
|
Particulars |
Amt |
Particulars |
Amt |
|
To Vendor’s a/c To Discount Received a/c To carriage a/c To purchase a/c |
91 1200 18 180 |
By balance c/d |
1489 |
|
|
1489 |
|
1489 |
यदि तलपट के दोनों पक्षों का योग नहीं मिलता है, तो निम्नलिखित उपाय प्रयोग में लाने चाहिएः-
1. तलपट के योग की जाँच करना- सर्वप्रथम तलपट के दोनों पक्षों की धनराशियों को पुनः जोड़ना चाहिए यदि तलपट के दोनों पक्षों का योग ठीक नहीं है तो तलपट के दोनो पक्षों के योगों के अन्तर की धनराशि को अलग लिख लेना चाहिए।
2. अन्तर के बराबर रकम खोजना – इस अन्तर को लिखने के बाद यह देखना चाहिए कि इस अन्तर के बराबर की कोई राशि खाताबही से तलपट में लिखे जाने से तो नहीं छूट गई है।
3. अन्तर की आधी रकम खोजना – यदि उपर्युक्त बातें सही हों तो दोनो पक्षों के योग के अन्तर की राशि को आधा करके यह देखना चाहिए कि यह राशि तलपट के गलत पक्ष में तो नहीं लिख दी गई है।
4. अन्तर के नौवे भाग के बराबर राशि खोजना – अन्तर का 1/9 करना चाहिए। हो सकता है कि धनराशि लिखते समय भूल से शून्य बढ़ गया हो या शून्य कम हो गया हो। यदि शून्य बढ़ गया होगा तो राशि 10 गुनी हो गई होगी और यदि शून्य घट गया होगा तो राशि 1/10 रह गई होगी। ऐसी दशा में अन्तर 9 से अवश्य विभाजित हो जाएगा।
5. अंकों के स्थान परिवर्तन की जाँच करना – कभी-कभी अंकों के स्थान परिवर्तन हो जाने के कारण भी अशुद्धि हो जाती है। जैसे- रु 120 के स्थान पर रु 102 लिख जाना। ऐसी दशा में अन्तर 9 से विभाजित हो जाता है।
6. रोकड़ बही के शेषों को देखना – यह देखना चाहिए कि प्रारम्भिक लेखे की पुस्तक, जैसे रोकड़ बही की रोकड़, बैंक या छूट खाने का शेष तलपट में लिकने से तो नहीं रह गया है।
7. खातों की राशि का तलपट से मिलान करना – यह भी जाँच कर लेनी चाहिए कि खातावही के सभी खातों की राशियों को तलपट में लिख दिया गया है अथवा नहीं।
8. खतौनी की जाँच – यह भी जाँच कर लेनी चाहिए कि खाताबही में खतौनी करते समय सभी राशियाँ सही-सही और ठीक पक्ष में लिख दी गई हैं।
9. प्रारम्भिक शेषों की जाँच – यह भी जाँच कर लेनी चाहिए कि पिछले वर्ष के लाए हुए शेष इस वर्ष की पुस्तकों में ठीक प्रकार से लिखे गए हैं।
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Debit Account Items |
Credit Account Items |
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तलपट बनाने के प्रमुख उद्देश्य या लाभ निम्न प्रकार हैं-
1. दोहरे लेखें की जाँच- तलपट द्वारा यह ज्ञात हो जाता है कि प्रत्येक लेन-देन का दोहरा लेखा हो गया है अथवा नहीं।
2. खातों की गणित सम्बन्धी शुद्धता की जाँच - तलपट तैयार करने का मुख्य उद्देश्य खाताबंदी में की गई खतैनी की गणित सम्बन्धी शुद्धता की जाँच करना होता है। सामान्यतः यदि तलपट के ऋणी और धनी पक्षों का योग मिल जाता है तो यह समझा जाता है कि खाताबही में की गई खतौनी शुद्ध है, अन्यथा नहीं।
3. खातों के शेषो का ज्ञान - किसी भी समय एक ही दृष्टि में व्यापारी को इस बात का ज्ञान हो सकता है कि उसकी खाताबही में किन खातों के ज्ञणी शेष है तथा किन खातों के धनी शेष हैं। वास्तव में तलपट सम्पूर्ण खाताबही का संक्षिप्त रुप होता है।
4. अन्तिम खाते तैयार करने के लिए- तलपट की सहायता से ही प्रत्येक व्यापारी एक निश्चित अवधि के अन्त मैं अपने अन्तिम खाते (व्यापारिक खाता, लाभ-हानि खाता तथा आर्थिक चिट्ठा) तैयार करता है जो व्यापार का लाभ या हानि तथा वित्तीय स्थिति को प्रकट करते हैं।
5. महत्वपूर्ण निष्कर्ष निकालने के लिए- चालू वर्ष के तलपट की राशियों से गत वर्ष के तलपट की राशियों की तुलना करके भविष्य के लिए महत्वपूर्ण निष्कर्ष निकाले जा सकते हैं।
6. व्यापार का मूल्यांकन करने के लिए – तलपट के द्वारा व्यापार की राशियों की आर्थिक स्थिति का सरलतापूर्वक पता लगाया जा सकता है, जिससे व्यापार के मूल्यांकन में शीघ्रता होती है। तलपट में दिए गए विभिन्न प्रकार के खातों के स्वभाव एवं शेषों से व्यापार की समालोचना सरलतापूर्वक की जा सकती है।
यदि तलपट के दोनों पक्षों का योग नहीं मिलता है, तो निम्नलिखित उपाय प्रयोग में लाने चाहिएः-
1. तलपट के योग की जाँच करना- सर्वप्रथम तलपट के दोनों पक्षों की धनराशियों को पुनः जोड़ना चाहिए यदि तलपट के दोनों पक्षों का योग ठीक नहीं है तो तलपट के दोनो पक्षों के योगों के अन्तर की धनराशि को अलग लिख लेना चाहिए।
2. अन्तर के बराबर रकम खोजना – इस अन्तर को लिखने के बाद यह देखना चाहिए कि इस अन्तर के बराबर की कोई राशि खाताबही से तलपट में लिखे जाने से तो नहीं छूट गई है।
3. अन्तर की आधी रकम खोजना – यदि उपर्युक्त बातें सही हों तो दोनो पक्षों के योग के अन्तर की राशि को आधा करके यह देखना चाहिए कि यह राशि तलपट के गलत पक्ष में तो नहीं लिख दी गई है।
4. अन्तर के नौवे भाग के बराबर राशि खोजना – अन्तर का 1/9 करना चाहिए। हो सकता है कि धनराशि लिखते समय भूल से शून्य बढ़ गया हो या शून्य कम हो गया हो। यदि शून्य बढ़ गया होगा तो राशि 10 गुनी हो गई होगी और यदि शून्य घट गया होगा तो राशि 1/10 रह गई होगी। ऐसी दशा में अन्तर 9 से अवश्य विभाजित हो जाएगा।
5. अंकों के स्थान परिवर्तन की जाँच करना – कभी-कभी अंकों के स्थान परिवर्तन हो जाने के कारण भी अशुद्धि हो जाती है। जैसे- रु 120 के स्थान पर रु 102 लिख जाना। ऐसी दशा में अन्तर 9 से विभाजित हो जाता है।
6. रोकड़ बही के शेषों को देखना – यह देखना चाहिए कि प्रारम्भिक लेखे की पुस्तक, जैसे रोकड़ बही की रोकड़, बैंक या छूट खाने का शेष तलपट में लिकने से तो नहीं रह गया है।
7. खातों की राशि का तलपट से मिलान करना – यह भी जाँच कर लेनी चाहिए कि खातावही के सभी खातों की राशियों को तलपट में लिख दिया गया है अथवा नहीं।
8. खतौनी की जाँच – यह भी जाँच कर लेनी चाहिए कि खाताबही में खतौनी करते समय सभी राशियाँ सही-सही और ठीक पक्ष में लिख दी गई हैं।
9. प्रारम्भिक शेषों की जाँच – यह भी जाँच कर लेनी चाहिए कि पिछले वर्ष के लाए हुए शेष इस वर्ष की पुस्तकों में ठीक प्रकार से लिखे गए हैं।
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A.
चालू दायित्व
B.
प्रावधान
C.
आधिक्य
D.
ऋण
आयोजन या प्रावधान का अर्थ है ऐसी राशि, जो ऐसी किसी भावी ज्ञात हानि या देयता, जिसकी राशि पर्याप्त यथार्थता से निश्चित नहीं की जा सकती है, की व्यवस्था करने हेतु रखी जाए।
A.
सम्पत्ति के बाजार मूल्य में कमी
B.
उपयोग होने एवं समय व्यतीत होने के साथ सम्पत्ति के मूल्य में कमी
C.
मुद्रास्फीति
D.
इनमें से कोई नहीं
स्थायी सम्पत्ति के व्यापार में निरन्तर प्रयोग से उसमें घिसावट आ जाती है, जिसके कारण सम्पत्ति के मूल्य में कमी हो जाती है। प्रयोग में लापरवाही से भी सम्पत्ति में टूट-फूट या घिसावट आ सकती है।
A.
वार्षिक वृति पद्धति में
B.
स्थायी किश्त पद्धति में
C.
क्रमागत शेष पद्धति में
D.
ह्रास कोष पद्धति में
क्रमागत शेष पद्धति में सम्पत्ति कभी भी पूर्ण मूल्य तक अपलिखित नहीं हो पाती है l जबकि शेष तीनों विधियों में में सम्पत्ति शून्य मूल्य तक अपलिखित हो सकती है l
A.
2,800
B.
2,900
C.
3,000
D.
3,100
28,000+2,000-1000=29,000; 29,000/10=
2,900
A.
स्थायी
B.
चल
C.
कृत्रिम
D.
सभी
व्यवसाय के संचालन मैं स्थायी सम्पत्तियों का महत्वपूर्ण योगदान होता है। स्थायी सम्पत्तियाँ वे सम्पत्तियाँ होती हैं, जिनकी दीर्घ आयु होती हैं और जो व्यापार में प्रयोग के लिए क्रय (प्राप्त) की जाती हैं न कि पुनर्विक्रय के लिए।
A. नकद खाते द्वारा
B. ह्रास खाते द्वारा
C. मशीनरी खाते द्वारा
D. उपर्युक्त में से कोई नहीं।
सम्पत्ति के मूल्य में प्रयोग या समय के कारण से गिरावट को ह्रास कहते हैं। इस प्रकार स्पष्ट है कि ह्रास स्थायी सम्पत्ति के मूल्य में वह गिरावट है जोकि उसके प्रयोग से या समय के व्यतीत हो जाने के कारण होती है।
A.
सम्पत्ति की मूल लागत पर l
B.
सम्पत्ति के बाजार मूल्य पर l
C.
सम्पत्ति के अपलिखित मूल्य पर l
D.
सम्पत्ति के अवशिष्ट मूल्य पर l
मान लीजिए वर्ष 2010 में, एक टाइपराइटर
5,000 का क्रय किया गया तथा इस पर 10 प्रतिशत वार्षिक ह्रास घटती हुई शेष पद्धति में लगाया जाए। तो 2010 वर्ष में
500 ह्रास काटा जाएगा। 2011 वर्ष के प्रारम्भ में टाइपराइटर खाते में
4,500 शेष होगा, अतः 2011 वर्ष में
4,500 शेष पर 10 प्रतिशत अर्थात
450 ह्रास चार्ज किया जाएगा।
A.
भूमि पर
B.
भवन
C.
फर्नीचर
D.
संयन्त्र पर
भूमि को छोड़कर शेष सभी सम्पत्तियों पर ह्रास की गणना की जाती है l
A.
सभी वर्षों के लिए समान रहती है,
B.
प्रत्येक वर्ष घटती जाती है,
C.
प्रत्येक वर्ष पुनर्मूल्यांकित होती रहती है,
D.
प्रत्येक वर्ष बढ़ती है।
इस विधि में प्रति वर्ष चार्ज की जाने वाली ह्रास की राशि सम्पत्ति के सम्पूर्ण जीवनकाल में एक समान रहती है।
A.
4,860
B.
37,680
C.
720
D.
38,400
यदि संचित ह्रास की राशि तथा विक्रय मूल्य की राशि सम्पत्ति की मूल लागत से कम हो तो अन्तर विक्रय पर हानि होगा।
A.
7,500
B.
6,400
C.
5,000
D.
500
जैसे-जैसे किसी सम्पत्ति पर ह्स काटा जाता है, उसका अपलिखित मूल्य कम होता है, परिणामस्वरुप प्रत्येक वर्ष ह्स की राशि भी कम होती जाती है।
A.
अगला दिन
B.
पहला दिन
C.
उसी दिन
D.
एक माह बाद
यदि बिल की देय तिथि रविवार अथवा सार्वजनिक अवकाश के दिन पड़ती है तो बिल का भुगतान उससे पहले दिन होगा।
A.
1 अक्तूबर, 2016
B.
2 अक्तूबर, 2016
C.
3 अक्तूबर, 2016
D.
4 अक्तूबर, 2016
प्रत्येक बिल की भुगतान तिथि निर्धारित करते समय उसकी देय तिथि में तीन दिन और जोड़ दिए जाते हैं। इन तीन दिनों को अनुग्रह दिवस कहते हैं।
A.
लेखक के द्वारा
B.
स्वीकर्ता के द्वारा
C.
बैंक के द्वारा
D.
विपत्र के धारक द्वारा
यह शुल्क प्रारम्भ में विनिमय-विपत्र के धारक द्वारा अदा किया जाता है तथा बाद में स्वीकर्ता से वसूल कर लिया जाता है।
A.
देनदार द्वारा
B.
लेनदार द्वारा
C.
बैंक द्वारा
D.
ये सभी
यह वह व्यक्ति है जो किसी अन्य व्यक्ति से रकम प्राप्त करने का अधिकारी है और अपने देनदार पर बिल को लिखता है। विनिमय-बिल पर लेखक के हस्ताक्षर होते हैं।
A.
दो
B.
तीन
C.
पाँच
D.
छः
विनिमय-विपत्र के तीन पक्ष होते हैं।
A.
एक
B.
दो
C.
तीन
D.
चार
प्रत्येक बिल की भुगतान तिथि निर्धारित करते समय उसकी देय तिथि में तीन दिन और जोड़ दिए जाते हैं। इन तीन दिनों को अनुग्रह दिवस कहते हैं।