देय तिथि से पूर्व छूट पर स्वीकर्ता द्वारा बिल का भुगतान, छूट पर बिल का भुगतान कहलाता है। बिल पर देय राशि तथा देय तिथि से पूर्व चुकाई गई राशि का अन्तर बिल पर छूट कहलाती है।
जब बिल के स्वीकर्ता द्वारा परिपक्वता के समय प्रस्तुति पर बिल का भुगतान नहीं जाये, तो पुराने बिल को रद्द कर दिया गया है और नए सिरे से भुगतान की नई शर्तों के साथ एक बिल जारी किया जाता है। इसे बिल का नवीकरण कहा जाता है।
कभी कभी बिल का स्वीकर्ता बिल का परिपक्वता पूर्व भुगतान करता है, जिसके कारण वह इसकी परिपक्वता से पहले बिल का भुगतान स्वीकार करने के लिए धारक से एक अनुरोध करता है। यदि धारक ऐसा करने के लिए सहमत होता है तो बिल का भुगतान कर दिया जाता है।
बिल की अवधि से आश्य उस समय से है जिसके पश्चात स्वीकर्ता बिल की राशि का भुगतान करेगा। इस प्रकार प्रत्येक बिल की भुगतान तिथि निर्धारित करते समय उसकी देय तिथि में तीन दिन और जोड़ दिये जाते हैं। यह तीन दिन रियायती दिन या अनुग्रह के दिन कहलाते हैं।
प्रतिज्ञ पत्र के दो पक्षकार होते हैः एक प्रतिज्ञा–पत्र का लेखक तथा दूसरा प्राप्तकर्ता देनदार लेखक तथा लेनदार प्रतिज्ञा-पत्र का प्राप्तकर्ता होता है।
विनिमय विपत्रों के भुगतान की देय तिथि में जोडे़ जाने वाले अतिरिक्त तीन दिवसों को अनुग्रह दिवस के रूप में जाना जाता है।


अनुग्रह बिल ऐसा विनिमय बिल होता है जिसे एक पार्टी पर लिखा तथ स्वीकार किया जाता है जिससे उसे भुनाया जा सके। इसे किसी भी अंतर्निहित व्यापार लेनदेन के बिना वित्तपोषण के उद्देश्य के लिए प्रयोग किया जाता है।

ऐसे बिल धन की कमीं की दशा में एक पक्ष द्वारा किसी दूसरे पक्ष की सहायता के लिए लिखे जाते हैं।
जब विनिमय-विपत्र लिखा जाता है तो लिखने के बाद उसे स्वीकृति हेतु विपत्र के देनदार या लेख पात्र के पास भेजा जाता है। देनदार विपत्र के मुख पर स्वीकृति शब्द लिखकर अपने हस्ताक्षर करके उसे वापस कर देता है। यह क्रिया विपत्र की स्वीकृति कहलाती है। स्वीकृति से पूर्व विपत्र केवल ड्राफ्ट ही माना जाता है। ध्यान रहे, स्वीकृति हेतु केवल दर्शनी एवं मुद्दति विपत्र ही भेजा जाता है, मॉग पर देय विपत्र नहीं भेजा जाता है। इसका कारण यह है कि मॉग विपत्र का भुगतान तो उसके प्रस्तुत करने पर ही हो जाता है। स्वीकृति सामान्यतया विपत्र के उपर ही दी जाती है, किसी पृथक कागज पर स्वीकृति शब्द लिख देने से विपत्र की स्वीकृति नहीं मानी जाती।


A.
ह्रासित मूल्य पद्घति,
B.
सरल रेखा पद्घति
C.
वर्ष गणना पद्घति
D.
शोधन कोष पद्घति
इस विधि में सम्पत्ति के कुल मूल्य में से उसका अवशिष्ट मूल्य घटाकर बचने वाली राशि को उस सम्पत्ति के सम्पूर्ण उपयोगी जीवनकाल में बराबर-बराबर बाँट देते हैं।
A.
चिट्ठे का सही एवं उचित चित्र प्रस्तुत करने के लिए,
B.
विनियोजकों को सन्तुष्ट करने के लिए,
C.
प्रबन्धकों को सन्तुष्ट करने के लिए,
D.
कर्मचारियों को सन्तुष्ट करने के लिए
यदि सम्पत्ति पर ह्रास का आयोजन नहीं किया जाता है तो वह चिट्ठे में अपने वास्तविक मूल्य से अधिक पर दिखलाई जाएगी।
A.
स्थायी किस्त पद्धति में,
B.
क्रमागत शेष पद्धति में,
C.
वार्षिक वृत्ति पद्धति में
D.
ह्रास कोष पद्धति में।
इस विधि के अन्तर्गत ह्रास की गणना एक निश्चित दर से वर्ष के प्रारम्भ में सम्पत्ति के अपलिखित किए गए मूल्य पर की जाती है।
A.
कर-भार को कम करना
B.
सही-लाभ की गणना करना,
C.
सही आर्थिक स्थिति का ज्ञान होना,
D.
स्थायी सम्पत्तियों के प्रतिस्थापन के लिए आवश्यक धन की व्यवस्था करना।
ह्रास लाभ को घटाकर स्थायी सम्पत्ति के मूल्य तथा स्वामी की पूँजी को कम करता है।
A.
10,000
B.
9,600
C.
9,000
D. उपर्युक्त में से कोई नहीं।
इस विधि के अन्तर्गत ह्रास की गणना एक निश्चित दर से वर्ष के प्रारम्भ में सम्पत्ति के अपलिखित किए गए मूल्य पर की जाती है। सम्पत्ति के मूल्य में से ह्रास घटाकर जो मूल्य शेष बचता है, वह अपलिखित मूल्य कहलाता है।
A.
2,800
B.
2,900
C.
3,000
D.
3,100
28,000 + 2,000 − 1000 =
29,000
ह्रास की राशि = 29,000 / 10 =
2,900
A.
4,200
B.
4,000
C.
3,800
D. उपर्युक्त में से कोई नहीं।
इस विधि में प्रति वर्ष चार्ज की जाने वाली ह्रास की राशि सम्पत्ति के सम्पूर्ण जीवनकाल में एक समान रहती है। इस पद्धति में सम्पत्ति की मूल लागत (स्थापना व्यय सहित) में से उसका अवशिष्ट मूल्य घटाकर बचने वाली राशि को सम्पत्ति के सम्पूर्ष उपयोगों जीवनकाल पर बराबर-बराबर फैला देते हैं।
A. प्रतिवर्ष
B. प्रतिवर्ष
C. प्रतिवर्ष बढ़ती
D. प्रतिवर्ष घटती जाती
क्योंकि ह्रास प्रतिवर्ष सम्पत्ति के अपलिखित मूल्य पर लगाया जाता है, इसलिये प्रत्येक आगे के वर्ष के लिये ह्रास कम होता जाता है l
A. डेबिट, क्रेडिट
B. क्रेडिट, डेबिट
C. अधिक, कम
D. उपर्युक्त में से कोई नहीं।
ह्रास एक व्यय खाता है। इसका सदैव डेबिट शेष होता है तथा यह एक अस्थायी खाता है। यह खाता तब खोला जाता है जब सम्पत्ति को क्रमागत ह्रास मूल्य पर दिखाना है। इस खाते को सम्पत्ति से चार्ज किया जाता है।
किसी भी सम्पत्ति के जीवन काल समाप्त होने के बाद उस सम्पत्ति को बेचने पर जो भी कीमत मिलती है, उसको सम्पत्ति का अवशिष्ट मूल्य कहा जाता है l
ह्रास लेखांकन की इस पद्धति में ह्रास की राशि को प्रतिवर्ष प्रतिभूतियों में विनियोजित किया जाता है इस कुल विनियोजित राशि का प्रयोग सम्पत्ति के प्रतिस्थापन के लिये किया जाता है l
यह एक ह्रास लेखांकन की विधि है l ह्रास लेखांकन की इस विधि में ह्रास की गणना प्रतिवर्ष सम्पत्ति के घटते शेष पर की जाती है l
ह्रास की इस पद्धति में सम्पत्ति पर ह्रास की राशि प्रत्येक वर्ष समान रहती है l ह्रास की गणना प्रत्येक वर्ष सम्पत्ति की मूल लागत पर ही की जाती है l
इस पद्धति में सम्पत्ति पर ह्रास के साथ-साथ सम्पत्ति के प्रतिस्थापन के लिये भी धनराशि की व्यवस्था की जाती है l
नये-नये आविष्कारों के कारण पुरानी सम्पत्तियों के बेकार होने को अप्रचलन कहा जाता है l इसके कारण सम्पत्ति के मूल्य में तुरन्त कमी आती है, जिसे पूँजीगत हानि कहा जाता है l
आयोजन ज्ञात हानि की पूर्ति के लिए बनाए जाते हैं तथा संचय अज्ञात हानि की पूर्ति के लिए बनाए जाते हैं। आयोजन बनाना कानूनी रूप से आवश्यक होते हैं वहीं संचय बनाना ऐच्छिक होता है।
गुप्त संचय एक ऐसा संचय है जो स्थिति विवरण द्वारा प्रकट नहीं होता है। इन संचयों का निर्माण लाभों को वास्तविक राशि से कम दिखाकर तथा सम्पत्तियों को कम मूल्यों पर एवं दायित्वों को अधिक मूल्यों पर दिखाकर किया जाता है।
अपलेखित
मूल्य विधि
के दो लाभ:
1. यह
बाद के
वर्षों में
होने वाली मरम्मत
तथा रखरखाव
की लागत को
ध्यान में
रखती है।
2. यह
आयकर
अधिनियम के
द्वारा
स्वीकृत
होती है।
मूल्यह्रास
लगाने के
कारण:
1. टूट-फूट
2. समय
की समाप्ति
3. अप्रचलन
4. दुर्घटना
मूल्यह्रास
लेखांकन में
निम्नलिखित
सभी खातों को
तैयार किया
जा सकता है:
1. सम्पत्ति
खाता।
2. मूल्यह्रास
खाता।
3. मूल्यह्रास
के लिए आयोजन
खाता।
4. सम्पत्ति
निपटान
खाता।
क्रमागत शेष पद्धति
की निम्न विशेषतायें हैं -
i. ह्रास प्रतिवर्ष सम्पत्ति के घटते शेष पर लगाया जाता है l
ii.
प्रतिवर्ष ह्रास की राशि कम होती जाती है l
iii.
ह्रास की दर प्रतिवर्ष समान रहती है l
iv.
लाभ-हानि खाते पर प्रतिवर्ष उचित भार पड़ता है l
मूल्य-ह्रास की विशेषताएँ अथवा लक्षण निम्नलिखित हैः-
(1) मूल्य-ह्रास का सम्बन्ध स्थायी एवं मूर्त सम्पत्तियों से होता है, अमूर्त सम्पत्तियों से नहीं।
(2) मूल्य-ह्रास का आशय किसी स्थायी सम्पत्ति के मूल्य में कमी से होता है,चल सम्पत्ति पर नहीं।
(3) मूल्य से आशय उस सम्पत्ति के पुस्तक मूल्य से होता है, बाजार मूल्य से नहीं।
(4) मूल्य में यह कमी निरन्तर एवं स्थायी रुप से सम्पत्ति के प्रयोग के कारण, समय बीतने या अन्य किसी कारण से होता है।
|
|
Journal Entry for Sale of Machinery |
|
|||
|
Date |
Particulars |
|
L.F. |
Dr.( |
Cr.( |
|
|
Bank A/c |
Dr. |
|
1,12.000 |
|
|
|
Provision for Depreciation A/c |
Dr. |
|
1,17,000 |
|
|
|
Loss on Sale of Machinery A/c (Profit and loss A/c) |
|
|
23,000 |
|
|
|
To Machinery A/c |
|
|
|
2,40,000 |
|
|
To Output CGST A/c |
|
|
|
6,000 |
|
|
To Output SGST A/c |
|
|
|
6,000 |
|
|
(Being the machinery sold and loss on sale of machinery is transferred to Profit and Loss Account) |
|
|
|
|
कार्यकारी टिप्पणी:
1. मशीन के विक्रय के लिए लाभ एवं हानि की गणना कीजिए।
|
Particulars |
( |
|
Cost of Machine (1st April, 2014) |
2,40,000 |
|
Less: Provision for Depreciation up to 1st July, 2017 ( |
1,17,000 |
|
Book Value on 1st July, 2017 |
1,23,000 |
|
Less: Sale Proceeds |
1,00,000 |
|
Loss on Sale of Machinery |
23,000 |
|
2. |
Depreciation to be charged on 31st March, 2018: |
|
|
|
On Balance Machinery: (i.e., |
2,04,000 |
|
|
On New Machinery: |
7,200 |
|
|
|
2,11,200 |
ह्रास प्रदान करने के कारक या आधार
ह्रास की गणना में शामिल कारक हैं:
(i) परिसंपत्ति की मूल लागत: लागत में उपयोग के योग्य बनाने के लिए किए गए सभी व्ययों जैसे कि भाड़ा एवं स्थापना खर्च शामिल हैं।
मूल लागत = क्रय मूल्य + भाड़ा एवं अन्य लागत + स्थापन लागत
परिसंपत्ति के क्रय पर भुगतान जीएसटी (सीजीएसटी और एसजीएसटी अथवा आईजीएसटी) परिसंपत्ति की लागत नहीं होती है क्योंकि भुगतान जीएसटी, एकत्रित जीएसटी (सीजीएसटी और एसजीएसटी अथवा आईजीएसटी) से समायोजन है। इस प्रकार भुगतान जीएसटी को बिना लिए परिसंपत्ति खाता डेबिट किया जाता है। वास्तव में, ह्रास परिसंपत्ति खाते में डेबिट की गई राशि पर लगाया जाता है।
संचयों
के उदाहरण:
1. सामान्य
संचय
2. कर्मचारी
क्षतिपूर्ति
कोष
3. विनियोग
विचलन कोष
4. पूँजी
संचय
5. लाभांश
समानीकरण
संचय
6. ऋणपत्रों
के शोधन के
लिए संचय
प्रावधानों
के उदाहरण:
1. मूल्यह्रास
के लिए
प्रावधान
2. संदिग्ध
एवं डूबत
ऋणों के लिए
प्रावधान
3. कराधान
के लिए
प्रावधान
4. देनदारों
पर बट्टे के
लिए
प्रावधान
5. मरम्मत
एवं
नवीनीकरण के
लिए
प्रावधान
|
(a) |
Amount Paid to Vendor of Machine: |
|
|
|
Value (Cost) of Machine |
10,00,000 |
|
|
Add: CGST @ 6% |
60,000 |
|
|
SGST @ 6% |
60,000 |
|
|
|
11,20,000 |
|
(b) |
Amount to be Debited to Machinery Account: |
|
|
|
Cost (without CGST and SGST) |
10,00,000 |
|
|
Loading/unloading and Carriage Expenses |
40,000 |
|
|
Installation Charges |
50,000 |
|
|
|
10,90,000 |
|
(c) |
|
JOURNAL ENTRIES |
|
|||
|
Date |
|
Particulars |
|
L.F. |
Dr.( |
Cr.( |
|
2018 Mar. |
1 |
Machinery A/c |
Dr. |
|
10,00,000 |
|
|
|
|
Input CGST A/c |
Dr. |
|
60,000 |
|
|
|
|
Input SGST A/c |
Dr. |
|
60,000 |
|
|
|
|
To Cash/Bank A/c
|
|
|
|
11,20,000 |
|
|
|
(being the machinery purchased) |
|
|
|
|
|
|
|
Machinery A/c |
Dr. |
|
90,000 |
|
|
|
|
To Cash/Bank A/c |
|
|
|
90,000 |
|
|
|
(Being loading/unloading, carriage and installation charges paid) |
|
|
|
|
मूल्यह्रास
की आवश्यकता:
1) लागत
और आय का
मिलान: -
व्यापार के संचालन
में अचल
संपत्तियों
के अधिग्रहण
का औचित्य यह
होता है कि
इनका उपयोग
आय कमाने में किया
जाता है। एक
बार
सम्पत्तियों
को व्यवसाय
में उपयोग
करने पर
इसमें कुछ
टूट-फूट होती
है जिससे
इसके मूल्य
में कमीं
होती है।
इसलिए, मूल्यह्रास
को व्यापार
के सामान्य
कार्यों में
किए गए किसी
भी अन्य
व्ययों की
तरह लागत के
रूप में लिया
जाता है।
2) कर
के लिए -
मूल्यह्रास
कर उद्देश्य
के लिए कटौतीयोग्य
लागत होती
है।
3) सच
और उचित
वित्तीय
स्थिति: - यदि
संपत्ति पर मूल्यह्रास
नहीं लगाया
जाता है तो
सम्पत्ति को
अधिक मूल्य
पर दिखाया
जायेगा तथा
चिट्ठा
व्यवसाय की
सही वित्तीय
स्थिति को
चित्रित
नहीं करेगा।
4) कानून
की अनुपालना: -
परोक्ष रूप
से अचल संपत्तियों
पर
मूल्यह्रास
लगाने के लिए
कंपनी उद्यमों
की तरह
व्यापार
संगठनों के
लिए कुछ विशिष्ट
कानून मौजूद
हैं।
मूल्यह्रास
के कारण:
1) उपयोग
या समय बीतने
के कारण
टूट-फूट: -
टूट-फूट अर्थात
आय कमाने के
लिए व्यापार
के संचालन
में इसके
उपयोग से
उत्पन्न
होने वाली एक
संपत्ति मूल्य
में कमी तथा
गिरावट। यह
संपत्ति की
की तकनीकी
क्षमता की
सेवा को कम
करता है
जिसके लिए
इसे स्थापित
किया गया है।
टूट-फूट का एक
अन्य पहलू
भौतिक
गिरावट भी
होती है।
2) कानूनी
अधिकारों की
समाप्ति: -
संपत्ति की
कुछ
श्रेणियों
का मूल्य
पूर्व
निर्धारित
अवधि की
समाप्ति के
बाद या सरकार
द्वारा
व्यावसायिक
समझौते की
समाप्ति के
बाद समाप्त
हो जाता है।
3) अप्रचलन:
- स्थायी
संपत्तियों
के मूल्यह्रास
का एक और
प्रमुख कारक
होता है।
अप्रचलन
अर्थात 'समय
समाप्ति'।
अप्रचलन
संपत्तियों
के बेहतर
प्रकारों की उपलब्धता
के कारण
मौजूदा
परिसंपत्तियों
की समाप्ति
को संदर्भित
करता है।
4) असामान्य
कारक: -
संपत्ति की
उपयोगिता
में गिरावट
दुर्घटनाओं
आग, भूकंप,
बाढ़,
आदि
के रूप में
असामान्य
कारकों के
कारण भी हो
सकता है।
आकस्मिक
हानि स्थायी
होती है
लेकिन सतत्
या क्रमिक
नहीं होती
है।
|
Dr. |
Machinery Account |
Cr. |
|||||
|
Date |
Particulars |
|
Date |
Particulars |
|
||
|
2009 |
|
|
2009 |
|
|
||
|
Jan. 01 |
To Cash A/c |
2,000 |
Dec.31 |
By Depreciation |
200 |
||
|
|
|
|
Dec.31 |
By Balance c/d |
1,800 |
||
|
|
|
2,000 |
|
|
2,000 |
||
|
2010 |
|
|
2010 |
|
|
||
|
Jan. 01 |
To Balance b/d |
1,800 |
Dec.31 |
By Depreciation |
200 |
||
|
|
|
|
Dec.31 |
By Balance c/d |
1,600 |
||
|
|
|
1,800 |
|
|
1,800 |
||
|
2011 |
|
|
2011 |
|
|
||
|
Jan. 01 |
To Balance b/d |
1,600 |
June 30 |
By Depreciation |
100 |
||
|
June 30 |
To Profit and Loss |
|
June 30 |
By Bank A/c |
1,800 |
||
|
|
(Profit on sale) |
300 |
|
|
|
||
|
|
|
1,900 |
|
|
1,900 |
||


1. सम्पत्तियों में की गई वृद्दि पर ह्रास की प्रक्रिया
यदि ह्रास की दर प्रतिवर्ष या वार्षिक दी गई है तथा सम्पत्ति के क्रय की तिथि भी दी गई है तो जिस वर्ष सम्पत्ति क्रय की जाती है, उस वर्ष सम्पत्ति क्रय की तिथि से लेखावधि के अन्त तक का ह्रास लगाया जाएगा। इसके विपरीत, यदि ह्रास की दर प्रतिवर्ष नहीं है तो ह्रास, क्रय के वर्ष में पूरे वर्ष का ह्रास चार्ज किया जाएगा।
यदि प्रश्न में यह संकेत दिया गया है कि क्रय के वर्ष में पूरे वर्ष का ह्रास चार्ज किया जाए तो उस दशा में ह्रास सम्पूर्ण वर्ष का चार्ज किया जाएगा।
2. बेची गई सम्पत्ति पर ह्रास की विधि
यदि वर्ष के दौरान सम्पत्ति का विक्रय किया जाता है तो विक्रय के वर्ष के प्रारम्भ से विक्रय तिथि तक ह्रास की गणना की जाएगी तथा ह्रास लगाया जाएगा।
यदि प्रश्न में यह कहा गया हो कि विक्रय के वर्ष में सम्पत्ति पर पूर्ण ह्रास लगाया जाएगा तो सम्पूर्ण वर्ष का ह्रास लगाया जाएगा। इसके विपरीत, यदि यह कहा गया हो कि विक्रय वर्ष में ह्रास चार्ज नहीं किया जाएगा तो विक्रय वर्ष में ह्रास चार्ज नहीं किया जाएगा।
मूल्यह्रास
की राशि की
गणना
विभिन्न
विधियों
द्वारा की
जाती है। मूल्यह्रास
के लिए
प्रयुक्त
सामान्य
विधियाँ हैं:
1. सीधी
रेखा या
स्थायी
प्रतिशत या
मूल लागत विधि
2. क्रमागत
ह्रास या
अपलेखित
मूल्य विधि
3. वार्षिक
वृत्ति विधि
4. ह्रास
कोष विधि
5. बीमा
पॉलिसी विधि
6. पुनर्मूल्यांकन
विधि
7. रिक्त
इकाई विधि
8. मशीन
घंटा दर विधि
9. वर्षों
की योग विधि
हालांकि,
मूल्यह्रास
की गणना के
लिए आमतौर पर
दो मुख्य विधियों
का उपयोग
किया जाता है:
1. सीधी
रेखा विधि: इस
विधि के तहत
एक स्थायी
सम्पत्ति से
मूल्यह्रास
के रूप में एक
समान राशि चार्ज
की जाती है।
अन्य शब्दों
में यह कहा जा सकता
है कि
मूल्यह्रास
की गणना
प्रत्येक
वर्ष मूल
लागत पर एक
स्थायी दर से
की जाती है।
यह विधि बहुत
साधारण होती
है। इसे मूल
लागत विधि
तथा समान किस्त
विधि भी कहा
जाता है।
2. अपलेखित
मूल्य विधि:
इस विधि के
तहत एक
स्थायी
सम्पत्ति से
वर्ष दर वर्ष
मूल्यह्रास
के रूप में
घटता हुआ
मूल्य चार्ज
किया जाता
है। अन्य
शब्दों में
यह कहा जा
सकता है कि
मूल्यह्रास
की गणना प्रत्येक
वर्ष घटते
हुए मूल्य पर
एक स्थायी दर से
की जाती है।
यह विधि अधिक
न्यायोचित
होती है तथा
इसे आय कर
विभाग
द्वारा
अनुमोदित
किया गया है।
इसे क्रमागत
ह्रास विधि
एवं घटती
किस्त विधि
भी कहा जाता
है।
मूल्यह्रास
दो अलग-अलग
विधियों का
उपयोग कर लेखा
पुस्तकों
में रिकॉर्ड किया
जा सकता है:
1. सम्पत्ति
खाते से
चार्ज करके:
इस
विधि में
मूल्यह्रास सीधे
समत्ति से
चार्ज किया
जाता है। अतः
सम्पत्ति
खाते को
पुस्तकों
में अपलेखित
मूल्य पर दिखाया
जाता है।
सम्पत्ति के
इस मूल्य को
पुस्तक
मूल्य कहा
जाता है।
मूल्यह्रास के लिए
प्रावधान
खाता नहीं
रखा जाता है।
इस
स्थिति में
निम्नलिखित
प्रविष्टियाँ
की जाती हैं:

2. मूल्यह्रास के लिए
प्रावधान
खाते का
निर्माण
करके:
इस
विधि के तहत
मूल्यह्रास को
मूल्यह्रास के लिए
प्रावधान
खाते में
क्रेडिट
किया जाता है
तथा
सम्पत्ति
खाते को
पुस्तकों
में हमेशा वास्तविक
मूल्य पर
दिखाया जाता
है। मूल्यह्रास के लिए
प्रावधान
खाते का शेष
उस तिथि तक
संचित
मूल्यह्रास
की कुल राशि
को प्रदर्शित
करता है।
इस
स्थिति में
निम्नलिखित
प्रविष्टियाँ
की जाती हैं:

Dr. Furniture Account Cr.
|
Date |
Particulars |
|
Date |
Particulars |
|
|
2002 |
|
|
2003 |
|
|
|
1Apr. |
To Bank A/c (I) |
50,000 |
31Mar. |
By Dep. A/c (I) |
5,000 |
|
|
|
|
31Mar. |
By Bal. c/d |
45,000 |
|
|
|
50,000 |
|
|
50,000 |
|
2003 |
|
|
2004 |
|
|
|
1Apr. |
To Bal. b/d |
45,000 |
31Mar. |
By Dep. A/c (I) |
4,500 |
|
1Apr. |
To Bank A/c (II) |
20,000 |
31Mar. |
By Dep. A/c(II) |
2,000 |
|
|
|
|
31Mar. |
By Bal. c/d (I) |
40,500 |
|
|
|
|
31Mar. |
By Bal. c/d (II) |
18,000 |
|
|
|
65,000 |
|
|
65,000 |
|
2004 |
|
|
2005 |
|
|
|
1Apr. |
To Bal. b/d (I) |
40,500 |
31Mar. |
By Dep. A/c (I) |
4,050 |
|
1Apr. |
To Bal. b/d (II) |
18,000 |
31Mar. |
By Dep. A/c(II) |
1,800 |
|
|
|
|
31Mar. |
By Bal. c/d (I) |
36,450 |
|
|
|
|
31Mar. |
By Bal. c/d (II) |
16,200 |
|
|
|
58,500 |
|
|
58,500 |
|
2005 |
|
|
2005 |
|
|
|
1Apr. |
To Bal. b/d (I) |
36,450 |
1Apr. |
By Bank A/c |
|
|
1Apr. |
To Bal. b/d (II) |
16,200 |
|
(Sale) |
8,000 |
|
|
|
|
1Apr. |
By P&L A/c |
|
|
|
|
|
|
(Loss on Sale) |
6,580 |
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2006 |
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31Mar. |
By Dep. A/c (I) |
2,187 |
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31Mar. |
By Dep. A/c(II) |
1,620 |
|
|
|
|
31Mar. |
By Bal. c/d (I) |
19,683 |
|
|
|
|
31Mar. |
By Bal. c/d (II) |
14,580 |
|
|
|
52,650 |
|
|
52,650 |
|
2006 |
|
|
2007 |
|
|
|
1Apr. |
To Bal. b/d (I) |
19,683 |
31Mar. |
By Dep. A/c(I) |
1,968 |
|
1Apr. |
To Bal. b/d (II) |
14,580 |
31Mar. |
By Dep. A/c(II) |
1,458 |
|
30Sep. |
To Bank A/c (III) |
28,600 |
31Mar. |
By Dep. A/c (III) |
1,430 |
|
|
|
|
31Mar. |
By Bal. c/d (I) |
17,715 |
|
|
|
|
31Mar. |
By Bal. c/d (II) |
13,122 |
|
|
|
|
31Mar. |
By Bal. c/d (III) |
27,170 |
|
|
|
62,863 |
|
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62,863 |
Dr. Furniture Account Cr.
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Date |
Particulars |
|
Date |
Particulars |
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2005 |
|
|
2005 |
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Jan.1 |
To Bank A/c |
70,000 |
Dec.31 |
By Bal. c/d |
70,000 |
|
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|
70,000 |
|
|
70,000 |
|
2006 |
|
|
2006 |
|
|
|
Jan.1 |
To Bal. b/d |
70,000 |
Dec.31 |
By Bal. c/d |
87,500 |
|
Oct.1 |
To Bank A/c |
17,500 |
|
|
|
|
|
|
87,500 |
|
|
87,500 |
|
2007 |
|
|
2007 |
|
|
|
Jan.1 |
To Bal. b/d |
87,500 |
Dec.31 |
By Bal. c/d |
87,500 |
|
|
|
87,500 |
|
|
87,500 |
Dr. Provision for Depreciation Account Cr.
|
Date |
Particulars |
|
Date |
Particulars |
|
|
2005 |
|
|
2005 |
|
|
|
Dec.31 |
To Bal. c/d |
7,000 |
Dec.31 |
By Dep. A/c |
7,000 |
|
|
|
7,000 |
|
|
7,000 |
|
2006 |
|
|
2006 |
|
|
|
Dec.31 |
To Bal. c/d |
14,000 |
Jan. 1 |
By Bal. b/d |
7,000 |
|
|
(Fur.- I) |
|
Dec.31 |
By Dep. A/c |
7,000 |
|
Dec.31 |
To Bal. c/d |
438 |
|
(Fur.- I) |
|
|
|
(Fur.- II) |
|
Dec.31 |
By Dep. A/c |
438 |
|
|
|
|
|
(Fur.- II) |
|
|
|
|
14,438 |
|
|
14,438 |
|
2007 |
|
|
2007 |
|
|
|
Dec.31 |
To Bal. c/d |
21,000 |
Jan. 1 |
By Bal. b/d |
14,000 |
|
|
(Fur.- I) |
|
|
(Fur.- I) |
|
|
|
To Bal. c/d |
2,188 |
Jan. 1 |
By Bal. b/d |
438 |
|
|
(Fur.- II) |
|
|
(Fur.- II) |
|
|
|
|
|
Dec.31 |
By Dep. A/c |
7,000 |
|
|
|
|
|
(Fur.- I) |
|
|
|
|
|
Dec.31 |
By Dep. A/c |
1,750 |
|
|
|
|
|
(Fur.- II) |
|
|
|
|
23,188 |
|
|
23,188 |
|
|
|
|
|
|
|
Dr. Depreciation Account Cr.
|
Date |
Particulars |
|
Date |
Particulars |
|
|
2005 |
|
|
2005 |
|
|
|
Dec.31 |
To Pro. for |
|
Dec.31 |
By P&L A/c |
7,000 |
|
|
Dep. A/c |
7,000 |
|
|
|
|
|
|
7,000 |
|
|
7,000 |
|
2006 |
|
|
2006 |
|
|
|
Dec.31 |
To Prov. for |
|
Dec.31 |
By P&L A/c |
7,438 |
|
|
Dep. A/c (I) |
7,000 |
|
|
|
|
|
To Prov. for |
438 |
|
|
|
|
|
Dep. A/c (II) |
|
|
|
|
|
|
|
7,438 |
|
|
7,438 |
|
2007 |
|
|
2007 |
|
|
|
Dec.31 |
To Prov. for |
|
Dec.31 |
By. P&L A/c |
8,750 |
|
|
Dep. A/c (I) |
7,000 |
|
|
|
|
|
To Prov. for |
|
|
|
|
|
|
Dep. A/c (II) |
1,750 |
|
|
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|
|
|
8,750 |
|
|
8,750 |
|
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< Q. 170151 एक व्यवसायी ने 1 अप्रैल 2000 को Right Answer is: SOLUTION
Q. 170152 राय ने 1 अक्टूबर, 2015 को एक मशीन Right Answer is: SOLUTION(i) जब ह्रास खाते के लिए प्रावधान नहीं बनाये रखा जाता है।
(ii) जब ह्रास खाते के लिए प्रावधान बनाये रखा जाता है।
Q. 170153
आयोजन
की विभिन्न
विशेषताएँ
लिखिए।
Right Answer is: SOLUTION
आयोजन
की
विशेषताएँ
इस प्रकार
हैं: Q. 170154
आयगत
संचय तथा
पूँजीगत
संचय को
स्पष्ट
कीजिए।
Right Answer is: SOLUTION
अ)
आयगत संचय: इन्हें
ऐसे आयगत
लाभों में से
बनाया जाता
है जो
व्यवसाय की
सामान्य
गतिविधियों
से प्राप्त
होते हैं तथा
जो लाभांश के
रूप में
वितरण के लिए
स्वतंत्र
रूप से
उपलब्ध होते
हैं आयगत संचयों
के उदाहरण
हैं: Q. 170155
विशेष
संचय को
स्पष्ट
कीजिए।
Right Answer is: SOLUTION
विशेष
संचय वे संचय
होते हैं
जिन्हें एक
विशेष
उद्देश्य के
लिए बनाया
जाता है तथा
इन्हें उसी
उद्देश्य के
लिए उपयोग
में लिया
जाता है। विशेष
संचयों के
उदारहण हैं: Q. 170156 स्थायी किस्त पद्धति एवं क्रमागत शेष पद्धति में क्या अंतर है ?
Right Answer is: SOLUTIONस्थायी किस्त पद्धति एवं क्रमागत शेष पद्धति में अंतर इस प्रकार हैः-
Q. 170157
सीधी
रेखा विधि
तथा इसके
लाभों को
स्पष्ट कीजिए।
Right Answer is: SOLUTION
यह
विधि
सम्पत्ति के
सम्पूर्ण
जीवनकाल में
इसके समान
उपयोगो की
अवधारणा पर
आधारित होती
है। इसे सीधी
रेखा एक कारण
से कहा जाता
है कि यदि
मूल्यह्रास की
राशि तथा
संबंधित
समयावधि को
एक ग्राफ पर रखा
जाये तो इसका
परिणाम एक
सीधी रेखा
होता है।
सीधी
रेखा विधि के
लाभ: Q. 170158 एक फर्म ने 1 जनवरी, 2011 को एक संयंत्र Right Answer is: SOLUTION
Q. 170159
हुण्डी
कितने
प्रकार की
होती है
तीन B. दो C. चार D. इनमें से कोई नहीं Right Answer is: B SOLUTIONहुण्डी दो प्रकार की होती है (1) दर्शनी हुण्डी एवं (2) मुद्दती हुण्डी Q. 170160
बिल
के बेचान का
अर्थ है
आहर्ती से बिल के अधिकार को लेनदार को स्थानान्तरित करना B. लेनदार से बिल के अधिकार को आहर्यी को स्थानान्तरित करना C. आहर्ता से बिल के अधिकार को लेनदार को स्थानान्तरित करना D. लेनदार द्वारा बिल के अधिकार को आहर्ता को स्थानान्तरित करना Right Answer is: C SOLUTIONजब बिल का लेखक बिल को अपने किसी ऋणदाता (लेनदार) के पक्ष में बेचान करता है, ऋणदाता बिल को प्राप्त करता है इसलिए इसकी रकम ऋणदाता के डेबिट में लिखी जाएगी और बिल हमारे पास से जाता है इसलिए इसकी रकम प्राप्य बिल खाते के क्रेडिट में लिखी जाएगी। Q. 170161
विनिमय-विपत्र
के धारक के
पास देय तिथि
तक बिल को
अपने पास
रोके रखने के
अतिरिक्त
क्या विकल्प
होते हैं
बैंक में संग्रह हेतु बिल भेजना B. बैंक से बिल को भुनाना C. लेनदार को बिल का बेचान करना D. उपर्युक्त सभी Right Answer is: D SOLUTIONजो व्यक्ति विनिमय-बिल या प्रतिज्ञा-पत्र प्राप्त करता है उसके पास चार विकल्प हैं – (1) वह उसको परिपक्वता तिथि अर्थात भुगतान तिथि तक अपने पास रख सकता है, (2) वह इसकी रकम बैंक को कटौती देकर इसकी परिपक्वता तिथि से पहले प्राप्त कर सकता है, (3) वह इसको अपने ऋणदाताओं अर्थात तीसरे पक्षकार को बेचान कर सकता है, तथा (4) वह इसको बैंक के पास इसकी परिपक्वता तिथि से पहले बेंक को संग्रह के लिए भेज सकता है। Q. 170162
विपत्र
का अवधि
पूर्व
भुगतान से
क्या आशय है
विपत्र को भुनाना B. विपत्र का अनादरण C. विपत्र का नवीनीकरण D. विपत्र का परिपक्वता से पूर्व भुगतान Right Answer is: D SOLUTIONयदि बिल का स्वीकर्ता बिल का देय तिथि से पहले भुगतान करना चाहता है तो वह बिल का भुगतान कर सकता है। ऐसी अवस्था में बिल का लेखक कुछ छूट दे देता है। इस प्रकार बिल के भुगतान को विपत्र का परिपक्वता से पूर्व भुगतान कहते हैं। Q. 170163
यदि
एक फर्म बहुत
सारे
विनिमय-प्रतिज्ञा
पत्र
प्राप्त कर
रही हो तो यह
अच्छा होगा
कि इसे एक
भिन्न
पुस्तक में
लिखा जाए, जिसे
कहते हैं-
प्राप्य विपत्र बही B. जर्नल C. क्रय बही D. विक्रय बही Right Answer is: A SOLUTIONअधिक मात्रा में विनिमय-प्रतिज्ञा पत्र प्राप्त करने की दशा में उसे प्राप्य विपत्र बही में दर्ज किया जाता है। Q. 170164
भारतीय
मुद्रा एक----------
होती है
विनिमय-पत्र B. चैक C. प्रतिज्ञा-पत्र D. बैंक ड्रॉफ्ट Right Answer is: C SOLUTIONभारतीय मुद्रा प्रतिज्ञा-पत्र के रुप में एक ऐसा महत्वपूर्ण साख-पत्र है, जिसका प्रयोग सामान्तया लेन-देन में किया जाता है। Q. 170165 विनिमय-विपत्र का स्वीकारकर्ता कौन होता है-
देनदार B. लेनदार C. विक्रेता D. इनमें से कोई नहीं Right Answer is: A SOLUTIONयह वह व्यक्ति होता है, जिस पर विनिमय-विपत्र लिखा जाता है तथा जो विनिमय-विपत्र पर अपनी स्वीकृति देता है। यह व्यक्ति माल उधार खरीदता है, अतः ऋणी होता है और निश्चित अवधि के पश्चात धन का भुगतान करता है। Q. 170166
यदि
बिल स्वीकार
किया जाता है
और रकम नियत
तिथि पर
(परिपक्वता
तिथि) से पूर्व
दी जाती है तब
बिल कहा जाता
है
कैंसिल (रद्द) B. स्वीकृत C. रिटायर्ड D. अनादृत Right Answer is: C SOLUTIONयदि बिल का स्वीकर्ता बिल का देय तिथि से पहले भुगतान करना चाहता है तो वह बिल का भुगतान कर सकता है। ऐसी अवस्था में बिल का लेखक कुछ छूट दे देता है। इस प्रकार बिल के भुगतान को बिल का अवधि से पूर्व भुगतान कहते हैं। Q. 170167
दर्शनी
विपत्र का
अर्थ है कि
विपत्र का
भुगतान ...... पर
देय होगा।
भुगतान का कोई समय नहीं होता B. भुगतान मॉंग होने पर किया जाता है C. भुगतान किसी भी समय हो सकता है D. उपर्युक्त (1) एवं (2) दोनों Right Answer is: D SOLUTIONयह ऐसा विनिमय-बिल है जिसका भुगतान स्वीकर्ता को प्रस्तुत करने पर करना होता है। ऐसे विनिमय-बिलों पर अनुग्रह दिवस नहीं दिए जाते। Q. 170168
एक
विनिमय-विपत्र
स्वीकर्ता
द्वारा भुगतान
करने से मना
करने पर बिल
कहलाता है-
बिल का नोटिंग B. बिल का अनादरण C. बिल का नवीनीकरण D. बिल का बट्टा Right Answer is: B SOLUTIONजब किसी विपत्र का स्वीकर्ता बिल पर स्वीकृति देने में या बिल की भुगतान तिथि पर विपत्र का भुगतान करने में असमर्थता प्रकट करता है तो उसे विपत्र की अप्रतिष्ठा, अनादरण या तिरस्कृत होना कहते हैं। Q. 170169
बिल
को बट्टे पर
भुनाने का
दायित्व
होता है
लघु अवधि दायित्व B. दीर्घकाल दायित्व C. चालू दायित्व D. संदिग्ध दायित्व Right Answer is: D SOLUTIONबिल का प्राप्तकर्ता (धारक) देय तिथि से पूर्व बैंक से बिल को बट्टे पर भुना सकता है। बट्टे पर बिल भुनाने का तात्पर्य बिल को वर्तमान मूल्य पर नकद में परिवर्तित करना है। इसके लिए बिल बैंक को बेच दिया जाता है। Q. 170170 A ने रु 12,000 के 4 माह के विनिमय-पत्र को बैंक से 10%: वार्षिक दर पर बट्टा कराया। देय तिथि पर बिल अनादृत हो गया तथा रु. 50 नोटिंग व्यय बैंक द्वारा भुगतान किए गए। बैंक द्वार A के खाते में डेबिट की जाने वाली राशि होगी-
रु 13,050 B. रु 11,050 C. रु 12,050 D. रु 12,250 Right Answer is: C SOLUTIONबिल का अनादरण होने पर स्वीकर्ता को देय बिल वापस मिल जाता है तथा लेखक पुनः स्वीकर्ता का लेनदार बन जाता है। Q. 170171
प्राप्य
बिल एक खाता
है
अवास्तविक खाता B. व्यक्तिगत खाता C. वास्तविक खाता D. इनमें से कोई नहीं Right Answer is: B SOLUTIONवह व्यक्ति, जो विनिमय-विपत्र को लिखता है और निश्चित तिथि पर भुगतान प्राप्त करने का अधिकारी होता है, देनदार की स्वीकृति के पश्चात विनिमय-विपत्र को प्राप्त कर लेता है। इस प्रकार के विनिमय-विपत्र को प्राप्य विनिमय-विपत्र कहते हैं। Q. 170172
बिल
के नवीनीकरण
पर लेखा होगा-
कोई लेखा नहीं किया जाएगा B. पुराने बिल को रद्द करने का लेखा और नए बिल बनाने का लेखा C. केवल बिल के नवीनीकरण का लेखा D. इनमें से कोई नहीं Right Answer is: B SOLUTIONयदि बिल का लेखक बिल के स्वीकर्ता के अनुरोध पर वर्तमान बिल को रद्द करके आगे की तिथि का एक नया बिल लिख दे तो इसे बिल का नवीनीकरण कहते हैं। Q. 170173
अनुग्रह
बिल का
उद्देश्य
क्या होता है-
माल के वास्तविक क्रय या विक्रय की वित्त व्यवस्था B. व्यापारिक सम्प्रेषण को सुचारु बनाना C. जब दोनों पक्षकारों को धन की आवश्यकता है, D. उपर्युक्त में से कोई नहीं Right Answer is: C SOLUTIONअनुग्रह बिल बिना किसी प्रतिफल के एक दूसरे की सहायतार्थ लिखे एवं स्वीकृत किए जाते हैं। व्यावसायिक क्षेत्रों में कभी-कभी व्यापारी एक-दूसरे की सहायता से उद्देश्य से आपस में किसी प्रतिफल के बिना ही बिल लिखते हैं तथा स्वीकार करते हैं। Q. 170174
5 अक्टूबर
2009 को
रोहित ने
अखिल पर 15,000 रु का 4 माह
पश्चात् देय
एक विपत्र
लिखा। रोहित
ने 5 नवम्बर
2009 को
इस बिल को
अपने बैंकर
के पास भुना
लिया बैंक ने
बट्टा
प्रभार के
रूप में 375 रू की
कटौती
की।परिपक्वता
तिथि पर बिल
का अनादरण हो
गया तथा बैंक
को 200 रु
निकराई
प्रभार के
रूप में
चुकाये गये।
रोहित तथा
अखिल की
पुस्तकों
में आवश्यक
जर्नल प्रविष्टियाँ
दीजिए।
A.
B. C. D. Right Answer is: SOLUTION
Q. 170175
4 जनवरी
2008 को
एक्स ने वाई
को 40,000 रु
का माल बेचा
तथा इस तिथि
को उसने वाई
पर पूर्ण
भुगतान में 39,500
रु
का 2 माह
के लिए एक बिल
लिखा। बिल को विधिवत् स्वीकार कर लिया गया तथा यह परिपक्वता तिथि को अनादरित हो गया। वाई को 850 रु निकराई व्यय के चुकाने पडे़। एक्स तथा वाई की पुस्तकों में आवश्यक जर्नल प्रविष्टियाँ दीजिए। A.
B. C. D. Right Answer is: SOLUTION
Q. 170176
संक्षेप
में अनुग्रह
विपत्र की
विशेषताएं बताइए।
A.
B. C. D. Right Answer is: SOLUTION
अनुग्रह विपत्र की प्रमुख विशेषताएँ निम्न प्रकार हैं- 1. यह बिना किसी प्रतिफल के लिखे जाते हैं। 2. यह आर्थिक सहायतार्थ लिखे एवं स्वीकार किये जाते हैं। 3. इनको बट्टे पर भुनाने की दशा में बट्टे की राशि को भी बिल की राशि के उपयोग के अनुपात में वहन किया जाता है। Q. 170177
विनिमय-विपत्र
के नवीनीकरण
से क्या अर्थ
है
A.
B. C. D. Right Answer is: SOLUTION
जब विपत्र के स्वीकर्ता को यह पूर्ण विश्वास हो जाता है कि वह विपत्र की भुगतान की तिथि पर विपत्र का भुगतान नहीं कर सकेगा। तो वह विपत्र के लेखक अपने लेनदार से एक नया विपत्र लिखने की प्रार्थना करता है जिसे प्रायः लेनदार द्वारा स्वीकार कर लिया जाता है। ऐसी दशा में स्वीकर्ता अपने लेदनार को बढाई हुई अवधि का ब्याज तथा समस्त व्यय चुकाता है जो उसके लेनदार ने पहले विपत्र के सम्बन्ध में किए हों। ब्याज की राशि या तो नकद दे दी जाती है या विपत्र की राशि में जोड दी जाती है। इस प्रकार पुराने विनिमय-विपत्र के स्थान पर नए विनिमय-विपत्र का स्वीकार करना विनिमय-विपत्र का नवीनीकरण कहलाता है। Q. 170178
विनिमय-विपत्र
एवं चैक में
क्या अंतर है
A.
B. C. D. Right Answer is: SOLUTION
Q. 170179 जीएसटी शामिल होने पर ड्रावर एवं ड्रावी की पुस्तकों में कौन सी रोजनामचा प्रविष्टियाँ दर्ज की जाती हैं?
A.
B. C. D. Right Answer is: SOLUTIONड्रावर की पुस्तकों में प्रविष्टियाँ : ड्रावर की पुस्तकों में दर्ज रोजनामचा प्रविष्टियाँ हैं:
ड्रावी की पुस्तकों में प्रविष्टियाँ: जब किसी लेनदार को बिल की स्वीकृति भेजी जाती है, तो ऐसा माना जाता है कि उसका ऋण सुलझा लिया गया है; इसकी जगह एक नया देयता अर्थात् देय बिल अस्तित्व में आता है। इसलिए लेनदार के अनुरोध पर बिपत्र स्वीकार किए जाने पर और उसे भेजे जाने पर उसका खाता डेबिट कर दिया जाता है और नई देयता का खाता और विपत्र देय खाता क्रेडिट कर दिया जाता है। ड्रावी अथवा लेनदार/देनदार (माल के क्रय) की पुस्तकों में निम्नलिखित रोजनामचा प्रविष्टियाँ बनाई जाती हैं:
Q. 170180
डिस्काउटिंग
चार्जेज तथा
नोटिंग
चार्जेज में
क्या अंतर है
A.
B. C. D. Right Answer is: SOLUTION
Q. 170181
विनिमय-विपत्र
के लेखक के
पास विपत्र
का प्रयोग
करने के लिए
कौन-से
विकल्प होते
हैं
A.
B. C. D. Right Answer is: SOLUTION
विनिमय-विपत्र के लेखक के पास देय तिथि के पूर्व अपने विपत्र का प्रयोग करने के निम्नलिखित चार विकल्प होते हैं- 1. विनिमय-विपत्र को देय तिथि तक अपने पास रखना और देय तिथि पर स्वीकर्ता से स्वंय या बैंक के माध्यम से भुगतान प्राप्त करना 2. विनिमय-विपत्र को देय तिथि से पूर्व बैंक से बट्टे पर भुनाना 3. विपत्र का अपने किसी लेनदार को भुगतान के बदले बेचान करना एवं 4. विपत्र को बैंक से संग्रह के लिए भेजना उपर्युक्य सभी दशाओं में निम्न प्रकार से लेखे किए जाते हैं। यहॉं ध्यान देने योग्य बात यह है कि विपत्र के लेखक के लिए विपत्र प्राप्य विनिमय-विपत्र होता है तथा देनदार या विपत्र के स्वीकर्ता के लिए यह देय विनिमय-विपत्र होता है। इस प्राप्य विनिमय-विपत्र या देय विनिमय-विपत्र से सम्बन्धित लेन-देनों का लेखा ही सम्बन्धित पक्षकारों की पुस्तकों में किया जाता है। Q. 170182
व्यापारिक
विनिमय-विपत्र
तथा अनुग्रह
विनिमय-विपत्र
में अंतर
बताइए
A.
B. C. D. Right Answer is: SOLUTION
Q. 170183
विनिमय-विपत्र
के कितने
पक्षकार
होते हैं-
A.
B. C. D. Right Answer is: SOLUTION
विनिमय-विपत्र के निम्नलिखित तीन पक्ष होते हैंः- 1. लेखक या आहर्ता - यह वह व्यक्ति होता है जो विनिमय-विपत्र को लिखता जै। यह व्यक्ति उधार माल बेचता हैख् बिल पर अपने हस्ताक्षर करता है तथा विनिमय-विपत्र की धनराशि प्राप्त करता है। 2. स्वीकर्ता, भुगतान करने वाला या आहार्यी- यह वह व्यक्ति होतय है, जिस पर विनिमय-विपत्र लिखा जाता है तथा जो विनिमय-विपत्र क पर अपनी स्वीकृति देता है। यह छवयक्ति माल उधार खरीदता है, अतः ऋणी होता है और निश्चित अवधि के पश्चात धन का भुगतान करता है। 3. भुगतान पाने वाला या प्राप्तकर्ता या आदाता - यह वह व्यक्ति होता है, जो एक निश्चित अवधि के पश्चात स्वीकारक से विनिमय-विपत्र की धनराशि प्राप्त करता है। यह विनिमय-विपत्र बैंक से भुना लिया जाए तो बैंक प्राप्तकर्ता होता है। Q. 170184 1 अक्टूबर, 2017 को A, B को A.
B. C. D. Right Answer is: SOLUTION
Q. 170185
1 जनवरी
2011 को,
ललित
ने रूचि को 5,000 रु का
माल बेचा तथा 2
माह
का एक बिल
लिखा। बिल को
पत्र द्वारा
स्वीकार
किया गया तथा
लेखक को लौटा
दिया गया। देय तिथि को बिल का भुगतान कर दिया गया। दोनों पक्षों की पुस्तकों में आवश्यक जर्नल प्रविष्टियाँ दीजिए। A.
B. C. D. Right Answer is: SOLUTION
Q. 170186
17 जनवरी
2007 को
संदीप ने
उत्तम से 60,000 रु
उधार लिये।
उसी तिथि को
उत्तम ने उसी
राशि के लिए
संदीप पर 2 माह का
एक बिल लिखा।
संदीप ने इस
बिल को
स्वीकार
किया तथा
उत्तम को
लौटा दिया। उत्तम ने इस बिल को बैंक से 15% वार्षिक दर पर भुना लिया। परिपक्वता की तिथि पूर्व संदीप ने उत्तम को कहा कि वह सम्पूर्ण भुगतान करने में असमर्थ है तथा उसने उत्तम से 20,000 रु तुरंत नकद स्वीकार करने तथा शेष राशि का 18% वार्षिक ब्याज के साथ 53 दिन का बिल लिखने के लिए प्रार्थना की, जिसे उत्तम ने स्वीकार किया। उत्तम तथा संदीप की पुस्तकों में आवश्यक जर्नल प्रविष्टियाँ दीजिए। A.
B. C. D. Right Answer is: SOLUTION
Q. 170187
विनिमय-विपत्र
एंव
प्रतिज्ञा
पत्र में
अंतर स्पष्ट
करें
A.
B. C. D. Right Answer is: SOLUTION
Q. 170188
विनिमय
बिल तथा
प्रतिज्ञा
पत्र के एक
नमूने का
निर्माण
कीजिए।
A.
B. C. D. Right Answer is: SOLUTION
Q. 170189
विनिमय
विपत्र के
लाभों का
वर्णन
कीजिए।
A.
B. C. D. Right Answer is: SOLUTION
विनिमय
विपत्र के
लाभ Q. 170190
निम्नलिखित
मदों को
स्पष्ट
कीजिए: 1. बिल की अवधि 2. अनुग्रह दिवस 3. देय तिथि 4. परिवक्वता तिथि A.
B. C. D. Right Answer is: SOLUTION
Q. 170191
1 जनवरी
2006 को
सैबा ने
विशाल को 10,000 रु का
माल बेचा तथा
उस पर 2 माह
का एक बिल
लिखा। विशाल
ने बिल को
स्वीकार किया
तथा शैबा को
वापस कर
दिया।
परिपक्वता
तिथि पर
विशाल
द्वारा बिल
को अनादरित
कर दिया गया।
शैबा तथा
विशाल की पुस्तकों
में नीचे
सूचीबद्ध
सभी
स्थितियों में
आवश्यक
जर्नल
प्रविष्टियाँ
दीजिए। 1. जब इस बिल को परिपक्वता तक शैबा द्वारा रखा जाये। 2. जब इस बिल को शैबा द्वारा 200 रु के लिए भुना लिया जाये। 3. जब इस बिल को शैबा द्वारा लाल चंद को बेच दिया जाये। A.
B. C. D. Right Answer is: SOLUTION
Q. 170192
रोहन
और रोहित
दोनों को
अस्थायी
अनुग्रह की आवश्यकता
थी।
1 मार्च 2005 को, रोहन
ने रोहित का 3 महीने
के लिए 5000 रु का
एक ड्राफ्ट
स्वीकार
किया और
रोहित ने रोहन
का 3 महीने
के लिए 4000 रु का
एक ड्राफ्ट
स्वीकार
किया। दोनों
बिलों को 4800 रु और 3850
रु
के लिए
बैंकों से
भुना लिया
गया। बिल की
परिपक्वता
से पहले
रोहित ने
रोहन को
अनुग्रह बिल
में अंतर के
लिए 1,000 रु
भेजे। रोहन
और रोहित
दोनों की
स्वीकृतियों
का नियत तिथि
पर भुगतान हो
गया। रोहन
तथा रोहित की
पुस्तकों
में जर्नल
में
लेनदेनों को
रिकॉर्ड
कीजिए।
A.
B. C. D. Right Answer is: SOLUTION
Q. 170193
निम्न
को समझाये- 6
(1)
विनिमय-विपत्र
को देय तिथि
से पूर्व
वैंक से
बट्टे पर
भुनाना
(2)
विपत्र का
अपने किसी
लेनदार को
भुगतान के बदले
बेचान करना
(3)
विपत्र को
बैंक में
संग्रह के
लिए भेजना
A.
B. C. D. Right Answer is: SOLUTION
(1) विनिमय-विपत्र को देय तिथि से पूर्व वैंक से बट्टे पर भुनाना- यदि विनिमय-विपत्र के लेखक को धन की तुरन्त आवश्यकता हो तो वह देय तिथि से पूर्व ही विनिमय-विपत्र को बैंक से बट्टे पर भुनाकर धनराशि प्राप्त कर सकता है। ऐसी दशा में बैंक विनिमय-विपत्र के भुनाने की तिथि से लेकर विनिमय-विपत्र की देय तिथि तक का एक निश्चित दर से ब्याज काटकर, शेष राशि का भुगतान विनिमय-विपत्र के लेखक को कर देता है। यह ब्याज की राशि छूट या कटौती कहलाती है तथा इसे र्जनल में ऋणी किया जाता है। इस ब्याज का लेखा विपत्र को बैंक से बट्टे पर भुनाने के लेखे के साथ ही किया जाता है, पृथक से इसका कोई लेखा नहीं किया जाता है। (2) विपत्र का अपने किसी लेनदार को भुगतान के बदले बेचान करना - यदि विपत्र का लेखक चाहे तो स्वीकृति प्राप्त होने के पश्चात अपने किसी लेनदार को भुगतान देने के बदले में विपत्र को उसके नाम बेचान कर सकता है। ऐसी दशा में केवल विपत्र के लेखक एवं बेचान प्राप्तकर्ता की पुस्तकों में लेखा किया जाता है, विपत्र के स्वीकर्ता की पुस्तकों में कोई लेखा नहीं किया जाता है। (3) विपत्र को बैंक में संग्रह के लिए भेजना - रूपया वसूल करने की कठिनाई से बचने के लिए कभी-कभी विपत्र का लेखक स्वीकृत विपत्र को बैंक से वसूली से लिए भेज देता है। वसूली हो जाने पर बैंक उस व्यक्ति के खाते में रकम जमा कर देता है। इस सम्बन्ध में विपत्र के लेखक की पुस्तकों में लेखा किया जाता है, स्वीकर्ता की पुस्तकों में इसका कोई लेखा नहीं किया जाता है। Q. 170194 कुल इनपुट सीजीएसटी
B. C. D. Right Answer is: C SOLUTIONदेय शुद्ध सीजीएसटी = Q. 170195
B. C. D. Right Answer is: C SOLUTION
Q. 170196
लाभ एवं हानि खाते का शेष हस्तांतरित किया जाता है:
B. आय विवरण में। C. तलपट में D. पूँजी खाते में। Right Answer is: D SOLUTIONलाभ एवं हानि खाते के शेष को चिट्ठे में स्वामी के खाते में हस्तांतरित किया जाता है। इसे पूँजी खाते में जोड़ दिया जाता है। शुद्ध लाभ को पूँजी में जोड़ दिया जाता है जबकि शुद्ध हानि को पूँजी से घटाया जाता है। Q. 170197
मूल्यह्रास _________ का एक उदाहरण होता है।
B. पूँजीगत प्राप्ति C. आयगत व्यय D. आयगत प्राप्ति Right Answer is: C SOLUTIONआयगत व्यय व्यवसाय के संचालन में किया जाने वाला व्यय होता है। एक सम्पत्ति का मूल्यह्रास या समाप्ति मूल्य आयगत व्यय का उदाहरण होता है। Q. 170198
तलपट में प्रदर्शित आवक वापसी को घटाया जाता है:
B. विक्रय। C. क्रय वापसी। D. जावक वापसी। Right Answer is: B SOLUTION
तलपट प्रदर्शित आवक वापसी को विक्रय से घटाया जाता है। विक्रय खाते का हमेशा वर्ष के दौरान की गयी कुल विक्रय को शामिल करते हुए क्रेडिट शेष रहता है। विक्रय वापसी खाते का ग्राहकों द्वारा वापस किये गये माल की कुल राशि को शामिल करते हुए हमेशा डेबिट शेष रहता है। दो राशि के शुद्ध रूप को ‘शुद्ध विक्रय’ कहा जाता है तथा इसे व्यापारिक खाते के क्रेडिट पक्ष में रिकॉर्ड किया जाता है।
Q. 170199
ख्याति होती है:
B. मूर्त सम्पत्ति। C. अमूर्त सम्पत्ति। D. चालू सम्पत्ति। Right Answer is: C
SOLUTIONअमूर्त सम्पत्तियाँ वे सम्पत्तियाँ होती है जिनका कोई भौतिक अस्तित्व नहीं होता है। उदाहरण के लिए - ख्याति, पेटेंट, ट्रेडमार्क आदि। Q. 170200
भूमि एवं भवन तथा प्लांट एवं मशीनरी उदाहरण होती है:
B. चालू दायित्व का। C. चालू सम्पत्ति का। D. मूर्त सम्पत्ति का। | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||