A.
आयगत प्राप्ति।
B. पूँजीगत व्यय।
C. आयगत व्यय।
D. पूँजीगत प्राप्ति।
यह सेवा तथा माल के विक्रय द्वारा सामान्य तथा निरंतर प्राप्त राशि होती है। व्यवसाय द्वारा व्यावसायिक माल के विक्रय से प्राप्त राशि का आयगत प्राप्ति होती है। उदाहरण के लिए एक फर्नीचर विक्रेता के लिए टेबल तथा कुर्सियों के विक्रय से प्राप्त राशि आयगत प्राप्ति होती है।
A.
तलपट तथा चिट्ठा।
B. व्यापारिक, लाभ एवं हानि खाता तथा चिट्ठा।
C. जर्नल, खाताबही तथा तलपट।
D. लाभ एवं हानि खाता तथा चिट्ठा।
वित्तीय विवरणों में व्यापारिक, लाभ एवं हानि खाता तथा चिट्ठा शामिल होता है। वित्तीय विवरणों को खाताबही तथा रोकड़ बही से तैयार किये गये तलपट से तैयार किया जाता है।
A.
सकल लाभ - क्रय + प्रत्यक्ष व्यय।
B. विक्रय - क्रय - प्रत्यक्ष व्यय।
C. सकल लाभ + अन्य आयें - अप्रत्यक्ष व्यय।
D. शुद्ध विक्रय - परिचालन लागत।
शुद्ध लाभ अर्थात व्ययों तथा हानियों पर अतिरिक्त आय। शुद्ध लाभ = सकल लाभ + अन्य आयें - अप्रत्यक्ष व्यय।
A.
आय विवरण।
B. पूँजीगत प्राप्ति।
C. आयगत प्राप्ति।
D. आस्थगित आयगत व्यय।
आय विवरण के दो भाग होते हैं, एक व्यापारिक खाता जो सकल लाभ एवं हानि को प्रदर्शित करता है तथा दूसरा लाभ एवं हानि खाता जो शुद्ध लाभ एवं हानि प्रदर्शित करता है।
A.
लाभ एवं हानि खाते में।
B. तलपट में।
C. व्यापारिक खाते में।
D. चिट्ठे में।
शुद्ध विक्रय तथा बिके माल की लागत को केवल व्यापारिक खाते में रिकॉर्ड किया जाता है। सभी प्रकार की प्रत्यक्ष लागतों को व्यापारिक खाते में रिकॉर्ड किया जाता है। यह हमें सकल लाभ एवं हानि के बारे में बताता है।
A.
आयगत प्राप्ति।
B. पूँजीगत व्यय।
C. पूँजीगत प्राप्ति।
D. आयगत व्यय।
यह व्यवसाय की आय क्षमता में वृद्धि करता है। वहीं दूसरी तरफ आयगत व्यय लाभ कमाने के लिए किये जाते हैं।
A.
खाताबही।
B. तलपट।
C. अंतिम खाते।
D. लाभ एवं हानि खाता।
जब दो विवरण (आय विवरण तथा चिट्ठा) एक साथ होते हैं, तो उन्हें अंतिम खातों के रूप में जाना जाता है। इसे अंतिम खाते कहलाते हैं क्योंकि यह अंत में खाते तैयार करने की प्रक्रिया है। यह सभी व्यावसायिक लेनदेनों का सारांश होता है।
A.
गोदाम व्यय।
B. विक्रय पर भाड़ा।
C. अंकेक्षण शुल्क।
D. ऐजेंट का कमीशन।
प्रशासनिक एवं कार्यालय प्रबंधन व्यय में अंकेक्षण शुल्क, कार्यालय वेतन, मुद्रण तथा स्टेशनरी, डाक तथा टेलीफोन शुल्क आदि शामिल होता है।
A.
लाभ एवं हानि खाता।
B. चिट्ठा।
C. व्यापारिक खाता।
D. तलपट।
लाभ एवं हानि का निर्धारण करने के लिए एक व्यवसाय द्वारा लाभ एवं हानि खाता तैयार किया जाता है तथा अवधि के अंत में वित्तीय स्थिति का पता लगाने के लिए चिट्ठा तैयार किया जाता है।
A.
सकल लाभ के।
B. सकल हानि के।
C. शुद्ध हानि के।
D. परिचालन लाभ के।
सकल लाभ को निम्नलिखित समीकरण के प्रारूप में दिखाया जा सकता है: सकल लाभ = शुद्ध विक्रय - बिके माल की लागत। इसकी गणना व्यापारिक खाता तैयार कर की जाती है। व्यापारिक खाते में शुद्ध विक्रय तथा उत्पादन की सभी प्रत्यक्ष लागतें शामिल होती है।
A.
तलपट।
B. व्यापारिक खाता।
C. चिट्ठा।
D. लाभ एवं हानि खाता।
सकल लाभ का निर्धारण व्यापारिक खाता तैयार कर किया जाता है तथा तत्पश्चात् इसे लाभ एवं हानि खाते के क्रेडिट पक्ष में हस्तांतरित किया जाता है।
A.
विक्रय।
B. समायोजित विक्रय।
C. क्रय।
D. समायोजित क्रय।
समायोजित क्रय = शुद्ध क्रय + प्रारंभिक रहतिया - अंतिम रहतिया। इसे व्यापारिक खाते में दिखाया जाता है।
A.
आयगत व्यय।
B. पूर्वदत्त व्यय।
C. पूँजीगत व्यय।
D. आयगत प्राप्ति।
व्यापारिक या लाभ एवं हानि खाते में दिखाये गये व्यय आयगत व्यय होते हैं। ऐसे व्ययों के लाभ एक वर्ष के भितर समाप्त हो जाते हैं। हालांकि पूँजीगत व्ययों को चिट्ठे में दिखाया जाता है।
व्यापारिक खाते से आशय एक ऐसे खाते से है जिससे क्रय एवं विक्रय के द्वारा सकल (कुल) लाभ या हानि का ज्ञान होता है। इसके बनाने का मुख्य उद्देश्य यह है कि विक्रय की रकम व्यापारी द्वारा क्रय किए गए माल एवं उस पर किए गए व्ययों से कम है अथवा अधिक है। कम होने पर हानि तथा अधिक होने पर लाभ होता है। इसमें गत वर्ष का शेष माल, वर्ष में क्रय किया गया या निर्मित माल, माल के निर्माण या क्रय सम्बन्धी व्यय, बेचा गया माल तथा वर्ष के अन्त में बचे हुए शेष माल आदि का लेखा होता है।
व्यापार खाता बनाने के प्रमुख उद्देश्य या महत्व निम्नलिखित हैं –
(1) सकल लाभ व सकल हानि ज्ञात करना
(2) गत वर्षों के क्रय-विक्रय से चालू वर्ष के क्रय-विक्रय की तुलना करना
(3) व्यापार सम्बन्धी व्यय और सकल लाभ बिक्री के अनुसार कम हैं या अधिक, इसका पता लगाना
(4) सम्पूर्ण प्रत्यक्ष व्ययों का लाभ पर प्रतिशत ज्ञात करना
(5) बिक्री पर लाभ की दर का पता लगाना
ऐसे दायित्व जो भविष्य में देय हो भी सकते हैं और नहीं भी जैसे - सरकारी मुकदमा आदि।


आयोजन करने के निम्न उद्देश्य हैं-
सामान्य संचय का निर्माण निम्न उद्देश्यों के लिये किया जाता है-
सकल लाभ एवं शुद्ध लाभ में निम्नलिखित अंतर है-
|
अन्तर का आधार |
सकल लाभ |
शुद्ध लाभ |
|
लाभ की स्थिति |
यह माल के क्रय-विक्रय पर हुआ लाभ है। |
यह सकल लाभ में से अप्रत्यक्ष व्यय घटाने के बाद का लाभ है। |
|
प्रगति का ज्ञान |
इससे व्यापार की प्रगति का वास्तविक ज्ञान प्राप्त नहीं होता है। |
इससे व्यापार की प्रगति का वास्तविक ज्ञान प्राप्त होता है। |
संचय एक दायित्व है, क्योंकि संचय की दशा में सिर्फ हम व्यवसाय की अज्ञात एवं अनिश्चित हानियों की पूर्ति के लिये लाभों के कुछ भाग को व्यवसाय में रोक लेते है। लेकिन वास्तव में लाभों पर स्वामियों का ही अधिकार होता है, इसलिए यह एक दायित्व है ।
संचयों को आर्थिक चिट्ठे के दायित्व पक्ष में दर्शाया जाता है।
व्यापारिक खाते से आशय एक ऐसे खाते से है जिससे क्रय एवं विक्रय के द्वारा सकल (कुल) लाभ या हानि का ज्ञान होता है। इसके बनाने का मुख्य उद्देश्य यह है कि विक्रय की रकम व्यापारी द्वारा क्रय किए गए माल एवं उस पर किए गए व्ययों से कम है अथवा अधिक है। कम होने पर हानि तथा अधिक होने पर लाभ होता है। इसमें गत वर्ष का शेष माल, वर्ष में क्रय किया गया या निर्मित माल, माल के निर्माण या क्रय सम्बन्धी व्यय, बेचा गया माल तथा वर्ष के अन्त में बचे हुए शेष माल आदि का लेखा होता है।
व्यापार खाता बनाने के प्रमुख उद्देश्य या महत्व निम्नलिखित हैं –
(1) सकल लाभ व सकल हानि ज्ञात करना
(2) गत वर्षों के क्रय-विक्रय से चालू वर्ष के क्रय-विक्रय की तुलना करना
(3) व्यापार सम्बन्धी व्यय और सकल लाभ बिक्री के अनुसार कम हैं या अधिक, इसका पता लगाना
(4) सम्पूर्ण प्रत्यक्ष व्ययों का लाभ पर प्रतिशत ज्ञात करना
(5) बिक्री पर लाभ की दर का पता लगाना


यह कथन 100% सत्य है। फर्नीचर की क्रय पर खर्च की गयी राशि पूँजीगत व्यय होता है परंतु फर्नीचर का कार्य करने वाले व्यवसाय के लिए यह आयगत व्यय होता है। इसीप्रकार, कार्यालय के क्रय पर किया गया व्यय पूँजीगत व्यय होता है, परंतु भवनों का क्रय एवं विक्रय करने वाले व्यवसाय के लिए यह एक आयगत व्यय होता है। इसी तरह, भाडे़ एवं मजदूरी पर किया गया व्यय आयगत व्यय होता है परंतु जब मशीनरी की स्थापना के लिए मजदूरी चुकायी जाती है या कारखाने में मशीनरी को लाने के लिए भाड़ा चुकाया जाता है तो ये पूँजीगत व्यय होते हैं क्योंकि ये स्थायी सम्पत्तियों के मूल्य को बढ़ाती है।
निम्नलिखित व्ययों की प्रकृति आयगत है, परंतु इन्हें निम्नलिखित परिस्थितियों में पूँजीगत व्ययों के रूप में व्यवहारित किया जाता है:
अ) कच्चा माल तथा स्टोर का माल: जब इन्हें स्थायी सम्पत्ति का निर्माण करने के लिए उपयोग में लिया जाता है तो इन्हें पूँजीगत व्ययों के रूप में व्यवहारित किया जाता है।
ब) मजदूरी: जब यह नये कार्यालय के निर्माण या कार्यालय भवन के पुनर्नवीकरण के लिए चुकता मजदूरी को पूँजीगत व्यय के रूप में व्यवहारित किया जाता है।
स) मरम्मत: जब एक पुरानी मशीनरी का क्रय किया जाता है तथा इसे उपयोग में लेने के लिए व्यय किये जाते हैं। ऐसे व्ययों की प्रकृति पूँजीगत होती है।
व्यापारिक खाता एवं लाभ-हानि खाते में निम्नलिखित अंतर है-
|
अन्तर का आधार |
व्यापारिक खाता |
लाभ-हानि खाता |
|
मद |
इसमें माल के क्रय-विक्रय का लेखा किया जाता है। |
इसमें कार्यालय के आय-व्यय या लाभ-हानि का लेखा किया जाता है। |
|
व्यय |
इसमें प्रत्यक्ष व्यय लिखे जाते हैं। |
इसमें अप्रत्यक्ष व्यय लिखे जाते हैं। |
|
खाते |
इसमें वास्तविक एवं अवास्तविक दोनों प्रकार के खातों के शेष लिखे जाते हैं। |
इसमें केवल अवास्तविक खातों के शेष लिखे जाते हैं। |
आयोजन और संचय में निम्न अन्तर है-
|
अन्तर का आधार |
आयोजन |
संचय |
|
अनिवार्य या ऐच्छिक |
किसी ज्ञात दायित्व व हानि के लिये इसका निर्माण अनिवार्य रूप से किया जाता है। |
संस्था को लाभ होने की दशा में ही इसका निर्माण किया जाता है तथा इसका बनाया जाना ऐच्छिक है । |
|
लेखांकन |
लाभ-हानि के डेबिट पक्ष में इसका लेखा किया जाता है । |
लाभ-हानि नियोजन खाते के डेबिट पक्ष में इसका लेखा किया जाता है। |
|
प्रयोग |
जिस हानि के लिये बनाया गया है सिर्फ उसी की पूर्ति के लिये इसका प्रयोग किया जा सकता है। |
संचय का प्रयोग किसी भी हानि हेतु किया जा सकता है। (पूँजीगत व विशेष संचय को छोड़कर) |
|
लाभांश वितरण |
लाभांश वितरण के लिये इसका प्रयोग नहीं किया जा सकता है। |
इसका प्रयोग लाभांश वितरण के लिये किया जा सकता है। (संस्था के अन्तर्नियमों के अनुसार) |
|
चिट्ठे में स्थिति |
इसका लेखा दायित्व पक्ष में चालू दायित्व व आयोजन शीर्षक के अधीन किया जाता है। |
इसका लेखा दायित्व पक्ष में संचय व आधिक्य शीर्षक के अधीन किया जाता है। |
कभी-कभी कोई आयगत व्यय ऐसा होता है जिसकी उपयोगिता कई वर्षों तक रहती है, ऐसे व्यय को स्थगित आयगत व्यय कहते हैं। ऐसे व्यय जिस वर्ष में किए जाते हैं उस वर्ष के लाभ-हानि खाते में ही न डाल कर कई वर्षों के लाभ-हानि खाते में डाले जाते हैं। मान लो, एक नई फर्म विज्ञापन पर आरम्भ के वर्ष में एक बड़ी रकम व्यय करती है। इस विज्ञापन का लाभ उसे कई वर्षों तक प्राप्त होता रहेगा। यदि उचित होगा कि उस व्यय की समस्त रकम पहले वर्ष में ही लाभ-हानि खाते में न डालकर धीरे-धीरे तीन-चार वर्षों के लाभ-हानि खातों में डाली जाए।
(1) इन व्ययों के अन्तर्गत व्यापार चलाने में सामान्य रुप से व्यय की जाने वाली राशियाँ आती हैं।
(2) आयगत व्ययों की अल्पकालीन उपयोगिता है।
(3) इन व्ययों को बार-बार किया जाता है क्योंकि व्यापार निरन्तर चलता रहता है।
(4) इनका उद्देश्य स्थायी सम्पत्तियों की कार्यक्षमता बनाए रखना है, बढ़ाना नहीं।
(5) ये व्यय व्यवसाय की लाभ उपार्जन शक्ति को बनाए रखते हैं।
(6) आयगत व्यय व्यापारिक एवं लाभ-हानि खाते के डेबिट पक्ष में दिखाए जाते हैं।
यह कथन 100% सत्य है। फर्नीचर की क्रय पर खर्च की गयी राशि पूँजीगत व्यय होता है परंतु फर्नीचर का कार्य करने वाले व्यवसाय के लिए यह आयगत व्यय होता है। इसीप्रकार, कार्यालय के क्रय पर किया गया व्यय पूँजीगत व्यय होता है, परंतु भवनों का क्रय एवं विक्रय करने वाले व्यवसाय के लिए यह एक आयगत व्यय होता है। इसी तरह, भाडे़ एवं मजदूरी पर किया गया व्यय आयगत व्यय होता है परंतु जब मशीनरी की स्थापना के लिए मजदूरी चुकायी जाती है या कारखाने में मशीनरी को लाने के लिए भाड़ा चुकाया जाता है तो ये पूँजीगत व्यय होते हैं क्योंकि ये स्थायी सम्पत्तियों के मूल्य को बढ़ाती है।
ऐसे व्यय को पूर्वदत्त व्यय कहा जाता है, जिसका भुगतान तो चालू वर्ष में कर दिया गया है l लेकिन ऐसे व्यय का सम्बन्ध किसी आगामी वर्ष से होता है l
उपार्जित आय ऐसी आय को संदर्भित करती है जो लेखांकन वर्ष के दौरान कमा ली गयी परंतु प्राप्त नहीं हुई। उदाहरण के लिए, विनियोगों पर देय परंतु अभी तक अप्राप्त ब्याज।
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यदि डूबत ऋण की राशि समायोजना में दी गई है l तो प्रविष्टि इस प्रकार होगी-
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1,000 का किराया और
2,000 का कमीशन उपार्जित है l आप जर्नल में इनको रिकॉर्ड कीजिये l
Journal Entries
(For Decembar, 2004)
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Date |
Particulars |
L.F. |
Dr. |
Cr. |
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Accrued Rent A/c Dr. |
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1,000 |
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To Rent A/c |
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1,000 |
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(Accrued rent recorded) |
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|
Accrued Commission A/c Dr. |
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2,000 |
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To Commission A/c |
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2,000 |
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(Accrued commission recorded) |
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Loss by Fire A/c.........Dr |
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To Trading or Purchase A/c |
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(For loss of goods by fire) |
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Profit & Loss A/c.........Dr. |
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To Loss by Fire A/c |
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(Loss transferred) |
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मशीनरी |
50,000 |
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20,000 |
|
ह्रास की दर दोनों पर (वार्षिक) |
5% |
|
Date |
Particulars |
L.F. |
Dr. |
Cr. |
|
31st |
Depreciation A/c Dr. |
|
3,500 |
|
|
Dec. |
To Machinery A/c |
|
|
2,500 |
|
|
To Furniture A/c |
|
|
1,000 |
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|
(Depreciation Recorded) |
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|
|
31st |
Profit And Loss A/c Dr. |
|
3,500 |
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|
Dec. |
To Depreciation A/c |
|
|
3,500 |
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|
(Depreciation Transferred) |
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|
पूँजी 1 जनवरी |
1,00,000 |
|
ब्याज की दर (वार्षिक) |
10% |
|
Date |
Particulars |
L.F. |
Dr. |
Cr. |
|
31st |
Interest on Capital A/c Dr. |
|
10,000 |
|
|
Dec. |
To Capital A/c |
|
|
10,000 |
|
|
(Interest Recorded) |
|
|
|
|
|
Profit and Loss A/c Dr. |
|
10,000 |
|
|
|
To Interest on Capital A/c |
|
|
10,000 |
|
|
(Interest transferred) |
|
|
|
उपार्जित आय ऐसी आय को संदर्भित करती है जो लेखांकन वर्ष के दौरान कमा ली गयी परंतु प्राप्त नहीं हुई। उदाहरण के लिए, विनियोगों पर देय परंतु अभी तक अप्राप्त ब्याज।
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यदि डूबत ऋण की राशि समायोजना में दी गई है l तो प्रविष्टि इस प्रकार होगी-
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|
1,000 का किराया और
2,000 का कमीशन उपार्जित है l आप जर्नल में इनको रिकॉर्ड कीजिये l
Journal Entries
(For Decembar, 2004)
|
Date |
Particulars |
L.F. |
Dr. |
Cr. |
|
|
Accrued Rent A/c Dr. |
|
1,000 |
|
|
|
To Rent A/c |
|
|
1,000 |
|
|
(Accrued rent recorded) |
|
|
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|
Accrued Commission A/c Dr. |
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2,000 |
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To Commission A/c |
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|
2,000 |
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|
(Accrued commission recorded) |
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Loss by Fire A/c.........Dr |
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To Trading or Purchase A/c |
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(For loss of goods by fire) |
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Profit & Loss A/c.........Dr. |
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To Loss by Fire A/c |
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(Loss transferred) |
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मशीनरी |
50,000 |
|
|
20,000 |
|
ह्रास की दर दोनों पर (वार्षिक) |
5% |
|
Date |
Particulars |
L.F. |
Dr. |
Cr. |
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31st |
Depreciation A/c Dr. |
|
3,500 |
|
|
Dec. |
To Machinery A/c |
|
|
2,500 |
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|
To Furniture A/c |
|
|
1,000 |
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|
(Depreciation Recorded) |
|
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|
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31st |
Profit And Loss A/c Dr. |
|
3,500 |
|
|
Dec. |
To Depreciation A/c |
|
|
3,500 |
|
|
(Depreciation Transferred) |
|
|
|
|
पूँजी 1 जनवरी |
1,00,000 |
|
ब्याज की दर (वार्षिक) |
10% |
|
Date |
Particulars |
L.F. |
Dr. |
Cr. |
|
31st |
Interest on Capital A/c Dr. |
|
10,000 |
|
|
Dec. |
To Capital A/c |
|
|
10,000 |
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|
(Interest Recorded) |
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|
Profit and Loss A/c Dr. |
|
10,000 |
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To Interest on Capital A/c |
|
|
10,000 |
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(Interest transferred) |
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कभी-कभी तलपट में ऋण की राशि एवं उस पर ब्यीज की दर दी गई होती है, लेकिन समायोजनाओं में इस सम्बन्ध में कुछ नहीं दिया गया होता है। अतः यदि ऋण की राशि एंव अवधि दी हो तो शेष अवधि के लिए ब्याज की राशि निकालकर समायोजन किया जाता है। यदि ब्याज की राशि ऋणी पक्ष में भी दी हो तो उसे कुल देय ब्याज की राशि में से घटाकर दिखाया जाता है तथा शेष राशि को अदत्त व्यय मानकर उसका समायोजन लेखा कर दिया जाता है।
नियम – जर्नल में ऋण पर ब्याज खाता ऋणी तथा अदत्त ब्याज खाता धनी किया जाता है। ऋण पर ब्याज की राशि को लाभ-हानि खाते के ऋणी पक्ष में तथा आर्थिक चिट्ठे के दायित्व पक्ष की ओर ऋण की राशि में जोड़कर दिखाया जाता है।
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कभी-कभी तलपट में ऋण की राशि एवं उस पर ब्यीज की दर दी गई होती है, लेकिन समायोजनाओं में इस सम्बन्ध में कुछ नहीं दिया गया होता है। अतः यदि ऋण की राशि एंव अवधि दी हो तो शेष अवधि के लिए ब्याज की राशि निकालकर समायोजन किया जाता है। यदि ब्याज की राशि ऋणी पक्ष में भी दी हो तो उसे कुल देय ब्याज की राशि में से घटाकर दिखाया जाता है तथा शेष राशि को अदत्त व्यय मानकर उसका समायोजन लेखा कर दिया जाता है।
नियम – जर्नल में ऋण पर ब्याज खाता ऋणी तथा अदत्त ब्याज खाता धनी किया जाता है। ऋण पर ब्याज की राशि को लाभ-हानि खाते के ऋणी पक्ष में तथा आर्थिक चिट्ठे के दायित्व पक्ष की ओर ऋण की राशि में जोड़कर दिखाया जाता है।


A.
आयगत व्यय।
B. पूँजीगत व्यय।
C. आयगत प्राप्ति।
D. पूँजीगत प्राप्ति।
कारखाने द्वारा प्रयुक्त एक उपकरण के निर्माण के लिए कर्मचारी को चुकायी गई मजदूरी पूँजीगत व्यय होता है, क्योंकि इसके लाभ एक से अधिक वर्षों के लिए प्राप्त होंगे।
A.
लाभ एवं हानि खाते में।
B. मोटर कार खाते में।
C. मूल्यह्रास खाते में।
D. रोकड़ खाते में।
सभी हानियों तथा व्ययों को लाभ एवं हानि खाते में डेबिट किया जाता है। इसलिए, एक पुरानी मोटर कार के विक्रय या हानि को लाभ एवं हानि खाते में डेबिट किया जाता है।
एक ऐसा शोधन कोष, जिसमें विनियोग पर अर्जित ब्याज प्रतिवर्ष प्रतिभूतियों में विनियोजित होती रहती है, संचयी शोधन कोष कहलाता है ।
ऐसा संचय, जो व्यवसाय में तो विद्यमान होता है, लेकिन पुस्तकों में जिसको नहीं दर्शाया जाता है, गुप्त संचय कहलाता है।
यदि निर्मित सामान्य संचय तथा विशेष संचय के बराबर राशि व्यवसाय के बाहर प्रतिभूतियों में विनियोजित कर दी जाती है तो ऐसे संचय को संचय कोष कहा जाता है ।
ऐसे संचयों को पूँजीगत संचय कहा जाता है, जिनका निर्माण पूँजीगत लाभों से किया जाता है तथा जिनका वितरण अंशधारियों में लाभांश के रूप में नहीं किया जा सकता है।
आयगत संचय से आशय ऐसे संचयों से है, जिनका निर्माण व्यवसाय के साधारण लाभों से किया जाता है, तथा इन संचयों को स्वामियों में लाभांश के रूप में बाँटा जा सकता है।
संचय का निर्माण शुद्द लाभ होने पर ही किया जाता है। शुद्द लाभ होने पर भी इसका निर्माण ऐच्छिक होता है न कि अनिवार्य ।
यदि इनपुट जीएसटी, आउटपुट जीएसटी की तुलना में अधिक होता है, तो यह जीएसटी क्रेडिट कहलाता है।
एक ऐसा शोधन कोष, जिसमें विनियोग पर अर्जित ब्याज प्रतिवर्ष प्रतिभूतियों में विनियोजित होती रहती है, संचयी शोधन कोष कहलाता है ।
ऐसा संचय, जो व्यवसाय में तो विद्यमान होता है, लेकिन पुस्तकों में जिसको नहीं दर्शाया जाता है, गुप्त संचय कहलाता है।
यदि निर्मित सामान्य संचय तथा विशेष संचय के बराबर राशि व्यवसाय के बाहर प्रतिभूतियों में विनियोजित कर दी जाती है तो ऐसे संचय को संचय कोष कहा जाता है ।
ऐसे संचयों को पूँजीगत संचय कहा जाता है, जिनका निर्माण पूँजीगत लाभों से किया जाता है तथा जिनका वितरण अंशधारियों में लाभांश के रूप में नहीं किया जा सकता है।
आयगत संचय से आशय ऐसे संचयों से है, जिनका निर्माण व्यवसाय के साधारण लाभों से किया जाता है, तथा इन संचयों को स्वामियों में लाभांश के रूप में बाँटा जा सकता है।
संचय का निर्माण शुद्द लाभ होने पर ही किया जाता है। शुद्द लाभ होने पर भी इसका निर्माण ऐच्छिक होता है न कि अनिवार्य ।
ऐसे लाभ जिनकी प्राप्ति व्यवसाय के दैनिक परिचालन की गतिविधियों द्वारा होती है। आयगत लाभ कहलाते हैं। जबकि ऐसे लाभ जिनकी प्राप्ति व्यवसाय के दैनिक परिचालन की गतिविधियों द्वारा नहीं होती है। पूँजीगत लाभ कहलाते हैं।
आयोजन करने के निम्न उद्देश्य हैं-
सामान्य संचय का निर्माण निम्न उद्देश्यों के लिये किया जाता है-
सकल लाभ एवं शुद्ध लाभ में निम्नलिखित अंतर है-
|
अन्तर का आधार |
सकल लाभ |
शुद्ध लाभ |
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लाभ की स्थिति |
यह माल के क्रय-विक्रय पर हुआ लाभ है। |
यह सकल लाभ में से अप्रत्यक्ष व्यय घटाने के बाद का लाभ है। |
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प्रगति का ज्ञान |
इससे व्यापार की प्रगति का वास्तविक ज्ञान प्राप्त नहीं होता है। |
इससे व्यापार की प्रगति का वास्तविक ज्ञान प्राप्त होता है। |
संचय एक दायित्व है, क्योंकि संचय की दशा में सिर्फ हम व्यवसाय की अज्ञात एवं अनिश्चित हानियों की पूर्ति के लिये लाभों के कुछ भाग को व्यवसाय में रोक लेते है। लेकिन वास्तव में लाभों पर स्वामियों का ही अधिकार होता है, इसलिए यह एक दायित्व है ।
संचयों को आर्थिक चिट्ठे के दायित्व पक्ष में दर्शाया जाता है।
A.
विनियोग आय।
B. अग्रिम में प्राप्त आय।
C. उपार्जित आय।
D. प्राप्त कमीशन।
उपार्जित आय ऐसी आय होती है जिसे चालू वर्ष के दौरान कमा लिया जाता है परंतु चालू वर्ष के अंत तक प्राप्त नहीं किया जाता है, जैसे - प्रतिभूतियों पर ब्याज, कमीशन, किराया आदि।
A.
अदत्त किराया खाते को डेबिट तथा किराया खाते को क्रेडिट।
B. किराया खाते को डेबिट तथा रोकड़ खाते को क्रेडिट।
C. रोकड़ खाते को डेबिट तथा किराया खाते को क्रेडिट।
D. किराया खाते को डेबिट तथा अदत्त किराया खाते को क्रेडिट।
किराया बकाया है अतः इसे डेबिट किया जाता है। यह एक दायित्व बन जाता है इसलिए, अदत्त किराया खाते को क्रेडिट किया जाता है।
A.
दीर्घकालीन ऋण के रूप में एक कम्पनी द्वारा धन प्राप्ति।
B. माल का विक्रय।
C. लाभों की हानि के लिए क्षतिपूर्ति।
D. सेवाओं के विक्रय से प्राप्त राशि।
एक कम्पनी द्वारा एक दीर्घकालीन ऋण के रूप में राशि प्राप्त करना कम्पनी का साधारण कार्य नहीं होता है इसलिए, इसे पूँजीगत प्राप्ति के रूप में व्यवहारित किया जाता है।
A.
अग्रिम में प्राप्त आय।
B. कमायी गई आय।
C. उपार्जित आय।
D. अदत्त आय।
आगामी वर्ष से सम्बंधित आय का हिस्से को अग्रिम प्राप्त आय तथा अग्रिम आय के रूप में जाना जाता है।
A.
आय।
B. व्यय।
C. सम्पत्तियाँ।
D. दायित्व।
ऐसी आय को लाभ एवं हानि खाते में सम्बंधित आय में जोड़ते हुए दिखाया जायेगा तथा उपार्जित आय के नयी खाते को चिट्ठे के सम्पत्ति पक्ष में दिखाया जायेगा।
A.
केवल अंतिम खाता।
B. केवल व्यय।
C. केवल आय।
D. सभी मदें यदि इनका समायोजन आवश्यक हो।
वित्तीय विवरण तैयार करते समय सभी मदों को समायोजित किया जाता है।
A.
सम्पत्ति।
B. दायित्व।
C. खर्च।
D. व्यय।
पूर्वदत्त व्यय एक सम्पत्ति होती है क्योंकि इसका लाभ आगामी लेखांकन वर्ष में प्राप्त होगा।
यह खरीदे गये परंतु चालू वर्ष में अप्राप्त माल को संदर्भित करता है।
यदि अन्तिम रहतिया समायोजना के रूप में दिया हुआ है, तो उसका लेखा व्यापार खाते के क्रेडिट में और आर्थिक चिट्ठे के सम्पत्ति पक्ष में किया जाता है l
पूँजी पर ब्याज को लाभ-हानि खाते के डेबिट पक्ष में और आर्थिक चिट्ठे के दायित्व पक्ष में पूँजी में जोड़कर दर्शाया जाता है l
आहरण पर ब्याज वाली समायोजना को लाभ-हानि खाते के क्रेडिट पक्ष में और आर्थिक चिट्ठे के दायित्व पक्ष में पूँजी में से घटाकर दर्शाया जाता है l
जब क्रय की रासि तलपट में दी हुई हो और इसके साथ समायोजित शब्द लिखें हों तो इसका आशय यह है कि इसमें अन्तिम रहतिया घटा हुआ है। एसी दशा में यदि अन्तिम रहतिया भी तलपट में दिया रहता है तो इस प्रकार के अन्तिम रहतिया को व्यापारिक खाते के क्रेडिट पक्ष में नहीं लिखा जाता है, वरन् केवल चिट्ठे में सम्पत्ति पक्ष की ओर लिखा जाता है।
एक ऐसी आय को उपार्जित आय माना जाता है, जो अर्जित तो चालू वर्ष में कर ली गयी है, लेकिन जिसकी प्राप्ति चालू वर्ष के अन्त तक नहीं
ऐसे व्यय को पूर्वदत्त व्यय कहा जाता है, जिसका भुगतान तो चालू वर्ष में कर दिया गया है l लेकिन ऐसे व्यय का सम्बन्ध किसी आगामी वर्ष से होता है l
यह खरीदे गये परंतु चालू वर्ष में अप्राप्त माल को संदर्भित करता है।
यदि अन्तिम रहतिया समायोजना के रूप में दिया हुआ है, तो उसका लेखा व्यापार खाते के क्रेडिट में और आर्थिक चिट्ठे के सम्पत्ति पक्ष में किया जाता है l
पूँजी पर ब्याज को लाभ-हानि खाते के डेबिट पक्ष में और आर्थिक चिट्ठे के दायित्व पक्ष में पूँजी में जोड़कर दर्शाया जाता है l
आहरण पर ब्याज वाली समायोजना को लाभ-हानि खाते के क्रेडिट पक्ष में और आर्थिक चिट्ठे के दायित्व पक्ष में पूँजी में से घटाकर दर्शाया जाता है l
जब क्रय की रासि तलपट में दी हुई हो और इसके साथ समायोजित शब्द लिखें हों तो इसका आशय यह है कि इसमें अन्तिम रहतिया घटा हुआ है। एसी दशा में यदि अन्तिम रहतिया भी तलपट में दिया रहता है तो इस प्रकार के अन्तिम रहतिया को व्यापारिक खाते के क्रेडिट पक्ष में नहीं लिखा जाता है, वरन् केवल चिट्ठे में सम्पत्ति पक्ष की ओर लिखा जाता है।
एक ऐसी आय को उपार्जित आय माना जाता है, जो अर्जित तो चालू वर्ष में कर ली गयी है, लेकिन जिसकी प्राप्ति चालू वर्ष के अन्त तक नहीं
निम्नलिखित व्ययों की प्रकृति आयगत है, परंतु इन्हें निम्नलिखित परिस्थितियों में पूँजीगत व्ययों के रूप में व्यवहारित किया जाता है:
अ) कच्चा माल तथा स्टोर का माल: जब इन्हें स्थायी सम्पत्ति का निर्माण करने के लिए उपयोग में लिया जाता है तो इन्हें पूँजीगत व्ययों के रूप में व्यवहारित किया जाता है।
ब) मजदूरी: जब यह नये कार्यालय के निर्माण या कार्यालय भवन के पुनर्नवीकरण के लिए चुकता मजदूरी को पूँजीगत व्यय के रूप में व्यवहारित किया जाता है।
स) मरम्मत: जब एक पुरानी मशीनरी का क्रय किया जाता है तथा इसे उपयोग में लेने के लिए व्यय किये जाते हैं। ऐसे व्ययों की प्रकृति पूँजीगत होती है।
व्यापारिक खाता एवं लाभ-हानि खाते में निम्नलिखित अंतर है-
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अन्तर का आधार |
व्यापारिक खाता |
लाभ-हानि खाता |
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मद |
इसमें माल के क्रय-विक्रय का लेखा किया जाता है। |
इसमें कार्यालय के आय-व्यय या लाभ-हानि का लेखा किया जाता है। |
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व्यय |
इसमें प्रत्यक्ष व्यय लिखे जाते हैं। |
इसमें अप्रत्यक्ष व्यय लिखे जाते हैं। |
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खाते |
इसमें वास्तविक एवं अवास्तविक दोनों प्रकार के खातों के शेष लिखे जाते हैं। |
इसमें केवल अवास्तविक खातों के शेष लिखे जाते हैं। |
आयोजन और संचय में निम्न अन्तर है-
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अन्तर का आधार |
आयोजन |
संचय |
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अनिवार्य या ऐच्छिक |
किसी ज्ञात दायित्व व हानि के लिये इसका निर्माण अनिवार्य रूप से किया जाता है। |
संस्था को लाभ होने की दशा में ही इसका निर्माण किया जाता है तथा इसका बनाया जाना ऐच्छिक है । |
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लेखांकन |
लाभ-हानि के डेबिट पक्ष में इसका लेखा किया जाता है । |
लाभ-हानि नियोजन खाते के डेबिट पक्ष में इसका लेखा किया जाता है। |
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प्रयोग |
जिस हानि के लिये बनाया गया है सिर्फ उसी की पूर्ति के लिये इसका प्रयोग किया जा सकता है। |
संचय का प्रयोग किसी भी हानि हेतु किया जा सकता है। (पूँजीगत व विशेष संचय को छोड़कर) |
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लाभांश वितरण |
लाभांश वितरण के लिये इसका प्रयोग नहीं किया जा सकता है। |
इसका प्रयोग लाभांश वितरण के लिये किया जा सकता है। (संस्था के अन्तर्नियमों के अनुसार) |
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चिट्ठे में स्थिति |
इसका लेखा दायित्व पक्ष में चालू दायित्व व आयोजन शीर्षक के अधीन किया जाता है। |
इसका लेखा दायित्व पक्ष में संचय व आधिक्य शीर्षक के अधीन किया जाता है। |
(1) विनिमय विपत्र - विनिमय विपत्र एक प्रकार के साख विपत्र हैं जो उधार विक्रय में सहायता देते हैं। भारतवर्ष में बहुत प्राचीन समय से इनका प्रचलन ‘हुन्डियों’ के रूप में होता आ रहा है जो देशी भारतीय भाषाओं में लिखी जाती हैं। विदेशों में इन साख विपत्रों को विनिमय विपत्र या प्रतिज्ञा पत्र का नाम दिया जाता है।
(2) ख्याति - ख्याति एक अदृश्य सम्पवत्ति है। जिसका वर्णन करना आसान है परंतु उसे परिभाषित करना कठिन है। ख्याति कई तत्वों पर निर्भर करती है जैसे व्यवसाय की स्थिति, व्यापारी की इमानदारी, प्रतिष्ठित नाम, श्रेष्ठ उत्पादित वस्तु आदि।
(3) रूढि़वादिता की प्रथा - इस प्रथा के अनुसार भविष्य में हाने वाली समस्त सम्भावित हानियों के लेखे के लिए तो पहले से ही व्यवस्था कर ली जाती है परंतु सम्भावित लाभों को छोड़ दिया जाता है।
(4) पूँजीगत व्यय - कोई भी ऐसा खर्च जो किसी स्थायी सम्पत्ति को क्रय करने अथवा उसके मूल्य में वृद्धि करने के लिए किया जाता है पूँजीगत व्यय कहलाता है।
खरीद पर भुगतान की गई जीएसटी (सीजीएसटी और एसजीएसटी अथवा आईजीएसटी) को क्रय खाता से डेबिट नहीं किया जाता है क्योंकि इसे बिक्री पर संग्रह की गई जीएसटी (सीजीएसटी और एसजीएसटी अथवा आईजीएसटी) से समायोजित किया जाता है। इसलिए यह खरीदे गए माल की लागत नहीं है।
क्रय वापसी, माल के आहरण, माल के दान, सैम्पल के रूप में दिए गए माल के समय प्रत्येक प्रकार के भुगतान किए गए जीएसटी (सीजीएसटी और एसजीएसटी अथवा आईजीएसटी) (जिसे इनपुट जीएसटी कहा जाता है) और संग्रह किए गए जीएसटी (सीजीएसटी और एसजीएसटी अथवा आईजीएसटी) (जिसे आउटपुट जीएसटी कहा जाता है) के लिए अलग खाता बनाया जाता है। इनपुट जीएसटी (सीजीएसटी और एसजीएसटी अथवा आईजीएसटी) खाता डेबिट किया जाता है।
माल और/या सेवाओं अथवा दोनों के क्रय पर भुगतान किए गया वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) का समायोजन माल और/या सेवाओं अथवा दोनों के विक्रय (आपूर्ति) पर एकत्र किए गए जीएसटी से किया जाता है। जिस क्रम में इसे समायोजित किया जा सकता है, वह निम्नलिखित है:
जब अंतिम खाते तैयार किए जाते हैं तो शेष राशि जीएसटी खाते में समायोजित की जानी चाहिए।
| Account title |
Dr. |
Cr. |
| Input CGST | 7,500 | |
| Input SGST | 7,500 | |
| Input IGST | 11,250 | |
| Output CGST | 6,000 | |
| Output SGST | 6,000 | |
| Output IGST | 9,000 |
|
Account title |
Input |
Output |
Balance |
|
IGST |
11,250 |
9,000 |
2,250 (Dr.) |
|
CGST |
7,500 |
6,000 |
1,500 (Dr.) |
|
SGST |
7,500 |
6,000 |
1,500 (Dr.) |
तलपट (केवल प्रासंगिक हिस्सा)
|
Account title |
Dr. |
Cr. |
|
Input IGST |
2,250 |
|
|
Input CGST |
1,500 |
|
|
Input SGST |
1,500 |
चिट्ठा (केवल प्रासंगिक हिस्सा)
|
Liabilities |
|
|
|
|
|
|
Input CGST |
2,250 |
|
|
Input SGST |
1,500 |
|
|
|
Input IGST |
1,500 |