A. यूरोप
B. अमेरिका
C. ऑस्ट्रेलिया
D. एशिया
प्रशीतित जहाजों के विकास से जल्दी खराब होने वाले खाद्य पदार्थों को लंबी दूरी पर ले जाया जा सकता था। अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया या न्यूजीलैंड में पशु भोजन के लिए काटे जाते थे और फिर जमे हुए मांस के रूप में यूरोप जाते थे।
A. नूडल
B. पिज्जा
C. चोपसुएय
D. चावफेन
व्यापार ने केवल माल के परिवहन में मदद नहीं की बल्कि विभिन्न खाद्य वस्तुओं और दुनिया के विभिन्न भागों में सब्जियों के प्रसार में भी मदद की।
A. 1929- 1930 के दशक
B. 1929-1940 के दशक
C. 1929- 1950 के दशक
D. 1929- 1960 के दशक
महामंदीके दौरान दुनिया भर में आर्थिक मंदी छाई रही । यह 1929 में शुरू हुई और 1939 के अंत तक चली ।
A. 1780
B. 1790
C. 1880
D. 1900
अफ्रीका में 1880 के दशक में रिंडरपेस्ट या मवेशियों की महामारी से लोगों की आजीविका पर भयानक प्रभाव पड़ा ।यह एक उधारण है कि यूरोपीय उपनिवेशवाद से ओपनिवेशिक समाज पर क्या असर पड़ा था।
A. न्यूयॉर्क
B. प्रिटोरिया
C. एल डोराडो
D. न्यू जर्सी
एल डोराडो के बारे में कहानी मशहूर हो गई थी कि वहां का आदिवासी मुख्या अपने आप को सोने की धूल से ढक लेता है और फिर झील के साफ़ पानी में छलांग लगा लेता है।
A. वास्को डी गामा
B. क्रिस्टोफर कोलंबस
C. फा हयान
D. अमेरिको वस्पुच्ची
क्रिस्टोफर कोलंबस ने १४९२ में अमेरिका की खोज की थी।
A. ऑस्ट्रेलिया
B. न्यूजीलैंड
C. अमेरिका
D. अफ्रीका
कोलंबस ने 1492 में अमेरिका की खोज की, एशिया और यूरोप में इन खाद्य पदार्थों की शुरूआत हुई।
A. जर्मनी
B. चीन
C. स्पेन
D. सिसिली
सिसिली इटली में एक द्वीप है।
A. एक राजनीतिक प्रणाली
B. एक सामाजिक व्यवस्था
C. एक आर्थिक प्रणाली
D. एक सांस्कृतिक प्रणाली
वैश्वीकरण एक ऐसी प्रक्रिया है जिसके माध्यम से क्षेत्रीय और राष्ट्रीय अर्थव्यवस्थाओं के व्यापार, निवेश, पूंजी प्रवाह और आबादी के पलायन के माध्यम से अंतरराष्ट्रीय अर्थव्यवस्था में एकीकृत हो रहे है।
A. समुद्री रास्तो की खोज
B. लोहा
C. भाप इंजन
D. अमेरिका
एशिया तक के समुद्री रास्ते की खोज तब हुई जब यूरोपीय नाविकों ने सफलता पूर्वक अटलांटिक को पर कर लिया। हिन्द महासागर व्यापर के लिए जाना जाता था। समुद्री रास्ते की खोज ने यूरोप को भारत के सीधे संपर्क में ला दिया।
A. कोलंबिया और साओ गबीले
B. हवाई और अलास्का
C. पनामा और सैन फ्रांसिस्को
D. पेरू और मेक्सिको
जैसे ही कीमती धातुएं इन इलाक़ों में पाई गईं, यूरोपियों की भीड़ इन इलाक़ों में उमड़ पड़ी। इन इलाक़ों की मूल संस्कृति को यूरोपियों ने नष्ट कर दिया जैसे कि मेक्सिको के एजटेक्स और पेरू के इन्का की संस्कृतियां नष्ट हो गईं।
A. मलेरिया
B. प्लेग
C. निमोनिया बुखार
D. चेचक
ऐसा इस लिए कहा जाता था क्योंकि उपनिवेशवादियों को नई खोज की गई भूमि के निवासियों से लड़ना नहीं पड़ा, चेचक ने उन्हें मार डाला।
A. आयरलैंड
B. स्कॉटलैंड
C. फिनलैंड
D. ब्रिटेन
रोग से आलू की फसल का विनाश हुआ। आयरलैंड में अकाल का सर्वाधिक प्रभाव गरीब लोगों पर हुआ जो आलू पर निर्भर थे। यह अनुमान लगाया गया था कि आयरलैंड के चारों ओर 10,00,000 लोग इस अकाल में मर गये थे।
A.
B.
C.
D.
मुंबई में पहली कपास की मिल 1854 वर्ष में स्थापित हुई थी तथा इसमें दो वर्ष पश्चात उत्पादन का कार्य आरम्भ हो गया था।
A.
अमेरिका
B.
ब्रिटेन
C.
चीन
D.
जापान
ब्रिटिश शासन काल में भारत में उत्पादित अफीम मुख्य रूप से चीन में निर्यात होती थी और वे इंग्लैंड के लिए चीन से चाय आयात करवाते थे।
A.
बम्बई
B.
बंगाल
C.
मद्रास
D.
कानपुर
एल्गिन मिल की स्थापना कानपुर में 1860 में हुई थी।
A.
आधुनिक काल
B.
औद्योगीकरण की अवधि
C.
औद्योगीकरण के बाद का समय
D.
औद्योगीकरण से पहले का समय
आदि-औद्योगिकरण का अर्थ है औद्योगीकरण से पहले का समय। जिस काल में उत्पादन फ़ैक्ट्रियों में नहीं होता था उस समय को इतिहासकार आदि-औद्योगिकरण कहते हैं।
A.
द्वारकानाथ टैगोर
B.
दिनशॉ पेटिट
C.
जमशेदजी नुसरवानजी टाटा
D.
सेठ हुकुमचंद
सेठ हुकुमचन्द एक मारवाड़ी व्यापारी थे जिन्होंने पहली भारतीय जूट मिल की स्थापना 1917 में कलकत्ता में की थी।
A.
हाथ से बने उत्पादित चीज़ बहुत सस्ती थीं
B.
मशीन द्वारा उत्पादित माल महंगा था
C.
हाथों से बनी चीज़ों को परिष्कार एवं सुरुचि का प्रतिकार माना जाता था
D.
इस तरह की चीज़ों के उत्पादन से निम्न वर्ग के लोगों को रोजगार मिलता था
विक्टोरिया कालीन ब्रिटेन में, उच्च वर्गों के लोग हाथ से उत्पादित चीजों को प्राथमिकता देते थे क्योंकि हाथों से बनी चीज़ों को परिष्कार एवं सुरुचि का प्रतिकार माना जाता था। वे हाथों से उत्पादित सामान की कदर करते थे।
A.
मुद्रा दर में बदलाव के कारण
B.
देशांतरण दुगना होने कारण
C.
शहर में निर्माण के कार्य तेजी से होने के कारण
D.
श्रमिकों की संख्या में वृद्धि के कारण
1840 के बाद ब्रिटेन में रोजगार की स्थिति में सुधार शहर/नगरों में निर्माण के कार्य तेजी से होने के कारण हुआ था। निर्माण के कार्यों में विकास से रोजगार में वृद्धि आयी थी।
फ्लाई शटल : इस मशीन का आविष्कार जॉन के द्वारा किया गया था। फ्लाई शटल के आविष्कार के साथ बड़े करघे का संचालन और अधिक कपड़े की बुनाई संभव हो गई।यह रस्सियों और पुलियों के जरिए चलने वाला एक यांत्रिक औजार है जिसका बुनाई के लिए इस्तेमाल किया जाता है।
औद्योगिक क्रांति का अभिप्राय 18 वीं सदी के उत्तरार्द्ध और 19 वीं सदी के पूर्वार्द्ध में प्रमुख, तकनीकी, सामाजिक-आर्थिक और सांस्कृतिक परिवर्तन से है। यह कृषि प्रधान, हस्तकला अर्थव्यवस्था का, उद्योग और मशीन निर्माण पर वर्चस्व रखने वाली व्यवस्था में प्रतिस्थापित होने का एक परिणाम था।
श्रमिकों की आय निर्धारित करने वाले अनेक कारक थे:
1. उन्नीसवीं सदी के पूर्वार्द्ध में उद्योग में मांग की वजह से श्रमिकों की मजदूरी में थोड़ी सी वृद्धि हुई थी ।
2. रोजगार की अवधि संकटमय थी; काम के दिनों की संख्या श्रमिकों की औसत दैनिक आय का निर्धारण करती थी ।
1. व्यापार-श्रेणियाँ उत्पादकों के संघ थे जो कारीगरों और कुशल श्रमिकों को प्रशिक्षित करते थे।
2. वे उत्पादन पर नियंत्रण बनाए रखते थे, प्रतिस्पर्धा और कीमतों को विनियमित करते थे और व्यापार में नए लोगों के प्रवेश को प्रतिबंधित करते थे।
1764 में इस मशीन का आविष्कार हारग्रीव्स द्वारा किया गया था। इस मशीन से कताई का काम तेजी से होने लगा और श्रम की मांग कम हो गई । महिला कार्यकर्ताओं द्वारा इस पर हमला किया गया था:
द्वारकानाथ टैगोर बंगाल के एक उद्योगपति थे उन्होनें चीन के साथ व्यापार में खूब पैसा कमाया और वे उद्योगों में निवेश करने लगे। 1830 के दशक में उन्होंने संयुक्त उद्यम कम्पनियां लगा ली थीं और उन्होंने जहाजरानी, जहाज निर्माण, खनन, बैंकिंग, बागान और बीमा क्षेत्र में निवेश किया था। टैगोर उस समय उन उद्योगपतियों मे से एक थे जिनका निवेश में घाटा हुआ था।
भारत में औपनिवेशिक काल के दौरान, यूरोपीय प्रबंध एजेंसियों, ने मुख्यतः चाय, कॉफी के बागान लगाए और खनन, नील व जूट व्यवसाय के क्षेत्र में निवेश किया था।
औपनिवेशिक काल के दौरान, यूरोपीय प्रबंध एजेंसियों, ने मुख्यतः बागानों, खनन और जूट के क्षेत्र में निवेश किया था क्योंकि उनके उत्पादों का भारी मांग को पूरा करने के लिए वैश्विक बाजार मे निर्यात किया जाता था।
प्रथम विश्व युद्ध के अंत के बाद, कारण ब्रिटिश अर्थव्यवस्था के ध्वस्त हो जाने पर इंग्लैंड के मैनचेस्टर उद्योग भारतीय बाजार में अपनी पूर्व प्रभावपूर्ण स्थिति को प्राप्त करने में असमर्थ थे।
आविष्कारित 321 भाप इंजनों में से 80 कपास उद्योग में, नौ ऊन उद्योग में और शेष खनन, नहर और लौह कार्य में संलग्न थे।
बीसवीं सदी के दौरान हस्तशिल्प उद्योग, विशेष रूप से हथकरघा उद्योग का नए और सस्ते प्रौद्योगिकीय नवाचारों के उपयोग के माध्यम से अस्तित्व में बना रहा एवं उत्पादन का विस्तार हुआ। हालांकि, बुनकर जो गरीबों के लिए मोटा कपड़ा बनाते थे प्रतियोगिता में मारे गए खासतौर पर अकाल के समय जब गरीबों के पास कुछ खाने अथवा खरीदने के लिए कुछ भी नहीं होता था। हालांकि, अकाल उत्कृष्ट बनारसी साड़ी, मद्रास लुंगी आदि, के उत्पादन को प्रभावित नहीं कर सका था।
अ)बीसवीं शताब्दी के दौरान, भारत में हथकरघा बुनकर गरीबी में जीवनयापन करते थे। वे कठोर जीवन जीते थे और अधिक घंटों के लिए काम करते थे।
ब) अक्सर, बुनकर उत्पादन प्रक्रिया के विभिन्न सौपानों में काम करने के लिए अपने समुर्ण परिवार को संलग्न कर देते थे।
स) हालांकि, इस अवधि के दौरान, बुनकरों का जीवन और श्रम औद्योगीकरण की प्रक्रिया का अभिन्न अंग था।
क) राष्ट्रवादी आंदोलन के दौरान देश में राष्ट्रवाद की भावना को बढ़ावा देने के लिए भारतीय उद्योगपतियों द्वारा विज्ञापनों का इस्तेमाल किया गया था।
ख) उन्होने अपने माल की बिक्री में वृद्धि के द्वारा अपने बाजार का विस्तार करने के लिए राष्ट्रवादी संदेशों का विज्ञापन दिया ।
ग)इस प्रकार राष्ट्रवादी विज्ञापन स्वदेशी राष्ट्रवाद के संदेश के प्रसार वाहक बन गए।
आधुनिक काल से पहले के युग में दुनिया के दूर-दूर स्थित भागों के बीच व्यापारिक और सांस्कृतिक संपर्कों का सबसे जीवंत उदाहरण सिल्क मार्गों के रूप में दिखाई देता है। ‘सिल्क मार्ग’ नाम से पता चलता है कि इस मार्ग से पश्चिम को भेजे जाने वाले चीनी रेशम (सिल्क)का कितना महत्त्व था। इतिहासकारों ने बहुत सारे सिल्क मार्गों के बारे में बताया है। जमीन या समुद्र से होकर गुजरने वाले ये रास्ते न केवल एशिया के विशाल क्षेत्रों को एक-दूसरे से जोड़ने का काम करते थे बल्कि एशिया को यूरोप और उत्तरी अफ्रीका से भी जोड़ते थे। ऐसे मार्ग ईसा पूर्व के समय में ही सामने आ चुके थे और लगभग पंद्रहवीं शताब्दी तक अस्तित्व में थे। सिल्क मार्ग ने सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक विकास का नेतृत्व किया।
1) पूर्वी भारत में उपजा बोद्ध धर्म सिल्क मार्ग की विविध शाखाओं से ही कई दिशाओं में फैल चुका था।
2)इसी रास्ते से चीनी पॉटरी जाती थी और इसी रास्ते से भारत व दक्षिण-पूर्व एशिया के कपड़े व मसाले दुनिया के दूसरे भागों में पहुँचते थे। वापसी में सोने-चाँदी जैसी कीमती धातुएँ यूरोप से एशिया पहुँचती थीं।
अ पूर्व आधुनिक विश्व में दूर देशों के बीच सांस्कृतिक संपर्क के रूप में भोजन के दो उदाहरण दीजिये।
ब यूरोप में आलू, सोया और टमाटर जैसे खाद्य पदार्थ कब शुरू किए गए थे?
अ)खाद्य पदार्थ दूर देशों के बीच सांस्कृतिक आदान-प्रदान के कई उदाहरण पेश करते हैं। जब भी व्यापारी और मुसाफिर किसी नए देश में जाते थे, जाने-अनजाने वहाँ नयी फसलों के बीज बो आते थे। संभव है कि दुनिया के विभिन्न भागों में मिलने वाले ‘झटपट तैयार होने वाले’ (रेडी)खाद्य पदार्थों के भी साझा स्त्रोत रहे हों।माना जाता है कि नूडल्स चीन से पश्चिम में पहुँचे और वहाँ उन्हीं से स्पैघेत्ती का जन्म हुआ, या संभव है कि पास्ता अरब यात्रियों के साथ पाँचवीं सदी में सिसली पहुँचा जो अब इटली का ही एक टापू है।
ब) आलू, सोया, मूँगफली, मक्का, टमाटर, मिर्च, शकरकंद और ऐसे ही बहुत सारे दूसरे खाद्य पदार्थ लगभग पाँच सौ साल पहले हमारे पूर्वजों के पास नहीं थे। ये खाद्य पदार्थ यूरोप और एशिया में तब पहुँचे जब क्रिस्टोफर कोलंबस गलती से उन अज्ञात महाद्वीपों में पहुँच गया था जिन्हें बाद में अमेरिका के नाम से जाना जाने लगा। दरअसल, हमारे बहुत सारे खाद्य पदार्थ अमेरिका के मूल निवासियों यानी अमेरिकन इंडियनों से हमारे पास आए हैं। इनमें से कईं खाद्य पदार्थों का परिवहन किया गया और यूरोप में उन्हें बेचा गया इसलिए, वहां के लोग बेहतर भोजन खाने लगे।
इस युद्ध ने मौत और विनाश की जैसी विभिषिका रची उसकी औद्योगिक युग से पहले और औद्योगिक शक्ति के बिना कल्पना नहीं की जा सकती थी। युद्ध में 90 लाख से ज्यादा लोग मारे गए और 2 करोड़ घायल हुए। मृतकों और घायलों में से ज्यादातर कामकाजी उम्र के लोग थे। इस महाविनाश के कारण यूरोप में कामकाज के लायक लोगों की संख्या बहुत कम रह गई। परिवार के सदस्य घट जाने से युद्ध के बाद परिवारों की आय भी गिर गई। युद्ध संबंधी सामग्री का उत्पादन करने के लिए उद्योगों का पुनर्गठन किया गया। युद्ध की जरूरतों के मद्देनजर पूरे के पूरे समाजों को बदल दिया गया। मर्द मोर्चे पर जाने लगे तो उन कामों को सँभालने के लिए घर की औरतों को बाहर आना पड़ा जिन्हें अब तक केवल मर्दों का ही काम माना जाता था।
बीसवीं सदी की शुरुआत तक वैश्विक अर्थव्यवस्था बहुत एकीकृत हो चुकी थी। दुनिया के एक हिस्से में पैदा होने वाले संकट का अन्य भागों पर भी प्रभाव पड़ता था। औपनिवेशिक भारत कृषि वस्तुओं का निर्यातक और तैयार मालों का आयातक बन चुका था अतः महामंदी ने भारतीय व्यापार को फौरन प्रभावित किया।
1.1928 से 1934 के बीच देश के आयात-निर्यात घट कर लगभग आधे रह गए थे। जब अंतर्राष्ट्रीय बाजार में कीमतें गिरने लगीं तो यहाँ भी कीमतें नीचे आ गईं। 1928 से 1934 के बीच भारत में गेहूँ की कीमत 50 प्रतिशत गिर गई।
2.शहरी निवासियों के मुक़ाबले किसानों और काश्तकारों को ज्यादा नुकसान हुआ। यद्यपि कृषि उत्पादों की कीमत तेजी से नीचे गिरी लेकिन सरकार ने लगान वसूली में छूट देने से साफ इनकार कर दिया। सबसे बुरी मार उन काश्तकारों पर पड़ी जो विश्व बाजार के लिए उपज पैदा करते थे।
3.बंगाल के जूट/पटसन उत्पादकों कच्चा पटसन उगाते थे जिससे कारखानों में टाट की बोरियाँ बनाई जाती थीं। जब टाट का निर्यात बंद हो गया तो कच्चे पटसन की कीमतों में 60 प्रतिशत से भी ज्यादा गिरावट आ गई।
4.पूरे देश में काश्तकार पहले से भी ज्यादा कर्ज में डूब गए। खर्चे पूरे करने के चक्कर में उनकी बचत खत्म हो चुकी थी, जमीन सूदखोरों के पास गिरवी पड़ी थी, घर में जो भी गहने-जेवर थे बिक चुके थे।
5.मंदी शहरी भारत के लिए इतनी दुखदाई नहीं रही। कीमतें गिरते जाने के बावजूद शहरों में रहने वाले ऐसे लोगों की हालत ठीक रही जिनकी आय निश्चित थी।
इस महामंदी के कई कारण थे:
पहला कारण यह था कि कृषि क्षेत्र में अति उत्पादन की समस्या बनी हुई थी। कृषि उत्पादों की गिरती कीमतों के कारण स्थिति और खराब हो गई थी। कीमतें गिरीं और किसानों की आय घटने लगी तो आमदनी बढ़ाने के लिए किसान उत्पादन बढ़ाने का प्रयास करने लगे ताकि कम कीमत पर ही सही लेकिन ज्यादा माल पैदा करके वे अपना आय स्तर बनाए रख सकें। फलस्वरूप, बाजार में कृषि उत्पादों की आमद और भी बढ़ गई। जाहिर है, कीमतें और नीचे चली गईं। खरीदारों के अभाव में कृषि उपज पड़ी-पड़ी सड़ने लगी।
दूसरा कारण: 1920 के दशक के मध्य में बहुत सारे देशों ने अमेरिका से कर्जे लेकर अपनी निवेश संबंधी जरूरतों को पूरा किया था। जब हालात अच्छे थे तो अमेरिका से कर्जा जुटाना बहुत आसान था लेकिन संकट का संकेत मिलते ही अमेरिकी उद्यमियों के होश उड़ गए। 1928 के पहले छह माह तक विदेशों में अमेरिका का कर्जा एक अरब डॉलर था। साल भर के भीतर यह कर्जा घटकर केवल चौथाई रह गया था। जो देश अमेरिकी कर्जे पर सबसे ज्यादा निर्भर थे उनके सामने गहरा संकट आ खड़ा हुआ।
युद्ध के बाद आर्थिक स्थिति को पटरी पर लाने में काफी बाधाएँ थे:
1.युद्ध से पहले ब्रिटेन दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था था।युद्ध के बाद सबसे लंबा संकट उसे ही झेलना पड़ा। जिस समय ब्रिटेन युद्ध से जूझ रहा था उसी समय भारत और जापान में उद्योग विकसित होने लगे थे। युद्ध के बाद भारतीय बाजार में पहले वाली वर्चस्वशाली स्थिति प्राप्त करना और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर जापान से मुक़ाबला करना ब्रिटेन के लिए बहुत मुश्किल हो गया था।
2.युद्ध के कारण आर्थिक उछाह का माहौल पैदा हो गया था क्योंकि माँग, उत्पादन और रोजगारों में भारी इजाफा हुआ था।
3. बहुत सारी कृषि आधारित अर्थव्यवस्थाएँ भी संकट में थीं। युद्ध से पहले पूर्वी यूरोप विश्व बाजार में गेहूँ की आपूर्ति करने वाला एक बड़ा केंद्र था। युद्ध के दौरान यह आपूर्ति अस्त-व्यस्त हुई तो गेहूँ की पैदावार अचानक बढ़ने लगी।
4. लेकिन जैसे ही युद्ध समाप्त हुआ पूर्वी यूरोप में गेहूँ की पैदावार सुधरने लगी और विश्व बाजारों में गेहूँ की अति के हालात पैदा हो गए। अनाज की कीमतें गिर गईं, ग्रामीण आय कम हो गई और किसान गहरे कर्ज संकट में फँस गए।
एक नयी अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक प्रणाली (न्यू इंटरनेशनल इकोनोमिक ऑर्डर- एन.आई.ई.ओ.) इस संगठन में सतहत्तर(77) संस्थापक सदस्य देश (जी-77) के रूप में संगठित हो गए। लेकिन इसके बाद अब तक संगठन में एक सौ तीस सदस्य देशों को सदस्यता प्राप्त हो चुकी है । जी -77 देशों के मुख्य उद्देश्य इस प्रकार थे:
1.एक ऐसी व्यवस्था से था जिसमें उन्हें अपने संसाधनों पर सही मायनों में नियंत्रण मिल सके,
2.जिसमें उन्हें विकास के लिए अधिक सहायता मिले,
3.कच्चे माल के सही दाम मिलें,
4.और अपने तैयार मालों को विकसित देशों के बाजारों में बेचने के लिए बेहतर पहुँच मिले।
A.
न्यूकॉमेन
B.
जेम्स वॉट
C.
रोजर थोमसन
D.
विल थोर्न
मैथ्यू बुल्टन नामक उद्योगपति जेम्स वॉट के करीबी दोस्त थे। जेम्स वाट ने न्यूकॉमेन के भाप इंजन में सुधार किया था। इस माडॅल का उत्पादन उनके दोस्त मैथ्यू बुल्टन ने किया था।
A.
B.
C.
D.
1873 तक, बिट्रने के लौहा और स्टील निर्यात का मूल्य 7.7 करोड़ पौंड था। यह राशि इंग्लैंड के कपास निर्यात के मूल्य से दोगुनी थी।
A.
कपास एवं धातुओं
B.
कपास एवं खनन
C.
कृषि एवं खनन
D.
तेल तथा जूट
औद्योगिक क्रांति के दौरान ब्रिटेन में तक सबसे गतिशील उद्योग कपास एवं धातुओं के थे।
A.
5
B.
C.
D.
1760 में ब्रिटेन अपने कपास उद्योग की ज़रूरतों को पूरा करने के लिए 25 लाख पौंड कच्चे कपास का आयात करता था।1787 में यह आयात बढ़कर 220 लाख पौंड तक पहुँच गया था। यह इज़ाफा उत्पादन की प्रक्रिया में बहुत सारे बदलाव का परिणाम था।
A.
मैथ्यू बूल्टन
B.
हर्ग्रीव्ज़
C.
न्यूकॉमेन
D.
विलियम बैल स्कोट
जेम्स वॉट ने न्यूकॉमेन द्वारा बनाए गए भाप के इंजन में सुधार किए और 1871 में नए इजंन का पेटेंट करा लिया।
A.
कपास
B.
जूट
C.
ऊन
D.
कागज़
इसका इस्तेमाल ऊन उद्योग में शुरू किया गया था। स्पिनिंग जेनी को जेम्स हरग्रीव्ज़ द्वारा बनाया गया था।
A.
जेम्स एगस्तस
B.
थॉमस एल्वा एडिसन
C.
आइनस्टाइन
D.
जेम्स हरग्रीव्ज़
स्पिनिंग जेनी को जेम्स हरग्रीव्ज़ ने1764 में बनाया था । इस मशीन ने कताई की प्रक्रिया तेज़ कर दी और मज़दूरों की माँग घटा दी थी। एक ही पहिया घुमाने वाला एक मज़दूर बहुत सारी तकलियों को घुमा देता था और एक साथ कई धागे बनने लगते थे।
A.
बुनकरों के प्रमुख
B.
मंडली के प्रमुख
C.
वेतनभोगी कर्मचारी
D.
कर संग्राहक
कंपनी में बुनकरों पर निगरानी रखने, माल इकट्ठा करने और कपड़ों की गुणवत्ता जाँचने के लिए वेतनभोगी कर्मचारी तैनात कर दिए थे जिन्हें गुमाश्ता कहा जाता था।
A.
यूरोपीय देश
B.
अमेरिकी देश
C.
अफ्रीकी देश
D.
एशियाई देश
भमूध्य सागर के पर्वू में स्थित देश प्राच्य इलाक़े कहलाते हैं। आमतौर पर यह शब्द एशिया के लिए इस्तमेाल किया जाता है। पश्चिमी नज़रिए में प्राच्य इलाके पूर्व-आधुनिक, पारपंरिक आरै रहस्यमय थे।
A.
B.
C.
D.
1912 में जे.एन.टाटा ने जमशेदपुर में भारत पहली लौह एवं इस्पात संयंत्र की स्थापना की थी। भारत में लौह एवं इस्पात उद्योग कपड़ा उद्योग के काफी बाद शुरू हुआ था। औपनिवेशिक भारत में औद्योगिक मशीनरी, रेलवे और लोकोमोटिव का ज्यादातर आयात ही किया जाता था। इसलिए स्वतंत्रता मिलने तक भारी उद्योग कोई खास आगे नहीं बढ़ सकता था।
A.
हुगली
B.
सूरत
C.
बम्बई
D.
मच्छलीपटनम
सूरत का बंदरगाह लाल सागर और खाड़ी के बंदरगाहों से जुड़ा है। ये गुजरात में स्थित है यह मध्य-पूर्वी एशिया में व्यापार के लिए सुगम समुद्री-मार्ग था।
A.
कोंकण तट
B.
मालाबार तट
C.
कोरोमंडल तट
D.
उत्तर-पूर्वी तट
समुद्री मार्ग अंतरराष्ट्रीय व्यापार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। कई बंदरगाह दक्षिण भारत के लंबे समुद्र तट पर स्थित हैं तथा मछलीपटनम बंदरगाह दक्षिण-पूर्वी स्थित कोरोमंडल तट पर है।
A.
B.
C.
D.
1874 में मद्रास में पहली कताई और बुनाई की मिल आरम्भ हुई थी। जो मिलें भारतीय महानगरों में स्थापित हुई थीं वे इस प्रकार हैं: मुंबई में 1854 में, बंगाल में 1862 में तथा 1860 में कानपुर में हुई थीं।
A. जेम्स विद्स्लय।
B. जॉन विनतहोरप
C. अल्फ्रेड क्रोस्बेय।
D. एम्.डब्लू. रिडले
अपनी पुस्तक में, अल्फ्रेड क्रोस्बेय का तर्क है कि दुनिया के शीतोष्ण क्षेत्रों के मूल निवासी यानीउत्तरी अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड के लोगों के विस्थापनमें केवल उनके बेहतर हथियारों का हाथ नहीं था बल्कि यूरोप के पौधे और जानवर भी एक कारण थे जो आक्रमणकारी अपने साथ लाये थे ।
A. जॉन विनतहोरप
B. जेम्स विंडसले
C. अल्फ्रेड ईद्भॉसबी
D. एम्.डब्लू.रिडले
विनतहोरप पहला व्यक्ति था जिसने मई 1634 में 'चेचक' को उपनिवेशवादियों के लिए भगवान के एक वरदान के रूप में वर्णन किया था।
A. स्थिर विनिमय दर
B. एनएसवाई विनिमय दर
C. बीएसई विनिमय दर
D. राष्ट्रीय विनिमय दर
नियत विनिमय दर प्रणाली में, राष्ट्रीय मुद्राएँ जैसे भारतीय रूपया डॉलर के मुकाबले एक नियत विनिमय दर पर आँका जाता है।
A. विकासशील देशों
B. विकसित और विकासशील देशों की एक संयुक्त परिषद
C. पश्चिमी औद्योगिक शक्तियों द्वारा
D. अविकसित देशों द्वारा
इन संस्थानों में निर्णय पश्चिमी औद्योगिक शक्तियों द्वारा लिए जाते हैं। अमेरिका अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष और विश्व बैंक के फैसलों पर वीटो का एक प्रभावी अधिकार रखता है।
A. यूरोप
B. दक्षिण अमेरिका
C. ऑस्ट्रेलिया
D. चीन
व्यापारी और यात्री जिस नए इलाक़े में गए वहां नई फसलों की शुरुआत की, इस कारण यूरोप के ग़रीबों ने बेहतर खाना शुरू कर दिया और उनकी आयु भी लंबी हुई ।
भारत में रेलवे की शुरूआत 1853 AD में हुई।
असंतुष्ट:जो स्थापित विश्वासों और तरीकों को नहीं मानता।
1845 से 1849 के बीच पड़े भयानक आयरिश आलू अकाल के दौरान आयरलैंड के लगभग 10,00,000 लोग भुखमरी के कारण मारे गए थे और इससे दोगुने लोग काम की तलाश में घर-बार छोड़ कर दूसरे इलाकों में चले गए थे।
एल डोराडो को सोने का शहर कहा जाने लगा और 17वीं शताब्दी में उसकी खोज में बहुत सारे खोजी अभियान शुरू किए गए।
मंदी के दिनों में भारत कीमती धातु विशेष रूप से सोने का निर्यातक, बन गया था।
जब मशीन जैसे कि कार के विभिन्न भागों का निर्माण विभिन्न स्थानों पर होता था, लेकिन इन पुर्जो को एक ही स्थान पर जोड़ा जाता है, इस प्रणाली को असेम्बली लाइन कहा जाता है।
आर्थिक महामंदी की शुरुआत 1929 से हुई और यह संकट तीस के दशक के मध्य तक बना रहा। इस दौरान दुनिया के ज़्यादातर हिस्सों के उत्पादन, रोजगार, आय और व्यापार में भयानक गिरावट दर्ज की गई जिससे विश्व अर्थव्यवस्था चरमरा गई।
निषेधाधिकार(वीटो): इस अधिकार के सहारे एक ही सदस्य की असहमति किसी भी प्रस्ताव को खारिज करने का आधार बन जाती है।
ब्रेटन वुड्स प्रणाली स्थिर विनिमय दर पर आधारित थी
युद्धोत्तर काल में पुनर्निर्माण का काम दो बड़े प्रभावों के साये में आगे बढ़ा। पश्चिमी विश्व में अमेरिका एक वर्चस्वशाली ताकत बन चुका था। दूसरी ओर सोवियत संघ भी एक वर्चस्वशाली शक्ति के रूप में सामने आया।
अंतर्राष्ट्रीय व्यापार की सुविधा के लिए विभिन्न देशों की राष्ट्रीय मुद्राओं को एक-दूसरे से जोड़ा जाता है।मोटे तौर पर विनिमय दर दो प्रकार की होती हैं: स्थिर विनिमय दर और परिवर्तनशील विनिमय दर।
सोलहवीं सदी में जब यूरोपीय जहाजियों ने एशिया तक का समुद्री रास्ता ढूँढ़ लिया और वे पश्चिमी सागर को पार करते हुए अमेरिका तक जा पहुँचे तो
पूर्व-आधुनिक विश्व बहुत छोटा सा दिखाई देने लगा था। और इस सुगमता से ऐसा प्रतीत हुआ कि सोलहवीं सदी में दुनिया ‘सिकुड़ने’ लगी थी।
उन्नीसवीं सदी तक यूरोप में गरीबी और भूख का ही साम्राज्य था। शहरों में
बेहिसाब भीड़ थी और बीमारियों का बोलबाला था। धार्मिक टकराव आम थे।
धार्मिक असंतुष्टों को कड़ा दंड दिया जाता था। इस वजह से हजारों लोग
यूरोप से भागकर अमेरिका जाने लगे।
युद्ध के कारण दुनिया की कुछ सबसे शक्तिशाली आर्थिक ताकतों के बीच आर्थिक संबंध टूट गए। अब वे देश एक-दूसरे से बदला लेने पर उतारू थे। इस युद्ध के लिए ब्रिटेन को अमेरिकी बैंकों और अमेरिकी जनता से भारी कर्जा लेना पड़ा। फलस्वरूप, इस युद्ध ने अमेरिका को कर्जदार की बजाय कर्जदाता देश बना दिया। कहने का आशय यह है कि युद्ध के बाद दूसरे देशों में अमेरिका व उसके नागरिकों की संपत्तियों की कीमत अमेरिका में दूसरे देशों की सरकारों या उन नागरिकों के स्वामित्व अथवा नियंत्रण वाली संपदाओं से कहीं ज्यादा हो चुकी थी।
भारतीय व्यापार पर औपनिवेशिक नियंत्रण कड़ा होने के परिणामस्वरूप-
1. भारतीय व्यावसायियों के लिए कार्यात्मक गतिविधियों के लिए स्थान अत्यधिक संकीर्ण हो गया ।
2.उन्हें अपना तैयार माल यूरोप में बेचने से रोक दिया गया। अब वे मुख्य रूप से कच्चे माल और अनाज-कच्ची कपास, अफीम, गेहूँ और नील-का ही निर्यात कर सकते थे जिनकी अंग्रेजों को जरूरत थी।
3.धीरे-धीरे उन्हें जहाजरानी व्यवसाय से भी बाहर धकेल दिया गया।
1. भारत में प्राचीन बंदरगाह कहां स्थित थे और अंग्रेजों के आगमन उपरांत विकसित होने वाले नए बन्दरगाहों के नाम बताइये।1.अंग्रेजों के आगमन से पूर्व पश्चिम मे गुजरात के तट पर स्थित सूरत, दक्षिण में कोरोमंडल तट पर मछलीपटनम और पूर्व में बंगाल में हुगली जैसे प्रमुख व्यापारिक बंदरगाहों का संचालन किया जाता था। पश्चिम में बंबई (नवी मुंबई)एवं पूर्व में बंगाल में कलकत्ता नए विकसित बन्दरगाह थे।
2.यूरोपीय कंपनियों ने धीरे-धीरे अपनी ताकत बढ़ा ली थी। यह अभिवृद्धि उन्होंने 18 वीं शताब्दी के मध्य तक स्थानीय दरबारों से कई तरह की रियायतें प्राप्त कर की थी और उसके बाद उन्होंने शासकों से व्यापार पर एकाधिकार प्राप्त कर लिया। इससे पुराने बंदरगाह कमजोर पड़ गए। और 18 वीं और 19वीं शताब्दी में बंबई एवं कलकत्ता जैसे नए बन्दरगाहों का विकास हुआ।
1. इंग्लैंड में पहली कपास मिल की स्थापना किसने की थी ?
2. मिल के ढाँचे में सबसे महत्वपूर्ण परिवर्तन क्या हुआ था ? (1+ 2 = 3)
1. इंग्लैंड में पहली कपास मिल की स्थापना रिचर्ड आर्कराईट द्वारा की गई थी ।
2. मिल के भीतर का ढांचा ग्रामीण इलाकों की तुलना में पूरी तरह से अलग था। अब मिल में महंगी नई मशीनों का क्रय, उनकी स्थापना एवं रख-रखाव किया जा सकता था। सूती वस्त्र के निर्माण के लिए आवश्यक सभी प्रक्रियाएँ जैसे कि धुनाई, घुमाई एवं कताई, और बेलना एक छत और प्रबंधन के अंतर्गत आ गई थी। इससे उत्पादन की प्रक्रिया का और अधिक सावधानीपूर्वक पर्यवेक्षण, गुणवत्ता पर ध्यान, एवं श्रम का नियमन होने लगा। यह सब ग्रामीण इलाकों में संभव नहीं था जहां सर्वत्र वस्त्र-उत्पादन का प्रसार था और ग्रामीण घरों के भीतर यह कार्य किया जाता था।
विश्व व्यापार के विस्तार के साथ वस्तुओं की मांग में वृद्धि आरम्भ हो गई। शहरी शिल्प और व्यापार श्रेणियाँ शक्तिशाली थे। जिसके परिणाम स्वरूप व्यापारी उनकी इच्छा के अनुसार उत्पादन प्राप्त करने में सक्षम नहीं थे। अतएव उन्होंने गांवों की ओर रूख किया।
यहां किसानों और दस्तकारों ने निम्नलिखित कारणों की वजह से उनके लिए काम करने के लिए तैयार हो गए:
1.इस समय के दौरान खुले क्षेत्र लुप्त होना आरम्भ हो गए थे ।
2.कुटिया में रहने वाले एवं निर्धन किसान जो अपने अस्तित्व के लिए पूर्व में सार्वजनिक भूमि पर निर्भर थे, उनको अपने आय के वैकल्पिक स्रोत की ओर देखना पड़ा।
3.कईयों के पास भूमि के छोटे भूखंड थे जो घर के सभी सदस्यों को कार्य प्रदान नहीं कर सकते थे।
अतः जब व्यापारियों ने माल का उत्पादन करने के लिए किसानों को अग्रिम राशि का भुगतान किया तो किसानों ने उत्सुकता के साथ अपनी उत्सुकता व्यक्त की। इस तरह से वे अपने ग्रामीण क्षेत्र में रह सकते थे और आय के अतिरिक्त स्रोत के साथ उनके छोटे भूखंडों पर कृषि करना जारी रख सकते थे।
1.बीसवीं सदी के पूर्वार्द्ध में स्वदेशी आंदोलन ने भारतीय जनता को राष्ट्रवादी भावना उत्पन्न कर जुटाया।
2.इसके परिणामस्वरूप उन्होंने विदेशी कपड़ों जिनका ब्रिटेन से भारत में आयात किया जाता था, का बहिष्कार किया।
4. इसके बाद चीन भेजे जाने वाले भारतीय धागे के निर्यात में भी कमी आने लगी थी।
5.इसके परिणामस्वरूप , भारत के उद्योगपति धागे की बजाय कपड़ा बनाने लगे।
1 ऊपर दिए गए दोनों चित्रों की पहचान कीजिये।
2 किस प्रयोजन के लिए इस तरह के चित्रों का इस्तेमाल किया जाता था ?1.पहली तस्वीर कई भारतीय देवी-देवताओं- कार्तिक, लक्ष्मी और सरस्वती की एक छवि है। दूसरी छवि पंजाब के पूर्व शासक महाराजा रणजीत सिंह की है।
2.कपड़े के बंडलों पर इन तस्वीरों पर लेबल के रूप में किया जाता था। लेबल का फायदा यह होता था कि खरीदारों को कंपनी का नाम व उत्पादन की जगह पता चल जाती थी। लेबल ही चीजों की गुणवत्ता का प्रतीक भी था।
3.देवी-देवताओं की तसवीर के बहाने निर्माता ये दिखाने की कोशिश करते थे कि ईश्वर भी चाहता है कि लोग उस चीज़ को खरीदें। तसवीरों का फायदा ये होता था कि विदेशों में बनी वस्तुएँ भी भारतीयों को जानी-पहचानी सी लगती थी।
1.उन्नीसवीं सदी के आखिर में जब भारतीय व्यवसायी उद्योग लगाने लगे तो उन्होंने भारतीय बाजार में इंग्लैंड के मैनचेस्टर की बनी वस्तुओं से प्रतिस्पर्धा नहीं की।
2.इसके स्थान पर उन्होंने उनकी सूती मिलों में कपड़े की बजाय मोटे सूती धागे ही बनाए जिनका भारत के हथकरघा बुनकर इस्तेमाल करते थे अथवा उन्हें चीन को निर्यात कर दिया जाता था।
3.बीसवीं सदी के पहले दशक में स्वदेशी आंदोलन के परिणामस्वरूप भारतीय जनता राष्ट्रवादी लहर से प्रेरित थे परिणामस्वरूप उन्होंने विदेशी कपड़ों का बहिष्कार किया।
4. इसके बाद चीन भेजे जाने वाले भारतीय धागे के निर्यात में भी कमी आने लगी थी।
5.इसके परिणामस्वरूप , भारत के उद्योगपति धागे की बजाय कपड़ा बनाने लगे।
1.औपनिवेशिक काल के दौरान ब्रिटेन में निर्मित कपड़ों पर ‘मेड इन मैनचेस्टर’ का लेबल लगाया जाता था जिसे खरीददार का वस्त्र की गुणवत्ता में विश्वास उत्पन्न करने के लिए भारत में बेचा जाता था।
2.लोगों को ब्रिटिश उत्पाद खरीदने हेतु प्रेरित करने के लिए भारतीय देवी-देवताओं की तसवीरें भी प्रायः प्रयोग में ली जाती थीं क्योंकि सामान्य व्यक्ति भारतीय देवी-देवताओं के प्रति आकर्षित रहता था।
3.उत्पादों को बेचने के लिए कैलेंडर के उपयोग को लोकप्रियता प्राप्त हुई क्योंकि ये आम व्यक्ति की भाषा का प्रतिनिधित्व करते थे, कैलेंडर उनको भी समझ में आ जाते थे जो पढ़ नहीं सकते थे।
4.घरों एवं कार्यस्थल पर जैसे कि दुकानों, दफ्तरों में ये विज्ञापन लटके रहते थे। जिन्हें हर रोज, पढ़ा जा सकता था। उत्पादों को बेचने के लिए इन कैलेंडरों में देवताओं की तसवीर का भी प्रयोग किया जाता था।
5. देवताओं की तसवीरों की तरह महत्त्वपूर्ण व्यक्तियों, सम्राटों व नवाबों की तस्वीरें भी विज्ञापनों व कैलेंडरों में खूब इस्तेमाल होती थीं। इनका संदेश अकसर यह होता था: अगर आप इस शाही व्यक्ति का सम्मान करते हैं तो इस उत्पाद का भी सम्मान करेंगे।
6.खरीदी गई वस्तुओं को इस तरह अच्छी गुणवत्ता का माना जाता था क्योंकि शाही व्यक्तियों द्वारा इनका इस्तेमाल किया जाता था।
विश्व व्यापार के विस्तार के साथ वस्तुओं की माँग बढ़ने लगी थी। शहरी दस्तकारी और व्यापारिक गिल्ड्स काफी ताकतवर थे। फलस्वरूप, नए व्यापारी शहरों में कारोबार नहीं कर सकते थे। इसलिए वे गाँवों की तरफ जाने लगे। गाँवों में गरीब काश्तकार और दस्तकार सौदागरों के लिए काम करने लगे जिसके निम्नलिखित कारण थे:
1.यह एक ऐसा समय था जब खुले खेत खत्म होते जा रहे थे।
2. छोटे किसान(कॉटेज़र) और गरीब किसान जो पहले अपनी आजीविका के लिए साझा जमीनों पर निर्भर करते थे, वे अब आमदनी के नए स्त्रोत ढूंढ रहे थे।
3.बहुतों के पास छोटे-मोटे खेत तो थे लेकिन उनसे घर के सारे लोगों का पेट नहीं भर
सकता था।
इसीलिए, जब सौदागर वहाँ आए और उन्होंने माल पैदा करने के लिए पेशगी रकम दी तो किसान फौरन तैयार हो गए। इससे वे अपने गाँव में ही रहकर सौदागरों के लिए काम करते हुए आय के अतिरिक्त स्त्रोत के साथ अपने छोटे-छोटे खेतों को भी सँभाल सकते थे।
निम्न कारणों से प्रथम विश्व युद्ध के दौरान भारत में औद्योगिक उत्पादन में वृद्धि हुई थी:
आपूर्ति सौदागर अकसर बुनकर गाँवों में ही रहते थे और बुनकरों से उनके नजदीकी ताल्लुकात होते थे।
नए गुमाश्ता प्रवासी थे जिनके गांव के साथ कोई दीर्घकालिक सामाजिक संबंध स्थापित नहीं हुए थे। बुनकरों और गुमाश्तों मे टकराव निम्न कारणों से हुआ था:
1.उन्हें कंपनी से जो कीमत मिलती थी वह बहुत कम थी पर वे कर्जों की वजह से कंपनी से बँधे हुए थे।
2.अब बुनकर न तो दाम पर मोलभाव कर सकते थे और नही किसी और को माल बेच सकते थे।
3. वे दंभपूर्ण व्यवहार करते थे, सिपाहियों व चपरासियों को लेकर आते थे और माल समय पर तैयार न होने की स्थिति में बुनकरों को सजा देते थे।
4.सजा के तौर पर बुनकरों को अकसर पीटा जाता था और कोड़े बरसाए जाते थे।
1. औद्योगिक क्रांति से इंग्लैंड आवश्यकता से अधिक माल का उत्पादन करने में सक्षम हो गया था। इसलिए भारतीय बाजारों में इंग्लैंड के मशीन-निर्मित माल की बाढ़ आ गयी थी।औद्योगिक क्रांति ने भारतीय कारीगरों और दस्तकारों से उनका काम छीनकर उन्हें बेरोजगार कर दिया । इसके परिणाम के रूप में भारतीय लघु उद्योग बर्बाद हो गए।
2. भारत में ब्रिटिश सरकार ने भारतीय किसानों को ब्रिटिश कारखानों को सस्ती दरों पर अपना कच्चा माल बेचने के लिए विवश कर दिया।
3. बेरोजगार कारीगर खेतिहर श्रमिक बन गए और भारतीय कृषि पर बोझ बढ़ गया।
4. इंग्लैंड में भारतीय धन का निकास हो रहा था और उसके संसाधनों का शोषण किया जा रहा था। इस सभी तत्वों ने भारतीय अर्थव्यवस्था पर प्रतिकूल प्रभाव डाला।
A. बीबी फातिमा
B. पंडिता रामुबाई
C. कुमार देवी
D. रशसुन्दरी देबी
रशसुन्दरी देबी ने पहली बार नारी जीवन औरउसकी भावनाओं पर ध्यान केन्द्रित करने के लिए‘आमार जीबन’नामक आत्मकथा1876 में लिखी थी।
A. 1810
B. 1813
C. 1816
D. 1817
‘रामचरितमानस’16 वीं सदी में तुलसीदास द्वारा लिखितएक हिंदू शास्त्र और काव्य है।जिसे पहली बार कलकत्ता में1810में मुद्रितकिया गया था।
A. गुजरात
B. मद्रास
C. मध्य प्रदेश
D. महाराष्ट्र
20वीं सदी में, बी.आर. अम्बेडकर, जो दलित समुदाय के महान नेता थे,ने जाति व्यवस्था के खिलाफ महाराष्ट्र में लिखा था।इन्होंने अपनी पूरी जिन्दगी सामाजिक बुराइयों को दूर करने में समर्पित कर दी थी।
A. जयदेव
B. जयगोंडा
C. क्ल्हाना
D. वाल्मीकि
यह 12 वीं सदी का काम है जिसे जयदेव ने लिखा था। इस पाण्डुलिपि में श्रीकृष्ण, राधा और वृन्दावन की गोपियों के बीच विशेष संबंध का वर्णन है।
युद्धोत्तर अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक व्यवस्था का मुख्य उद्देश्य यह था कि औद्योगिक विश्व में आर्थिक स्थिरता एवं पूर्ण रोजगार बनाए रखा जाए। इस फ्रेमवर्क पर जुलाई 1944 में अमेरिका स्थित न्यू हैम्पशर के ब्रेटन वुड्स नामक स्थान पर संयुक्त राष्ट्र मौद्रिक एवं वित्तीय सम्मेलन में सहमति बनी थी।
न्यू इंग्लैंड स्थित मैसाचुसेट्स बे कॉलोनी के पहले गवर्नर जॉन विनथॉर्प ने मई 1634 में लिखा था कि छोटी चेचक उपनिवेशकारों के लिए ईश्वर का वरदान है: ‘... देशी जनता ... छोटी चेचक के कारण लगभग पूरी खत्म हो चुकी थी। इस तरह परमेश्वर ने हमारी मिल्कीयत पर हमें मालिकाना दे दिया।’
वैश्वीकरण एक सतत प्रक्रिया है जिसका अर्थ है :
1. देश से और देश में वस्तुओं के मुक्त प्रवाह की अनुमति के दृष्टिकोण के साथ व्यापार बाधाओं को दूर करना। यह विदेश व्यापार पर से व्यावहारिक रूप से सभी बाधाओं और प्रतिबंध को हटा देता है।
2. प्रवाहकीय वातावरण एवं प्रस्तावों के सहज अनुमोदन को सुनिश्चित कर निवेश के संदर्भ में पूंजी का मुक्त प्रवाह यह विदेशी व्यापार, निजी और संस्थागत विदेशी निवेश को प्रोत्साहित करता है
3. प्रौद्योगिकी का मुक्त प्रवाह और श्रम और मानव शक्ति की मुक्त आवाजाही।
प्राचीन काल से ही यात्री, व्यापारी, पुजारी और तीर्थयात्री, ज्ञान, अवसरों और आध्यात्मिक शांति के लिए या उत्पीड़न/यातनापूर्ण जीवन से बचने के लिए दूर-दूर की यात्राओं पर जाते रहे हैं।
1)एक लाभदायक उदाहरण: ये लोग जो वैश्विक आदान - प्रदान के अगुआ थे अपनी यात्राओं में अपने साथ तरह-तरह की चीजें, पैसा, मूल्य-मान्यताएँ, हुनर, विचार, आविष्कार लेकर आते थे। 2)एक हानिकारक उदाहरण: यात्री, व्यापारी, पुजारी और तीर्थयात्री कीटाणु और बीमारियाँ भी अपने साथ लेकर चलते रहे । जो उनके लिए बहुत हानिकारक सिद्ध हुए और जिससे हजारों की संख्या में स्थानीय निवासियों की मृत्यु हो गई ।’सिल्क रूट’प्राचीन काल में व्यापारिक व सांस्कृतिक संपर्को का सबसे जीवंत उदाहरण सिल्क मार्ग के रूप में दिखता है । इस मार्ग का प्रयोग मुख्यतः चीन से सिल्क यूरोप भेजने में होता था । यह मार्ग एशिया, यूरोप व अफ्रीका को जोड़ता था । व्यापारिक दृष्टि से उत्तरी सिल्क रूट महत्त्वपूर्ण था जो चीन से शुरू होकर, मध्य एशिया होते हुए यूरोप पहुँचता था । यह सिर्फ एक व्यापारिक ही नहीं वरन् सांस्कृतिक मार्ग भी था । जिसने अनेक सभ्यताओं पर जैसे मिस्त्र, ईरान, अरब, भारत, रोम आदि पर गहरा असर डाला । व्यापार की दृष्टि से जहां चीन रेशम, चाय, चीनी मिट्टी के बर्तन यूरोप भेजता था वहीं भारत इसका प्रयोग मसाले, हाथी दाँत, कपडे़ व काली मिर्च आदि के व्यापार के लिए करता था व बदले में रोम से मूल्यवान वस्तुऐं यथा चाँदी, सोने, शीशे के वस्तुएँ, कालीन, शराब आदि प्राप्त करता था।सांस्कृतिक आदान-प्रदान के लिए भी यह मार्ग बेहद महत्त्वपूर्ण सिद्ध हुआ। 1) इस्लाम धर्म प्रचारक इस राह से विश्व के अन्य देशों में गए । 2) बौद्ध धर्म प्रचारकों ने भी इस राह का प्रयोग अन्य देशों में जाने के लिए किया।
रेशम मार्ग से पश्चिम भेजे जाने वाले चीनी रेशम का बहुत महत्व था। यह भूमि व समुद्र से होकर गुजरने वाले मार्ग थे जो एशिया के क्षेत्रों को यूरोप व उ0 अफ्रीका से जोड़ते थे। रेशम मार्ग से चीनी पाॅटरी व भारत से कपड़े व मसाले विश्व के अन्य भागों में पहुंचते थे । वापसी में सोना-चाँदी आदि बहुमूल्य वस्तुऐं एशिया आती थी । सांस्कृतिक आदान-प्रदान के लिए भी यह मार्ग बेहद महत्त्वपूर्ण सिद्ध हुआ। 1) इस्लाम धर्म प्रचारक इस राह से विश्व के अन्य देशों में गए । 2) बौद्ध धर्म प्रचारकों ने भी इस राह का प्रयोग अन्य देशों म जाने के लिए किया।
असेंबली लाइन के लाभ इस प्रकार थे:
1.यह इंजीनियर माल के उत्पादन का एक त्वरित और सस्ता तरीका था।
इसने श्रमिकों को कन्वेयर बेल्ट द्वारा तय की गई गति से यंत्रवत् और लगातार एक ही काम को दोहराने के लिए बाधित किया। यह काम की गति बढ़ाकर प्रत्येक मजदूर की उत्पादकता बढ़ाने वाला तरीका था।
2.इसने प्रत्येक मजदूर की उत्पादकता में वृद्धि की । कन्वेयर बेल्ट के साथ खड़े होने के बाद कोई मजदूर अपने काम में ढील करने या कुछ पल के लिए भी अवकाश लेने का जोखिम नहीं उठा सकता था। और तो और, इस व्यवस्था में मशदूर अपने साथियों के साथ बातचीत भी नहीं कर सकते थे।
3.इसने वृहत उत्पादन (मास प्रोडक्शन)को संभव बना दिया।