गहन जीविका कृषि से तात्पर्य सीमित भूमि में की जानी वाली वह कृषि है, जहाँ जनसंख्या घनत्व अधिक होता है। अधिक मात्रा में उत्पादन प्राप्त करने के लिये अधिक मात्रा में जैव रासायनिक निवेशों व सिंचाई का प्रयोग किया जाता है। यह श्रम गहन खेती है, क्योंकि किसान के पास वैकल्पिक रोजगार नहीं होता अतः इस प्रकार की कृषि में सीमित भूमि से ज्यादा पैदावार लेने का प्रयास किया जाता है।
i) यह एक प्रकार की वाणिज्यिक कृषि है । ii) विस्तृत भू-भाग में एक ही फसल ऊगाई जाती है । iii) अत्याधिक पूंजी व प्रवासी श्रमिकों की आवश्यकता होती है।
i. भारत की समुद्री सीमा 7,515 किलोमीटर है ।
ii. मछुआरे कुशल व साहसी है ।
iii. बहुउद्देशीय नदी घाटी परियोजनाओ पर बने बाँधो एवं नदियों में मछली पालन होता है ।
i. छोटे व सीमान्त किसानो की आय में वृद्धि।
ii. कृषि के लिये कम्पोस्ट खाद की प्राप्ति।
बकरी से दूध, माँस, चमड़ा तथा ऊन की प्राप्ति होती है । इसके लिये कम जगह तथा थोड़े चारे की जरुरत होती है । इसलिये बकरी को गरीब की गाय कहा जाता है ।
भारत में चाय असम राज्य की सुरमा व ब्रह्मपुत्र नदी की घाटी, पश्चिमी बंगाल, केरल, तमिलनाडु, बिहार, उत्तराखंड, कर्नाटक एवं हिमाचल प्रदेश में उत्पादित होती है ।
भारत में कर्नाटक, केरल एवं तमिलनाडु में कहवा की तीन प्रकार की किस्में पैदा होती है किस्में -
i. अरेबिका कहवा
ii. रोबस्टा कहवा
iii. लाइबेरिका कहवा
जूट का स्थानीयकरण हुगली नदी की घाटी में निम्न कारणों से हुआ है -
i. उपजाऊ मिट्टी एवं पानी की निरंतर उपलब्धता ।
ii. सस्ते श्रमिकों की पूर्ति ।
निम्नलिखित तथ्यों के कारण भारत को मुख्य रूप से एक कृषि प्रधान देश कहा जाता है :
i) इसकी दो तिहाई जनसँख्या कृषि पर निर्भर है।
ii) सकल घरेलू उत्पाद में कृषि का 25 प्रतिशत योगदान है।
iii) देश के निर्यात मूल्य का 16 प्रतिशत हिस्सा कृषि से आता है।
iv) लगभग 65 प्रतिशत श्रम शक्ति रोजगार कृषि प्रदान करती है।
निम्नलिखित स्थितियां भारत में कृषि विकास के लिए उत्तरदायी हैं :
i) समतल भूमि का बृहद फैलाव।
ii) उपजाऊ मिट्टी
iii) समय-समय पर जलवायु में परिवर्तन विभिन्न फसलों के लिए हितकर।
iv) पर्याप्त धूप और लंम्बा मौसम।
'नई कृषि नीति' के प्रमुख तत्व निम्नलिखित हैं -
i) बड़ी पूंजी और तकनीकी जानकारी का प्रयोग।
ii) खेती के आधुनिक वैज्ञानिक तरीकों को अपनाना।
iii) उन्नत किस्म के बीजों का उपयोग।
iv) रासायनिक उर्वरकों, कीटनाशकों का समुचित उपयोग।
निम्न कारणों से मिश्रित खेती किसानों के लिए एक स्थिर आय सुनिश्चित करती है :
मिश्रित खेती में फसलों और पशुओं से आय बढ़ाते हैं? दो या दो से अधिक फसलें एक साथ उगाई जाती हैं जिससे दो या दो से अधिक फसलों से किसान की आय होती है। यदि प्रतिकूल जलवायु या किसी अन्य कारण से किसान की आय प्रभावित होती है तो किसान पशुपालन की तरफ मुड़ जाता है।
खेती के इस प्रकार को वृक्षारोपण खेती कहा जाता है। इसकी मुख्य विशेषताएं इस प्रकार हैं :
i) आधुनिक तकनीक और मशीनरी का उपयोग से बड़े खेतों में एकल खेती की जाती है।
ii) रासायनिक उर्वरकों, कीटनाशकों और तृणनाशकों का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल किया जाता है।
iii) वाणिज्यिक फसलें जैसे - चाय, कॉफी और रबर को लाभ के लिए बड़े पैमाने पर उगाया जाता है।
A.
पंजाब
B. कर्नाटक
C. पश्चिम बंगाल
D. गुजरात
भारत में कुल चावल उत्पादन का लगभग 16% उत्पादन केवल पश्चिम बंगाल करता है|
A.
चावल
B. कपास
C. सरसों
D. बाजरा
खरीफ फसल अप्रैल से जून तक गर्मियों में मानसून से पहले उगाई जाती हैं और सितंबर-अक्टूबर में काटी जाती हैं|
A.
चावल
B.
बाजरा
C.
चना
D.
कपास
रबी फसलों का मौसम सर्दियों में अक्टूबर से दिसंबर में मानसून के बाद आरम्भ होता है और इन फसलों को गर्मियों में अप्रैल से जून तक काटा जाता है|
A.
चावल
B.
गेहूँ
C.
बाजरा
D.
खीरा
खरीफ और रबी के बीच के मौसम को ज़ायद मौसम कहा जाता है।
A.
रतालू
B.
चावल
C.
गेहूं
D.
बाजरा
मुख्य रुप से कृषि स्थानांतरण में उगाई जाने वाली फसल रतालू, जड़ और कंद हैं|
A.
पश्चिम
बंगाल
B. महाराष्ट्र
C. केरल
D. तमिलनाडु
महाराष्ट्र संतरा उत्पादन का प्रमुख राज्य है|
A.
ऑस्ट्रेलिया
B.
क्यूबा
C.
ब्राज़िल
D.
फ्रांस
दक्षिणी अमेरिका की जलवायु गन्ना उत्पादन के लिए उपयुक्त है| ब्राजील दुनिया का सबसे बड़ा गन्ना उत्पादक राष्ट्र है|
A.
दलहन
B. बाजरा
C. ज्वार
D. तिल
फलीदार फसलों और हवा से नाइट्रोजन फिक्सिंग के द्वारा मिट्टी की उर्वरता बढ़ाने में दलहन सहायक होते हैं|
A.
तापमान- 25 डिग्री सेल्सियस, वर्षा-100 सेमी० - 200 सेमी०
B.
तापमान- 20-25 डिग्री सेल्सियस, वर्षा- 50 सेमी० -75 सेमी०
C.
तापमान- 21-27 डिग्री सेल्सियस, वर्षा- 50 सेमी० -75 सेमी०
D.
तापमान- 20-25 डिग्री सेल्सियस, वर्षा- 50 सेमी० -75 सेमी०
चावल की फसल के लिए 25 डिग्री सेल्सियस तापमान और 100 सेमी० से 200 सेमी० वर्षा की आवश्यकता होती है|
A.
रासायनिक
उर्वरकों से
B. मानसून से
C. उच्च उपज फसलों या बीज से
D. कीटनाशकों से
मिट्टी का प्राकृतिक प्रजनन, परिवार के सदस्यों द्वारा उत्पादन केवल मानसूनी आदिम निर्वाह कृषि के साथ जुड़े हैं|
A. झूम कृषि
B. व्यावसायिक कृषि
C. बागान कृषि
D. मत्स्य पालन.
असम जैसे पूर्वोत्तर राज्यों में, स्थानांतरण कृषि 'झूम कृषि’ के नाम से भी जानी जाती है|
A.
हरित
क्रांति का
B. श्वेत क्रांति का
C. जनन विज्ञान अभियांत्रिकी का
D. वैज्ञानिक अनुसंधान का
यह इंजीनियरिंग की महत्वपूर्ण शाखाओं में से एक है, जो भारतीय कृषि के क्षेत्र में बीज और पौधों की नई किस्मों के विकास में सहायक है|
A. पंजाब और हरियाणा
B. ओड़िशा और पश्चिम बंगाल
C. राजस्थान और गुजरात
D. हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड
व्यावसायिक कृषि एक ऐसी कृषि है, जो फसलों की उच्च उत्पादकता प्राप्त करने के लिए आधुनिक साधनों का उपयोग करके बाजार के लिए तैयार की जाती है| यह पंजाब और हरियाणा राज्यों में अत्यधिक प्रचलित है।
A.
मूंगफली
B. नारियल
C. केस्टर-बीज
D. सरसों
यह एक ऐसी फसल है जो दोनों मौसमों में उगाई जा सकती है।
इसमें वे आर्थिक गतिविधियाँ हैं जो उपभोक्ताओं को सेवाएं प्रदान करती हैं।
कृषि प्राथमिक गतिविधि है। जिसमे बढ़ती फसले, फल, सब्जियाँ, फूल और पालन पशुधन भी शामिल है।
रेशम के कीड़ों के वाणिज्यिक पालन को रेशम उत्पादन कहा जाता है।
विशेष रूप से निर्मित टैंक और तालाबों में मछली की व्यावसायिक रूप से प्रजनन मछली पालन कहा जाता है
वाणिज्यिक उपयोग के लिए सब्जियों, फूलों और फलों उत्पादन को बागवानी के रूप में जाना जाता है।
1. लघु कृषक विकास संस्था (SFDA) 2. सीमांत किसान विकास संस्था (MFDA)
1) निर्वाह कृषि 2) व्यापारिक कृषि
i. भारत में खनन कार्य में आधुनिक तकनीक का प्रयोग नहीं किया जाता है ।
ii. हिमालय के पर्वतीय भागो में खनिज के विशाल भंडार है । परन्तु आवागमन के साधनों की कमी के कारण अभी तक सर्वेक्षण कार्य नहीं किया जा सका है ।
मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, कर्नाटक एवं आन्ध्र प्रदेश भारत का
भारत में सरसों की खेती उत्तरप्रदेश, बिहार, हरियाणा, पश्चिमी बंगाल, पंजाब, मध्यप्रदेश, उड़ीसा, राजस्थान आदि राज्यों में की जाती है ।
मक्का की कृषि के लिए आवश्यक भौगोलिक दशाएं
i. तापमान 25 से 30 डिग्री सेन्टीग्रेट
ii. वर्षा 50 से 100 सेंटीमीटर
iii. मिट्टी - दोमट, सरन्ध्र व ढालू भूमि
भारत में 1950 -51 के बाद गेहूँ के उत्पादन व व्यापार की प्रवृत्ति
i. सन 1950 -51 में 97 लाख हेक्टेयर क्षेत्र पर 68 लाख टन गेहूँ का उत्पादन
ii. सन 1998 -99 में 273 लाख हेक्टेयर क्षेत्र पर 707 .7 लाख टन गेहूँ का उत्पादन
iii. सन 2003 -04 में 727.4 लाख टन गेहूँ का उत्पादन
iv. सन 2006-07, एवं 2007-08 में 780 लाख टन गेहूँ का उत्पादन
भारतीय कृषि अधिकतर मानसून पर निर्भर करती है, इसी मानसून की अनिश्चित के कारण भारतीय कृषि को मानसून का जुआ भी कहते हैं ।
हमारे देश में अनेक प्रकार की जलवायु परिस्थितियां, भूखंड और मिट्टी पायी जाती हैं इसलिए विभिन्न प्रकार की फसलें देश दे विभिन्न क्षेत्रों में उगाई जाती हैं।
मोनोकल्चर कृषि के उस प्रकार को संदर्भित करता है जिसमें केवल एक फसल उगाई जाती है जैसे - चाय और रबर के बागान।
शुष्क धान, अनाज, मक्का और बाजरा
गहन कृषि उप हिमालय के तराई क्षेत्र में प्रचलित है।
कृषि एक खेती है जिससे उत्पादित पौधे, रेशे, फसलों को जीवन को बनाये रखने में उपयोग किया जाता है।
भारत में 143 मिलियन हेक्टेयर क्षेत्रफल भूमि पर खेती की जाती है जो कुल भौगोलिक क्षेत्रफल का 46.6 प्रतिशत है।
बाज़रा की फसल शुष्क खेती में उगाई जाती है क्योंकि यह जल्दी पक्ति हैं और सूखा प्रतिरोधी होती हैं।
1.कोरकोरस केप्सुलरिस (सफ़ेद जूट)
2.कोरकोरस ओलिटोरियस (तोस्सा जूट)
जूट का प्रयोग हलकी गुणवत्ता वाले कपड़ों के निर्माण में, बोरी, चटाई, कारपेट, सुतली व अन्य पेकिंग सामग्री के निर्माण में होता है |
वह फसलें जिनकी खेती बाजार में बेचने के लिए की जाती है | जैसे कपास, गन्ना आदि |
जुट का प्रयोग गनी बैग,रस्सी, धागा, कारपेट व अन्य दस्तकारी का सामान बनाने में होता है |
अत्यधिक लागत की वजह से इसके बाजार पर सिंथेटिक रेशों का अधिकार होता जा रहा है, जो अपेक्षाकृत सस्ता है| सिंथेटिक रेशे विशेषकर नायलोन का प्रयोग पेकिंग सामग्री के रूप में किया जा रहा है|
भारत का विश्व कपास उत्पादन में तीसरा स्थान है भारत के प्रमुख कपास उत्पादक राज्य हैं –
महाराष्ट्र,गुजरात,मध्य प्रदेश कर्नाटक, आँध्रप्रदेश,तमिलनाडु, पंजाब, हरियाणा एवं उत्तरप्रदेश |
जूट भारतीय उपमहाद्वीप में सुनहरे रेशे के नाम से जाना जाता था |1947 में हुए विभाजन के बाद प्रमुख जूट आपूर्ति क्षेत्र तो पूर्वी पाकिस्तान (आज का बंग्लादेश) में चला गया जबकि अधिकांश मिलें भारत में रह गयीं|
A.
भूगर्भशास्त्र
B.
भू-आकृति विज्ञान
C.
पारिस्थितिकी तंत्र
D.
पारिस्थितिकी
पारिस्थितिकी को एक विज्ञान के रूप में माना जाता है, क्योंकि यह जीवित प्राणियों और उनके बीच संबंधों का अध्ययन करता है।
A.
संरक्षित वन
B.
जीवमंडल आरक्षित
C.
वन्यजीव अभ्यारण्य
D.
राष्ट्रीय उद्यान
एक राष्ट्रीय उद्यान एक या कई पारिस्थितिक तंत्र वाले अपेक्षाकृत बड़े क्षेत्र होते हैं। यहाँ पौधे और पशु प्रजातियाँ, स्थलाकृतिक आकृतियाँ और विशेष वैज्ञानिक शिक्षा और मनोरंजन के लिए निवास संरक्षित हैं। वन्य जीव पशुविहार, राष्ट्रीय उद्यान की तरह वन्य जीवों और संकटग्रस्त प्रजातियों की रक्षा के लिए समर्पित हैं।
A.
स्थानीय उपयोग के लिए आरक्षित
B.
वाणिज्यिक उपयोग के लिए आरक्षित
C.
शिकार के लिए आरक्षित
D.
औषधीय जड़ी बूटियों की वृद्धि के लिए आरक्षित
वनस्पतियों को बड़ी तेजी से समाप्त किया जा रहा है। इसलिए सरकार ने कुछ निश्चित क्षेत्रों को आरक्षित क्षेत्र घोषित कर दिया है| आरक्षित क्षेत्र में कोई भी ऐसी गतिविधि जिससे वनस्पति का ह्रास हो, को निषिद्ध घोषित कर दिया गया है।
A.
जनमानस केंद्रित
B.
बाल केंद्रित
C.
सरकार केंद्रित
D.
वाणिज्यिक केंद्रित
विकास कार्य लोगों को ध्यान में रखते हुए किया जाना चाहिए। सरकार को इस तरह की जनमानस केंद्रित नीतियों को क्रियान्वित करना चाहिए जिसमें लोगों की भागीदारी हो और वे निर्णय लेने में शामिल हों।
A.
पंजाब
B.
केरल
C.
ओड़िशा
D.
गुजरात
भारत में विशेषकर ओड़िशा में संयुक्त वन प्रबंधन कार्यक्रम में क्षरित वनों के प्रबंध और पुनर्निर्माण में स्थानीय समुदायों की महत्वपूर्ण भूमिका शामिल है। इस तरह के कार्यक्रम पर्यावरण के अनुकूल और आर्थिक रूप से लाभप्रद साबित हुए हैं।
वन संरक्षण नीति के उद्देश्य:
(i) मानव निर्मित वनों का विस्तार करके वनोत्पादों को बढ़ाना|
(ii) वन विकास को वन निर्भर उद्योगों कि आवश्यकता से जोड़ना |
(iii) वनों का विकास ग्रामीण अर्थव्यवस्था के सहायक विकास के रूप में करना |
एक सामान भौतिक विशेषताओं वाले प्रदेश जहां कुछ निश्चित प्रजाति, वनस्पतियों एवं जीवों का मिश्रण मिलता है उसे नैचुरल हैबिटाट कहा जाता है |
उष्ण कटिबंधीय शुष्क पर्णपाती वनों का विस्तार भारत के उत्तरी भागों में मिलता है जहां तापमान 27 डिग्री सेल्सियस तथा वर्षा 150 से.मी. तक होती है |
सदाबहार वनों का विस्तार महाराष्ट्र, केरल, कर्नाटक, बंगाल और असम राज्यों में मिलता है |
टाइगर प्रोजेक्ट की शुरुआत 1973 में की गयी |
समशीतोष्ण वनों की लकड़ियों का प्रयोग मुख्यतः कागज़, लुगदी व दियासलाई के निर्माण में होता है |
पृथ्वी पर बिना मानवीय प्रयास के अपने आप उग आये पेड़- पौधों और झाड़ियों के समूह को प्राकृतिक वनस्पति कहते हैं |
किसी स्थान की वनस्पति को प्रभावित करने वाले कारक वहाँ की उच्चावच, जलवायु तथा मिट्टी हैं |
पारिस्थितिकी जीव विज्ञान का वह भाग है जिसमें जीव और उसके पर्यावरण के बीच पारस्परिक संबंधों का अध्ययन किया जाता है |
वन से होने वाली प्रत्यक्ष और परोक्ष लाभ को देखते हुए सरकार के वन विकास की एक नयी नीति तैयार की है इस नीति के द्वारा वनो का संरक्षण करने में काफी मदद मिलती है।
इसके दो उपाय निम्नलिखित हैः
(1) मानव निर्मित वनों का विस्तार करके वनो से प्राप्त होने वाले उत्पादन को बढ़ाना।
(2) वन विकास को वन-निर्भर उद्योगों की आवश्यकता से जोड़ना।
1) औपनिवेशकाल की क्रियाएँ - कालांतर में रेल लाइनों के विस्तार , कृषि क्षेत्र में विस्तार, वाणिज्य वानिकी आदि क्रियाओं की वृद्धि ने वन्य जीव व वनस्पति को बहुत नुकसान पंहुचाया है । 2) कृषि क्षेत्र का विस्तार - बूम खेती या स्थानांतरित खेती ने भी वनस्पतिजात व प्राणिजात को नुकसान पहुंचाया है ।
वन्य जीव (संरक्षण) अधिनियम 1972 के अंतर्गत सरकार के द्वारा राज्यों को दी
जानेवाली तीन सहायताएं:
(i) राष्ट्रीय उद्यान एवं वन्य जीव अभ्यारण्य के प्रबंधन एवं विकास के लिए शत -
प्रतिशत आर्थिक अनुदान देना |
(ii) वन्य जीव एवं उनसे प्राप्त उत्पादों की सुरक्षा एवं गैर कानूनी शिकार आदि से
सुरक्षा प्रदान करना |
(iii) चिड़ियाघर की पुर्नस्थापना एवं विकास |
विभिन्न पारिस्थितिक तंत्रों या जैव समुदायों में मिलने वाली विभिन्न प्रजाति, वनस्पति तथा सूक्ष्म जीवों के समूह को जैव विविधता कहते हैं| भारत सरकार द्वारा 'जैव विविधता एक्ट ' 1998 में पारित किया गया |
ज्वारीय वनों के वृक्षों की प्रमुख विशेषता यह है कि ये खारे तथा ताजे जल दोनों में ही पनप सकते है | सुंदरी यहाँ का प्रमुख वृक्ष है |
पश्चिमी भारत के विशेषकर राजस्थान में पीने का जल एकत्रित करने के लिए आमतोर पर ‘छत वर्षा जल संग्रहण’ का तरीका अपनाते थे।
बहुउद्देशीय परियोजनाएँ और बड़े बाँध का निर्माण के कारण बहुत से नए सामाजिक आंदोलनों का उदय हुआ है, ऐसे ही दो आंदोलनों हैं - ‘नर्मदा बचाओ आंदोलन’ और ‘टिहरी बाँध आंदोलन’ ।
विश्व में अलवणीय जल का लगभग 70 प्रतिशत भाग अंटार्कटिका, ग्रीनलैंड और पर्वतीय क्षेत्रों में बर्फ की चादरों और हिमनदों के रूप में मिलता है|
भारत की नदियाँ विशेषकर छोटी सरिताएँ, प्रदूषित धाराओं में परिवर्तित हो गई हैं और बड़ी नदियाँ जैसे गंगा और यमुना कोई भी शुद्ध नहीं हैं। बढ़ती जनसंख्या, कृषि, आधुनिकीकरण, नगरीकरण और औद्योगीकरण का भारत की नदियों पर अत्यधिक दुष्प्रभाव पढ़ रही है और हर दिन गहराता जा रहा है, इससे संपूर्ण जीवन खतरे में पड़ रहा है।
उद्योगों की बढ़ती हुई संख्या के कारण अलवणीय जल संसाधनों पर दबाव बढ़ रहा है। उद्योगों को अत्यधिक जल के अलावा उनको चलाने के लिए ऊर्जा की भी आवश्यकता होती है और इसकी काफ़ी हद तक पूर्ति जल विद्युत से होती है। वर्तमान समय में भारत में कुल विद्युत का लगभग 22 प्रतिशत भाग जल विद्युत से प्राप्त होता है।
सतलुज-ब्यास नदी बेसिन में भाखड़ा-नांगल परियोजना मूलतः जल विद्युत उत्पादन और सिंचाई दोनों काम के उद्देश्य से बनायी गयी है।
1) वृक्षारोपण कर बादलों को वर्षा करने के लिए आकर्षित किया जाए । 2) वर्षा जल का संरक्षण किया जाना चाहिए ।
दामोदर घाटी परियोजना द्वारा 1,187 मेगावाट बिजली का उत्पादन होता है। यह परियोजना छोटा नागपुर पठार के उजाड़ और वीरान क्षेत्र के लिए वरदान सिद्ध हुई है। दामोदर घाटी के ऊपरी भाग में वन लगाकर भू-क्षरण नियन्त्रित किया गया है। नहर के कारण पश्चिमी बंगाल और झारखंड से कोयला और अभ्रक नावों द्वारा कारखानों तक पहुँचाया जाता है। बोकारो, सिन्दरी, दुर्गापुर, कोडरमा के औद्योगिक केन्द्रों पर इस परियोजना के द्वारा सस्ती जल-विद्युत भेजी जाती है।
शहरों की बढ़ती संख्या और जनसंख्या तथा शहरी जीवन शैली के कारण न केवल जल और ऊर्जा की आवश्यकता में बढ़ोतरी हुई है अपितु इनसे संबंधित समस्याएँ और भी गहरी हुई हैं। यदि आप शहरी आवास समितियों या कालोनियों पर नजर डालें तो आप पाएँगें कि उनके अंदर जल पूर्ति के लिए नलकूप स्थापित किए गए हैं। इसमें कोई आश्चर्य नहीं है कि शहरों में जल संसाधनों का अति शोषण हो रहा है और इनकी कमी होती जा रही है।
परम्परागत बाँध, नदियों और वर्षा जल को इकट्ठा करके बाद में उसे खेतों की सिंचाई के लिए उपलब्ध करवाते थे। आज कल बाँध सिर्फ सिंचाई के लिए नहीं बनाए जाते अपितु उनका उद्देश्य विद्युत उत्पादन, घरेलू और औद्योगिक उपयोग, जल आपूर्ति, बाढ़ नियंत्रण, मनोरंजन, आंतरिक नौचालन और मछली पालन भी है। इसलिए बाँधों को बहुउद्देशीय परियोजनाएँ भी कहा जाता है जहाँ एकत्रित जल के अनेकों उपयोग समन्वित होते हैं। उदाहरण के तौर पर महानदी बेसिन में हीराकुंड परियोजना जलसंरक्षण और बाढ़ नियंत्रण का समन्वय है।
प्राचीन भारत में कई प्रमुख जलीय संरचनायें पाई जाती हैं, जैसे:
क. ईसा से एक शताब्दी पहले इलाहाबाद के नजदीक श्रिगंवेरा में गंगा नदी की बाढ़ के जल को संरक्षित करने के लिए एक उत्कृष्ट जल संग्रहण तंत्र बनाया गया था।
ख. चन्द्रगुप्त मौर्य के समय बृहत् स्तर पर बाँध, झील और सिंचाई तंत्रों का निर्माण करवाया गया। कलिंग (ओडिशा), नागार्जुनकोंडा (आंध्र प्रदेश) बेन्नूर (कर्नाटक) और कोल्हापुर (महाराष्ट्र) में उत्कृष्ट सिंचाई तंत्र होने के सबूत मिलते हैं।
ग. अपने समय की सबसे बड़ी कृत्रिम झीलों में से एक, भोपाल झील, 11वीं शताब्दी में बनाई गई।
घ. 14वीं शताब्दी में इल्तुतमिश ने दिल्ली में सिरी फोर्ट क्षेत्र में जल की सप्लाई के लिए हौज खास (एक विशिष्ट तालाब) बनवाया था।
जल प्रबन्धन का तात्पर्य उपलब्ध जल संसाधनों का उचित विदोहन और उपयोगकरना
महत्व
(i) स्थिति- यह उत्तर प्रदेश की सबसे बड़ी परियोजना है। यह परियोजना सन् 1956 में बन गयी थी। सोनभद्र जिले में पिपरी नामक स्थान पर सोन की सहायक नदी रिहन्द पर रिहन्द बाँध बनाया गया। यह 936 मीटर लम्बा और 91 मीटर ऊँचा है। रिहन्द बाँध के पीछे बने जलाशय का क्षेत्रफल 466 वर्ग किमी ओर क्षमता 10,608 लाख घनमीटर की है।
(ii) प्रभावित क्षेत्र- रिहन्द परियोजना से उत्तर प्रदेश और पश्चिमी बिहार का बहुमुखी विकास हुआ है।
(iii) महत्व - इसकी सफाई के लिए 4 सुरंग बनायी गयी हैं तथा बाढ़ का जल निकालने के लिए 13 फाटक लगाये गये हैं। इस परियोजना के अन्तर्गत ओबरा नामक स्थान पर ही 300 मेगावाट क्षमता का जलविद्युत् शक्तिगृह बनाया गया है। इसमें 600 किमी लम्बी नहर निकाली गयी है जिससे 6.0 लाख हेक्टेयर भूमि पर सिंचाई की जाती है। उत्तर प्रदेश के उद्योग के विकास के लिए इन क्षेत्रों को सस्ती जलविद्युत प्राप्त की जाती है। मुगलसराय व पटना के मध्य रेलगाड़ी चलाने में भी इस जलविद्युत शक्ति का प्रयोग होता है। सोन नदी के प्रवाह को कम करके मिट्टी के कटाव को रोका गया है।
बहुउद्देश्यीय परियोजना का मतलब ऐसी योजना से होता है जिसका निर्माण कईउद्देश्यों की पूर्ति के लिए किया जाय। इन परियोजनाओं के निर्माण का मुख्य उद्देश्य भारत का चौतरफा विकास करना है। इसके अन्तर्ग सिंचाई, जल-विद्युत, बाढ़- नियन्त्रण, नौका वाहन और पारितंत्र का संचरण करना है।
(1) बाढ़ पर नियन्त्रण के साथ ही मिट्टी का कटाव रोकना।
(2) सिंचाई के लिए नहरों का निर्माण करना।
(3) जलशक्ति का उत्पादन करना।
(4) जल परिवहन का विकास करना।
(5) सस्ती बिजली प्राप्त कर औद्योगिक विकास करना।
(6) जलाशयों में मत्स्य उद्योग को बढ़ावा देना।
(7) इनका उद्देश्य योजनाबद्ध तरीके से वृक्षारोपण करके वन का विस्तार करना।
(8) अकाल के समय जल सूखे क्षेत्रों में भेजना।
A.
कृषि स्थानांतरण
B.
व्यावसायिक खेती
C.
वृक्षारोपण कृषि
D.
आदिम निर्वाह खेती
वृक्षारोपण कृषि एक एकल व्यापक क्षेत्र पर की जाती है| उदाहरण: कॉफी के बगान|
A.
गहन कृषि
B.
वृहत कृषि
C.
जैविक कृषि
D.
आनुवांशिक कृषि
इस प्रकार की कृषि कारखानों मे बनाए गये रसायनों, उर्वरकों और कीटनाशकों के उपयोग के बिना की जाती है।
A.
भारतीय खाद्य निगम
B.
भंडारण
C.
सार्वजनिक वितरण प्रणाली
D.
किसान क्रेडिट प्रणाली
सार्वजनिक वितरण प्रणाली एक ऐसा कार्यक्रम है, जो ग्रामीण क्षेत्रों में सब्सिडी वाले दामों पर खाद्यान्न और अन्य आवश्यक वस्तुएं प्रदान करता है|
A.
विश्व
व्यापार
संगठन
B. किसान क्रेडिट कार्ड
C. भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद
D. कृषि विज्ञान के भारतीय संस्थान
इस संस्था ने कृषि के क्षेत्र में अनुसंधान आरम्भ किए और भारत में कृषि के आधुनिकीकरण के लिए सहायता प्रदान की है|
A.
पदयात्रा
आंदोलन
B. भूदान आंदोलन
C. श्रम दान आंदोलन
D. गोदान आंदोलन
विनोबा भावे गांधी जी के शिष्य थे। उन्होंने अमीर जमींदारों को मनाने के लिए भूमिहीन मजदूरों को उनकी भूमि दान करने के लिए भूदान आंदोलन की शुरुआत की|
A. बिहार
B. पंजाब
C. हरियाणा
D. कर्नाटक
मक्का मुख्य रूप से कर्नाटक, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश और बिहार के राज्यों में उगाया जाता है|
छोटी जोत से कृषि प्रभावित होती है इसके निम्न कारण हैं -
1. छोटे और खंडित जोत आधुनिक कृषि को प्रोत्साहित नहीं कर सकते।
2. वे नई कृषि वस्तुओं को खरीदने के लिए भारी निवेश करने के लिए पर्याप्त आय उत्पन्न नहीं करते।
3. विकसित तकनीक और वैज्ञानिक खेती नहीं की जाती।
4. इन जोतों से समय, श्रम की बर्बादी होती है और सिंचाई की सुविधाओं का समुचित उपयोग नहीं होता है।
पर्यावरण पर सकारात्मक प्रभाव के लिए कार्बनिक कृषि की जानी चाहिए, क्योंकि इसमें रासायनिक उर्वरकों व कीटनाशकों का प्रयोग नहीं किया जाता।
गेहूॅं। नवम्बर से दिसबर के अंत तक बोये जाते हैं।

चावल के लिये तापमान 26 डिग्री सेटी ग्रेट, वर्षा 100 से 200 से. मी. के वीच तथा चिकनी उपजाऊ मिटटी की जरुरत होती है l
जो कृषि बाजार मे बेचने के लिये की जाती है उसे व्यापारिक कृषि कहते है जैसे गन्ना, जूट आदि l