A.
जाति
B.
समष्टि
C.
प्रतिव्यष्टि
D.
समुदाय
समष्टि विकास की एक इकाई है । एक समष्टि एक क्षेत्र विशेष में निवास करने वाली जाति विशिष्ट के जीवों का समूह है। प्राकृतिक चयन उस विशिष्ट क्षेत्र की समष्टि में उसके लाभदायक लक्षणों पर कार्य करता है ।
A.
38.
B.
40.
C.
42.
D.
44.
46 गुणसूत्रों में से, 44 कायिक गुणसूत्र हैं और एक जोड़ी लिंग गुणसूत्र होते हैं।
A.
IAIA , IAIO.
B.
IOIO , IA IA.
C.
IBIA , IOIO.
D.
IAIA, IOIB.
मानव में रक्त समूह के निर्धारण के लिए ABO रक्त समूह सहप्रभाविता का एक उदाहरण है। एक 'A' समूह वाले व्यक्ति के जीनप्ररूपी IA IA या IAIO है ।
A.
नया डार्विनवाद
B.
नव- डार्विनवाद
C.
नीयु - डार्विनवाद
D.
नोई डार्विनवाद
विकास की आधुनिक अवधारणा, डार्विन के प्राकृतिक चयन सिद्धान्त का रूपांतरित रूप है और नव डार्विनवाद कहलाता है। नव डार्विनवाद एक सिद्धान्त है जो मेंडेलियन आनुवंशिकी के साथ प्राकृतिक चयन द्वारा डार्विनियन विकास जा आधुनिक संश्लेषण है।
A.
3 : 1.
B.
1 : 2 : 1.
C.
9 : 3 : 3 : 1.
D.
2 : 5 : 4.
जनक AABbCC � AABbCC F1 पीढ़ी • AABBCC • AABbCC • AAbbCC जीनप्ररूपी अनुपात = 1 : 2 : 1
A.
24:48:24.
B.
28:56:28.
C.
24:56:24.
D.
28:48:28.
F2 पीढ़ी में मेंडेलियन अनुपात 1:2:1 होता है।
A.
3.6 x 106 वर्ष
B.
3.6 x 104 वर्ष
C.
4.5 x 109 वर्ष
D.
4.5 x 106 वर्ष
आधुनिक भूवैज्ञानिकों और भूभौतिकविदों के अनुसार पृथ्वी की आयु लगभग 4.5 बिलियन वर्ष (4.5 x 109 वर्ष) हो सकती है।
A.
हीमोफीलिया
B.
सइकिल सेल एनिमिया
C.
फेनिलकीटोन्यूरिया
D.
डाउन सिंड्रोम
21वें अतिरिक्त गुणसूत्र की उपस्थिति डाउन सिंड्रोम करता है इस गुणसूत्र की उपस्थिति बच्चे में मानसिक विकार कर देता है।
A.
प्रत्येक जीन के लिए अनेक एलिल्स
B.
प्रत्येक जीन के लिए दो एलिल्स
C.
प्रत्येक जीन के लिए एक एलिल
D.
एक जीन में तीन एलिल्स
अगुणित पादप अप्रभावी और प्रभावी दोनों प्रकार के एलिल्स या उत्परिवर्तन प्रकट करने में सक्षम होते हैं, क्यों की प्रत्येक जीन के लिए एक एलिल होता है फिर भी अगुणित जीवों में प्रत्येक जीन जो प्रभावी या अप्रभावी है, अपनी अभिव्यक्ति करता है।
A.
प्लाज़्मिड
B.
जीन्स
C.
क्रोमेटिन
D.
कोस्मिड
मेंडल का कारक अब जीन कहलाता है। जीन D N A की क्रियात्मक ईकाई है।
A.
पूर्ण डाटा का विश्लेषण
B.
भिन्न वंशागत लक्षणों का प्रेक्षण
C.
उसका जीवविज्ञान का ज्ञान
D.
एक बार में एक ही लक्षण पर ध्यान देना
उसके पूर्व अनुसंधानकर्ताओं जिन्होने लक्षणों की बड़ी संख्या पर एक साथ कार्य किया था, इसके विपरीत मेंडल ने एक बार में एक ही एकल लक्षण की अनेक पीढ़ियों तक वंशागति का अध्ययन किया।
A.
पैतृक गुणसूत्र X है (लड़की के लिए) या Y (लड़के के लिए)
B.
पैतृक गुणसूत्र Y है (लड़की के लिए) या X (लड़के के लिए)
C.
मातृ गुणसूत्र X है (लड़की के लिए) या Y (लड़के के लिए)
D.
मातृ गुणसूत्र Y है (लड़की के लिए) या X (लड़के के लिए)
मानव में नर में X Y गुणसूत्र और मादा में X X गुणसूत्र होते हैं।
A.
जीन विनिमय
B.
आनुवांशिक विचलन
C.
जंपिंग जीन
D.
स्थानांतरण
जनन के दौरान विभिन्नताओं की उत्पत्ति का कारण जीन विनिमय या लैंगिक जनन है। जीन विनिमय अर्धसूत्री विभाजन समजात गुणसूत्रों के बीच आनुवंशिक पदार्थ का आदान प्रदान है और आनुवांशिक विभिन्नता में योगदान देता है।
1. पौधों और जंतुओं दोनों के द्वारा श्वसन के एक उत्पाद के रूप में वातावरण में कार्बन डाइऑक्साइड की मुक्ति।
2.कार्बनिक कचरे और मृत जैव अंशों के अपघटकों द्वारा अपघटन।
3. कोयला और पेट्रोलियम जैसे जीवाश्मी ईंधन के दहन से।
a. DDT (डाइक्लोरो डाइफेनिल ट्राइक्लोरोएथेन)
b. यूनाइटेड नेशनल एनवायरमेंट प्रोग्राम
c. वर्षा जल संचयन प्राकृतिक स्रोत जैसे वर्षाजल से जल का संग्रहण करने और घरेलू उपयोग के साथ ही सिंचाई के उद्देश्य के लिए अपनायी जाने वाली एक विधि।
खाद्य श्रृखंला, प्राकृतिक रूप से जीवों के आहारों को व्यवस्थित क्रमबद्धविन्यास में श्रृंखला के रूप में लिखना।
परितंत्र में ऊर्जा प्रवाह - स्थलीय परितंत्र में हरे पौधे सूर्य के प्रकाश का 1 प्रतिशत भाग ही खाद्य ऊर्जा में परिवर्तित करते हैं जिसकी कुछ मात्रा का उपयोग पाचन, जैव क्रियाओं, वृद्धि एवं जनन में प्रयुक्त होता है हरे पौधों को प्राथमिक उपभोक्ता खाकर इस ऊर्जा का 10 प्रतिशत भाग ही जैव मात्रा में बदल पाते हैं। इस प्रकार प्रत्येक स्तर में कार्बनिक पदार्थों का औसतन 10 प्रतिशत भाग ही अगले स्तर तक पहुँचता है।
ऊर्जा का प्रवाह एकदिशीय होता है स्वयंपोषी जीवों द्वारा ग्रहण की गई ऊर्जा पुनः सौर ऊर्जा में परिवर्तित नहीं होती। और पौधे पोषक स्तर के बाद उपयोगी ऊर्जा की मात्रा बहुत कम हो जाती है।
i. गलत, नंदा देवी बायोस्फीयर रिजर्व उत्तराखंड राज्य के गढ़वाल में स्थित है।
ii. सही
iii. सही
iv. गलत, संकटग्रस्त प्रजातियाँ, जन्तु और पौधों की वह प्रजातियाँ हैं जो संख्या में बहुत कम है और संभावनायें है की वे भविष्य में विलुप्त हो सकती हैं।
v. सही
i. बायोस्फीयर रिजर्व
ii. पुनःवनीकरण
iii. बंगाल टाइगर
iv. चिपको आंदोलन
v. धुआँ + कोहरा = स्मोग
A.
अमृता देवी बिशनोई
B.
अरुंधति रॉय
C.
सुंदर लाल बहुगुणा
D.
सर आर्थर टेंसले
चिपको आंदोलनसुंदर लाल बहुगुणा द्वारा 1970 में प्रारम्भ किया गया ।
A.
क्षेत्र के समीप रहने वाले
B.
क्षेत्र से दूर रहने वाले
C.
दूसरे स्थान पर रहने वाले
D.
उस क्षेत्र में प्रवासित
जल संरक्षण प्रायक्षेत्र के समीप रहने वाले स्थानीय लोगों के लिए लाभदायक है ।
A.
उर्वर भूमि
B.
झील
C.
मरुस्थल
D.
पर्वत
मरुस्थल एक ऐसा स्थलीय भाग है जहां बहुत कम वर्षा होती है। मरुस्थल ऐसे क्षेत्र हैं जहां औसतन वर्षण 250 सेमी (10 इंच) से भी कम है या ऐसे क्षेत्र हैं जहां वर्षण से अधिक जल की क्षति हो जाती है ।
A.
स्थल भाग
B.
सीवेज
C.
जीवश्मी ईंधन
D.
पोषक तत्व
जीवश्मी ईंधन मृत पादपों और जंतुओं के अवशेष हैं जो दहन से ऊर्जा उपलब्ध कराते हैं जैसे कोयला, तेल, और प्राकृतिक गैस आदि ।
A.
बांधों का निर्माण
B.
जल में रसायनों का निपटान
C.
जल को साफ करना
D.
जल को ऊबालना
जल का संरक्षण वर्षा जल को वर्षा के दौरान,भूमिगत जल को पुनः आवेशित करने या बाद में उपयोग के लिए संग्रहित कर जमीन में संचित रखना है ।
A.
पटना
B.
हरिद्वार
C.
कानपुर
D.
बिजनोर
कानपुर में गंगा जल में अधिकतम कोलिफोर्म गणना (MPN 1400/500 मिली) है जो यहाँ के जल को अत्यधिक प्रदूषित और संक्रमित होने के कारण अनेक रोगों को कर सकता है ।
A.
शुष्क भूमि
B.
आर्द्र क्षेत्र
C.
जल क्षेत्र
D.
जलीय भूमि
आर्द्र क्षेत्रनिम्न क्षेत्र है जहां जमीन पानी से संतृप्त होती है ।
A.
सामाजिक वानिकी
B.
शहरी वानिकी
C.
ग्रामीण वानिकी
D.
कृषि वानिकी
एक ही भूमि को कृषि और वानिकी उपभोग दोनों के लिए काम में लेना कृषि वानिकी कहलाता है । इस तंत्र द्वारा परंपरागत कृषि और वन उत्पादन विधियाँ अपनाकर उत्पादन बढ़ाना व सामाजिक और आर्थिक आय में वृद्धि और पारिस्थितिक उत्पाद और सेवा उपलब्ध कराता है ।
A.
ग्रीन कैमिस्ट्रि
B.
ईफ्लुएंट्स
C.
उड़ता धुआँ
D.
जीवश्मी ईंधन
ईफ्लुएंट्सवाहित मल या ओद्योगिक तरल अपशिष्ट है जो की सीवेज उपचार संयत्रों, उद्योगों और सेप्टिक टेंकों से मुक्त होकर प्राकृतिक जल में मुक्त कर दिया जाता है ।
A.
वायरोजन
B.
लेंथोजन
C.
पैथोजन
D.
माइक्रोजन
पैथोजनजीव हैं प्राय बहुत छोटे या सूक्ष्मजीव जैसे बैक्टीरिया, कवक , प्रोटोजोआ, हेल्मिन्थ, वाइरस या वाईरोइड जो पोषी में रोग उत्पन्न करते हैं। ये डेंगू मलेरिया जैसे रोग करने के महत्वपूर्ण कारक हैं ।
A.
पुनः प्रचालित करना
B.
बचे रहना
C.
पुर्न उपयोग
D.
मना करना
ये तीनों R's पर्यावरण संरक्षण के मूलभूतआधार हैं ।
A.
30%.
B.
50%.
C.
60%.
D.
70%.
पृथ्वी का लगभग 70% क्षेत्र जल से घिरा होता है जबकि केवल 30% जमीन का बना होता है ।
A.
एक क्षेत्र में उपस्थित रासायनिक अपशिष्ट
B.
एक क्षेत्र में उपस्थित जीवाश्मी ईंधन
C.
एक क्षेत्र में उपस्थित जल
D.
एक क्षेत्र में उपस्थित पादप और जन्तु जीवन
बायोटाएक भौगोलिक क्षेत्र या समयांतराल पर जीवों का सम्पूर्ण संग्रह है ।
A.
कार्बन मोनो ऑक्साइड
B.
ऑक्सीज़न
C.
सल्फर डाई ऑक्साइड
D.
नाइट्रोजन
जब दहन अपर्याप्त वायु (ऑक्सीज़न) की अनुपस्थिति में होता है तो कार्बन डाई ऑक्साइड के स्थान पर कार्बन मोनो ऑक्साइड उत्पन्न होती है जो की उच्च सांद्रता में हानिकारक होती है और मौत का कारण भी बन सकती है ।
A.
उत्तर प्रदेश
B.
बिहार
C.
मध्य प्रदेश
D.
राजस्थान
आहर और पाइन प्राचीन जल संग्रहण की विधियाँ बिहार में पायी जाती हैंये कुछ जल संग्रहण तकनीकें स्थानीय होती हैं और केवल स्थान विशिष्ट को ही लाभ पहुँचती हैं ।
(a) बांधपानी के
संग्राहक और
विद्युत
ऊर्जा
उत्पन्न करने
के साथ
सिंचाई के
लिए जल
उपलब्ध
कराते हैं।
(b) इन्दिरा
गांधी नहर
परियोजना
(1) ईंधन
के पूर्ण दहन
के लिए
उपयुक्त
ईंजन का इस्तेमाल
करें।
(2) दैनिक
जीवन में
ऊर्जा के
संरक्षण के
लिए गैर नवीनीकरणीय
वैकल्पिक
स्त्रोतों का
उपयोग।
a. जीवाश्म ईंधन ऊर्जा समृद्ध ईंधन होते है, जो कार्बन के दहनशील रूप या लाखोंवर्षोंपहले पृथ्वीके अंदर दबे जैव द्रव्यमान के अपघटन द्वारा बने यौगिक होते है।
b. कोयला एक दहनशील काली या भूरी - काली तलछटी चट्टानहोतीहै जो मुख्य रूप से कार्बन तथा हाइड्रोकार्बन से मिलकर बनी होती है।
पवन ऊर्जा के उपयोग के दो लाभ इस प्रकार हैं-
� यह ऊर्जा का प्रदूषण रहित और ऊर्जा का पर्यावरण हितेषी स्त्रोत है।
� इस ऊर्जा की लागत भी कम होती है।
मृदा अपरदन: जल या हवा द्वारा मृदा की ऊपरी उर्वर परत को दूर ले जाना मृदा अपरदन कहलाता है।
मृदा अपरदननिम्न कारणों से होता है-
� वनोन्मूलन
� नदियों की बाढ़
� भारी वर्षा
वनोन्मूलन के दो कारण हैं:
� आवास, रेलवे लाइनों, सड़कों, इमारतों, शैक्षणिक संस्थानों, उद्योगों आदि के लिए भूमि की आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए।
� पर्यावरण संबंधी कारक जैसे बाढ़, तूफान और बर्फ।
� जैव निम्नीकरणीय एवं अजैव निम्नीकरणीय अपशिष्ट पदार्थो को अलग-अलग करके समाप्त करना ।
� ऐसा पदार्थ जिनका पुनः चक्रण किया जा सकता है उन्हें पुनः उपयोग करके कचरा कम किया जाता है ।
� 3) पेड़-पौधों, फल, सब्जियाँ के अपशिष्ट, जैव निम्नीकरणीय पदार्थों को भूमि में दबाकर उपयुक्त खाद बनाकर भी कचरे की मात्रा में कमी लाई जा सकती है ।
|
क्रमांक |
राष्ट्रीय पार्क |
राष्ट्रीय अभ्यारण्य |
|
1. |
इसका आकार प्रायः छोटी परास 100 से 500 वर्ग किमी तक होता है। |
इसका आकार परास 500 से 1000 वर्ग किमी तक होता है। |
|
2. |
इसकी सीमा निश्चित होती है। |
इसकी सीमा निश्चित नहीं है। |
|
3. |
इसका मुख्य उद्देश्य विशेष वन्यजीवों के लिए आवास उपलब्ध कराने का होता है। |
इसका मुख्य उद्देश्य सामान्य प्रजातियों के लिए आवास उपलब्ध कराने का होता है। |
जल प्रदूषण के स्त्रोत इस प्रकार हैं-
� उद्योगों से निकले अपशिष्टों मिलकर
� शहरों से निष्कासित सीवेज
� समुद्रों में जहाजों से मुक्त किया तेल
� अत्यधिक उर्वरकों का उपयोग
� अत्यधिक शाकनाशियों का उपयोग
� अत्यधिक पीड़कनाशियों या कीटनाशियों का उपयोग
संरक्षण की तीन उपाय इस प्रकार हैं-
� वनों, विशेषकर राष्ट्रीय उद्यानों और अभ्यारण्यों को सुरक्षित स्थान घोषित किया जाना चाहिए।
� वन महोत्सव की परम्परा अपनाकर नागरिकों को वृक्षारोपण कार्यक्रमों में भागीदारी के लिए प्रोत्साहित किया जाना चाहिए।
� सामाजिकवानिकीकेअंतर्गतरेलमार्गो, सड़कों, नहरों के किनारे बंजर भूमि, पंचायत भूमि पर जनसाधरण व समाज के लिए इमारती व जलाऊ लकड़ी, फल-चारे की पूर्ति हेतु बहुउद्देशीय वृक्ष लगाने चाहिए।
बाँधों के निर्माण से उत्पन्न समस्याएं निम्न लिखित हैं -
� बाँधों के निर्माण के लिए अत्यधिक जमीन की आवश्यकता के लिए कृषि भूमि से कृषकों को बेदखल कर दिया जाता है।
� वर्षाकाल में नदियों पर बाँध बनाकर रोका गया जल उन क्षेत्रों में बाढ़ का कारण भी बनता है।
� गर्मियों में पानी की कमी को झेलते क्षेत्रों में पानी की आपूर्ति न पहुँच पाने से क्षेत्रीय तनाव उत्पन्न होने का भी कारण बनते हैं।
� बाँधों का रूका पानी रोगवाहक कीटों, जीवाणुओं एवं परजीवियों का प्रजनन स्थल होता है।
� तटीय क्षेत्रों में हमेशा मिट्टी के कटाव की स्थिति बनी रहती है।
हम जल प्रदूषण को निम्नांकित तरीकों से नियंत्रित कर सकते हैं-
� जलाशयों में फेक्ट्रियों,उद्योगों से और सीवेज को उपचरित करके डालना चाहिए।
� खेतों में जैव उर्वरक, जैव कीटनाशी और जैव पीड़कनाशियों का उपयोग किया जाना चाहिए ताकि ये तालाबों को प्रदूषित न करें ।
� हानिकारक अपशिष्टों और चिकित्सीय अपशिष्टों को जलाशयों में डालने से बचें।
वृक्ष काष्ठिय वनस्पति, झाडि़यों का एक सघन जैविक समुदाय वन कहलाता है। वन जैव विविधता के विशिष्ट स्थल होते है वहाँ अनेक प्रकार की वनस्पति तथा वन्य जीव पाये जाते है। वनों एवं वन्य जीवों का संरक्षण करना आवश्यक है, क्योंकि वनों से हमारी सभी मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति होती है जो निम्न प्रकार हैः-
� वनों से मानव को अनेक प्रकार की वस्तुऐं जैसे ईंधन तथा इमारती लकड़ी, बाँस, बेंत, सेल्यूलोज, चारा, गोंद, रबर, सुपारी, लाख, सूखा कोयला, कत्था आदि प्राप्त होते हैं।
� वनों से प्राप्त जड़ी-बूटियों पर आधारित चिकित्सा पद्धतियों का आज भी प्रचलन है। इनमें ऐसे रसायनों का पता लगाया जाता है जो सामान्य रोगों से लेकर कैंसर जैसे भयावह रोगों के उपचार में भी कारगर सिद्ध होते हैं।
� वन कई उद्योगों जैसे कागज, दियासलाई, धागे, वस्त्र, रंजक, रबर इत्यादि के लिए कच्चा माल उपलब्ध करवाते हैं।
� जानवरों के लिए चरागाह व लोगों को रोजगार भी वनों से मिलता है।
� वन प्राकृतिक संतुलन बनाये रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं जो पर्यावरण की दृष्टि से पृथ्वी पर जीवन को बनाये रखने के लिए महत्वपूर्ण है।
1. अमृता देवी
2. ए. के. बेनर्जी
3. बायोस्फीयर
4. मध्य प्रदेश
5. कम उपयोग, पुनः चक्रण, पुनः उपयोग
| जल संरक्षण की परंपरागत विधियाँ | क्षेत्र जहां ये विधियाँ अपनायी जाती हैं |
| बंधिस | |
| तालाब | |
| एरिस | |
| कट्टा | |
| सुरंगम | |
| नाड़ी | |
| बंधारस | |
| पाइन | |
| कुल्ह | |
| खादिन |
|
जल संरक्षण की परंपरागत विधियाँ |
क्षेत्र जहां ये विधियाँ अपनायी जाती हैं |
|
बंधिस |
मध्य प्रदेश |
|
तालाब |
जम्मू |
|
एरिस |
तमिल नाडु |
|
कट्टा |
कर्नाटक |
|
सुरंगम |
केरल |
|
नाड़ी |
राजस्थान |
|
बंधारस |
महाराष्ट्र |
|
पाइन |
बिहार |
|
कुल्ह |
हिमाचल प्रदेश |
|
खादिन |
राजस्थान |
हमें ज्ञात है कि: HCF (a, b) × LCM (a, b) = a × b ⇒ 30 × 1 = x × 6 ⇒ x = 5
का दशमलव व्यंजक है
A.
0.04128
B.
0.004128
C.
0.0004128
D.
0.00004128
A.
B.
C.
D.
556920 = 2 x 2 x 2 x 3 x 3 x 5 x 7 x 13 x 17 = 23 x 32 x 5 x 7 x 13 x 17
A.
5 x 112 x 23
B.
5 x 11 x 232
C.
52 x 11 x 23
D.
5 x 11 x 23
13915 = 5 x 11 x 11 x 23 =5 x 112 x 23
A.
11
B.
12
C.
13
D.
21
42 = 2 x 21
स्मोग जल वाष्प और धूल के साथ अधजले कार्बन कण, हाइड्रोकार्बन के निलंबित कणों का एक संयोजन है। जो वायुमण्डल की दृश्यता को बाधित करता है।
मृत एवं क्षयित होते पदार्थों को खाद्य के रूप में लेकर पर्यावरण को साफ करते हैं।
शाकाहारी
जैव निम्नीकरण पदार्थ अपघटित होकर दुर्गन्ध उत्पन्न करते हैं, जिससे वातावरण प्रदूषित होता है एवं हैजा व टी.बी जैसी अनेक बीमारियों का कारण बनते हैं।
CO2
क्लोरोफ्लोरोकार्बन
खाद्य श्रृंखला के माध्यम से प्रत्येक पोषक स्तर के साथ सान्द्रण होने से अंतिम पोषक स्तर में अत्यधिक मात्रा में एकत्रण होकर इसे अत्यधिक प्रभावित करना जैव आवर्धन कहलाता है।
यूट्रोफिकेशन (सुपोषण)
रेड बुक डाटा
प्रोजेक्ट टाइगर
एक खाद्य श्रृंखला पोषण प्राप्त करने के लिए एक जैविक तंत्र में कौन किसको खाता है को प्रदर्शित करने का एक अनुक्रम है, तथा अनेक खाद्य श्रृंखलाओं का एक नेटवर्क खाद्य जाल कहलाता है ।
हमारे चारों ओर स्थित सभी सजीव, तत्व, कारक और दशाएँ जो एक जीव की वृद्धि को प्रभावित करती हैं, पर्यावरण कहलाती है।
सूक्ष्मजीवों को प्राकृतिक सफाई कर्मी कहते हैं क्यों की ये जैव अपघटनीय अपशिष्टों को सरल पदार्थों में परिवर्तित कर देते हैं।
जीवमंडल के जैविक घटक − जीव-जंतु, पेड़-पौधे
जीवमंडल के अजैविक घटक - वायु, जल और मिट्टी।
शेष ऊर्जा अनेक गतिविधियों में काम आती है-
1. पाचन
2. वृद्धि और जनन
3. उपापचयी क्रियाओं में
4. गति
सुपोषण जलाशयों में अतिरिक्त पोषक तत्वों को मिलाने के परिणामतः शैवालों की वृद्धि से जल में घुली ऑक्सीज़न की कमी हो जाना सुपोषण कहलाता है।
a. ऊपरी वायुमंडल में UV विकिरणें कुछ आण्विक ऑक्सीजन (O2) को मुक्त ऑक्सीजन परमाणुओं के रूप में विभाजित कर देती है। ये परमाणु आण्विक ऑक्सीजन के साथ मिल कर ओज़ोन (O3) का निर्माण करते है।
b.सूर्य के प्रकाश में पराबैंगनी विकिरणें होती है जो मनुष्यों के लिए हानिकारक होती है क्यों कि ये त्वचा कैंसर, प्रतिरक्षा तंत्र में क्षति और मोतियाबिंद भी कर सकती है। ये पौधों में प्रकाश संश्लेषण को भी कम कर देती है। ओज़ोन परत पृथ्वी पर जीवन के लिए आवश्यक है क्योंकि यह हानिकारक पराबैंगनी किरणों को पृथ्वी पर आने से रोकती है और इस प्रकार हमें UV विकिरणों के हानिकारक प्रभावों से बचाती है।
c.क्लोरोफ्लोरोकार्बन यौगिकों (CFCs) ओजोन परत के अपक्षय के लिए उत्तरदायी है। CFCs प्रशीतक और अग्निशामक यंत्र में काम आने वाले कृत्रिम रसायन है।

a.तीन प्रक्रम जिनके द्वारा ऑक्सीजन वातावरण से काम में ली जाती है और पुनः वातावरण में लौटा दी जाती है क्रमशः-
• दहन
• श्वसन
• नाइट्रोजन के आक्साइडों के निर्माण
b.हवाओं को प्रभावित करने वाले कारक
• पृथ्वी का घूर्णन
• हवाओं के मार्ग में पर्वत श्रृंखलाओं उपस्थिति
c.दिन के दौरान, हवा की दिशा समुद्र से जमीन की ओर होती है। रात में, भूमि और समुद्र दोनों ठंडा होना प्रारम्भ कर देते हैं। चूंकि पानी, जमीन की तुलना में धीमे ठंडा होता है, अतः पानी के ऊपर की हवा, जमीन के ऊपर की हवा की अपेक्षा अधिक गर्म हो जाती है। इस प्रकार रात में हवाएं जमीन से समुद्र की ओर बहती हैं।
a.जल में भौतिक, जैविक या रासायनिक किसी भी प्रकार के परिवर्तन जिससे उसमें रहने वाले जीवों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़े और उसे उपयोग के अयोग्य बना दे, जल का प्रदूषित होना कहलाता है।
b.ग्रीन हाउस प्रभाव के कारण, ग्लोबल वार्मिंग में वृद्धि पृथ्वी के तापमान में को बड़ा देगी जो भविष्य में ध्रुवों की बर्फ भी पिघला देता है और महासागरों के जल स्तर में वृद्धि समुद्रस्तरीय स्थानों के लिए खतरा बन सकता है।
c.'ह्यूमस' मिट्टी के जैविक घटक हैं जो पौधे और जन्तु पदार्थों के पूर्ण या आंशिक अपघटन द्वारा बनते हैं।
Bb x Bb
मेण्डल के प्रभाविता के नियम के अनुसार, एक विपर्यासी लक्षणों के लिए शुद्ध दो जनकों में संकरण कराने पर, अगली पीढ़ी में केवल एक ही लक्षण प्रकट होगा।

यह दर्शाता है कि लंबाई के लिए उत्तरदायी कारक (T), बौनेपन के कारक (t) पर प्रभावी है ।
अवशेषी अंग - जीवों में अनेक ऐसी रचनाएँ भी पायी जाती हैं जो शरीर केलिए अनावश्यक हैं। ये अंग अवशेषी अंग कहलाते हैं। इनकी उपस्थिति से प्रमाणित होता है कि ये अंग कभी न कभी इन जन्तुओं के पूर्वजों में क्रियाशील थे और उनके लिए उपयोगी थे। बदलते पर्यावरण में इनका उपयोग धीरे धीरे कम होता गया और ये आकार में छोटे व निष्क्रिय होते गये। इस प्रकार अवशेषी अंग इन जीवों का सम्बन्ध उन पूर्वजों से स्थापित करते हैं जिनमें ये अंग सक्रिय और पूर्ण विकसित थे।
गुणसूत्रों के दो कार्य इसप्रकार हैं :
a. इसमें जीन होते हैं जो सूचना वाहक होते हैं व जनक और युग्मनज के बीच की कड़ी होते हैं ।
b. ये उपापचय, कोशिका विभेदन और प्रोटीन संश्लेषण को विनियमित करने में सहायता करते हैं ।
1. कृमिरूपी परिशेषिका - खरगोश, गाय, भैंस, आदि शाकाहारी स्तनधारियों में सेलुलोस के पाचन के लिए वृहदांत्र के अन्धनाल या सीकम के सिरे पर कृमिरूप परिशेषिका नामक रचना होती है किन्तु मनुष्य में कृमिरूप परिशेषिका एक अवशेषी अंग के रूप में पायी जाती है।
2. निमेषक पटल − जल मेंरहने वाले जीवों में पानी में देख पाने के लिए पायी जाने वाली निमेषक झिल्ली मनुष्य में नेत्र के भीतरी किनारे पर लाल रंग की एक अर्द्ध चन्द्राकार झिल्ली के रूप में होती है। यह एक अवशेषी अंग है ।
जाति उद्भव: पूर्वज जातियों से नई जाति की उत्पत्ति जाति उद्भव कहलाती है। किसी एक जाति के अपने पूर्व आवास को छोड़कर अन्यंत्र पलायन कर जाने से भौगोलिक दशाओं में परिवर्तन के कारण जननिक विभिन्नताओं का उत्पन्न होना उद्विकास का कारण बनता है।
सभी कशेरुकीयों में उनकी भ्रूणीय अवस्था में गिल्स, पूंछ और मेरुरज्जु की उपस्थित होते हैं। लक्षणों में यह समानता प्रमाणित करती है की सभी कशेरुकीयों के पूर्वजों समान रहे होंगे।
a. समवृत्ति अंग: ये वह अंग हैं जिनका कार्य समान होता है लेकिन उनकी मूलभूत संरचना और मूल में अंतर होता है।
समजात अंग: ये वह अंग हैं जिसकी मूलभूत संरचना समान है, लेकिन कार्य अलग-अलग अंग हैं।
b. कीट के पंख और चमगादड़ के पंख समवृत्ति अंग है।
मेंढक के अग्रपाद और मानव के अग्रपाद समजात अंग है।
c. उपार्जित लक्षण उस प्रकार के लक्षणों में परिवर्तन है जो अजननक्षम ऊतकों में होते हैं। जीन में कोई परिवर्तन नहीं होता है, इसलिए उपार्जित लक्षण वंशागत नहीं होते हैं जिसके परिणामस्वरूप अगली पीढ़ी में कोई परिवर्तन नहीं होता।
a. पाइसम सेटाइवम
b. DNA प्रतियाँ जो सटीक नहीं है वो नई विभिन्नतायें, उत्परिवर्तन को उत्पन्न करते हैं, जो प्रजनन के दौरान संतति में स्थानांतरित होती हैं।
c. एक गुणसूत्र DNA अणु से बने क्रोमेटिन तंतुओं का संघनित रूप है।
a. डार्विन ने विकास का विचार प्रस्तावित किया था लेकिन माता-पिता से वंशजों में विशेषताओं के संचरण की व्याख्या नहीं कर सका, जबकि मेण्डल ने अपने आनुवांशिकता के सिद्धान्त को वंशागति के नियमों द्वारा समझाया।
b. प्राकृतिक वरण 2. जीन विचलन
c. X − संलग्न वंशागति का प्रारूप।
a. इनमें या तो 47 गुणसूत्र होते हैं या 46 गुणसूत्रों में से एक बड़े आकार का होता है ।
b. गुण या विशेषताऐं Y- गुणसूत्र द्वारा नियंत्रित होती हैं, जो नर-लिंग को निधारित करता है इसलिए यह रोग स्त्रियों में नहीं पाया जाता है।
c. कायिक उत्परिवर्तन
प्रसिद्ध वैज्ञानिक ह्यूगो डी.व्रीज ने उत्परिवर्तनवाद का का सिद्धान्त दिया जिसके अनुसार-
1. नयी जातियों की उत्पत्ति एक ही बार में स्पष्ट एवं स्थायी आकस्मिक परिवर्तन (एक्स, रेडियोधर्मी, अल्ट्रावॉयलेट किरणें, कॉस्मिक किरणों के कारण) फलस्वरूप हुआ।
2. जाति का प्रथम सदस्य जिसमें उत्परिवर्तन होता है शुद्ध किस्म होता है।
3. उत्परिवर्तन अनिश्चित होते हैं, ये किसी एक अंग या एक से अधिक अंगों में हो सकते हैं जैसे- हार्मोन्स का प्रभाव ।
4. सभी जीवों में उत्परिवर्तन की प्राकृतिक प्रवृत्ति, युग्मक जनन के दौरान और गुणसूत्र द्विगुणन या अर्द्धसूत्रण में त्रुटियों के कारण होती है।
5. जातियों के विभिन्न सदस्यों में भिन्न-भिन्न प्रकार के उत्परिवर्तन उनके शरीर की भीतरी दशायें, रासायनिक प्रतिक्रियाएं, शारीरिक ताप के कारण हो सकते हैं।
1. सिकिल सेल एनीमिया
2. उत्परिवर्तन
3. चार्ल्स डार्विन
मिलर का प्रयोगः- स्टेनले मिलर ने 1953 में जीवन की उत्पत्ति को प्रयोग द्वारा सिद्ध करने के लिए निम्नानुसार प्रयोगिक व्यवस्था की, एक फ्लाक्स में स्थित अमोनिया, मीथेन CO, CO2 N2 गैसों के मिश्रण में निरन्तर जल वाष्प पहुँचाकर, दो इलेक्ट्रोडों द्वारा एक सप्ताह तक विद्युत प्रवाहित की। प्रयोग के अंत में जो गाढ़े रंग का द्रव प्राप्त हुआ उसमें कई प्रकार के अमीनो अम्ल थे, जिनसे प्रोटीन का निर्माण होता है जैसे- ग्लाइसीन, ऐलेनीन, एस्पार्टिक अम्ल, ग्लूटेमिक अम्ल आदि।

1. सही
2. सही
3. गलत, एक जीव का आनुवंशिक संगठन जीन प्ररूपी कहलाता है।
4. गलत, प्रथम पीढ़ी में प्रकट होने वाले लक्षण प्रभावी होते हैं।
5. सही
A.
पार्ट्स पर मिनट
B.
पार्ट्स पर मिलिमीटर
C.
पार्ट्स पर मेटर
D.
पार्ट्स पर मिलियन
PPM का पूरा नाम पार्ट्स पर मिलियन है यह मापी गई मात्रा में तुलनात्मक अनुपात को प्रदर्शित करता है।
A.
पाचन तंत्र
B.
तंत्रिका तंत्र
C.
उत्सर्जी तंत्र
D.
परिसंचरण तंत्र
धातु कण जैसे सीसा, पारा आदि वातावरण को प्रदूषित करके, मानव के तंत्रिका तंत्र को प्रभावित करते हैं।
A.
प्लास्टिक
B.
पेपर
C.
कपड़े
D.
काष्ठ
प्लास्टिक वह अपशिष्ट है जो दूसरे सजीवों द्वारा अपघटित नहीं हो सकता, यह अजैव अपघटनीय कहलाते हैं।
A.
तालाब
B.
महासागर
C.
जलजीवशाला
D.
मुहाना
प्राकृतिक स्वच्छ जलीय पारिस्थितिक तंत्र में झीलें, तालाब, नदियां, झरने, और जलीय क्षेत्र शामिल हैं।
A.
मिट्टी
B.
तापमान
C.
प्रकाश
D.
सतही ढलान
स्थलाकृतिक पृथ्वी की सतह के आकार और कारकों का अध्ययन है। स्थलाकृतिक कारकों में ऊंचाई सतही ढलान और समतल शामिल है।
A.
वनों में पेड़ काटकर
B.
उद्योगों को बढ़ाकर
C.
जीवाश्मी ईंधन का उपयोग घटाकर
D.
जीवाश्मी ईंधन का उपयोग बढ़ाकर
जीवाश्मी ईंधन का उपयोग घटाकर ग्लोबल वार्मिंग को रोका जा सकता है यह वायु में मुक्त कार्बन ड़ाई ऑक्साइड और कार्बन मोनो ऑक्साइड को घाटा देगा।
A.
वायु प्रदूषण
B.
ध्वनि प्रदूषण
C.
जल प्रदूषण
D.
भूमि प्रदूषण
तेज ध्वनि में देर तक रहने से बहरापन हो सकता है।
A.
IUCN.
B.
WHO.
C.
NAS
A.
D.
DBT.
WHO (विश्व स्वास्थ्य संगठन) ने ठोस अपशिष्ट को गलत स्थान पर डाले गए पदार्थ कहा जो की तरल और गैसीय नहीं है और पड़े हुए स्थान के लिए लंबे समय तक उपयोगी नहीं रहता।
A.
क्रिया में अधिक परास में
B.
क्रिया विशिष्ट होते हैं
C.
सभी स्थानों पर पाये जाते हैं
D.
प्लास्टिक के विघटन के लिए जीवों द्वारा काम में लिए जाते हैं
एंजाइम सजीवों द्वारा उत्पन्न प्रोटीन अणु हैं जो दूसरे पदार्थों की रासायनिक अभिक्रिया को उन अभिक्रियाओं के पूरा होने पर बिना नष्ट या परिवर्तित हुये उत्प्रेरित करते हैं।
A.
60 km ऊंचाई पर
B.
68 km ऊंचाई पर
C.
70 km ऊंचाई पर
D.
71 km ऊंचाई पर
ओज़ोन पृथ्वी के ऊपर स्थित वायुमंडल में 60 केएम ऊंचाई पर पायी जाती है । यह समतापमंडल का भाग है।
A.
1983 में
B.
1985 में
C.
1987 में
D.
1989 में
1987 में यूनाइटेड नेशन्स ऑफ एनवायरमेंट प्रोग्राम (UNEP) ने CFC के उत्पादन को फ्रीज़ करने के लिए एक समझौते का निर्माण किया जो की ओजोने परत की क्षति को नियंत्रित करने के लिए था।
A.
जल
B.
सूर्य का प्रकाश
C.
हरितलवक
D.
CO2.