1.1928 से 1934 के बीच देश के आयात-निर्यात घट कर लगभग आधे रह गए थे।
2.जब अंतर्राष्ट्रीय बाजार में कीमतें गिरने लगीं तो यहाँ भी कीमतें नीचे आ गईं। 1928 से 1934 के बीच भारत में गेहूँ की कीमत 50 प्रतिशत गिर गई।
3.बंगाल के जूट/पटसन उत्पादकों को ही देखिए। वे कच्चा पटसन उगाते थे जिससे कारखानों में टाट की बोरियाँ बनाई जाती थीं। जब टाट का निर्यात बंद हो गया तो कच्चे पटसन की कीमतों में 60 प्रतिशत से भी ज्यादा गिरावट आ गई।
1.प्रथम विश्व युद्ध विश्व का पहला आधुनिक औद्योगिक युद्ध था, क्योंकि इसमें विश्व के अग्रणीय औद्योगिक राष्ट्र सम्मिलित थे। इन राष्ट्रों में अन्य राष्ट्रों को अत्यधिक क्षति पहुंचाने की क्षमता थी।
2.इस युद्ध में मशीनगनों, टैंकों, हवाई जहाजों और रासायनिक हथियारों का भयानक पैमाने पर इस्तेमाल किया गया।
3.युद्ध के लिए दुनिया भर से असंख्य सिपाहियों की भर्ती की जानी थी और उन्हें विशाल जलपोतों व रेलगाडि़यों में भर कर युद्ध के मोर्चों पर ले जाया जाना था।
1920 के दशक की अमेरिकी अर्थव्यवस्था की एक बड़ी खासियत थी वृहत उत्पादन (मास प्रोडक्शन) का चलन।इसका विख्यात उदाहरण है फोर्ड कार जिसके निर्माता हेनरी फोर्ड थे। उन्होने डॅनवर में कार विनिर्माण इकाई स्थापित की थी जहां कन्वेयर बेल्ट एवं असेंबली लाइन प्रोडक्शन की सहायता से बड़े पैमाने पर और कम समय में कारों का निर्माण किया जाता था। हेनरी फोर्ड की टी-मॉडल नामक कार बृहत उत्पादन पद्धति से बनी विश्व की पहली कार थी।
मित्र राष्ट्रों जिसमें ब्रिटेन, फ्रांस, रूस, इटली और अमेरिका शामिल थे। इन देशों ने धूरी शक्तियों जिसमें जर्मनी, ऑस्ट्रिया-हंगरी, तुर्क साम्राज्य और बुल्गारिया शामिल थे के खिलाफ लड़ाई लड़ी। ऑस्ट्रिया-हंगरी के आर्कड्यूक फर्डिनेंड की 28 जून, 1914 को एक सर्ब द्वारा हत्या कर दी गई जिसके फलस्वरूप 28 जुलाई 1914 ई. को एक ऐसा युद्ध प्रारम्भ हुआ जिसने सम्पूर्ण विश्व को प्रभावित किया।
पहले विश्व युद्ध के समय भारत के औद्योगिक उत्पादन में वृद्धि -ब्रिटिश सरकार ने तो भारतीय उद्योगों को नष्ट करने में कोई कसर न छोड़ी, परन्तु जिसे रब रखे, ओनू कौन चखे। प्रथम विश्व युद्ध भारतीय उद्योगों के लिए एक वरदान बनकर आया। उसके कारण भारतीय उद्योगों को पनपने का एक उत्तम सुअवसर मिला था। इसके अनेक कारण दिये जाते है जिनमें से कुछ मुख्य निम्नलिखित हैं:
(i) प्रथम विश्व युद्ध में ब्रिटेन ऐसे उलझ गया कि उसका सारा ध्यान अपने बचाव में लग गया। वह अब भारत में अपने माल का निर्यात न कर सका जिसके कारण भारत के उद्योगों को पनपने का सुअवसर प्राप्त हो गया।
(ii) इंग्लैंड के सब कारखाने निर्यात की विभिन्न चीजें बनाने के बजाय सैनिक सामग्री बनाने में लग गई इसलिये भारतीय उद्योगों को रातोरात एक विशाल देशी बाज़ार मिल गया।
(iii) एक विशाल देशी बाज़ार मिलने के अतिरिक्त भारतीय उद्योगों को जब सरकार द्वारा भी अनेक चीजें-जैसे फौज के लिए वर्दियों, बूट आदि बनाने, टैंट आदि बनाने, घोड़ों के लिए अनेक प्रकार का सामान बनाने आदि-के आर्डर मिल गए तो उनमें नई जान आ गई। जैसे-जैसे युद्ध आगे बढ़ता गया भारतीय उद्योग भी प्रगति करते गये।
(iv) पुराने कारखानों के साथ-साथ बहुत सारें नए कारखाने खुल गए जिससे उद्योगपतियों को ही नहीं, वरन् मजदूरों और कारीगरों की भी चाँदी हो गई, उनके वेतन बढ़ गए जिससे उनकी काया पलट गई।
(v) प्रथम युद्ध में ब्रिटिश सरकार को फंसा देखकर जब भारतीय नेताओं ने स्वदेशी पर अधिक बल देना शुरू कर दिया तो भारतीय उद्योगों के लिए सोने पर सुहागा वाली बात हो गई।
इस प्रकार प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष रूप में प्रथम विश्व युद्ध भारतीय उद्योगों के लिए एक वरदान सिद्ध हुआ। निःसंदेह यह पहला आधुनिक औद्योगिक युद्ध था।
विश्व बैंक और आई.एम.एफ. को ब्रेटन वुड्स संस्थान या ब्रेटन वुड्स ट्विन भी कहा जाता है।
1.विश्व बैंक और आई.एम.एफ. ने 1947 में औपचारिक रूप से काम करना शुरू किया।
2. इन संस्थानों की निर्णय प्रक्रिया पर पश्चिमी औद्योगिक देशों का नियंत्रण रहता है। अमेरिका विश्व बैंक और आई.एम.एफ. के किसी भी फैसले को वीटो कर सकता है।
3. युद्धोत्तर अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक व्यवस्था को अकसर ब्रेटन वुड्स व्यवस्था भी कहा जाता है।
विनिमय दर वर्तमान बाजार मूल्य होता है इस व्यवस्था के जरिये एक मुद्रा को दूसरी मुद्रा से बदला जा सकता है अथवा अंतर्राष्ट्रीय व्यापार की सुविधा के लिए विभिन्न देशों की राष्ट्रीय मुद्राओं को एक-दूसरे से जोड़ा जाता है।
मोटे तौर पर विनिमय दर दो प्रकार की होती हैं: स्थिर विनिमय दर और परिवर्तनशील विनिमय दर।
स्थिर विनिमय दर: जब विनिमय दर स्थिर होती हैं और उनमें आने वाले उतार-चढ़ावों को नियंत्रित करने के लिए सरकारों को हस्तक्षेप करना पड़ता है तो ऐसी विनिमय दर को स्थिर विनिमय दर कहा जाता है।
लचीली या परिवर्तनशील विनिमय दर: इस तरह की विनिमय दर विदेशी मुद्रा बाजार में विभिन्न मुद्राओं की माँग या आपूर्ति के आधार पर और सिद्धान्तः सरकारों के हस्तक्षेप के बिना घटती-बढ़ती रहती है।
1.आयात शुल्क:किसी दूसरे देश से आने वाली चीजों पर वसूल किया जाने वाला शुल्क। यह कर या शुल्क उस जगह लिया जाता है जहाँ से वह चीज देश में आती है, यानी सीमा पर, बंदरगाह पर या हवाई अड्डे पर।
2.विनिमय दर :अंतर्राष्ट्रीय व्यापार की सुविधा के लिए विभिन्न देशों की राष्ट्रीय मुद्राओं को एक-दूसरे से जोड़ा जाता है।मोटे तौर पर विनिमय दर दो प्रकार की होती हैं: स्थिर विनिमय दर और परिवर्तनशील विनिमय दर ।
3.मल्टीनेशनल कॉर्पोरेशन:एक साथ बहुत सारे देशों में व्यवसाय करने वाली कंपनियों को बहुराष्ट्रीय निगम (मल्टीनेशनल कॉर्पोरेशन-एमएनसी)या बहुराष्ट्रीय कंपनी कहा जाता है। शुरुआती बहुराष्ट्रीय कंपनियों की स्थापना 1920 के दशक में की गई थी।
अ)उन्नीसवीं सदी के पूर्वार्द्ध में भारतीय ठेका प्रवासियों के मुख्य गंतव्य स्थल क्या थे?
ब)अनुबंधित श्रमिकों को 'गुलामी का नया रूप' के रूप में क्यों वर्णित किया गया था?
ब) अनुबंधित प्रवासियों को गुमाश्तो द्वारा भर्ती किया जाता था जिन्हें छोटे से शुल्क का भुगतान किया जाता था

अठारहवीं शताब्दी का काफी समय बीत जाने के बाद भी चीन और भारत को दुनिया के सबसे धनी देशों में गिना जाता था। एशियाई व्यापार में भी उन्हीं का दबदबा था। लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि पंद्रहवीं सदी से चीन ने दूसरे देशों के साथ अपने संबंध कम करने शुरू कर दिए और वह दुनिया से अलग-थलग पड़ने लगा। चीन की घटती भूमिका और अमेरिका के बढ़ते महत्त्व के चलते विश्व व्यापार का केंद्र पश्चिम की ओर खिसकने लगा। अब यूरोप ही विश्व व्यापार का सबसे बड़ा केंद्र बन गया।
सोलहवीं सदी के मध्य तक आते-आते पुर्तगाली और स्पेनिश सेनाओं की विजय का सिलसिला शुरू हो चुका था। उन्होंने अमेरिका को उपनिवेश बनाना शुरू
कर दिया था। यूरोपीय सेनाएँ केवल अपनी सैनिक ताकत के दम पर नहीं जीतती थीं। स्पेनिश विजेताओं के सबसे शक्तिशाली हथियारों में परंपरागत किस्म का सैनिक हथियार तो कोई था ही नहीं। यह हथियार तो चेचक जैसे कीटाणु थे जो स्पेनिश सैनिकों और अफसरों के साथ वहाँ जा पहुँचे थे। लाखों साल से दुनिया से अलग-थलग रहने के कारण अमेरिका के लोगों के शरीर में यूरोप से आने वाली इन बीमारियों से बचने की रोग-प्रतिरोधी क्षमता नहीं थी। फलस्वरूप, इस नए स्थान पर चेचक बहुत मारक साबित हुई। एक बार संक्रमण शुरू होने के बाद तो यह बीमारी पूरे महाद्वीप में फैल गई। जहाँ यूरोपीय लोग नहीं पहुँचे थे वहाँ के लोग भी इसकी चपेट में आने लगे। इसने पूरे के पूरे समुदायों को खत्म कर डाला। इस तरह घुसपैठियों की जीत का रास्ता आसान होता चला गया।
क्रिप्स मिशन की असफलता से भारत में घोर निराशा को जन्म दिया ।
इसका उद्देश्य अमरीका और चीन को संतुष्ट करना था ।
क्रिप्स मिशन की असफलता का प्रभाव भारत व ब्रिटेन पर पड़ा था ।
बर्मा पर जापान की विजय के बाद बर्मा से जो भारतीय शरणार्थी आ रहे थे । उन्होंने भारत आकर अपने प्रति अमानवीय व्यवहार की कहानी सुनाई थी । अंग्रेजों और भारतीयों को बर्मा से भारत आने के लिए दो अलग-अलग मार्ग दिए गये थे ।
भारत छोडो आन्दोलन की विफलता के मुख्य कारण थे -
भारत छोडो आन्दोलन का भूमिगत रूप से संचालन करने वाले मुख्य नेताओं के नाम निम्न लिखित हैं :-
4. पटवर्धन





साइमन कमीशन का मुख्य उद्देश्य और 1919 के भारत सरकार अधिनियम द्वारा भारत में पेश सुधारों की कार्यप्रणाली का अध्ययन कर उसकी जांच करना था।
ब्रिटिश सरकार ने हमेशा की तरह, दमन के साथ इसका प्रतिकार किया।
अ) जून 1930 में, कांग्रेस और उसके सहयोगी संगठनों को अवैध घोषित कर दिया गया और महात्मा गांधी एवं अन्य सभी कांग्रेस नेताओं को गिरफ्तार कर लिया गया था।
ब) प्रेस पर प्रतिबन्ध लगा दिया गया था और समाचार पत्रों पर पुलिस द्वारा की गई दर्जनों गोलाबारीयों की रिपोर्ट छापने पर पाबंदी थी।
अ) पूना पैक्ट द्वारा दलित वर्गों को रियायतें दी गयी।
ब) इसने दलित वर्गों के लिए सीटों की संख्या लगभग दोगुनी कर दी गई। जो केवल उन्हीं के लिए आरक्षित थीं।
स) केंद्रीय विधायिका में सीटों का 18 प्रतिशत भी उनके लिए आरक्षित किया गया था।
द) हिंदुओं के लिए एक सामान्य निर्वाचन-क्षेत्र रखा गया।
इस आयोग में एक भी भारतीय सदस्य नहीं था सारे अंग्रेज थे।आयोग के इस संगठन को भारत में संवैधानिक व्यवस्था की कार्यशैली का अध्ययन करना था और उसके बारे में सुझाव देने थे जो प्रबुद्ध भारतीय राजनीतिक विचारों को स्वीकार्य नहीं था। आई एन सी ने मद्रास में आयोजित अपने अधिवेशन में आयोग का " हर स्तर पर, हर जगह, और हर रूप में" बहिष्कार करने का संकल्प लिया।
बंगाल में खुद रबीन्द्रनाथ टैगोर भी लोक-गाथा गीत, बाल गीत और मिथकों को इकट्ठा करने निकल पड़े। उन्होंने लोक परंपराओं को पुनर्जीवित करने वाले आंदोलन का नेतृत्व किया। मद्रास में नटेसा शास्त्री ने द फोकलोर्स ऑफ सदर्न इंडिया के नाम से तमिल लोक कथाओं का विशाल संकलन चार खंडों में प्रकाशित किया। उनका मानना था कि लोक कथाएँ राष्ट्रीय साहित्य होती हैं, यह ‘लोगों के असली विचारों और विशिष्टताओं की सबसे विश्वसनीय अभिव्यक्ति’ है।
जैसे-जैसे राष्ट्रीय आंदोलन आगे बढ़ा, राष्ट्रवादी नेता लोगों को एकजुट करने और उनमें राष्ट्रवाद की भावना भरने के लिए भिन्न तरह के चिन्हों और प्रतीकों के बारे में और ज्यादा जागरूक होते गए।
1)बंगाल में स्वदेशी आंदोलन के दौरान एक तिरंगा झंडा (हरा, पीला, लाल) तैयार किया गया। इसमें ब्रिटिश भारत के आठ प्रांतों का प्रतिनिधित्व करते कमल के आठ फूल और हिंदुओं व मुसलमानों की एकता का प्रतिनिधित्व करता एक अर्धचंद्र दर्शाया गया था।
2)1921 तक गांधीजी ने भी स्वराज का झंडा तैयार कर लिया था। यह भी तिरंगा (सफ़ेद, हरा और लाल) था। इसके मध्य में गांधीवादी प्रतीक चरखे को जगह दी गई थी जो स्वावलंबन का प्रतीक था। जुलूसों में यह झंडा थामे चलना शासन के प्रति अवज्ञा का संकेत था।
राष्ट्र की पहचान प्रायः छवि का प्रतिकात्मक रूप लेने लगी थी।
1.बीसवीं सदी में राष्ट्रवाद के विकास के साथ भारत की पहचान भी भारत माता की छवि
का रूप लेने लगी।
2.यह तसवीर पहली बार बंकिमचन्द्र चट्टोपाध्याय ने बनाई थी। 1870 के दशक में उन्होंने मातृभूमि की स्तुति के रूप में ‘वन्दे मातरम्’ गीत लिखा था।
3.स्वदेशी आंदोलन की प्रेरणा से अबनीन्द्रनाथ टैगोर ने भारत माता की विख्यात छवि को
चित्रित किया। इस पेंटिग में भारत माता को एक संन्यासिनी के रूप में दर्शाया गया है।
वह शांत, गंभीर, दैवी और अध्यात्मिक गुणों से युक्त दिखाई देती है।
4.आगे चल कर जब भारत माता की इस छवि को बड़े पैमाने पर तसवीरों में उतारा जाने लगा और विभिन्न कलाकार यह तसवीर बनाने लगे तो भारत माता की छवि विविध रूप ग्रहण करती गई। इस मातृ छवि के प्रति श्रद्धा को राष्ट्रवाद में आस्था का प्रतीक माना जाने लगा।
हिन्द स्वराज गांधीजी द्वारा रचित एक पुस्तक का नाम है। मूल रचना गुजराती में थी। यह लगभग तीस हजार शब्दों की लघु पुस्तिका है जिसे गाँधीजी ने अपनी इंग्लैण्ड से दक्षिण अफ्रीका की यात्रा के समय पानी के जहाज में लिखी थी।
महात्मा गाँधी के द्वारा भारतीय राजनीति में अंग्रेजी शासन के सहयोगी के रूप में प्रवेश किया गया। महात्मा गाँधी की भारत वापसी के समय प्रथम विश्वयुद्ध चल रहा था। युद्ध काल में महात्मा गाँधी ने भारतीय जनता से अंग्रेजी सरकार के साथ पूरा-पूरा सहयोग करने की अपील की थी। अंग्रेजी शासन के द्वारा भी महात्मा गाँधी के सहयोग की सराहना की गयी और उन्हें ‘केसर-ए-हिन्द’ की उपाधि प्रदान की गयी। 1918 ई. के प्रारम्भ तक महात्मा गाँधी को अंग्रेजी शासन की न्यायप्रियता में पूरा विश्वास था। किन्तु इसके बाद भारतीय राजनीति में कुछ ऐसी परिस्थितियाँ उत्पन्न हुई तथा कुछ ऐसी घटनाएँ घटित हुई, जिनसे प्रभावित होकर महात्मा गाँधी ने अंग्रेजी शासन के विरूद्ध असहयोगी का रूप धारण कर लिया-
रोलेट एक्ट (1919)- सन 1917 ई. में सर सिडनी रोलेट की अध्यक्षता में क्रांतिकारी गतिविधियों की देख-रेख के लिए एक समिति गठित की गयी । इस समिति की सिफारिशों पर अराजकता तथा क्रांतिकारी अपराध विधयेक 1919 लागू किया गया, जिसका लोकप्रिय नाम रोलेट एक्ट था। इसके अनुसार प्रशासन को किसी व्यक्ति को गिरफ्तार करने और बिना मुकदमें के बन्दीगृह में रखने की अनुमति थी।
काला विधेयक (ब्लैक एक्ट) के रूप में घोषित इसका सभी जगह विरोध किया गया। पंजाब, गुजरात तथा बंगाल में कई हिंसक घटनाऐं हो गई। रोलेट सत्यागह ने इससे जुड़ी हुई कई घटनाओं को जन्म दिया।
2. जलियावाला बाग नरसंहारः कांग्रेस द्वारा 8 अप्रैल (1919) ई. को एक हड़ताल का आह्वान किया गया जिसे अभूतपूर्व समर्थन मिला। हिंसक स्थिति को देखते हुए असैनिक सरकार ने प्रशासन की बागडोर ब्रिग्रेडियर जनरल डायर के अधीन सैनिक अधिकारियों के सुपुर्द कर दी। डायर ने न केवल सार्वजनिक बैठकों पर ही रोक लगाई बल्कि महत्वपूर्ण राजनैतिक नेताओं को जेल में बंद कर दिया, इस अशांत परिस्थिति में नियमों की खुले आम अवज्ञा करते हुए जलियावाला बाग में 23 अप्रैल को एक सार्वजनिक बैठक का आयोजन किया गया जिसमें बाग में काफी संख्या में लोग एकत्र हुए। स्थिति की सूचना मिलते ही डापर वहां पहुंचा तथा बिना किसी पूर्व चेतावनी के भीड़ पर गोली चलाने का आदेश दे दिया। करीब 20,000 लोग गोलियों की चपेट में आ गए। गोलियां तभी रूकी जब वे समाप्त हो गई।
यह नरसंहार एक अकेली घटना नहीं थी, बल्कि थोड़ा कम परिणाम की समान नृशंसता, पंजाब में कई स्थानों पर दोहराई गई। दूसरी तरफ इससे स्वतन्त्रता संग्राम को आश्चर्यजनक प्रोत्साहन मिला।
3. खिलाफल आंदोलनः ओटोमन तुर्क साम्राज्य की प्रथम विश्व युद्ध में हार के कारण मुसलमानों का नाराज होना इस आंदोलन का पहला कारण था। दूसरा, सेवर की संधि (1920 ई.) में तुर्कों के साथ कठोर शर्तों ने आग में घी का काम किया, तीसरा, अंग्रेजों द्वारा सुल्तान के विरूद्ध उकसाए जाने से अरब में विद्रोह हुआ जिससे भारत में मुस्लिमों की भावना आहत हुई।
यह आंदोलन मुस्लिमों के इस विश्वास पर आधारित था कि खलीफा पूरे मुस्लिम जाति का धार्मिक तथा लौकिक प्रमुख था।
सितंबर 1919 ई. में लखनऊ के एक सम्मेलन में अखिल भारतीय खिलाफत समिति का गठन किया गया। जब 15 मई, 1920 ई. को तुर्कों के साथ सेवर संधि की घोषणा हुई, तब केंद्रीय खिलाफत समिति ने अपनी बैठक में 1 अगस्त से असहयोग आंदोलन शुरू करने का निर्णय लिया।
राष्ट्रवादियों की स्वराज्य की मांग- अंग्रेजों द्वारा कांग्रेस की मुख्य मांगों में से किसी की भी स्वीकृति नहीं दिये जाने के कारण जून, 1920 ई. में एक सर्वदलीय सम्मेलन का आयोजन, इलाहाबाद में किया गया जिसके अन्तर्गत सरकारी स्कूलों, कॉलेजों तथा विधि न्यायालयों के बहिष्कार करने की एक योजना पारित की गई।
सितंबर 1920 ईं में कांग्रेस के एक विशेष अधिवेशन में असहयोग आंदोलन शुरू करने का प्रस्ताव पारित किया गया, बाद में दिसंबर 1920 ई. में हुए नागपुर अधिवेशन में एक निर्णय को स्वीकृति दी गई।
इस प्रकार जनवरी 1921 ई. में कांग्रेस द्वारा गांधी के नेतृत्व में ईमानदारीपूर्वक असहयोग आंदोलन प्रारंभ किया गया।
उद्देश्य - (1) ब्रिटिश सरकार को उनके अत्याचारों व दमन चक्र के दुष्परिणामों के प्रति चेताना।
(2) घर-घर में स्वराज का संदेश पहुँचाना
(3) विभिन्न सम्प्रदायों और प्रांतों के लोगों में राष्ट्रीयता की भावना को उद्वेलित करना।
(4)राष्ट्रीय आन्दोलन को शक्ति प्रदान करना।
सत्याग्रह शुद्ध आत्मबल है - यह शुद्ध आत्मबल है चूंकि सत्य ही आत्मा का आधार होता है इसलिये इस बल को सत्याग्रह की संज्ञा दी गई है। सत्याग्रह शारीरिक बल नहीं है - गांधी जी के मतानुसार यह शारीरिक बल नहीं है, यह अपने शत्रु को कष्ट नहीं पहुंचाता। वह अपने शत्रु का विनाश नहीं चाहता। इसके सत्याग्रह के प्रयोग में प्रतिशोध या दुर्भावना की भावना नहीं होती है। सत्याग्रह सक्रिय प्रतिरोध है - यह निष्क्रिय प्रतिरोध नहीं वरन् सक्रिय प्रतिरोध है।
अक्टूबर 1943 ई० में लार्ड लिनलिथगो के स्थान पर भारत के गवर्नर जनरल लार्ड वेवेल नियुक्त हुए । उन्होंने गतिरोध समाप्त करने के लिए जून, 1945 में एक योजना प्रस्तावित की जिसमे कहा गया कि वायसराय कि कार्यकारिणी का पुनर्गठन करने के लिए सरकार तैयार है । कार्यकारिणी में 6 हिन्दू और 5 मुसलमान सदस्यों को गवर्नर जरनल की कार्यकारिणी में सम्मिलित किया जाय, लेकिन गवर्नर जनरल को वीटो का अधिकार बना रहेगा यह सम्मेलन शिमला में आयोजित किया गया सदस्यों की सहमति न हो पाने के कारण यह प्रस्ताव शिमला सम्मेलन में विफल हो गया ।
'भारत छोडो आन्दोलन' ने भारत की जनता में एक ऐसी अपूर्व जागृति उत्पन्न कर दी, जिससे ब्रिटिश सरकार के लिए भारत पर लम्बे समय तक शासन कर सकना संभव नहीं रहा । इस आन्दोलन की चेतना के परिणामस्वरुप 1946 ई० में जल सेना का विद्रोह हुआ इससे ब्रिटिश सरकार पर भयंकर चोट की द्वितीय विश्व युद्ध के बाद अमरीका और इंग्लैंड में लोकमत इतना अधिक भारत के पक्ष में हो गया की इंग्लैंड को विवश होकर भारत छोड़ना पड़ा । इस आन्दोलन ने भारतीय स्वतंत्रता के लिए पृष्ठभूमि तैयार की ।
A. हाफिज़
B. हज़ ज़यान
C. इराज़ बशीरी
D. मुबारिज़ मुजफ्फर
‘दीवान’ हाफिज़ की रचना थी। इनके ग्रंथ सभी ईरानियों में लोकप्रिय थे।इनके मुहावरे और रोज़मर्रा की कहावतेंपहली बार विलियम जोन्स ने 1771 में अंग्रेजी में अनुवाद कियेथे।
A. ब्राह्मणांचें कसब
B. गुलामगिरी
C. शेतकंयाचा असूड
D. तृतीय रत्न
‘निम्न-जातीय’ आंदोलनों की मराठी प्रणेता ज्योतिबा फले ने अपनी ‘गुलामगिरी’में1871में जाति-प्रथा के अत्याचारों पर लिखा था।
A. बौद्ध भिक्षुओं
B. कैथोलिक पादरियों
C. हिंदू पुजारियों
D. मौलवियों
तमिल में पहली मुद्रित पुस्तकें मिशनरी सामग्री थीं। वर्तमान काल मेंये हार्वर्ड विश्वविद्यालय में रखी हुई हैं। प्रिंटिंग मशीन पहले बारभारत मेंकोच्चि में इस्तेमालमेंलायीगयी थी।
A. ईदो
B. होक्काइदो
C. निप्पॉन-कोकु
D. निप्पॉन
टोक्यो का प्राचीन नामईदोथा जिसका अर्थ है नदी का मुहाना।सम्राट मीजी ने1868 में ईदोका नाम टोक्यो करदिया था जिसका मतलब हैपूर्वी राजधानी ।
A. 1926
B. 1927
C. 1928
D. 1929
जानी-मानी शिक्षाविद और लेखिका बेगम रोकैया शेखावत हुसैन ने 1926 में‘बंग महिला शिक्षा सम्मेलन’ को संबोधित करते हुएधर्म के नाम पर महिलाओं को पढ़ने से रोकने लिए पुरुष समाज की निंदा की थी।
A. परिवर्तित हिन्दूमहिलाओं
B. निम्न-जाति की हिंदू महिलाओं
C. अशिक्षित हिंदू महिलाओं
D. उच्च-जाति के हिंदू महिलाओं
महाराष्ट्र की ताराबाईशिंदे और पंडिता रमाबाई ने 1880 के दशक में उच्च जाति की नारियों की दयनीय हालत के बारे में रोष लेखन द्वारा प्रकटकिया था ।
A. बालगंगाधर तिलक
B. बिपिन चन्द्र पाल
C. दादाभाई नैरोजी
D. श्रीअरबिंदो
‘केसरी’ मराठी अख़बार था जिसे बालगंगाधर तिलक द्वारा 1880 में शुरू किया गया था।इस पर्चे का मुख्य उद्देश्यलोगों के बीच देशभक्ति की भावना का प्रसार करना था।
A. चैपमेन
B. डीलमेन
C. पेपरमेन
D. सेल्समेन
इंग्लैंड में पेनी चैपबुक्स या एकपैसिया किताबें बेचनेवालों को चैपमेन कहा जाता था। इन किताबों को गरीब तबके के लोग भी ख़रीदकर पढ़ सकते थे।
A. आचार्य
B. गुरु
C. संत
D. पेरियार
पेरियार नेमहिलाओं के अधिकारों और जाति व्यवस्था के सिद्धांतोंके उन्मूलन के लिए अपना जीवन समर्पित करदिया था।
A. कबीर
B. तिरुवल्लूवर
C. तुलसीदास
D. वेदव्यास
तुलसीदास नेसोलहवीं सदी में रामचरितमानस की रचना कीथी।रामचरितमानस के प्रथम संस्करण कामुद्रण1810 में कलकत्ता में हुआ था।
A. बेगम रोकैया शेखावत हुसैन
B. पंडिता रमाबाई
C. रामचड्ढा
D. ताराबाई शिंदे
राम चड्ढा का जन्म पंजाब में हुआ था।इन्होंनेऔरतों को आज्ञाकारी बीवियाँ बनने की सीख देने के उद्देश्य से अपनी बेस्ट-सेलिंग कृति ‘स्त्री धर्म विचार’ लिखी थी।
A. 1865
B. 1866
C. 1867
D. 1868
सन् 1867 में देवबंद सेमिनरी स्थापित हुआ था। इसमें मुसलमान पाठकों को रोज़मर्रा के जीवन जीने का सलीका और इस्लामी सिद्धांतों के मायन समझाए जाते
A. गुजराती
B. हिंदी
C. मराठी
D. मलयाली
बोम्बे समाचार एशिया का प्राचीन समाचारपत्रथा। इसका प्रकाशन गुजराती एवंअंग्रेजी भाषा में 1822 में हुआ था।
A. चीनी बौद्ध धर्म प्रचारक
B. कैथोलिक पादरी
C. हिंदू पुजारी
D. मौलवी
चीनी बौद्ध धर्म प्रचारक 768-770 ई. के आसपास छपाई की तकनीक जापान लेकर आए थे।
A. गंगाधर भट्टाचार्य
B. जेम्स ऑगस्टस हिक्की
C. राम मोहन रॉय
D. वॉरेन हेस्टिंग्स
जेम्स ऑगस्टसहिक्की ने 1780 से ‘बंगाल गज़ट’ नामक एक साप्ताहिक पत्रिका का संपादन शुरू किया था।जिसे उन्होंने हर किसी के लिए खुली एक व्यवसायिक पत्रिका जैसे प्रकाशित किया था।येपत्रिका किसी के प्रभाव में नहीं थी।
A. कॉर्नवॉलिस
B. जॉनएड्म
C. लार्ड मिन्टो
D. वॉरेन हेस्टिंग्स
वारेन हेस्टिंग्स गवर्नर जनरल थे जो भारत में आधिकारिक तौर पर स्वीकृत समाचार पत्र के प्रकाशन को प्रोत्साहित किया करते थे।
गाथागीत आम तौर पर कविता के रूप में गाकर सुनाया जाने वाला एक ऐतिहासिक विवरण अथवा लोक कथा है।
सुलेख सुंदर कौशल लेखन की कला है।
1780 से, जेम्स आगस्टस हिक्की ने पहली अंग्रेजी साप्ताहिक पत्रिका बंगाल गजट का सम्पादन करना शुरू किया था। बाद में गंगाधर भट्टाचार्य द्वारा यह कार्य अपने हाथ में ले लिया गया था।
लखनऊ में नवल किशोर प्रेस और बंबई मेंश्री वेंकटेश्वर प्रेस ने स्थानीय भाषा में अनेक धार्मिक ग्रंथों का प्रकाशन करना शुरू किया था।
दक्षिणी भारत में दोनों ओर के तटवर्ती मैदानों में एवं नदियों की घाटियाँ, और महानदी, गोदावरी, कृष्णा, कावेरी नदियों की घाटियों और डेल्टाओं में काँप मिट्टी मिलती है।
चूने और डोलोमाइट शैलों से प्राप्त मिट्टी नैनीताल, मसूरी, चकरोता आदि स्थानों के निकट विशेष रूप से मिलती है। ।
हिमालय की मिट्टियों को निम्न तीन भागों में विभाजित किया गया है:
1. पथरीली मिट्टी
2. चूने और डोलोमाइट शैलों से प्राप्त मिट्टी
3. ज्वालामुखी के उद्गार से प्राप्त मिट्टी
मिट्टी के संरक्षण के लिए तीन उपाय हैं:
1. वैज्ञानिक भूमि का उपयोग अर्थात प्रयोजन के लिए भूमि का उपयोग यह सबसे उपयुक्त है।
2. वैज्ञानिक फसल रोटेशन। समुच्चय जुताई और मेंडबंदी।
पहाड़ी ढलानों पर खेती मृदा क्षरण का मुख्य कारण है।
मनुष्य हमारे वातावरण में उपलब्ध सामग्री को संसाधनों में बदलता और उनका उपयोग करता है। इस प्रकार मनुष्य संसाधन के एक महत्वपूर्ण घटक के रूप में माना जाता है। उदाहरण के लिए लकड़ी एक सामग्री है और जब यह उपयोग किया जाता है यह फर्नीचर का एक टुकड़ा बन जाती है जो एक संसाधन है।
(i) संसाधनों के उपयोग से वे कम हो जाते है।
(ii) संसाधनों के उपयोग के दौरान पर्यावरण का क्षरण होता है।
कृषि आधारित उद्योग जैसे चीनी और कपास उद्योग कृषि संसाधनों पर निर्भर हैं।
भूमि मनुष्य के लिए एक महत्वपूर्ण संसाधन है जैसे कि वह उस पर रहता है और अपनी आवश्यकताओं के पूरा करता है।
जल, पौधों जानवरों और मनुष्य के अस्तित्व के लिए आवश्यक है। मनुष्य को घरेलू के साथ-साथ औद्योगिक उपयोग के लिए भी पानी की आवश्यकता है।
संभावित संसाधनों का एक हिस्सा है जो वास्तव में उपयोग के लिए विकसित किये गये है विकसित संसाधन कहा जाता है।
भारत में शक्ति का मुख्य स्रोत कोयला, पानी, पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस हैं।
मनुष्य और अधिक संसाधनों को बनाने के लिए प्रकृति का सबसे अच्छा उपयोग कर सकता हैं। जब उसके पास ज्ञान, कौशल और प्रौद्योगिकी ऐसा करने के लिए हो।
(1) इस मिट्टी में क्षारीय एवं लवणयुक्त तत्वों की मात्रा अधिक पायी जाती है।
(2) इस मिट्टी में उपजाऊ क्षमता कम होती है।
1. मिट्टी का निर्माण लावायुक्त पदार्थो से हुआ है। 2. इसमें नमी धारण करने की क्षमता अधिक होती हैं।
वनोें से प्रत्यक्ष रूप से प्राप्त होने वाले तीन संसाधन:-1) जलाऊ लकड़ी प्राप्त होती है । 2) अनेक प्रकार की औषधियाँ मिलती हैं । 3) वनों से गोंद आदि अनेक उत्पाद प्राप्त होते हैं ।
1) जलोढ मिट्टी
पूर्व तट के नदी डेल्टाओं पर जलोढ मिट्टी
मरुस्थलीय मिट्टी प्रधानत: बलुई है। जिनके कण मोटे होते है। ये मिट्टियाँ स्थानीय रूप से मरुस्थलीय भाग से एवं दक्षिणी-पश्चिमी मानसून द्वारा कच्छ के रन से उड़ाकर एकत्रित हुई हैं। बालू मिट्टी में आर्द्रता कम होती है। तथा वनस्पति के अंश भी नहीं पाए जाते है। परन्तु पर्याप्त मात्रा में जल मिल जाने पर यह मिट्टी उपजाऊ हो जाती है। सिंचाई के द्वारा ही इनमें गेहूँ, चावल, गन्ना, कपास, ज्वार-बाजरा, रसदार फल, सब्जियाँ आदि पैदा कई जाती है।
लैटेराइट मिट्टी का कुल क्षेत्रफल 1.2 लाख वेग किमी. है। इस मिट्टी का क्षेत्र विशेषकर मध्य प्रदेश, पूर्वी और पश्चिमी घाटों के समीप, कर्नाटक, दक्षिणी महाराष्ट्र, केरल, राजमहल की पहाड़ियों, उड़ीसा तथा असम के कुछ भागों में पाया जाता है।
लाल मिट्टी शुष्क और तर जलवायु के बदलने के फलस्वरूप प्राचीन रवेदार शैलों और परिवर्तित शैलों के टूट-फूट के कारण बनती है। कहीं-कहीं इसका रंग भूरा, चाकलेटी अथवा पीला अथवा काला भी होता है। क्योंकि ग्रेनाइट शैलों के बनने के कारण इसमें मूल शैल के चाकलेट रंग वाले खनिज तत्वों के बारीक कण पाये जाते है।
लावा की काली मिट्टी- इस प्रकार की मिट्टी गुजरात व महाराष्ट्र, अमरकंटक और बेलगाँव से गुना तक लगभग 5.5 लाख वर्ग किमी. क्षेत्र में दूर-दूर तक फैली है। यह गुजरात और महाराष्ट्र के अधिकांश भाग; मध्यवर्ती और पश्चिम मध्य प्रदेश; उड़ीसा के दक्षिणी भाग; कर्नाटक के उत्तरी जिलों; आंध्र प्रदेश के दक्षिणी और तटवर्ती भाग; तमिलनाडु के सलेम, रामनाथपुरम, कोयम्बटूर तथा तिरुनेलवैली जिलों; राजस्थान के झालावाड़, कोटा और टोंक जिलों तथा उत्तर प्रदेश के हमीरपुर, बाँदा और झाँसी जिलों में 5.5 लाख वर्ग किमी. में मिलती है।
1. नूतन जलोढ़ या डेल्टा की मिट्टियाँ गंगा-ब्रह्मपुत्र का डेल्टा, महानदी, कृष्णा, गोदावरी और कावेरी नदियों के डेल्टाओं में पायी जाती है।
2. ये अधिकांशत: दलदली और तट के निकट नमकीन भी होती है।
3. इनके कण बहुत बारीक होते है।
4. इनमें पोटाश, चूना, मैग्नेशियम और जीवांश अधिक मात्रा मिलने से यह विशेष उपजाऊ होती है।
5. यहाँ धान, गन्ना, जूट और दालों की कृषि की जाती है।
1. पथरीली मिट्टी हिमालय के तेज ढालों पर एवं निचली तली में पायी जाती है।
2. इसे नदियों ने लाकर एकत्रित कर दिया है।
3. इस मिट्टी के कण बड़े होते है।
4. इनमें कंकड पत्थर के छोटे-छोटे टुकड़े पाए जाते है।
5. इस मिट्टी में वनस्पति, चूने और लोहे का अंश बहुत कम होता है।
पवन कटाव रेगिस्तान और अर्द्ध रेगिस्तान क्षेत्रों में महत्वपूर्ण है। कुछ क्षेत्रों में ऊपरी मिट्टी शुष्क मौसम में हवा से उड़ जाती है और बरसात के मौसम में पानी से साफ हो जाती है।
जैसे-जैसे मानव जनसंख्या बढ़ती जाती है, भूमि की मांग भी बढ़ जाती है। वन और अन्य प्राकृतिक वनस्पति, मानव बस्ती, खेती के लिए, चारागाह पशु और कई अन्य आवश्यकताओं के लिए हट रहे हैं।
भारी बारिश के दौरान पानी मिट्टी में बूंद बूंद करके टपकता है जब तक यह अंतर्निहित अभेद्य चट्टानों से आगे बढ़ने में असमर्थ होता है। ढलानी भूमि पर भारी नमी से लदी मिट्टी पर अक्सर नीचे फिसलन होती है, जिसके परिणामस्वरूप भूस्खलन होता है।
जब पेड़ काटे जाते है तो इससे मिट्टी की सतह ढीली हो जाती है और अधिक आसानी से पानी और हवा द्वारा हट जाती है। बारिश का पानी जो मिट्टी द्वारा अवशोषित किया जा सकता था, वह तेजी से मिट्टी के साथ बह जाता है।
मिट्टी के संरक्षण के लिए प्रयोग में किये जाने वाले विभिन्न तकनीके हैं:
(i) वनीकरण
(ii) जानवरों के प्रतिबंधित चराई
(iii) उचित खेती की तकनीक
(iv) अवनालिका में रोपण
(v) आश्रय बेल्ट का रोपण
जब बहते हुए पानी द्वारा सतह पर मिट्टी की परत एक बड़े क्षेत्र में हट जाती है, इसे परतीय कटाव कहा जाता है। यह हानिकारक है क्योकि यह महीन और अधिक उपजाऊ ऊपरी मिट्टी हटा देते है।
भूमि निम्नीकरण/अपरदन के संरक्षण के प्रमुख उपाय - 1. खनन नियंत्रण 2. वनारोपण एवं चरागाहों का उचित प्रबंधन 3. नियंत्रित पशुपालन
भूमि निम्नीकरण/अपरदन के संरक्षण के प्रमुख उपाय - i) खनन नियंत्रण ii) वनारोपण एवं चरागाहों का उचित प्रबंधन पपपद्ध नियंत्रित पशुपालन iii) रेतीले टीलों पर काँटेवाली झाडि़याँ लगाना।
जलोढ़ मिट्टी पायी जाती है
• पंजाब
• हरियाणा
• उत्तर प्रदेश
• बिहार
• झारखंड
• महानदी, कृष्णा, गोदावरी और कावेरी के डेल्टा।
जलोढ़ मिट्टी को दो आधारो पर वर्गीकृत किया जा सकता है:
1. अनाज के आधार पर: दुअर्स, तराई
2. आयु के आधार पर: खादी, बांगर
लेटराइट मिट्टी का गठन पानी में घुलकर बहने की प्रक्रिया के कारण होता है। पानी में घुलकर बहने की प्रक्रिया वह है जिसमे ऊपरी मिट्टी अत्यधिक वर्षा और उच्च तापमान के कारण सभी पोषक तत्वों से रहित है।
दो औद्योगिक गतिविधियाँ हैं:
• सीमेंट उद्योग के लिए चूना पत्थर को पीसना और उत्खनन।
• केल्साइट को पीसना और उत्खनन और चीनी मिट्टी उद्योग के लिए साबुन बनाने का पत्थर।
मिट्टी गठन के लिए जिम्मेदार कारकों में से कुछ हैं:
• उच्चावच
• जनक रॉक
• जलवायु
• वनस्पति
• समय।
(i) कुछ व्यक्तियों के लालचवश संसाधनों का ह्नास हो गया हैं।
(ii) संसाधनों के अंधाधुंध शोषण से वैश्विक पारिस्थितिकी संकट उत्पन्न हो गया हैं।
A B कोयला खान तेल क्षेत्र आणविक ऊर्जा संयंत्र तापीय ऊर्जा संयंत्र रानीगंज डिगबोई नरोरा बरौनी
संसाधनों के उपयुक्त उपयोग के लिये अपनाई गई तकनीकी या क्षमता संसाधन नियोजन कहलाती है । स्तर - 1) संसाधनों के अन्वेषण की तैयारी । 2) संसाधनों की उपलब्धता का मूल्यांकन
A.
पूर्वी तटीय नदी तंत्र द्वारा
B.
गंगा नदी तंत्र द्वारा
C.
हिमालयी नदी तंत्र द्वारा
D.
पश्चिमी तटीय नदी तंत्र द्वारा
जलोढ़ मृदा का निक्षेपण हिमालयी नदी तंत्र द्वारा होता है।
A.
आर्थिक विकास
B.
सामाजिक विकास
C.
सांस्कृतिक विकास
D.
क्षेत्रीय विकास
आर्थिक विकास प्रौद्योगिकी एवं संस्थाओं के माध्यम से मानव प्राणी और उसके वातावरण पर निर्भर है।
A.
जम्मू और कश्मीर
B.
राजस्थान
C.
केरल
D.
झारखंड
लेटराइट मृदा उच्च तापमान और अत्यधिक वर्षा वाले क्षेत्रों में विकसित होती है। ये खेती के लिए तभी उपयुक्त होती हैं जब इसमें पर्याप्त मात्रा में उर्वरक एवं जैविक पदार्थों को मिलाया जाता है, क्योंकि इस मृदा में ह्यूमस की मात्रा कम पाई जाती है। ये मुख्य रूप से कर्नाटक, केरल, तमिलनाडु, मध्य प्रदेश, ओड़िशा और असम के पहाड़ी क्षेत्रों में पाई जाती हैं।
A.
हरियाणा, पंजाब
B.
बंगाल, बिहार, असम
C.
हिमाचल, असम, महाराष्ट्र, कर्नाटक
D.
जम्मू-कश्मीर, राजस्थान, गुजरात
इन राज्यों में अनेक मौसमी कारकों के कारण सिंचाई के अंतर्गत शुद्ध बुवाई क्षेत्र 25% से कम है।
A.
कच्छ बेसिन
B.
सौराष्ट्र बेसिन
C.
चंबल बेसिन
D.
दक्षिणी पठार
जब बहता जल मृत्तिकायुक्त मृदाओं को काटते हुए गहरी वाहिकाएँ बनाता है, तो इसे अवनलिकाएँ कहते हैं। ऐसी भूमि जोतने योग्य नहीं रहती। चंबल बेसिन ऐसी भूमि का उदाहरण है।
A.
जम्मू और कश्मीर
B.
राजस्थान
C.
गुजरात
D.
झारखंड
गुजरात राज्य काली मृदा के मामले में समृद्ध राज्य है, अन्य राज्य महाराष्ट्र और छत्तीसगढ़ हैं।
A.
वनीकरण
B.
पुनर्वनरोपण
C.
हरा-भरा क्षेत्र
D.
रक्षक मेखला