जो कृषि केवल स्थानीय आवश्यकताओ की पूर्ति के लिया की जाती है उसे निर्वाह कृषि किसे कहते है |
1. गलत
2. सही
3. गलत
4. सही
1. गलत
2. गलत
3. गलत
4. सही
जिनिंग की प्रक्रिया में कपास के बिनौले में से कपास के रेशों एवं बीजों को अलग अलग किया जाता है | व उनसे चिपके छोटे रेशों को छांटा जाता है |
1.दक्कन के पठार का काली मिटटी युक्त उत्तर-पश्चिमी क्षेत्र |
2.कर्नाटक एवं तमिलनाडु राज्य का दक्षिणी एवं मध्य दक्कन का पठारी क्षेत्र |
3.उपरी गंगा घाटी |
रबड़ का पौधा ऊष्ण एवं आद्र जलवायु में वर्ष भर अच्छी तरह बढ़ता है|
1.तापमान – रबड़ की वृद्धि के लिए 25 o C -35 oC के मध्य तापमान आदर्श है |
2.वर्षा –152 cm से 200 cm के मध्य वार्षिक वर्षा अनुकूल होती है |जो वर्ष भर सामान रूप से वितरित होनी चाहिए |
प्राकृतिक रबड़ के उत्पादन में भारत चौथा सबसे बड़ा देश है | देश के कुल उत्पादन का 94% केरल राज्य से प्राप्त होता है | केरल के कोट्टायम, कोजिकोड़, एर्नाकुलम जिले प्रमुख उत्पादक हैं | अन्य उत्पादक राज्यों में तमिलनाडु, कर्नाटक, त्रिपुरा,असम, अंडमान एवं निकोबार द्वीप समूह व गोवा शामिल हैं |
रबड़ के पौधे से रबड़ एकत्र करने की प्रक्रिया को रबड़ एकत्रीकरण कहते हैं | इस हेतु पेड़ की निचले भाग में V आकार का चीरा लगाया जाता है जिसमे से होकर लेटेक्स बह सके | टपकने वाले लेटेक्स को एकत्र करने के लिए V आकर के अंत में ज़स्ते या लोहे के बर्तन को लटकाया जाता है | जब लेटेक्स टपकना बंद हो जाता है तब इसे एक बाल्टी में एकत्र कर लिया जाता है |
इस प्रक्रिया में जूट को पानी में गलाया जाता है उसके बाद इसे लटकाया जाता है जिससे अनावश्यक पत्तियां हट जाती हैं | यह प्रक्रिया छाल को मुलायम बनती है व उसमें से रेशा आसानी से अलग हो जाता है |
सरसों के बीज की खेती के लिए भौगोलिक आवश्यकताऍ इस प्रकार हैं:
(i) तापमान: 10 डिग्री सेल्सियस से 20 डिग्री सेल्सियस
(ii) वर्षा: 50 -100 सेमी
(iii) मृदा: जलोढ़ मिट्टी
चाय उद्योग के महत्व:
(i) चाय एक श्रम प्रधान उद्योग है। यह एक लाख से अधिक पुरुषों और महिलाओं को रोजगार प्रदान करता है।
(ii) चाय उद्योग प्लाई लकड़ी, उर्वरक और परिवहन उद्योग का समर्थन करता है।
(iii) चाय मुख्य विदेशी मुद्रा अर्जक में से एक है।
अरंडी के दो प्रमुख उपयोग है:
(i) इसका प्रयोग पेंट, वार्निश, मुद्रण स्याही, लिनोलियम, पारदर्शी पेपर, साबुन, तेल, कपड़ा और प्लास्टिक में किया जाता है
(ii) इसका प्रयोग उच्च गति के इंजन और वाहनों के लिए स्नेहक के रूप में किया जाता है।
चाय के तीन मुख्य किस्में हैं:
(i) काली चाय: इसे धूप में पत्तियां सूखने से तैयार किया जाता है और फिर स्टील रोलर्स के बीच यंत्रवत् उन्हें रोल कर और उनका किण्वन किया जाता है।
(ii) हरी चाय:चाय के इस प्रकार के प्रसंस्करण में कोई किण्वन नही किया जाता है।
(iii) ऊलौंग चाय: इसमे आंशिक रूप से पत्तो का किण्वन किया जाता है। यह चाय हरे-भूरे रंग के पत्ते है।
वन से होने वाले प्रत्यक्ष और परोक्ष लाभ को देखते हुए सरकार द्वारा वनों विकास हेतु संरक्षित किया जाता है जिसे वन संरक्षण कहते है।
मानव के आर्थिक विकास में वनों का विशेष महत्त्व है। वन ही हमारी राष्ट्रीय सम्पत्ति है।वनों के द्वारा अर्थव्यवस्था में वृद्धि की जा सकती है। वनों से हमें निम्न आर्थिक लाभ प्राप्त होते हैं-
1. लकड़ी वनों की प्रधान उपज है। वनों से हमें ईंधन हेतु लकड़ी प्राप्त होती है।
2. वनों से अधिक मात्रा में इमारती लकड़ी प्राप्त होती है जिसके लिए सागौन, साल, शीशम, देवदार एवं चीड़ की लकड़ी मुख्य हैं।
3. वनों से ही कागज, दियासलाई, रबड़, लुग्दी तथा अन्य बहुत से उद्योगों के लिए कच्चा माल मिलता है।
4. वनों से ही राजस्व और रायल्टी के रूप में प्रति वर्ष सरकार को 500 करोड़ रूपये से अधिक की पूँजी प्राप्त होती है।
5. भारतीय वनों से अनेक उप-उत्पाद भी प्राप्त होते है जिनमें कत्था, रबड़,मोम, कुनैन तथा जड़ी-बूटी मुख्य हैं।
6. भारतीय वनों से लगभग 8 करोड़ लोगों को रोजगार मिला है।
7. वनों में वृक्षों के नीचे उग आयी घास क्षेत्रों का इस्तेमाल चरागाह के रूप मेंकिया जा सकता है।
8. वनों में वन्य-जीवों को संरक्षण मिलता है।
9. वनों में लाख, गोंद, बाँस, बेंत, कत्था, बिरोजा, तारपीन का तेल, चमड़ा रँगनेका पदार्थ, जड़ी-बूटियाँ आदि प्राप्त होती है।
भारतीय वनों की तीन विशेषताएं :
(i) भारत में जलवायु भिन्नता के कारण अनेक प्रकार के वन पाए जाते हैं | जलवायु के आधार पर भारत में विषुवतरेखीय उष्ण सदाबहार वन से लेकर ध्रुवीय अल्पाइन वनस्पति तथा मरुस्थलीय कंटीले वन पाए जाते हैं|
(ii) भारत में सबसे ज्यादा मानसूनी वन पाए जाते है जो गर्मियों कि शुरुआत में अपनी पत्तियाँ गिरा देते हैं |
(iii) भारत में मुलायम लकड़ी के वन कम पाए जाते है तथा इनका आर्थिक महत्व अधिक है |
भारत में जैविक भंडारों की स्थापना के उद्देश्य :
(i) चुने हुए प्रदेशों से एकत्रित वनस्पतियों, जीवों, तथा सूक्ष्म जीवों की विविधता एवं एकता को संरक्षित करना |
(ii) शिक्षा, जनजागरण एवं प्रशिक्षण की उचित सुविधा प्रदान करना |
(iii) पारिस्थितिक संरक्षण एवं अन्य पर्यावरणीय पहलुओं पर अनुसंधान को बढ़ावा देना |
पर्यावरण संरक्षण सम्बन्धी निम्नलिखित पाँच कार्यक्रम परियोजनाएं उल्लेखनीय है :
(i) वन महोत्सव - राष्ट्रीय स्तर पर पर्यावरण संरक्षण के प्रति जनजागरण के लिए
सरकार ने प्रतिवर्ष 5 दिसंबर को वन महोत्सव के रूप में घोषित किया है | इस
दिन प्रत्येक राज्य में लाखों की संख्या में वृक्षारोपण किया जाता है |
(ii) वन्य जीवों का संरक्षण- वन संरक्षण नीति के अंतर्गत16 बाघ आरक्षित क्षेत्रों की
स्थापना की गई है |असम में गैंडों के संरक्षण के लिए विशेष योजना चलाई जा रही
है |
(iii)
विद्युत केंद्र की स्थापना पर रोक लगा कर पर्यावरण संरक्षण को बढ़ावा दिया है |
(iv) चिपको आन्दोलन- चिपको आन्दोलन की शुरुआत 1970 में सुन्दर लाल बहुगुणा
ने गढ़वाल, टिहरी, व कुमाऊं के क्षेत्रों में पेड़ों की अंधाधुंध कटाई को रोकने के लिए
की थी | इस आन्दोलन में आदिवासीयों तथा जनजातियों ने वृक्षों की कटाई के समय
वृक्षों से चिपक कर उनकी रक्षा की
(v) गंगा कार्य योजना- इस योजना की शुरुआत गंगा नदी में गिरने वाले घरेलु
तथा शहरी अपशिष्ट को अन्य स्थान पर एकत्र करने एवं उन्हें उपयोगी ऊर्जा श्रोतों
में परिवर्तित करने के उद्देश्य से की गयी है |
लुप्त हो रहे वन्य जीवों का संरक्षण निम्न उपायों को अपनाकर किया जा सकता है :
(i) संकटापन्न वन्य जीवों की सुरक्षा पर विशेष ध्यान दिया जाना चाहिए |
(ii) विलुप्त हो रहे वन्य जीवों की समय- समय पर जनगणना की जानी चाहिए |
(iii) बाघ आरक्षित क्षेत्रों की तरह ही जलीय जीवों तथा पक्षी विहारों की स्थापना की
जानी चाहिए |
(iv) देश में सिंहों की जनसंख्या के विकास पर सरकार द्वारा बल दिया जाना चाहिए |
(v) असम में गैंडों के संरक्षण के लिए चल रही योजना के जैसी संरक्षण योजनाओं का क्रियान्वयन किया जाना चाहिए |
A.
897 वर्ग किलोमीटर प्रति वर्ष
B.
1897 वर्ग किलोमीटर प्रति वर्ष
C.
2897 वर्ग किलोमीटर प्रति वर्ष
D.
3897 वर्ग किलोमीटर प्रति वर्ष
भारत का कुल नवीकरणीय अनुमानित जल संसाधन 1897 वर्ग किलोमीटर प्रति वर्ष है।
A.
मेघालय की पहाड़ियाँ
B.
पश्चिमी घाट के अनुवात की ओर
C.
गंगा के मैदान
D.
पूर्वी घाट
पश्चिमी
घाट के
अनुवात की ओर
होने के कारण, इस
क्षेत्र को
अरब सागर से
आर्द्रता
लाने वाली
पवनें
प्राप्त
नहीं हो पाती
हैं।
A.
मिजोरम
B.
मेघालय
C.
असम
D.
सिक्किम
यह मेघालय में सिंचाई का एक बहुत ही आम तरीका है। सिंचाई वाहिकाओं के लिए बाँस का इस्तेमाल पाइप के रूप में किया जाता है।
A.
पंजाब
B.
दिल्ली
C.
हरियाणा
D.
राजस्थान
पीने के पानी के संग्रहण की परम्परा छतजल संग्रहण थार के सभी शहरों और ग्रामों में प्रचलित था।
A.
जल निकाय
B.
जल वाहिकाएँ
C.
खेतों की सिंचाई के लिए बनाई गई वाहिकाएँ
D.
हिमालय की बेटियों के नाम
यह पश्चिमी हिमालय में जल संचयन की प्राचीन परंपरा थी और इन क्षेत्रों में इसके द्वारा सिंचाई की जाती थी।
A.
मध्य प्रदेश
B.
महाराष्ट्र
C.
कर्नाटक
D.
गुजरात
गुजरात में नर्मदा के सरदार सरोवर बाँध के खिलाफ शुरू किया गया नर्मदा बचाओ आंदोलन एक प्रसिद्ध आंदोलन था।
A.
121
B.
127
C.
133
D.
136
संयुक्त राष्ट्र विश्व जल विकास रिपोर्ट 2003 के अनुसार प्रति वर्ष प्रति व्यक्ति की जल उपलब्धता के संदर्भ में भारत का विश्व में 133वाँ स्थान था| इसका अर्थ यह है कि 2025 तक भारत का एक बड़ा हिस्सा विश्व के अन्य देशों और क्षेत्रों की तरह जल की नितान्त कमी महसूस करेगा।
A.
राजस्थान के क्षेत्रों में वर्षा जल
B.
पहाड़ी क्षेत्रों में पीने का पानी
C.
कश्मीर में भूमिगत पानी
D.
खेतों में जल संचयन
इस क्षेत्र में वर्षा के जल को प्राकृतिक जल का शुद्धतम रूप समझा जाता है और यहाँ वर्षा जल संचयन प्रणाली को अच्छी तरह से विकसित किया गया है।
A.
1 ट्रिलियन
B.
10 लाख
C.
2 अरब
D.
1.5 अरब
कई पर्यावरण और सामाजिक कारकों के कारण पीने के पानी के स्रोतों का तेजी से क्षरण हो रहा है।
A.
कर्नाटक में मेत्तूर गाँव
B.
कर्नाटक में गुलबर्गा
C.
कर्नाटक में गंडाथूर
D.
केरल में मीठापुर
इस गाँव के लगभग सभी 200 घरों ने जल संरक्षण तकनीक को अपनाया है और वे सफलतापूर्वक साफ़ पानी का उपयोग करते हैं।
A.
आंध्र प्रदेश
B.
कर्नाटक
C.
तमिलनाडु
D.
केरल
भारत के तमिलनाडु राज्य मे हर घर में छत वर्षाजल संग्रहण ढाँचों का बनाना आवश्यक कर दिया गया है। इस संदर्भ में दोषी व्यक्तियों पर कानूनी कार्यवाही की जा सकती है।
A.
प्रति व्यक्ति 2000 घन मीटर से कम होती है।
B.
प्रति व्यक्ति 3000 घन मीटर से कम होती है।
C.
प्रति व्यक्ति 1000 घन मीटर से कम होती है।
D.
प्रति व्यक्ति 500 घन मीटर से कम होती है।
स्वीडेन के विशेषज्ञ, फाल्कन मार्क के अनुसार जल की कमी तब होती है जब प्रत्येक व्यक्ति को प्रतिदिन 1000 घन मीटर से कम जल उपलब्ध होता है।
A.
जल संसाधन का कुप्रबंधन
B.
बढ़ती जनसंख्या के लिए पानी की बढ़ती माँग
C.
शहरी क्षेत्रों में औद्योगीकरण
D.
गिरता भू-जल स्तर
यद्यपि सभी विकल्पों का जल की कमी में कुछ न कुछ योगदान है, किन्तु यदि जल संसाधनों का कुशलता के साथ उचित प्रबंधन किया जाता है, तो यह जल संरक्षण में मदद कर सकता है।
A.
राजस्थान
B.
मध्य प्रदेश
C.
असम
D.
दिल्ली
असम और मिजोरम भारी वर्षा वाले क्षेत्र हैं और इसलिए यहाँ प्रतिवर्ष बाढ़ आने का खतरा बना रहता है।
A.
बाढ़ पर नियंत्रण
B.
मत्स्य पालन
C.
पर्यावरण निम्नीकरण
D.
मृदा अपरदन पर नियंत्रण
बहुउद्देशीय नदी घाटी परियोजनाओं से बाढ़ पर नियंत्रण और विद्युत उत्पादन जैसे कुछ लाभ हैं।
A.
कार्बन चक्र
B.
नाइट्रोजन चक्र
C.
जल चक्र
D.
हाइड्रोजन चक्र
महासागर से वायुमंडल, वायुमंडल से स्थल और स्थल से पुनः महासागर की चक्रीय गति को जलीय चक्र कहा जाता है।
A.
नर्मदा
B.
महानदी
C.
सतलुज
D.
गंगा
हीराकुंड बाँध महानदी पर स्थित है।
A.
असम
B.
राजस्थान
C.
दिल्ली
D.
बिहार
राजस्थान में 100 मिलिमीटर से भी कम बारिश होती है।
A.
वर्षा जल संग्रहण
B.
दर्शनीय सुन्दरता
C.
विद्युत उत्पादन
D.
वृक्षारोपण
बहुउद्देश्यीय
परियोजनाओं
का उद्देश्य
बिजली उत्पादन,
घरेलू
और औद्योगिक
उपयोग हेतु
जल आपूर्ति
और आंतरिक
नौचालन है।
A.
15%
B.
20%
C.
22%
D.
25%
भारत में कुल विद्युत उत्पादन का लगभग 22 प्रतिशत भाग जल विद्युत से प्राप्त होता है।
प्रकृति में सतही जल का पुनर्भरण और नवीकरण जलीय चक्र के द्वारा किया जाता है|
भारत में कुल नवीकरण योग्य जल संसाधन 1,897 वर्ग किमी. प्रति वर्ष अनुमानित है।
भारत विश्व की वृष्टि के कुल आयतन का 4 प्रतिशत हिस्सा प्राप्त करता है|
भारत प्रति व्यक्ति प्रति वर्ष जल उपलब्धता के संदर्भ में विश्व में 133 वाँ स्थान पर स्थित है।
विश्व के लगभग 30 प्रतिशत से थोड़ा-सा कम भौमजल के जलभृत (aquifer) के रूप में पाया जाता है।
विश्व में जल के कुल आयतन का 96.5 प्रतिशत भाग महासागरों में पाया जाता है|
विश्व में जल के कुल आयतन में केवल 2.5 प्रतिशत अलवणीय जल पाया जाता है।
अलवणीय जल हमें सतही अपवाह और भौमजल स्रोत से प्राप्त होता है|
1. नदियों पर बाँध बनाकर जल-विद्युत का उत्पादन होता है। यह ऊर्जा का स्वच्छ, धुआँ रहित, प्रदूषण मुक्त साधन है।
2. बाँध बनाकर जल की तीव्रता को रोका जाता है जिससे बाढ़ को रोका जा सके और मिट्टी का संरक्षण भी हो सके।
3. नदियों पर बाँध बनाकर नहरें निकाली जाती है जिनमें वर्षा का जल एकत्र किया जाता है। इन बाँधों के जल का प्रयोग गर्मी में सिंचाई के लिए किया जाता है।
भारत की दो प्रमुख घाटी परियोजनाओं में दामोदरघाटी परियोजना और भांखड़ानाँगल परियोजना मुख्य है।
जल-दुर्लभता का अर्थ माँग की तुलना में जल की उपलब्धता में कमी का होना है ।
प्रमुख कारण- (i) बढ़ती जनसंख्या का दबाव ii) जल संसाधनों का असमान वितरण iii) प्रदूषित जल iv) जल का अत्यधिक प्रयोग
कॉफी उत्पादन बढ़ाने के लिए किए गए प्रयास हैं:
(i) अधिक उपज देने वाली पौधो का परिचय
(ii) प्रबंधन तकनीकों की बेहतरी
(iii) खाद और कीटनाशकों के बेहतर उपयोग
कॉफी के दानो के प्रसंस्करण दो तरह से किया जाता हैं:
(i) आद्र और चर्मपत्र विधि: बीन्स को दानो के गूदे से प्राप्त किया जाता हैं। प्रत्येक बीन पर एक पतली चर्मपत्र की तरह त्वचा होती है। बीन्स किण्वन और वाशिंग टैंकों की एक श्रृंखला के माध्यम से गुजारे जाते हैं। वे सूख जाते हैं और कई दिनों तक इन्हे इसी प्रकार छोड़ दिया जाता है। छिलको को हॉलिंग मशीन द्वारा हटा दिया जाता है।
(ii) सूखी और देशी विधि: दानो के बाहरी कवर को हटाने के लिए धूप में सुखाया जाता है। बीजो को फिर पतली चर्मपत्र की तरह त्वचा को हटाने के लिए घुनाया जाता हैं।
पानी का प्रयोग खेतो की सिंचाई के लिए किया जाता है। अनपढ़ और अज्ञानी किसानों के कारण पानी बहुत बर्बाद हो रहा है। परिणामस्वरूप कुछ नया दृष्टिकोण प्रस्तुत किया गया है जैसे कि:
1) नहर की लाइनिंग टपका के माध्यम से पानी के नुकसान को कम करना।
2) टपका और वाष्पीकरण द्वारा स्प्रिंकलर के उपयोग से पानी की कमी को नियंत्रित करना।
3) ड्रिप या ट्रिकल सिंचाई का शुष्क क्षेत्रों में प्रयोग किया जाता है।
आर्थिक गतिविधियों के तीन प्रकार हैं: प्राथमिक, द्वितीयक और तृतीयक। प्राथमिक गतिविधियों में प्राकृतिक संसाधनों का दोहन और उत्पादन के साथ जुड़े सभी कार्य शामिल है। द्वितीयक गतिविधियों का संबंध प्रसंस्करण के साथ हैं और तृतीयक गतिविधियाँ प्राथमिक और द्वितीयक गतिविधियों का समर्थन प्रदान करते हैं।
|
खाद्य फसल |
नकदी फसल |
|
1. फसलें जो लोगों के बुनियादी खाद्य निर्माण करती है खाद्य फसल कहा जाता है। 2. इसमे अनाज और दालें शामिल हैं। 3. ये व्यावसायिक तौर पर या निर्वाह के लिए उत्पादित की जाती हैं। |
1. फसलें जो बेचने या निर्यात करने के लिए उत्पादित की जाती है नकदी फसल कहा जाता है। 2. इसमें रेशेदार फसले और पेय पदार्थ शामिल है। 3. वे व्यावसायिक रूप से उत्पादित की जाती है और किसानों के लिए नकदी तैयार करती हैं। |
बागान कृषि का प्रकार है जहां बड़ी मात्रा में श्रम और पूंजी की आवश्यकता होती है और उत्पादन को खेतो या आसपास के कारखानों में ही संसाधित किया जा सकता है। खेती के इस प्रकार में उगाई जाने वाली मुख्य फसलें चाय, कॉफी, गन्ना, काजू, रबर, केला और कपास हैं।
गेहूं की फसल को 10 से 15 डिग्री सेल्सियस के बीच मध्यम तापमान की आवश्यकता होती है। वृद्धि के दौरान वर्षा की और काटते समय में खिली धूप की आवश्यकता होती है। यह अच्छी तरह से सूखी चिकनी बलुई मिट्टी पर अच्छी तरह से बढ़ता है। गेहूं के प्रमुख उत्पादक देश संयुक्त राज्य अमेरिका, कनाडा, अर्जेंटीना, रूस, यूक्रेन, ऑस्ट्रेलिया और भारत हैं।
कृषि विकास बढ़ती हुई जनसंख्या की बढ़ती मांग को पूरा करने के क्रम में कृषि उत्पादन को बढ़ाने के लिए किए गए प्रयासों से संदर्भित है। इसे कई मायनों द्वारा प्राप्त किया जा सकता है जैसे फसली क्षेत्र में वृद्धि करके, फसलों की संख्या बढाकर, सिंचाई सुविधाओं में सुधारकर, खाद और बीज की अधिक उपज देने वाली किस्म का उपयोग करके।
|
विकासशील देश |
विकसित देश |
|
1. खेत का आकार काफी छोटा होता है। |
खेत का आकार बहुत बड़ा होता है। |
|
2. खेती में बहुत ही बुनियादी उपकरणों या पारंपरिक तरीकों का उपयोग किया जाता है। |
बहुत नवीनतम प्रौद्योगिकी का उपयोग बेहतर पैदावार का उत्पादन करने के लिए किया जाता है। |
|
3. बाजार अनुकूल न होने पर भी किसान अपनी उपज को बेचने के लिए मजबूर हैं क्योकि भंडारण की कोई सुविधा नहीं हैं। |
किसानों को स्वचालित अनाज भंडारण में अपनी उपज को दुकान और इसे बेचने केवल जब उन्हें अच्छे लाभ हो। |
दो मुख्य पेय फसले कॉफी और चाय हैं। कॉफी को गर्म और गीली जलवायु और अच्छी तरह से सूखी लाल और लेटराइट मिट्टी की आवश्यकता होती है चाय को ठंडी जलवायु और इसकी कोमल पत्तियों के विकास के लिए अच्छी तरह से साल भर में उच्च वर्षा की जरूरत होती है। इसे अच्छी तरह से सूखी रेतीली दोमट मिट्टी और कोमल ढलानों की जरूरत होती है।
आर्थिक गतिविधियाँ तीन प्रकार की होती हैं: क) प्राथमिक गतिविधियाँ- वे सभी गतिविधियाँ जिसमे प्राकृतिक संसाधनों का दोहन और उत्पादन शामिल है, प्राथमिक गतिविधियाँ कहा जाता है। ये बारीकी से प्रकृति के साथ जुडी रहती हैं। उदाहरण - खेती, शिकार, मछली पकड़ने, खनन, एकत्रण आदि।
ख) माध्यमिक गतिविधियाँ - इसमें वे गतिविधियाँ शामिल है जिनमे प्राथमिक गतिविधियों से उत्पादित संसाधनों का उपयोग कच्चे माल के रूप में, उन्हें प्रक्रिया और उत्पादन उपभोक्ता वस्तुओं अंतिम परिणाम के रूप में किया जाता है। उदाहरण हैं- स्टील उद्योग, वस्त्र निर्माताओं, बेकरी आदि।
ग) तृतीयक गतिविधियाँ - इसमें वे गतिविधियाँ शामिल है जिनमे उपभोक्ताओं को सेवाएं प्रदान करते हैं। कुछ उदाहरण निम्न हैं - व्यापार, परिवहन, शिक्षा, बैंकिंग, आदि।
कृषि भारतीय अर्थव्यवस्था में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है:
(i) यह पशुओं के लिए चारा और लोगों के लिए भोजन प्रदान करता है।
(ii) यह कृषि आधारित उद्योगों के लिए कच्चे माल की आपूर्ति करता है जैसे कपड़ा, चीनी, खाद्य प्रसंस्करण आदि।
(iii) यह गैर-कृषि के विकास के लिए कार्यशील पूंजी उत्पन्न करता है और औद्योगिक माल विशेष रूप से खेत आदानों के लिए बाजार का बड़ा हिस्सा प्रदान करता है जैसे- उर्वरकों, कीटनाशकों, औजार, मशीनरी आदि।
|
निर्वाह खेती |
व्यावसायिक खेती |
|
भूमि जोत छोटी और बिखरी हुई होती हैं |
यह बड़े खेतो पर की जाती है |
|
खेती के पारंपरिक तरीकों का उपयोग किया जाता हैं। |
यंत्रीकृत खेती प्रचलित है |
|
उत्पादन का परिवार के भीतर ही सेवन किया जाता है। |
फसलो का मुख्य रूप से बिक्री के लिए उत्पादन किया जाता हैं। |
|
सघन खेती |
गहन खेती |
|
यह छोटे खेतों पर की जाती है। |
यह बड़े फार्मों खेतों पर की जाती है। |
|
यह उत्तरी भारत के मैदानी इलाकों और दक्षिण भारत के तटीय क्षेत्रों के सिंचित क्षेत्रों में प्रचलित है। |
खेती का यह प्रकार उप हिमालय के तराई क्षेत्र और उत्तर-पश्चिम भारत के कुछ हिस्सों में प्रचलित है। |
|
बहुत सारे श्रमिक खेती के इस प्रकार में आवश्यक हैं। |
कुछ लोगों और मशीनों को खेती के इस प्रकार में उपयोग किया जाता है। |
कृषि की समस्याएँ निम्न है -
i. कृषि पर जनसंख्या का अधिक दबाव ।
ii. कृषि योग्य भूमि का कम होना ।
iii. कृषि जोत का आकर छोटा होना ।
iv. मिटटी की उर्वरा शक्ति का कम होना ।
v. भारतीय किसानों की निर्धनता व अशिक्षा ।
vi. सिंचाई सुविधाओं की कमी ।
vii. कृषि की वर्षा पर निर्भरता ।
viii. उन्नत किस्म के बीजों एवं खादों का अभाव।
भारत की फसलों को तीन वर्गों में बाँट सकते हैं -
i. खाद्यान्न फसलें - गेहूँ, चावल आदि ।
ii. औधोगिक फसलें - गन्ना, जूट, रबड़ आदि ।
iii. पेय एवं बागानी फसलें - चाय, कहवा, रबड़ आदि ।
किसी जगह की जलवायु परिस्थितियाँ, विशेष रूप से तापमान और वर्षा सीधे फसलों को प्रभावित करती हैं। विभिन्न फसलों की वृद्धि के लिए भिन्न-भिन्न तापमान की आवश्यकता होती है। उदाहरण के लिए - उष्णकटिबंधीय फसलों जैसे - चावल और गन्ने को शीतोष्ण फसलें जैसे गेहूं और चुकंदर तुलना में उच्च तापमान की आवश्यकता होती है।
सिंचाई फसल की पैदावार बढ़ाने के लिए आवश्यक है हालाँकि कुछ मौसमी करक इसे जरूरी बना देते हैं :
अनिश्चित वर्षा : यद्यपि भारत में वर्षा प्रचुर मात्रा में होती है किन्तु यह इसका सम्पूर्ण वर्ष में समान वितरण नहीं रहता। अधिकांश वर्षा चार महीने की अवधि में ही होती है। इसके अतिरिक्त इसका वितरण भी पूरे देश में असमान होता है।
अनियमित मानसून : यहाँ का मानसून काफी अनिश्चित हैं कभी-कभी देर से, कभी-कभी अपर्याप्त और कभी-कभी लम्बा सूखा पड जाता है।
व्यावसायिक खेती के विभिन्न प्रकार हैं -
वाणिज्यिक अनाज खेती : खेती के इस प्रकार में, फसलों का उत्पादन व्यावसायिक उद्देश्यों के लिए किया जाता है। इस प्रकार की खेती में लम्बे-चौड़े क्षेत्र में एकल फसल बोई जाती है । गेहूं और मक्का सामान्य रूप से उगाई जाने वाली व्यावसायिक फसलें हैं।
मिश्रित फसलें : खेती के इस प्रकार में भूमि को भोजन और पशु चारा तथा पशुपालन के लिए प्रयोग किया जाता है।
बागान खेती : खेती के इस प्रकार में, एक एकल फसल में श्रम और पूंजी की बड़ी राशि का उपयोग होता है। उत्पादन खेत पर ही या आस-पास के कारखानों में संसाधित किया जा सकता है। विकसित परिवहन नेटवर्क इस तरह की खेती के लिए यह आवश्यक है। मुख्य रूप से चाय, कॉफी, गन्ना, काजू, रबर, केला या कपास जैसी फसलें इस प्रकार की खेती में उगाई जाती हैं।
भारतीय कृषकों के समक्ष आने वाली दो समस्याएँ निम्नलिखित है :
i) सिंचाई सुविधाओं का अभाव और अनिश्चित वर्षा : भारत में खेती भूमि का सबसे बड़ा सिंचित क्षेत्र है किन्तु 69 प्रतिशत से अधिक फसल क्षेत्र में सिंचाई सुविधाओं का अभाव है जो मानसून पर निर्भर है। मानसून का अनिश्चित और असमान वितरण है। यह बुरी तरह से कृषि उत्पादन को प्रभावित करता है और खाद्यान्न की कमी का परिणाम है।
ii) कम उत्पादकता : भारत में फसलों की औसत उत्पादकता पुराने तरीकों और तकनीकों के कारण काफी कम है। अपर्याप्त सिंचाई सुविधाओं और भारतीय किसानों की अच्छी गुणवत्ता के बीज और आधुनिक उपकरणों की खरीद में अक्षमता के कारण उत्पादकता में कमी आती है।

जायद की फसलो के लिये मार्च, अप्रैल मे बोया तथा जून, जुलाई मे जाता है इसमे तरबूज, खरबूज, ककड़ी, एवं सब्जियों की खेती की जाती है l
भारत में चाय , असम, प. बंगाल, मेघालय, अरुणाचल प्रदेश, उतराखंड, हिमाचल प्रदेश, तमिलनाडू, केरल की पहाडियो पैर चाय पैदा की जाती है
लेटेक्स दूध की तरह का पदार्थ है जिससे 33% शुष्क रबर प्राप्त होता है | इसको रबर के पौधे से लेटेक्स के एकत्रीकरण के द्वारा प्राप्त किया जाता है | प्राप्त लेटेक्स को साफ करके एसिटिक अम्ल मिलाया जाता है, जिससे यह चिपचिपे, गाढे व नरम सफ़ेद पदार्थ में बदल जाता है | अब इन नरम ब्लॉक्स को रोलर के मध्य से निकाला जाता है जिससे पानी निकल जाता है व रबर की पतली शीट प्राप्त होती है| अब इसे साफ पानी से धोकर 43oc से 46 oc तापमान में विशेष प्रकार के घरों में छाया में कई दिनों तक सुखाया जाता है
1.सर्वोच्च लम्बे रेशे वाली –भारत के कुल उत्पादन का 33% इस किस्म का है | इसके रेशे की लम्बाई 27 मिमी तक होती है |
2.लम्बे रेशे वाली –भारत के कुल उत्पादन में इसका योगदान 16 % है, व इसके रेशे की लम्बाई लगभग 24.5 मिमी से 26 मिमी के मध्य होती है |
3.सर्वोच्च मध्यम तंतु वाली –इसके तंतु की लम्बाई लगभग 24 मिमी तक होती है, व इसका उत्पादन देश के कुल उत्पादन का 37% है |
4.मध्यम तंतु वाली – इसके रेशे की लम्बाई लगभग 20-21.5 मिमी होती है | इस किस्म का उत्पादन देश के कुल उत्पादन का 9 % है |
5.छोटे रेशे वाली –इसका कुल उत्पादन में मात्र 6% योगदान है | इसके रेशे की लम्बाई 19 मिमी से भी कम होता है |
भारत की चार प्रमुख रेशेदार फसलें हैं –कपास,जूट,सन एवं प्राकृतिक सिल्क |
कपास, जूट,व सन फसलों से प्राप्त होता है जबकि प्राकृतिक सिल्क हमें रेशम के कीड़ों से प्राप्त होता है जिन्हें शहतूत के पेड़ों पर पाला जाता है |
अरहर दाल को छोड़ कर अन्य सभी दालें भूमि की उर्वरता की वृद्धि में सहायक हैं | यह हवा के जरिये नाइट्रोजन का स्थिरीकरण करती हैं, इस कारण इन्हें अन्य फसल चक्रों के साथ उगाया जाता है |
यह शाकाहारी भोजन में प्रोटीन का प्रमुख स्त्रोत हैं, जिनकी संख्या भारत में अधिक है | माँसाहारी भोजन बेहद महंगा होता है, व अधिकांश भारतीय शाकाहारी खाद्यों पर निर्भर हैं |
1.भारत में उगाये जाने वाले प्रमुख मोटे अनाज हैं-ज्वार,बाजरा,एवं रागी |
2.उत्पादन एवं क्षेत्र की दृष्टि से ज्वार तीसरे स्थान पर है |
3.महत्त्व –मोटे अनाज में पोषण मात्रा अधिक होती है | जैसे रागी में लौह तत्व,कैल्सियम अन्य सूक्षम पोषक तत्वों की प्रचुरता होती है |
चाय एक महत्वपूर्ण पेय फसल है।
इसकी आवश्यक भौगोलिक परिस्थितियाँ इस प्रकार हैं: -
(क) चाय के पौधे उष्णकटिबंधीय और उप उष्णकटिबंधीय मौसम में अच्छी तरह से बढ़ते है। चाय की झाड़ियों को साल भर गर्म और नम जलवायु की आवश्यकता होती है।
(ख) चाय के पौधे अच्छी तरह से गहरी और उपजाऊ ह्यूमस और कार्बनिक पदार्थ से समृद्ध सूखी मिट्टी की आवश्यकता होती है।
(ग) समान रूप से साल भर में लगातार बारिश चाय की पत्तियों के सतत विकास को सुनिश्चित करती हैं।
(1) हालांकि तिलहन और दालों का उत्पादन बढ़ रहा है लेकिन जनसंख्या अधिक तेज गति से बढ़ रही है।
(2) दलहन और तिलहन के उत्पादन बाजार की अटकलों के उतार-चढ़ाव के अधीन है।
(3) इनकी उच्च उत्पादकता के लिए उन्नत किस्म के बीजो, सुनिश्चित सिंचाई और रासायनिक उर्वरकों की जरूरत होती है जो महंगे हैं और भारतीय किसानों उनका वहन नहीं कर सकते है।
(4) उनका समर्थन मूल्य आकर्षक नहीं है।
भारत में उत्पादित मुख्य तिलहन मूंगफली, नारियल, सरसों, सोयाबीन, अरंडी के बीज, कपास बीज और सूरज फूल हैं।
1) इनमें से अधिकांश खाद्य और खाना पकाने में प्रयोग किये जाते हैं।
2) उनमें से कुछ साबुन, सौंदर्य प्रसाधन और मलहम के उत्पादन में कच्चे माल के लिए प्रयोग किये जाते हैं।
भारतीय कॉफी की अरबिका किस्म की दुनिया में काफी मांग है। यह शुरू में यमन से लायी गयी थी और अब देश में इसका उत्पादन किया जाता है। आरम्भ में इसकी खेती बाबा बुदान पहाड़ियों पर की जाती थी।
मूंगफली की खेती के लिए भौगोलिक आवश्यकताऍ निम्नलिखित हैं:
(i) तापमान: 22 डिग्री सेल्सियस से 28 डिग्री सेल्सियस।
(ii) वर्षा: 50-75 सेमी। यह सूखा प्रतिरोधी फसल है और कम वर्षा वाले क्षेत्रों में उत्पादित की जा सकती हैं। लेकिन फूलो के समय अच्छी तरह से वितरित वर्षा की आवश्यकता होती है।
(iii) मृदा: यह हल्की रेतीली मिट्टी में अच्छी तरह से बढ़ती है।
उत्पादन के क्षेत्र: लगभग 70% क्षेत्र और लगभग 75% उत्पादन गुजरात, आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु और कर्नाटक के राज्यों में केंद्रित है। गुजरात मूंगफली का प्रमुख उत्पादक क्षेत्र है।
उनके बीज के लिए सूरजमुखी के पौधों की खेती हाल ही में 1969 में भारत में प्रस्तुत की गयी थी।
भौगोलिक आवश्यकताऍ: भारत में सूरजमुखी के बीज की खेती साल भर जाती है। वे मिट्टी की अनेक किस्म में उत्पादित की जा सकती हैं। इसे बुआई के समय में शांत नम जलवायु की आवश्यकता होती है और फूल और कटाई के समय के प्रारंभिक विकास और गर्म धूप की आवश्यकता होती है। सूरजमुखी के पौधे 90 दिनों में कटाई के लिए तैयार होते हैं।
उत्पादन के क्षेत्र: भारत में सूरजमुखी के पौधे आंध्र प्रदेश, कर्नाटक और तमिलनाडु में होते हैं।
कॉफी कटिबंधों की विशिष्ट उच्च भूमि की फसल है। इसका उत्पादन 1100 मीटर से लेकर 2400 मीटर ऊंचाई पर किया जाता है।
तापमान: इसे साल भर 15 डिग्री सेल्सियस और 28 डिग्री सेल्सियस के बीच तापमान की जरूरत होती है। पाला फसल के लिए हानिकारक है। विशेष रूप से इसके विकास के प्रारंभिक दौर में पेड़ो को गर्म हवाओं से संरक्षित किया जाता है। पौधो की सीधे धूप से रक्षा की जानी चाहिए। शुष्क मौसम इसके पकने के लिए आवश्यक है।
वर्षा: इसे साल भर 125 सेमी और 250 सेमी के बीच वर्षा की जरूरत होती है।
मृदा: इसे अच्छी तरह से सूखी मिट्टी आवश्यकता होती है। यह अच्छी तरह से सूखा पहाड़ी ढलानों 450 मीटर और 1800 मीटर के बीच ज्वालामुखी मिट्टी में सर्वोत्तम तरीके से बढ़ते है। ह्यूमस की उपस्थिति आवश्यक है। भारत में कॉफी को लाल और लेटराइट मिट्टी में उगाया जाता है।
भारत में अनेक प्रकार की कृषि की जाती है ।
i. स्थानान्तरी कृषि - कृषि की सबसे पुरानी पद्धति है । एक जगह की भूमि की उर्वरा शक्ति खत्म हो जाने पर दूसरी जगह कृषि कार्य किया है ।
ii. स्थायी कृषि- मानव सभ्यता के विकास के साथ ही इस कृषि के शुरुआत हुई । इसमें किसान एक ही कृषि भूमि पर कृषि करता है । गंगा-यमुना के दोआब में की जाने वाली कृषि इसी प्रकार की कृषि है ।
iii. निर्वाह कृषि - किसान अपने व परिवार के जीवन निर्वाह के लिये करता है । सघन जनसंख्या वाले क्षेत्रो में इस प्रकार के खेती की जाती है ।
iv. व्यापारिक कृषि- कृषि कार्य आधुनिक यंत्रो एवं मशीनों से की जाती है । इस प्रकार की खेती में गेहूँ, गन्ना, कपास आदि की खेती की जाती है ।
v. रोपण कृषि- इस प्रकार की खेती में एक फसल को एक बार बो दिया जाता है । जिससे कई वर्ष तक फसल प्राप्त होती है ।
कृषि की समस्याओं को दूर करने के उपाय निम्नलिखित है -
i. चकवंदी करके खेतो का आकर बड़ा किया जाये ।
ii. अधिक उत्पादन के लिये उन्नत किस्म के बीजों का प्रयोग ।
iii. आधुनिक कृषि मशीनों व उपकरणों का प्रयोग करना।
iv. फसलों को रोगों से बचाना ।
v. कृषि उपजों का मूल्य निर्धारण ।
vi. सिंचाई सुविधाओ का विकास करना ।
vii. मिटटी का संरक्षरण एवं प्रबंधन ।
viii. कृषि भंडार गृहों की स्थापना ।
ix. बैंक से आसन किस्तों पर ऋण की व्यवस्था ।
x. मेडबंदी करके भूमि के कटाव को रोकना।
i) राष्ट्रीय कृषि नीति (एनएपी)
ii) जुलाई 28, 2000
iii) इस नीति की प्रमुख विशेषतायें निम्नलिखित है :
a) ठेका खेती और भूमि पट्टे के माध्यम से निजी क्षेत्र की भागीदारी को बढ़ावा देना।
b) कानून के माध्यम से वनस्पति किस्मों की रक्षा करना।
c) पशुपालन, मुर्गी पालन, डेयरी और मत्स्य पालन को बढ़ावा देकर कृषि में विविधता लाना।
d) कृषि वस्तुओं की आवाजाही पर से प्रतिबन्ध हटाना।
e) कृषि और बागवानी फसलों के लिए नए स्थान को विकसित करना।
f) कृषि के सभी पहलुओं को कवर करने के लिए राष्ट्रीय कृषि बीमा योजना का शुभारंभ।

i) स्थांतरित कृषि
ii) इस प्रकार की खेती हिमालय क्षेत्र में उत्तर-पूर्व भारत के कुछ पहाड़ी हिस्सों में की जाती है।
iii) इस प्रकार की खेती की मुख्य विशेषतायें इस प्रकार हैं :
a) किसान जमीन के एक टुकड़े को साफ़ करते हैं।
b) परिवार के जीवकोपार्जन के लिए फसलों को उगाया जाता है।
c) जब जमींन की उर्वरा शक्ति कम हो जाती है तब किसान जमीन के दूसरे टुकड़ों को साफकर यही प्रक्रिया दुहराते हैं।
d) प्राकृतिक प्रक्रियाओं के माध्यम से मिट्टी की उर्वरता की भरपाई करने के लिए प्रकृति को अवसर प्राप्त हो जाता है।
e) उर्वरक और आधुनिक उपकरणों का उपयोग नहीं किया जाता है।
f) भूमि की उर्वरता समय के अनुसार कम हो जाती है।
एक दिन चीन के सम्राट शैन नुंग के सामने रखे गर्म पानी के प्याले में, कुछ सूखी पत्तियाँ आकर गिरीं जिनसे पानी में रंग आया और जब उन्होंने उसकी चुस्की ली तो उन्हें उसका स्वाद बहुत पसंद आया। बस यहीं से शुरू होता है चाय का सफ़र। सन् 350 में चाय पीने की परंपरा का पहला उल्लेख मिलता है। सन् 1610 में डच व्यापारी चीन से चाय यूरोप ले गए और धीरे-धीरे ये समूची दुनिया का प्रिय पेय बन गया। भारत के गवर्नर जनरल लॉर्ड बैंटिक ने 1834 में असम में चाय के बाग़ लगाए । स्थानीय क़बाइली लोग चाय को वहुत पहले से पीते थे।
A.
गुजरात
B.
महाराष्ट्र
C.
असम
D.
मिज़ोरम
असम भारत का सबसे पुराना तेल उत्पादक राज्य है। डिगबोई, नहरकटिया और मोरन-हुगरीजन इस राज्य के महत्त्वपूर्ण तेल उत्पादक क्षेत्र हैं।
A.
मैग्नेटाइट
B.
बॉक्साइट
C.
अभ्रक
D.
मैंगनीज
क्ले जैसा दिखने वाला पदार्थ एल्यूमिनियम, बॉक्साइट अयस्क से प्राप्त किया जाता है। यद्यपि यह अनेक अयस्कों में मिलता है, किन्तु सबसे अधिक बॉक्साइट में मिलता है।
A.
घोड़ा
B.
कुत्ता
C.
बकरी
D.
गाय
कर्नाटक के पश्चिमी घाट की सबसे ऊँची चोटी घोड़े के मुख से मिलती-जुलती है। बेलाडिला की पहाड़ियाँ, बैल के डील से मिलती-जुलती हैं, जिसके कारण इसका यह नाम पड़ा।
कच्छ की खाड़ी में कुल ज्वारीय ऊर्जा का 900 मेगावाट उत्पादित होता है|
सोना और चांदी ऐसे दो खनिज हैं, जो प्लेसर निक्षेप के रूप में पाए जाते हैं|
झारखण्ड के हजारीबाग- गया- कोडरमा क्षेत्र सर्वाधिक अभ्रक उत्पादक क्षेत्र है|