A.
मांसाहारियों की छोटी आंत तुलना में लंबाई में छोटी
B.
मांसाहारियों की छोटी आंत तुलना में लंबाई में लंबी
C.
मांसाहारियों की छोटी आंत की लंबाई के समान
D.
बहुत छोटी
शाकाहारियों को घास और दूसरे पौधों में स्थित सेलुलोज को पचाने के लिए बड़ी छोटी आंत कि आवश्यकता होती है ।
A.
हीमोसायनिन
B.
हीमोइरिथ्रीन
C.
हीमोग्लोबिन
D.
फ्यूकोजेन्थिन
रक्त का ऑक्सीकरण अनेक तरीकों से मापा जाता है लेकिन महत्वपूर्ण माप हीमोग्लोबिन (Hb) संतृप्तता प्रतिशतता है। लाल रक्त कोशिकाओं में उपस्थित हीमोग्लोबिन अणु स्तनधारियों में ऑक्सीज़न के प्राथमिक परिवहक हैं ।
A.
विटामिन्स
B.
प्रोटीन्स
C.
कार्बोहाइड्रेट्स
D.
वसा
एंजाइम प्रोटीन्स हैं जो रासायनिक अभिक्रियाओं को उत्प्रेरित करते हैं। एंजाइमी अभिक्रियाओं में प्रक्रम के प्रारम्भ में अणु सब्सट्रेट कहलाता है और एंजाइम इनको भिन्न अणुओं में परिवर्तित कर देते हैं जो उत्पाद कहलाते हैं ।
A.
वाष्पोत्सर्जन
B.
प्रकाश्संश्लेषण
C.
अंधकार अभिक्रिया
D.
ग्लाइकोलाइसिस
वाष्पोत्सर्जन जल का पौधे के वायवीय भागों से विशेषकर तने, फूलों और फलों से भाप में परिवर्तित होना है वाष्पोत्सर्जन चूषण में सहायता करता है जो जल को जाइलम की कोशिकाओं द्वारा खींचता है ।
A.
धमनियाँ मोटी और प्रत्यास्थ भित्ति वाली जबकि शिराएँ मोटी भित्ति वाली होती हैं ।
B.
शिराएँ मोटी और प्रत्यास्थ भित्ति वाली जबकि धमनियाँ मोटी भित्ति वाली होती हैं ।
C.
धमनियों में वाल्व होते हैं जबकि शिराओं में वाल्व नहीं होते हैं ।
D.
शिराएँ केशिकाओं के निर्माण के लिए विभाजित हो जाती हैं जबकि धमनियाँ नहीं होती हैं ।
धमनियाँ मोटी और प्रत्यास्थ भित्ति वाली जबकि शिराएँ मोटी भित्ति वाली होती हैं ।
A.
लाल रक्त कोशिकाओं का
B.
ऑक्सीज़न का
C.
कार्बन डाई ऑक्साइड का
D.
नाइट्रोजन अपशिष्टों का
लाल रक्त कोशिकाएं ऑक्सीज़न का परिवहन करती हैं जबकि प्लाज्मा भोजन, कार्बन डाई ऑक्साइड, और नाइट्रोजनी अपशिष्टों का परिवहन करता है ।
A.
स्थलीय जीवों में श्वसन की दर से धीमी
B.
स्थलीय जीवों में श्वसन की दर से तेज
C.
वायवीय जीवों में श्वसन की दर से तीव्र
D.
स्थलीय जीवों में श्वसन की दर से कम
इस प्रकार पानी में घुलित ऑक्सीज़न की मात्रा कम होने के कारण जलीय जीवों में श्वसन की दर तेज होती है ।
A.
प्रोटीन
B.
वसा
C.
कार्बोहाइड्रेट
D.
विटामिन
यह बड़े वसा अणुओं को पित्त रस द्वारा वसा की छोटी बूंदों में विभाजित करने का प्रक्रम है। पित्त लवण वसा कणिकाओं की परत को प्रभावी एंजाइमी क्रिया के लिए वसा की छोटी कणिकाओं में तोड़ दिया जाता है ।
आंत्र की भित्ति में उपस्थित रसांकुरों का कार्य अवशोषण के लिए अधिक सतह प्रदान करना है|
चित्र में
दर्शाया गया
भाग A क्या है ?
हेनले का लूप
परासरण के लिए दोनों द्रवों के मध्य अर्द्धपारगम्य झिल्ली का होना आवश्यक है जबकि विसरण के लिए यह आवश्यक नहीं है।
साइटोकाइनिन
मानव में चार प्रकार का A, B, AB और O रक्त समूह पाया जाता है।
वे तत्व जो धातु एवं अधातु दोनों के गुणधर्म प्रदर्शित करते हैं , उन्हें उपधातु या अर्द्धधातु कहते हैं ।
दो उपधातुओं के नाम जर्मेनियम और आर्सेनिक हैं ।
आधुनिक आवर्त नियम के अनुसार तत्वों के भौतिक तथा रासायनिक गुणधर्म उनके परमाणु क्रमांकों के आवर्ती फलन होते हैं।
तत्वों को उनके परमाणु क्रमांकों के अनुसार लगाने पर आवर्त में परमाणु त्रिज्या व धात्विकता कम होती है।
कैल्सियम और स्ट्रॉन्शियम, मैग्नीशियम के समान रासायनिक अभिक्रिया दर्शायेंगे क्योंकि इनके बाहरी कोश में संयोजकता इलेक्ट्रॉन की संख्या मैग्नीशियम के समान है अर्थात इन सभी तत्वों में दो संयोजकता इलेक्ट्रॉन हैं और ये आधुनिक आवर्त सारणी के समूह दो के तत्व हैं |
परमाणु क्रमांक
हम जानते हैं-
q = ne
यहाँ
n = q/e
q = 1 कूलॉम और e = 1.6 x 10-19 कूलॉम
n = 1 कूलॉम / 1.6 x 10-19 कूलॉम
n = 6.25 x 1018
अतः इलेक्ट्रॉनों की संख्या =
(b) मैग्नीशियम (Mg) और कैल्सियम (Ca)
नाइट्रोजन का इलेक्ट्रॉनिक विन्यास
फॉस्फोरस का इलेक्ट्रॉनिक विन्यास 2, 8, 5 है ।
नाइट्रोजन छोटे आकार के कारण फॉस्फोरस से अधिक विद्युतऋणी होता है ।
(अ) वे तत्व जिनमें प्रोटॉन की संख्या समान तथा न्यूट्रॉन की संख्या भिन्न होने के कारण उनकी द्रव्यमान संख्या अलग-अलग होती है, समस्थानिक कहलाते हैं, जैसे -- 6C12,6C14 आदि कार्बन के समस्थानिक होते हैं।
(ब) Ne, Ar
(स) तत्व का इलेक्ट्रॉनिक विन्यास 2,8,2 है। अतः परमाणु क्रमांक 12 है तो
वर्ग संख्या = 2
संयोजकता = +2
| तत्व | सबसे कम परमाणु त्रिज्या | रासायनिक रूप से सबसे कम सक्रिय |
| F, Cl, Br | ����.. | ����� |
| Li, Na, K | ����� | �����. |
|
तत्व |
सबसे कम परमाणु त्रिज्या |
रासायनिक रूप से सबसे कम सक्रिय |
|
|
|
|
|
|
|
|
1. आवर्त सारणी ने रसायन विज्ञान के अध्ययन को व्यवस्थित और आसान कर दिया है ।
2. अगर किसी तत्व का आवर्त सारणी में स्थान ज्ञात हो तो इसके गुणों को याद रखना आसान होता है ।
3. किसी तत्व का आवर्त सारणी में स्थान ज्ञात करके इसके द्वारा बनाए जा सकने वाले यौगिकों की भविष्यवाणी की जा सकती है ।
१. आधुनिक आवर्त सारणी में किसी भी आवर्त में बाएं से दायें जाने पर परमाणु का साइज़ घटता है ।
इसका कारण यह है कि किसी भी आवर्त के तत्वों के परमाणुओं में बाह्य इलेक्ट्रॉन समान संयोजकता कोश में जुड़ते हैं और परमाणु संख्या बढ़ने से प्रभावी नाभिकीय आवेश बढ़ता है । अतः नाभिक का इलेक्ट्रॉनों प्रति आकर्षण बढ़ता है और परमाणु का साइज़ घटता है ।
उदाहरण :

२. आधुनिक आवर्त सारणी में किसी भी आवर्त में बाएं से दायें जाने पर धात्विक गुण कम होता है और अधात्विक गुण बढ़ता है ।
उदाहरण :
तीसरा आवर्त:

अ. परमाणु आकार - एक स्वतंत्र परमाणु के केन्द्र से उसके सबसे बाहरी कोश की दूरी को परमाणु त्रिज्या कहते हैं। आवर्त में बायें से दायें परमाणु त्रिज्या घटती है, क्योंकि नाभिक में आवेश बढ़ने से यह इलेक्ट्रॉनों को नाभिक की ओर अधिक आकर्षित करता है । अतः परमाणु आकार घटता जाता है। जबकि समूह में ऊपर से नीचे परमाणु आकार बढ़ता है क्योंकि ऊपर से नीचे एक नया कोश जुड़ जाता है जिससे प्रभावी नाभिकीय आवेश भी कम हो जाता है । अतः परमाणु आकार समूह में बढ़ता है।
ब. विद्युत ऋणात्मकता- आवर्त में जैसे-जैसे संयोजकता कोश के इलेक्ट्रॉनों पर लगने वाला प्रभावी नाभिकीय आवेश बढ़ता है
मेन्डेलीफ की आवर्त सारणी के गुण-
वर्गों अथवा समूहों की विशेषताएँ-
1. किसी समूह की संख्या उस समूह के तत्वों की ऑक्सीजन के प्रति संयोजकता को दर्शाती है।
2. एक समूह के तत्वों के गुणों में परस्पर काफी समानता दिखाई देती है।
3. किसी समूह के ऊपर से नीचे चलने पर तत्वों के गुणों में क्रमिक परिवर्तन होते हैं , जैसे समूह में नीचे को विद्युत धनात्मकता, परमाणु त्रिज्या, परमाणु क्रमांक, परमाणु भार आदि बढ़ते हैं जबकि आयनन विभव, विद्युत ऋणात्मकता आदि क्रमशः घटते हैं ।
आवर्तो की विशेषताएँ-
1. किसी आवर्त में बायें से दायें को तत्वों की धातु प्रकृति घटती व अधातु प्रकृति बढ़ती है।
2. बायें से दायें जाने पर परमाणु त्रिज्या क्रमशः घटती है।
3. बायें से दायें जाने पर तत्वों के ऑक्साइडों की अम्लीय प्रवृति बढ़ती है।
4. बायें से दायें जाने पर आयनन विभव का मान बढ़ता है।
कमियाँ-
1. इसमें हाइड्रोजन को एक निश्चित स्थान नहीं दिया गया ।
2. इसमें एक तत्व के समस्थानिकों को अलग-अलग स्थान नहीं दिए गये।
3. इसमें कुछ स्थानों पर कम परमाणु भार वाले तत्त्व को बाद में तथा अधिक परमाणु भार वाले तत्वों को पहले रखा गया है |
समूहों के लक्षण हैं :
(i) संयोजकता इलेक्ट्रॉन: - आवर्त सारणी के एक समूह के सभी तत्व समान संख्या में संयोजकता इलेक्ट्रॉन रखते हैं ।
(ii) परमाणु का आकार: - समूह में नीचे जाने पर कोशों की संख्या बढ़ने के कारण परमाणु आकार में वृद्धि होती है ।
(iii) धात्विक लक्षण: - समूह में ऊपर से नीचे जाने पर तत्वों के धात्विक गुण में वृद्धि होती है ।
(iv) संयोजकता: - चूंकि एक समूह में संयोजकता इलेक्ट्रॉन समान होते हैं । अतः एक समूह के सभी तत्व समान संयोजकता रखते हैं ।
(v) अधात्विक गुण: - समूह में नीचे जाने पर तत्वों में अधात्विक गुण कम होते हैं ।
A.
फ्लोएम और मृदूतक
B.
मृदूतक और जाइलम
C.
स्थूलकोणोतक
D.
जाइलम
जाइलम जल का जड़ों से ऊपर की ओर परिवहन करता है । जाइलम मुख्यतः जल और खनिज लवणों को सम्पूर्ण पादप भागों को पहुँचने का कार्य करता है ।
A.
दायें आलिंद से
B.
दायें निलय से
C.
बाएँ आलिंद से
D.
बाएँ निलय से
विऑक्सीजनित रक्त दायें आलिंद में प्रवेश करता है और दायें आलिंद में जाता है, जहां से यह फुफ्फुसीय धमनियों द्वारा फेफड़ों को भेजा जाता है । फुफ्फुसीय शिराएँ ऑक्सीज़न प्रचुर रक्त को हृदय को वापस लौटाती है जहां से यह बाएँ निलय में जाने से पूर्व बाएँ आलिंद में जाता है । बाएँ निलय से ऑक्सीज़न प्रचुर रक्त महाधमनी धमनी द्वारा शेष शरीर को पम्प कर दिया जाता है ।
A.
पायरुविक अम्ल
B.
लेक्टिक अम्ल
C.
हाइड्रोक्लोरिक अम्ल
D.
कार्बोनिक अम्ल
अत्यधिक व्यायाम के दौरान मांसपेशियों द्वारा ऑक्सीज़न की कमी में अत्यधिक श्वसन से उत्पन्न लेक्टिक अम्ल, मांसपेशीय ऐंठन उत्पन्न करता है ।
A.
श्वसन
B.
जनन
C.
उत्सर्जन
D.
पाचन
कोशिकीय श्वसन एक कोशिका में ईंधन अणुओं से जैवरासायनिक ऊर्जा प्राप्त करने के लिए उपापचयी अभिक्रियाएं और प्रक्रम हैं । एक कोशिका द्वारा प्राय श्वसन में प्रयुक्त ईंधन अणुओं में ग्लूकोज, अमीनो अम्ल और वसा अम्ल और एक सामान्य ऑक्सीकारी कारक (इलेक्ट्रॉन ग्राही) जो की आण्विक ऑक्सीज़न शामिल हैं । प्रथम चरण में ग्लूकोज का विखंडन होता है ।
A.
सहजीवी
B.
परजीवी
C.
स्वयंपोषी
D.
मृतजीवी
कुस्कुटा (अमरबेल) लगभग 100-170 जतियों का वंश है जिसमें पीली, ऑरेंज, या लाल( कभी-कभी हरी) परजीवी रूप हैं ।
ससंजक बल और आसंजक बल
रॉबर्ट हिल
झींगा
जिबरेलिन
सभी जानवरों और गैर-हरे पौधों को विषमपोषी कहा जाता है, क्योंकि वे अपने भोजन के लिए दूसरों पर निर्भर रहते हैं और पोषण की इस विधा को विषमपोषी पोषण कहा जाता है।
जाइलम और फ्लोएम
रिकेट्स विटामिन डी की कमी से होता है।
पौधे अपनी जड़ों द्वारा अवशोषित पानी का उपयोग अपनी उपपाचयी क्रियाओं में करते है साथ ही बचे हुए पानी का अधिकांश अंश (लगभग 90 प्रतिशत) पौधे के लिये बेकार होता है। यह पानी सदैव ही पौधे की वायवीय सतहों से वाष्प बनकर उड़ता रहता है। इस क्रिया को ही वाष्पोत्सर्जन कहते हैं।
स्वांगीकरण - अवशोषण के पश्चात ये पदार्थ कोशिकाओं के जीवद्रव्य में विलय हो जाते हैं । यह प्रक्रिया स्वांगीकरण कहलाती है ।
फुफ्फुसीय धमनी
मछलियों में विऑक्सीजनीकृत रक्त पम्प किया जाता है जो गिल्स द्वारा ऑक्सीजनीकृत होता है और शरीर के अंगों को आपूर्ति कर दिया जाता है। जहाँ से विऑक्सीजनीकृत रक्त हृदय को वापस लौट जाता है और यह एकल परिसंचरण भी कहलाता है। इस प्रकार हृदय से रक्त एक चक्र में केवल एक ही बार गुजरने के कारण एकल परिसंचरण कहलाता है।
ग्लोमेरूलस में प्रवेश करने वाली अभिवाही धमनिका अपवाही धमनिका से अधिक चौड़ी होती है। इसलिए केशिका गुच्छ में रूधिर का दबाव बढ़ जाता है। इस दबाव के कारण प्रोटीन के अलावा रूधिर प्लाज्मा में घुले सभी पदार्थ छनकर बोमेन सम्पुट में पहुँच जाते हैं। बोमेन सम्पुट में पहुँचने वाला यह द्रव वृक्कनिस्यंद कहलाता है। यह प्रोटीनरहित छना हुआ प्लाज्मा वृक्कनिस्यंद समीपस्थ कुण्डलित नलिका में पहुँचता है।
वह दाब जो कोशिका की स्फीति अवस्था में जीवद्रव्य के द्वारा द्रव-स्थैतिक कोशिका भित्ति पर पड़ता है, स्फीतिदाब कहलाता है।
इसके विपरीत, कोशिका-भित्ति की दृढ़ता के कारण, जीवद्रव्य पर स्फीति-दाब के बराबर, विपरीत दिशा में लगाये गए दाब को भित्ति-दाब कहते हैं।
A = फुफ्फुसीय परिसंचरण
B = सिस्टेमिक परिसंचरण
1. पेसमेकर: हृदय की ऊपरी दांयी भित्ति पर स्थित विशेषीकृत ऊतक होता है, साइनोएट्रिअलनोड या पेसमेकर कहलाता है।
2. परासरण नियंत्रण: शरीर में जल की उचित मात्रा तथा उपयुक्त आयनों का संतुलन बनाए रखने की प्रक्रिया को परासरण नियंत्रण कहते हैं।
A अवस्था में रंध्र खुले व B अवस्था रंध्र के बंद होने को प्रदर्शित करती है।
प्रकाशानुवर्तन: पौधे या इसके किसी भाग का प्रकाश की ओर मुड़ना प्रकाशानुवर्तन कहलाता है।
प्रायोगिक प्रदर्शनः- एक गमले में लगे पौधे को अंधेरे कमरे में इस प्रकार रखेंगे कि पौधे को प्रकाश केवल एक ही ओर से मिले।कुछ दिनों उपरांत देखने पर पौधा प्रकाश की दिशा में मुड़ जाता है।
इससे यह प्रदर्शित होता है कितना प्रकाशानुवर्तन दर्शाता है।

a. चयनित अर्धपारगम्य झिल्ली
b. जल
c. सल्फर
|
घमनी |
शिरा |
|
|
इसमें रूधिर हृदय से अंगो की ओर बहता है। |
इसमें रूधिर अंगो से हृदय की ओर बहताहै। |
|
|
हृदय की धड़कन के साथ रूधिर दबाव के साथ बहता है। |
शिराओं में रूधिर घीमी (एक सी) गति के साथ बहता है। |
|
|
इनकी दीवारें मोटी एवं लचीली होती है। |
इनकी भित्तियाँ पतली, कम लचीली होती है। |
मनुष्य में वहन तंत्र के तीन घटक निम्न हैं
� रुधिर
� ह्रदय
� रुधिर वाहिकाएं
1. ऑक्सिन
2. एब्सिसिक अम्ल
a) 

| हॉर्मोन | Deficiency Disease |
| आयोडीन | घेंघा |
| बौनापन | |
| इंसुलिन |
|
हॉर्मोन |
कमी से रोग |
|
आयोडीन |
घेंघा |
|
वृद्धि हॉर्मोन |
बौनापन |
|
इंसुलिन |
डायबिटीज़ |
तंत्रिका आवेग द्वारा प्रतिवर्ती क्रिया में अनुसरण किया गया पथ प्रतिवर्ती चाप कहलाता है ।

पादप हॉरमोन वे रसायन हैं, जो उत्प्रेरित कोशिकाओं द्वारा मुक्त होते हैं । ये रासायनिक यौगिक वृद्धि, विकास और वातावरण के प्रति अनुक्रिया के नियंत्रण एवं समन्वय में सहायता करता है ।
ये अपने संश्लेषित होने के स्थान से दूर क्रिया करते हैं । ये क्रिया करने के स्थान से सरलतम रूप मेन विसरित होते हैं ।

कुछ लोग अधिक लंबे जबकि दूसरे अधिक छोटे हैं, इसप्रकार की असामान्यताएँ
वृद्धि हॉर्मोन्स की अधिकता और कम स्त्रवण के कारण होती हैं । यह हॉरमोन पीयूष ग्रंथि द्वारा स्त्रावित होता है। इसकी बचपन में कमी बौनेपन को और अधिकता अतिरिक्त लंबेपन को प्रेरित करती है ।
जंतुओं में शरीर की गतियों के नियंत्रण एवं समन्वय के लिए एक तंत्रिका तंत्र होता है। पादपों में कोई तंत्रिका तंत्र और मांसपेशियाँ नहीं होती हैं। पादपों में गतियाँ दो प्रकार की होती है, वृद्धि आधारित और वृद्धि अनाधारित। पादपों में आधारित गतियाँ कोशिकाओं में जल तत्वों के कारण की स्फीतता द्वारा नियंत्रित होती है ।
जब एक तंत्रिका आवेग मांसपेशी तक पहुंचता है कोशिकीय स्तर पर मांसपेशी अपना आकार परिवर्तित कर लेती है और छोटी हो जाती है। मांसपेशी कोशिका में विशिष्ट प्रोटीन होती हैं जो तंत्रिकीय विद्युत आवेगों में परिवर्तन के प्रति अपना आकार और मांसपेशी कोशिका में अपनी व्यवस्था को परिवर्तित कर लेते हैं । प्रोटीन्स की नयी व्यवस्था मांसपेशी कोशिका को छोटा बना देती है परिणामस्वरूप मांसपेशियों में संकुचन होता है।
1. एक तंत्रिका कोशिका के द्रुमाश्मी सिरों पर सूचनाएँ प्राप्त की जाती हैं।
2.एक्सोन
3.एक्सोन के अंत में तंत्रिकीय सिरे

1. माईलिन
आच्छद के
कार्य हैं :
a) तंत्रिका
आवेग संचालन
की गति बढ़ाने
के लिए
b) एक्सोन
को कुचालित
करने के लिए
जो की
समीपवर्ती
तंतुओं में
आवेगों को
मिश्रित
होने को रोकता
है ।
2. (a) प्रकाशानुवर्तन
और (b) गुरुत्वानुवर्तन
3. सोना के
दादाजी
डायबिटीज़ से
ग्रसित हैं
और यह रोग
इंसुलिन
हॉरमोन के
अनियमित
स्त्रवण से
हो जाता है जो
अग्नाश्य
द्वारा
उत्पन्न
होता है और
शर्करा के
स्तर को
नियमित करता
है।
(a) एड्रीनेलीन हॉरमोन
(b) राम का भाई पीला पड़ गया क्योंकि जब भी रक्त में एड्रीनेलीन स्त्रावित होता है किसी भी तनाव की परिस्थिति में त्वचा और पाचन तंत्र छोटी धमनियों के चारों और स्थित मांसपेशियों में संकुचन के कारण हमारी कंकाली पेशियों को रक्त भेजने के लिए इन अंगों को रक्त की आपूर्ति कम हो जाती है।
(c) आयोडीन लवण थायरोइड ग्रंथि के थायरोक्सिन हॉरमोन बनाने के लिए आवश्यक है। थायरोक्सिन शरीर में कार्बोहाइड्रेट, प्रोटीन और वसा उपापचय को नियमित करता है, ताकि वसा उपापचय को वृद्धि का सबसे अधिक संतुलन उपलब्ध करा सके । आयोडीन की कमी घेंघे को प्रेरित करती है जिसमें गर्दन फूल जाती है ।

(i) तंत्रिका
(ii) उद्दीपन
(iii) अनुक्रिया
(iv) उत्तेजनशीलता
(v) तंत्रिका आवेग
A.
मूत्राशय के
B.
मूत्रवाहिनी के
C.
मूत्रमार्ग के
D.
गर्भाशय के
माता के पेट में 9 महिने वृद्धि करने के बाद बच्चा गर्भाशय की मांसपेशियों में क्रमागत संकुचन के कारण बाहर आता है।
A.
कशाभ से
B.
पक्ष्माभ से
C.
बीजाणुधानी से
D.
कवकतंतु से
कवक तन्तु एक कवक की लंबी, शाखित, कोशिका है। कवक में, कवक तन्तु कायिक वृद्धि की मुख्य विधि है और सामूहिक रूप से कवकजाल कहलाती हैं ।
A.
अंडाशय में
B.
बीजांड में
C.
अंडवाहिनी में
D.
वर्तिकाग्र में
अंडाशय में बीजांड होते हैं और प्रत्येक बीजांड में एक अंड या मादा जनन कोशिका होती है । नर जनन कोशिका, परागकणों में होती है और बीजांड स्थित अँड कोशिका से संयुक्त होकर युग्मनज बनाती है ।
A.
असमान जीव
B.
जननिक समानता
C.
जननिक विभिन्नताएँ
D.
विविध संतति
कायिक रूप से परिवर्धित संततियाँ जननिक समानता दर्शाती हैं। यह जननिक समानता संतति के एकल जनक से परिवर्धित होने के कारण है।
A.
लैंगिक जनन
B.
कायिक जनन
C.
पुनरुदभवन
D.
खंडन
कायिक जनन में नए पौधे से पादपों के फूलों और बीजों के अतिरिक्त किसी भी भाग द्वारा जनन है ।
अलैंगिक जनन
विपरीत लिंग के दो प्रतिव्यष्टि
फैलोपियन नलिका
कंडोम का उपयोग
पुंकेसर और पुतन्तु
अंडाशय, फैलोपियन नलिकाएं, गर्भाशय, और योनि
मुकुलन द्वारा
कॉपर टी गर्भाधान से बचने के लिए गर्भाशय में लगाई जाती है, यह एक औरत को उसे लैंगिक संचारित रोगों से बचाने में सहायक नहीं है ।
भ्रूण विशिष्ट ऊतक की सहायता से माता के रक्त से, पोषण प्राप्त करता है, जो प्लेसेन्टा कहलाता है ।
लैंगिक जनन
माता के शरीर में गर्भाशय का महत्व:
• निषेचन के बाद अंडा गर्भाशय में आरोपित किया जाता है।
• विकासशील भ्रूण को सुरक्षा और पोषण देता है ।
• ग्रीवा में श्लेष्मा शुक्राणुओं को स्नेहन एवं ऊर्जा प्रदान करता है ।
• शुक्राणु गर्भाशयी ग्रीवा के माध्यम से गर्भ में प्रवेश करते हैं।
लैंगिक जनन और अलैंगिक जनन में अंतर :
1. लैंगिक जनन में दो प्रतिव्यष्टि भाग लेते हैं और संतति जनकों से भी कुछ भिन्न होती है।
2. अलैंगिक जनन में एक ही जनक भाग लेता है और संतति जनक के समरूप होती है।
1. वक्ष का आकार बढ्ने के साथ चूचकों के शीर्ष की त्वचा गहरी होना प्रारम्भ हो जाती है ।
2. इस अवस्था के प्रारम्भ में लड़की में मासिक धर्म की शुरुआत हो जाती है।
शुक्राशय और प्रोस्टेट ग्रंथि के स्त्राव शुक्राणुओं के परिवहन को आसान बनाता है और उन्हें पोषण भी प्रदान करता है।
परागण के प्रक्रम में पराग कणों में परिबद्ध नर युग्मक, पुंकेसर के पराग कोषो से पुष्प में जायांग के वर्तिकाग्र को ले जाए जाते हैं । निषेचन में नर और मादा युग्मकों का संयुग्मन होता है ।
नव निर्मित पुत्री कोशिकाओं के आनुवांशिक पदार्थ में जनकों के समान लक्षण उत्पन्न करने के लिए, DNA प्रतिकृति बनाना, जनन के प्रक्रम का आवश्यक भाग है।
शुक्राणुओं का अत्यधिक संख्या में उत्पादित होने के निम्न कारण हैं -
1. मादा जनन मार्ग के प्रतिकूल अम्लीय वातावरण के कारण लाखों शुक्राणु नष्ट हो जाते है।
2. लाखों शुक्राणु तरल प्रवाह और गुरुत्वाकर्षण बल के विरुद्ध फैलोपियन नलिका के माध्यम से गति करने में अक्षम होते हैं ।
3. अनेक शुक्राणु उस फैलोपियन नलिका में चले जाते है जिसमें अंडा नहीं होता।
परपरागण के लाभ-
(1) परपरागण से बने बीज अधिक बड़े स्वस्थ तथा संख्या में अधिक होते हैं।
(2) परपरागण से बने बीज अधिक प्रतिरोधक क्षमता वाले होते हैं।
(3) मनुष्य द्वारा कृत्रिम परागण से वांछित लक्षणों वाली जातियाँ उत्पन्न होती हैं।
(4) संतति में नवीन विभिन्नताऐं होती हैं।
(5) नयी जातियों का विकास होता है।
कायिक प्रवर्धन की तीन हानियाँ हैं :-
i. संतति में अपने जनकों से अवांछनीय लक्षण भी आ जाते हैं ।
ii. संतति की ओज में कमी होती है ।
iii. नई किस्मों की रचना नहीं हो पाती है ।

A.
आंत्रीय तंत्रिका
B.
कपालीय तंत्रिका
C.
प्रतिवर्त तंत्रिका
D.
आधारी तंत्रिका
कपालीय तंत्रिकाएं जो सीधे ब्रेन स्टेम से निकलती हैं मेरु तंत्रिकाओं के विपरीत जो की मेरुरज्जु के खंड से निकलती हैं ।
A.
अग्र मस्तिष्क
B.
पश्च मस्तिष्क
C.
मध्य मस्तिष्क
D.
मेरुरज्जु
क्रियाएँ जैसे चलना, साईकिल चलाना, पेंसिल का उठाना, अनुमस्तिष्क द्वारा नियंत्रित होते हैं जो पश्च मस्तिष्क का भाग है।
A.
अन्तः स्त्रावी तंत्र
B.
मेरुरज्जु
C.
तंत्रिका तंत्र
D.
मस्तिष्क
शरीर के विभिन्न कार्यों के लिए नियंत्रण एवं समन्वय अन्तः स्त्रावी तंत्र के द्वारा किया जाता है, यह तंत्र विभिन्न क्रियाओं पर रासायनिक नियंत्रण डालता है। ये रसायन अंगों द्वारा स्त्रावित होते हैं जो अन्तः स्त्रावी ग्रंथियां कहलाती है ।
A.
प्रमस्तिष्क वल्कुट
B.
अग्रमस्तिष्क
C.
मध्य मस्तिष्क
D.
पश्च मस्तिष्क
यह स्वायत्त तंत्रिका तंत्र का कारी है जो अनेच्छिक क्रियाओं को नियंत्रित करता है और मस्तिष्क व मेरुरज्जु के बीच तंत्रिका संकेतों को संचारित करता है । मेड्यूला ओब्लोंगेटा जो पश्च मस्तिष्क में स्थित होता है शरीर के प्रमुख कार्यों को करने के लिए उत्तरदायी होता है जैसे श्वसन, रक्त दाब, हृदय दर, प्रतिवर्ती क्रिया और उल्टी।
A.
अनुक्रिया
B.
उद्दीपन
C.
अभिक्रिया
D.
प्रतिवर्त
पिन चुभोनाएक उद्दीपन कहलाता है, ये पर्यावरणीय कारक उद्दीपन कहलाते हैं वातावरणीय कारक जो विभिन्न प्रकार की अनुक्रियाएँ करते हैं उद्दीपन कहलाते हैं ।
मानव शरीर में मस्तिष्क एक तरल से भरे अस्थिल बॉक्स में और मेरुरज्जु कशेरुक दंड या मेरुदंड में सुरक्षित रहता है ।