हाथ में लिए जाने वाले वायरलेस सेटवाकी टॉकी आपात स्थितियों में स्थानीय संचार के लिए उपयुक्त माने जाते हैं| ये विशिष्ट संकेत प्राप्त करने के कारण आपातकालीन स्थितियों के लिए अधिकउपयुक्त माने जाते हैं|
एमेच्योरस्वयंसेवकों ने वर्ष 1999 में उड़ीसा में आये विशाल चक्रवात में और वर्ष 2001 में गुजरात में आये भूकंप में अपनी सेवाएं प्रदान की हैं|
मोबाइल एक इलेक्ट्रॉनिक दूरसंचाए यंत्र है, जिसे अधिकतर एक सेलुलर फोन या सेल फोन के रूप में उल्लिखित किया जाता है|यह रेडियो तरंग या उपग्रह प्रसारण के माध्यम से एक वायरलेस संचार नेटवर्क को जोड़ता है| इस एक डिवाइस से कई कार्य किये जाते हैं और यह बहुत ही आसानी से कार्य करता है।यही कारण है कि यह लोकप्रिय होता जा रहा है|अधिकांशमोबाइल फोनआवाज संचार, लघु संदेश सेवा (एसएमएस), मल्टीमीडियासंदेश सेवा (एमएमएस) प्रदान करते हैं और कई स्मार्ट फोनइंटरनेट सेवाएं जैसे वेब ब्राउज़िंग औरई-मेल के रूप में सेवाएँ प्रदान करते हैं।
भारत सरकार आपदा प्रबंधकों को बहु-खतरा संभावी जिलों में पोर्टेबल सेटेलाइट फोन से सम्बद्ध कर रही है|आपदा प्रबंधक बहु-खतरा संभावी जिलों मेंपोर्टेबल सैटेलाइट फोन के साथ मौजूदहैं|ऐसामुख्य संचार लाइनों के असफल हो जाने पर स्थानीय और राज्य स्तर पर प्रशासन के मध्य संचार स्थापित करने के लिए किया जाता है|
भारतीय राष्ट्रीय उपग्रह वर्तमान परिचालन भारतीय अंतरिक्ष प्रणालियों के मध्य है। इसका उपयोग दूरसंचार, टेलीविजन प्रसारण, मौसम विज्ञान और आपदा चेतावनी के लिए किया जाता है।
भारतीय सुदूर संवेदन उपग्रह पृथ्वी अवलोकनउपग्रहों की एक श्रंखला है, जिसे भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन ने बनाया,इसका शुभारंभ किया और इसके संरक्षण के लिए कार्यरत है|आईआरएस श्रृंखला भारत के लिए कई सुदूर संवेदन सेवाएं प्रदान करती है।यह मुख्य रूप से संसाधन की निगरानी और प्रबंधन के लिए प्रयोग की जाती है।
हमारे देश में एमेच्योर रेडियोको लोकप्रिय बनाने के लिए सूचनाप्रौद्योगिकीविभागकेद्वाराविभिन्नप्रयास कियेगएहैं| इसने विभिन्न स्थानों पर एमेच्योर रेडियोकी स्थापना के लिए राष्ट्रव्यापी कार्यक्रम आयोजित किये हैं| विभाग रूचि रखने वाले एमेच्योर स्टेशन ऑपरेटरों को लाइसेंस प्राप्त एमेच्योर का बल विकसित करने के लिए प्रशिक्षण प्रदान कर रहा है|
पीएसटीएन का अर्थ पब्लिक स्विच्ड टेलीफोन नेटवर्कहै| यह एक सार्वजनिक वायर्ड टेलीफोन होता है| यहवाइससंदेशों, फैक्सऔरआंकड़ोंकोसंचारितऔरप्राप्तकरनेकेसाथ-साथसभीसरकारों, व्यक्तिगतकार्यालयों, पुलिसस्टेशनों, अग्निशमनस्टेशनों, अस्पतालोंऔरअधिकतरघरोंतथाव्यावसायिकस्थानोंकोजोड़नेकामुख्यनेटवर्कहै|
उपग्रह आधारित संचार प्रणाली सर्वाधिक विश्वसनीय संचार प्रणाली है क्योंकि इसमें संचार के उपग्रह अंतरिक्ष में अवस्थित किये जाते हैं|येउपग्रहकिसीभीप्राकृतिकआपदाकीचपेटमेंनहींआतेहैं| विश्वसंचारलिंक्सबहुतहीछोटेऔरपोर्टेबलउपग्रहएंटीनाकेद्वारास्थापितकियेजासकतेहैंतथायेसरलतासेकार्यकरतेहैं|
i. एमेच्योर
या हैम रेडियो
ii. एमेच्योर
रेडियोविशेषप्रकारकेनियमोंकाउल्लेखकरतेहैं, जोअन्तर्राष्ट्रीय
दूरसंचार
यूनियन
द्वारा
निर्धारित
विशिष्ट तरंगकीफ्रिक्वेंसीपरकार्यकरतेहैं|
iii.
एमेच्योर रेडियोआपात
की
स्थितियों
में
सफलतापूर्वक
कार्य करता
है,
क्योंकि यह
भूमि आधारित
सुविधाओं का
उपयोग नहीं
करता है|इसमें
विद्युतकी
सीमित
आवश्यकता
होती है, जो
बैट्रीज और
जनरेटर से
आसानी से प्राप्त
हो जाती है|
i.यह एक ट्रांसपोंडर है, जो एक संचार उपग्रह की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता है|
ii. ट्रांसपोंडर एक रेडियो होता है, जो एक आवृत्ति से वार्ता को प्राप्त करता है और पृथ्वी के लिए दूसरी आवृत्ति में परिवर्तित कर भेजता है|
iii. यह आंकड़े, टेलीविज़न, चित्र और कुछ टेलीफोन प्रसारण नियमित रूप से प्राप्त करता है तथा इन ट्रांसपोंडर से पुनःप्रसारित करता है|
i. भारतसंचारनिगमलिमिटेड (BSNL)एक अग्रणी दूरसंचार कंपनी है| यह भारत के सबसे बड़े सार्वजनिक क्षेत्र उपक्रम से संबंधित है|
ii.
भारतसंचारनिगमलिमिटेड
(BSNL)1
अक्टूबर 2000 को
अस्तित्व
में आया|
iii.
इसके मुख्य
कार्य सभी
गांवों में
दूरसंचार सेवाओं
की गुणवत्ता
में सुधार
करना,
दूरसंचार नेटवर्क
का विस्तार
करना, नई
दूरसंचार सेवाओं
की शुरुआत
करना और अपने
सदस्यों में
आत्मविश्वास
पैदा करना है|
A.
सूनामी
B.
भूकंप
C.
भूस्खलन
D.
चक्रवात
भूस्खलन मृदा अपरदन का एक मुख्य कारण है। भूस्खलन, ढलान अस्थायित्व और मिट्टी के कटाव से जुड़े हुए हैं और मृदा अपरदन इसको आगे बढ़ाते हैं।
A.
बाढ़ और भूकंप की आशंका वाले क्षेत्र
B.
भूकंप की आशंका वाले क्षेत्र
C.
भूस्खलन की आशंका वाले क्षेत्र
D.
बाढ़ और चक्रवात की आशंका वाले क्षेत्र
खंड स्तर पर, खंडविकासअधिकारी/ तालुकाविकासअधिकारीआपदा प्रबंधनसंबंधी सभी क्रियाकलापों के लिए नोडल अधिकारीहोता है। समिति के अन्य सदस्य समाज कल्याण विभाग, स्वास्थ्य विभाग, ग्रामीणजल आपूर्ति एवं स्वच्छता विभाग, पुलिस, समुदाय आधारित संगठनों, गैर-सरकारीसंगठनों, प्रख्यात वरिष्ठ नागरिक, निर्वाचित प्रतिनिधियोंआदि केअधिकारी हैं|
2004 में हिन्द महासागर में आई सुनामी में लगभग 1200 राष्ट्रीयसेवायोजनास्वयंसेवी राहत सामग्रियों के साथ प्रभावित क्षेत्रों विशेष रूप से मलिन बस्तियों में भेजे गए थे|क्षेत्रीय निदेशक की देखरेख में राष्ट्रीयसेवायोजनास्वयंसेवी राहत कार्यों के लिए पुदुच्चेरी में भी तैनात किये गए थे|
राष्ट्रीय केडिट कोर के मुख्य उद्देश्य इस प्रकार हैं:
i. युवाओं में चरित्र,साहस,मैत्रीभाव,अनुशासन,नेतृत्व के गुणों,धर्म-निरपेक्षदृष्टिकोण, साहसिक-कार्यों एवं खेल भावना तथा निःस्वार्थ सेवा के गुणों काविकास कर उन्हें जिम्मेदार नागरिक बनाना|
ii. युवाओं के लिए प्रशिक्षण एवं गतिविधियों का आयोजन|
iii. जीवन के सभी क्षेत्रों, सशस्त्रबलोंमें नेतृत्व प्रदान करना और स्वयंको देश सेवा के लिए अर्पित करना|
ब्लॉक आपदा प्रबंधन समिति के मुख्य कार्य निम्नवत हैं:
i. ब्लॉकआपदा प्रबंधन योजना की तैयारी में ब्लॉक प्रशासन की मदद करना|
ii. आपदा प्रबंधन टीमों के सदस्यों के लिए प्रशिक्षण का आयोजन|
iii. मॉक ड्रिल का आयोजन|
केंन्द्र सरकार की प्रतिक्रिया निम्न कारकों पर आधारित है:
i. आपदा की तीव्रता
ii. राहत कार्यों के पैमाने
iii. वित्तीय संसाधनों और रसद बढ़ाने केलिए केंद्रीय सहायता कीआवश्यकताओं को राज्य सरकार के निपटान का समर्थन|
नेहरुयुवाकेन्द्रों की शुरूआत वर्ष 1972 में ग्रामीण युवाओं के व्यक्तित्व, कौशल के विकास और राष्ट्र निर्माण की प्रक्रिया में हिस्सा बनने के लिए की गयी थी|वर्ष 1987-1988, खेल एवं युवा मंत्रालय के तहत नेहरु युवा केंद्र संगठन को स्वायत्त संगठन के रूप में स्थापित किया गया था| नेहरु युवा केन्द्रों की स्थापना राष्ट्रीय सलाहकार की सिफारिश पर की गयी थी| इसके स्वयंसेवक संकट के समय समुदायों की मदद के लिए तैयार रहते हैं| वर्तमान में, यह संगठन खेल एवं युवा मंत्रालय के अंतर्गत कार्यरत है|नेहरुयुवाकेन्द्र संगठन एक पंजीकृत संस्था है और इसे एक शासक-मंडल द्वारा संचालित किया जाता है| यह विश्व के सर्वाधिक बड़े जमीनी स्तर के संगठनों में से एक है| इसमें 13-35 वर्ष के आयु समूह में आठ लाख गैर-छात्र ग्रामीण युवाओं की जरूरतों को पूरा करना शामिल है| यह ग्राम-आधारित युवा संगठन के रूप में नामांकित हुआ, जिसेयुवा क्लब कहा जाता है|
होमगार्डएकस्वयंसेवीबलहोतेहै, जिसे दिसम्बर, 1946मेंस्थापितकियागयाथा, जोनागरिकअशांतितथासाम्प्रदायिकदंगों पर नियंत्रण करने में पुलिस की सहायता करते हैं| होम गार्ड के मुख्य कार्य इस प्रकार हैं:
· आंतरिक सुरक्षा बनाए रखने में पुलिस के सहायक के रूप में कार्य करना|
· किसी भी प्रकार की आपातस्थिति; जैसे हवाई हमला, आग लगना,चक्रवात,भूकंप,महामारी आदि में समुदाय की सहायताकरना|
· नागरिकों के लिए अनिवार्य सेवाओं को बनाए रखने में मदद करना|
· साम्प्रदायिक सद्भाव को बढ़ावा देना और कमजोर वर्गोंको संरक्षण प्रदान में प्रशासन की सहायता करना|
· सामाजिक-आर्थिक और कल्याण संबंधी गतिविधियों में भाग लेना तथा नागरिक सुरक्षा कार्य करना।
सक्षम बल की उपलब्धता, सभी स्तरों पर समय के साथ प्रभावी आपदा प्रबंधन के लिए आपदा प्रबंधन का प्रशिक्षण आवश्यक है| आपदा प्रबंधन को विद्यालयों से लेकर तकनीकी कॉलेजों से उच्च शिक्षा तक एक अनिवार्य विषय के रूप में कर देना चाहिए| भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) और राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन संस्थान (एनआईडीएम) जैसे संस्थानविभिन्न विभागों के सरकारी पदाधिकारियों को प्रशिक्षण प्रदान करके देश के लिए कुशल मानव संसाधनों को विकसितकरने की प्रक्रियाहै|अखिल भारतीय परिषद (एआईसीटीई) ने इंजीनियरिंग में आपदा प्रबंधन पाठ्यक्रम की शुरूआत की है।आपदा प्रबंधनभारतीय प्रशासनिक सेवा (आईएएस), भारतीय पुलिस सेवा (आईपीएस) और भारतीय वन सेवा के आधारभूत पाठ्यक्रम का भी हिस्सा बनाया गया है।इसे जागरूकफ़ैलानेके लिए सभी स्तरों पर पाठ्यक्रम के एक महत्वपूर्ण भाग के रूप में पेश किया जाना चाहिए।
नई श्रेणी में जाते समय उत्साह होना चाहिए था| इसी प्रकार अगली कक्षा की किताबों को पाकर भी उमंग होनी चाहिए थी| परंतु लेखक उदास हो जाता था क्योंकि लेखक को हर वर्ष नई पुस्तकों की बजाय पुरानी पुस्तकें मिला करती थी| लेखक को नई कक्षा में जाने का शौक कभी नहीं जागा| लेखक को अगली कक्षा की पढ़ाई अधिक कठिन प्रतीत होती थी| उसे नए मास्टरों की मार-पीट का भय सताता था| वे पुराने छात्रों से बहुत अधिक अपेक्षा किया करते थे| अपेक्षा पूरी न होने पर वे छात्रों की चमड़ी उधेड़ने को तैयार रहते थे| उसे नई कापियों और पुरानी किताबों से अजीब-सी गंध आया करती थी| आज लेखक को लगता है कि शायद मास्टरों की मार-पीट और आगे की मुश्किल पढ़ाई के कारण ही उसे पढ़ाई रुचती नहीं थी|
ग्रीष्मावकाश में मिले गृहकार्य को पूरा करने के लिए लेखक अनेक योजनाएँ बनाता था| अक्सर वह आज के काम को कल पर टालता था| एक महीना बीतने पर छुट्टियों के काम की याद आने लगती तो सोचने लगता था| सोचता था कि अभी तो 20 दिन बचे हैं| हिसाब के सवाल एक दिन में 10 भी किए तो 200 सवाल आराम से हो जाएँगे| परंतु फिर कुछ दिन बिना काम के बीते जाते| फिर वह एक दिन में 15 सवाल करने की सोचने लगता| आख़िरकार छुट्टियाँ बीतने को हो जातीं तो सोचने लगता कि ज्यादा से ज्यादा मास्टर की मार पड़ेगी| इतना करने से अच्छा तो मास्टर की मार खाना ही अच्छा है|
लेखक के स्कूल के हेडमास्टर थे-श्री मदनमोहन शर्मा स्वभाव से बहुत नरम और हँसमुख थे| वे अंग्रेजी पढ़ाते थे| | वे गोरे रंग के बड़े उदार और विन्रम हेडमास्टर थे| उन्हें बच्चों का अनुशासन पंसद था| परंतु वे उन पर सख्ती करने के विरुद्ध थे| वे जब कभी बच्चों पर गुस्सा होते थे तो उन्हें पीटने की बजाय अपनी आँखें झपकाने लगते थे, मानों अपनी नाराज़गी प्रकट कर रहे थे| वे बच्चों को मारते भी थे तो बड़ी हल्की चपत से| बच्चों को हेडमास्टर की चपत नमकीन पापड़ी जैसी भली लगती थी| वे अच्छे प्रशासक थे| एक बार पीटी मास्टर ने सब लड़कों को कान पकड़ने के लिए कहा| सबने मुर्गा बनकर कान पकड़े| मास्टर जी चीखे-पीठ ऊँची करो| लड़कों को मुर्गा बने देख हेडमास्टर जी को यह सहन न हुआ| उन्होंने उत्तेजित होकर प्रीतमचंद को कहा-‘क्या चौथी कक्षा के बच्चों को सज़ा देने का यही ढंग है? वे पीटी मास्टर की क्रूरता को देखा तो सहन न कर सके| उन्होंने उन्हें तत्काल स्कूल से निकाल दिया|
लेखक तथा उसके साथियों को स्कूली जीवन बिल्कुल नहीं भाता था| पाँच-छ: बच्चों को छोड़कर शेष सब बच्चे रोते-धोते हुए ही स्कूल जाते थे| इसके कई कारण बताए गए हैं| पहला कारण यह था कि स्कूल में भय का वातावरण था| बच्चे मास्टर की क्रूरता से भयभीत रहते थे| वे काम के अधिक बोझ से भी घबराते थे| मास्टर लोग बहुत कठोर दंड देते थे| पीटी मास्टर तो साक्षात् यमराज थे| वे बात-बात पर चमड़ी उधेड़ दिया करते थे| इस कारण बच्चे भयभीत रहते थे| बच्चे शारीरिक गतिविधियों और खेलों में अधिक रूचि लेते हैं| छुट्टियों का काम बच्चों पर इस तरह लाद दिया जाता था कि बच्चे उसका बोझ उठाने की बजाय मास्टर जी की मार खाना ही अधिक पंसद करते थे| लेखक को हर अगली कक्षा पहली कक्षा से अधिक कठिन जान पड़ती थी| नए मास्टर भी पुराने छात्रों से कुछ अधिक उम्मीद करते थे| इसलिए वे उन्हें खूब पीटा करते थे|
‘सपनों के-से-दिन’ पाठ में लेखक के बचपन की मस्ती का वर्णन है| बचपन में लेखक अपने आस-पड़ोस के बच्चों के साथ खूब खेला करते थे| वे रोज ही लकड़ियों के ढेर पर से फिसलते हुए कितनी चोट खाते थे| उनके मिट्टी भरे घाव देखकर माँ-बहनें तरस खाने की बजाय उनकी पिटाई किया करती थीं| उनमें से अधिक दोस्त तो स्कूल जाते ही नहीं थे| उनके सिर पर पढ़ाई का बोझ नहीं था| लेखक के अधिकतर साथी स्कूल को कैदखाना मानते थे| वे स्कूल में पढ़ाई से अधिक ध्यान फूल-पत्तियों,झाड़ों में लगाया करते थे| लेखक को सबसे अधिक आनंद ननिहाल में जाकर मिलता था| वहाँ नानी उन्हें खूब दूध-दही,मक्खन खिलाती थी और प्यार करती थी| वहाँ वे दिन-भर रेत के टीले पर चढ़ कर तालाब में कूदते थे| फिर रेत में लोट-पोट होकर फिर-से तालाब में कूदते थे| इस प्रकार वे खूब उछलकूद और मस्ती किया करते थे| कभी-कभी कुछ बच्चें तैरने के चक्कर में गहरे पानी में फँस जाया करते थे| तब वे बड़ी कठिनाई से बाहर निकल पाते थे| परंतु अगले दिन फिर-से तालाब में कूदते नज़र आते थे|
A. v2/2
B. 2g/v2
C. g/v2
D. v2/2g
कार्य = गतिज ऊर्जा में परिवर्तन
A. 30 इकाई
B. 5 इकाई
C. 20 इकाई
D. 8 इकाई
ऊर्जा = शक्ति x समय
स्थितिज ऊर्जा = mgh
यहाँ h प्रारम्भिक और अंतिम स्थितियों के बीच की दूरी है |
जब वर्षा की बूंद, ज़मीन पर गिरती है तो वर्षा की बूंद की गुरुत्वीय स्थितिज ऊर्जा का गतिज ऊर्जा में परिवर्तन होता है क्योंकि किसी वस्तु में गतिज ऊर्जा उस वस्तु में गति के कारण होती है|
यदि कोई अभिकर्ता 1 सेकंड में 1 जूल कार्य करता है तो उसकी शक्ति 1W होगी।
B. 1 वाट C. 1 किलो वाट घंटा D. 1 न्यूटन (KWh) ऊर्जा की वह मात्रा है जो 1KW के किसी स्त्रोत को 1 घंटे तक उपयोग करने में व्यय होगी| घरों, उद्योगों और व्यावसायिक संस्थानों में व्यय होने वाली ऊर्जा को KWh में व्यक्त करते हैं।
जब किसी वस्तु का वेग दुगुना हो जाएगा तो उसकी गतिज ऊर्जा चार गुना हो जाएगी |
किसी वस्तु की स्थिति या विन्यास परिवर्तन के लिए किया गया कार्य उसममें ऊर्जा के रूप में संचित हो जाता है | इसे वस्तु की स्थितिज ऊर्जा कहते हैं , जो कि वस्तु की स्थिति या विन्यास में विकृति के कारण होती है|
यदि विस्थापन और बल, लम्बवत हों तो विस्थापन की दिशा तथा बल की दिशा एक दूसरे से 900 कोण बनाती हैं | अर्थात अगर θ का मान 00 है तो cos 900 का मान 0 हुआ | अत: शून्य कार्य होगा|
B. कार्य = बल x समय C. कार्य = बल x विस्थापन D. कार्य =विस्थपन / बल कार्य की परिभाषा के अनुसार किया गया कार्य, बल और विस्थापन के गुणनफल के बराबर होता है|
B. 50 मीटर/सेकण्ड C. 100 मीटर/सेकण्ड D. 200 मीटर/सेकण्ड
ऊर्जा संरक्षण के सिद्धांत अनुसार ऊर्जा की न तो उत्पत्ति की जा सकती है और न ही पतन | इसे केवल एक रूप से दूसरे रूप में परिवर्तित कर सकते हैं| इसलिए कुल स्थितिज ऊर्जा , गतिज ऊर्जा में परिवर्तित हो जाएगी| अत: गतिज उर्जा, प्रारंभिक स्थितिज उर्जा (जो कि 200 जूल है) के बराबर होगी|
गतिज ऊर्जा किसी निकाय में उसकी गति के कारण होती है| यह निकाय की गति और द्रव्यमान पर निर्भर करती है | इसका परिमाण सूत्र होता है|
B. स्थितिज उर्जा C. शक्ति D. गुरुत्वीय किसी वस्तु की स्थिति या विन्यास परिवर्तन के लिए किया गया कार्य उसमें ऊर्जा के रूप में संचित हो जाता है| इसे वस्तु की स्थितिज ऊर्जा कहते हैं, जो कि वस्तु की स्थिति या विन्यास में विकृति के कारण होती है|
B. ऋणात्मक होता है। C. शून्य होता है। D. धनात्मक तथा ऋणात्मक दोनों हो सकता है। यदि बल और विस्थापन दोनों विपरीत दिशा में हों अर्थात q का मान 1800 हो , तो cos 1800 का मान -1 होगा|
अतः W का मान -Fs होगा |
इस स्थिति में किया गया कार्य ऋणात्मक कहलाता है|
B. 40 जूल होगा। C. 50 जूल होगा। D. 60 जूल होगा। कार्य = बल x विस्थापन
= 5 x 10
= 50 जूल
B. वाट है। C. मीटर है। D. जूल है। कार्य = बल x विस्थापन
बल का मात्रक न्यूटन होता है और विस्थापन का मात्रक मीटर होता है | इसलिए कार्य का मात्रक हुआ न्यूटन मीटर जिसे जूल कहा जाता है|
B. ऋणात्मक होता है। C. धनात्मक तथा ऋणात्मक दोनों हो सकता है। D. शून्य होता है। कार्य = बल x विस्थापन
यदि बल एवं विस्थापन एक-दूसरे से किसी कोण पर कार्य कर रहें हों , तो कार्य की गणना करने के लिए बल का वह घटक लेना होगा जो विस्थापन की दिशा में है ।
यदि विस्थापन बल के लम्बवत हो तो विस्थापन की दिशा तथा बल की दिशा एक दूसरे से 900 कोण बनाती हैं | अर्थात q का मान 900 तो cos 900 का मान 0 हुआ | अत: शून्य कार्य होगा |
B. गतिज ऊर्जा C. प्रत्यास्थ स्थितिज ऊर्जा D. रासायनिक ऊर्जा वस्तुओं में गति के कारण उत्पन्न ऊर्जा को गतिज ऊर्जा कहते हैं |
ऊर्जा संरक्षण के सिद्धांतों के अनुसार ऊर्जा की न तो उत्पत्ति की जा सकती है और न ही पतन | इसको केवल एक रूप से दूसरे में परिवर्तित कर सकते हैं और किसी बंद निकाय में कुल ऊर्जा सदैव अचर और स्थिर रहती है ।इसलिए मुक्त पतन के दौरान स्थितिज ऊर्जा , गतिज ऊर्जा मे परिवर्तित हो जाती है किन्तु प्रत्येक बिन्दु पर गतिज और स्थितिज ऊर्जा का योग स्थिर रहता है|
तनी हुई धनुष के आकार में परिवर्तन के कारण स्थितिज ऊर्जा उत्पन्न होती है। तीर के निकलने पर, धनुष की स्थितिज ऊर्जा तीर की गतिज ऊर्जा में परिवर्तित हो जाती है। कुल यांत्रिक ऊर्जा के लिए गणितीय व्युत्पन्न निम्न प्रकार है : E = T + U U स्थितिज ऊर्जा निम्न प्रकार से दी जाती है, किसी निकाय की गतिज ऊर्जा तथा स्थितिज ऊर्जा का योग उसकी यांत्रिक ऊर्जा कहलाती है। भौतिक रूप में, कार्य पुस्तक पढ़ने में विस्थापन शून्य होता है, अत: कृत कार्य भी शून्य होता है। वृत्ताकार मार्ग पर घूमते हुए किसी पिण्ड यदि जब स्प्रिंग में संपीडन या विस्तार (प्रसार) होता है तो दोनों स्थितियों में इसकी स्थितिज ऊर्जा में वृद्धि होती है। यह इसलिए क्योंकि संपीड़न तथा प्रसार के दौरान इसका आकार परिवर्तित करने के लिए हमारे द्वारा कार्य किया जाता है। ऊर्जा के संरक्षण नियम के अनुसार, ऊर्जा न तो उत्पन्न की जा सकती है और न ही नष्ट की जा सकती है। लेकिन यह एक रूप से दूसरे रूप में रूपान्तरित हो सकती है या की जा सकती है। यदि किसी निकाय के वेग को दुगुना कर दिया जाए गतिज ऊर्जा जब बल किया गया कार्य बल = कार्य आरोपित बल तथा विस्थापन जब समान दिशा में होते हैं तो निकाय पर किया गया कार्य धनात्मक होता है। ऊर्जा का मात्रक जूल है और शक्ति का मात्रक वाट है कार्य ( समय सामर्थ्य rयदि कोई कण स्वतन्त्रता पूर्वक गिरता है, तो इसकी स्थितिज ऊर्जा कम होती रहती है। समान समय पर स्थितिज ऊर्जा में कमी, गतिज ऊर्जा में वृद्धि के साथ समकृत हो जाती है। इसलिए, किसी भी समय पर, यह ऊर्जा के संरक्षण के नियम का उल्लंघन नहीं करता है। किया गया कार्य होगा, W = m x g x h जहाँ अब m = 10kg, v= 4 m/s बल = 10 N किया गया कार्य = बल X विस्थापन एक किलोवाट घंटा तथा एक जूल के बीच सम्बन्ध: किसी वस्तु की स्थिति या विन्यास परिवर्तन के लिए किया गया कार्य उसमें ऊर्जा के रूप में संचित हो जाता है | इसे वस्तु की स्थितिज ऊर्जा कहते हैं , जो की वस्तु की स्थिति या विन्यास में विकृति के कारण होती है| स्थितिज ऊर्जा दो प्रकार की होती है 1.प्रत्यास्थ स्थितिज ऊर्जा किसी वस्तु में विन्यास परिवर्तन के कारण संचित ऊर्जा को प्रत्यास्थ स्थितिज ऊर्जा कहते हैं| 2. गुरुत्वीय स्थितिज उर्जाः किसी ऊंचाई पर स्तिथ वस्तु की ऊर्जा उसकी अवस्था के कारण होती है और इसे गुरुत्वीय स्थितिज उर्जा कहते हैं। v वेग से गतिशील m द्रव्यमान के निकाय की गतिज ऊर्जा के लिए व्यंजक निम्न प्रकार दिया जाता है : तथा वेग = v तो, निकाय की अंतिम गतिज ऊर्जा होगी (ii) जब द्रव्यमान = m वेग = 2v तो, निकाय की अंतिम गतिज ऊर्जा होगी इसका तात्पर्य है कि गतिज ऊर्जा वास्तविक मान की चार गुनी हो जाएगी। (c) जब यह A स्थिति से B स्थिति की ओर गति करता है, तो इसकी चाल में वृद्धि होती है तथा ऊंचाई में कमी होती है। (e) जबकि, जब लोलक B स्थिति से C स्थिति की ओर जाता है, तो इसकी ऊंचाई में वृद्धि तथा चाल में कमी होती है। दिया गया है गेंद का भार, m = 4 kg v = 20 m/s h= 15m गेंद की गतिज ऊर्जा जब उसे ऊपर फेंका जाता है 15m पर गेंद की स्थितिज ऊर्जा (P.E)= mgh= 4x10x 15= 600J 15m पर गेंद की गतिज ऊर्जा (K.E)= 800J - 600J = 200J गेंद की कुल ऊर्जा = P.E + K.E = 600 J + 200J = 800 J u = 54km/h = [54 x 1000/3600)] m/s किया गया कार्य = गतिज ऊर्जा में परिवर्तन = (1/2)x m x (v2 - u2) = (1/2) x 30 x [(0 - (15)2] = - 3375 J पानी का द्रव्यमान ऊंचाई जिससे पानी ऊपर उठता है गुरुत्वाकर्षण के कारण त्वरण पानी की बाल्टी उठाने में व्यक्ति द्वारा किया गया कार्य स्थितिज ऊर्जा के रूप में संगृहीत हो जाता है इसलिए किया गया कार्य = 500J व्यक्ति द्वारा उपयोग की गई शक्ति P = W/t = 500/10 = 50W उपरोक्त चित्र में, यह गेंद बिंदु A से बिंदु C की ओर स्वतन्त्र रूप से गिर रही है। इसकी स्थितिज ऊर्जा गतिज ऊर्जा में परिवर्तित हो जाती है। कुल ऊर्जा स्थिर रहती है। इसलिए समीकरण (1) तथा (2) से, हमें प्राप्त होता है, विद्धुत उपकरण की शक्ति दर P = 500W = 500/1000 KW =0.50 KW चार उपकरणों द्वारा उपयोग की गई कुल शक्ति = 4 x 0.50 = 2KW समय जब तब उपकरण उपयोग किए जाते हैं t = 10h किया गया कार्य = विद्युत उपकरणों द्वारा उपयोग की गई ऊर्जा उपभोग की गई ऊर्जा =शक्ति x समय = 2KW x 10h = 20KWh क्योंकि 1KWh = 3.6 x 106 J इसलिए 20 KWh = 20 x 3.6 x 106 J = 72 x 106 J a) कार्य होने के लिए दो चीजें आवश्यक हैं- i) बल तथा b) गुरुत्वाकर्षण बल ऊर्ध्वाधर: नीचे की ओर लगता है तथा विस्थापन क्षैतिज दिशा में है, अतः बल तथा विस्थापन के बीच में कोण 900 होगा। अतः कृत कार्य शून्य होगा| (c) जब आदमी पुल पर चढ़ता है तो ऊपर की ओर ऊर्ध्व दिशा में विस्थापन पुल की ऊचाँई के बराबर होगा। चूँकि गुरुत्व बल ऊर्ध्वत: नीचे की दिशा में है, अतः बल व विस्थापन की दिशाओं के बीच कोण 1800 है। अतः कृत कार्य का मान 1960 जूल होगा। कार्य ऋणात्मक(-) है, क्योंकि बल तथा विस्थापन की दिशायें विपरीत हैं। B. त्वरित वृत्ताकार गति की। C. सरल रेखीय गति की। D. कंपन गति की। एक वृत्ताकार गति वह गति है जिसमें, कोई कण या एक बिंदु द्रव्यमान निकाय किसी वृत्त पर गति कर रहा है।
B. असमरूप। C. शून्य। D. ऋणात्मक। चूँकि, वेग में कोई परिवर्तन नहीं होता है। इसलिए, त्वरण शून्य होता है।
B. घटते हुए वेग को। C. वेग समान रहता है। D. वेग विरामवस्था में रहता है। यदि त्वरण, वेग की दिशा में है, तो इसे धनात्मक लिया जाता है तथा यदि यह वेग के विपरीत दिशा में है, तो इसे ऋणात्मक लिया जाता है।
B. वक्ररेखीय। C. सरल रेखीय। D. परवलिक। जब कोई निकाय समान समय अंतरालों में समान दूरियां तय करता है, तो यह समरूप चाल से गति की अवस्था में कहलाता है। यह दर्शाता है कि निकाय द्वारा तय की गई दूरी, लिए गए समय के समानुपाती होती है।
B. इसकी प्रारम्भिक तथा अन्तिम स्थितियाँ समान हैं। C. और केवल यदि यह समरूप गति की अवस्था में है। D. ये समान दूरियाँ तय करते हैं। यदि गतिशील निकाय की दिशा निर्धारित है, तो किसी निकाय की औसत चाल का परिमाण, इसके औसत वेग के बराबर होता है।
B. घटती हुई चाल से। C. समरूप चाल से। D. उच्च चाल से। यदि त्वरण, वेग की दिशा में है, तो इसे धनात्मक लिया जाता है तथा यदि यह वेग के विपरीत दिशा में है, तो इसे ऋणात्मक लिया जाता है। इसके अलावा, ऋणात्मक त्वरण मंदन कहलाता है।
B. लिया गया समय / तय की गई दूरी C. त्वरण / समय D. विस्थापन / समय अंतराल गतिशील निकाय का वेग, विस्थापन तथा निकाय द्वारा लिए गए समय अंतराल के अनुपात के रूप में परिभाषित किया जाता है। अर्थात्, वेग = विस्थापन / समय अंतराल।
B. एक सदिश राशि। C. एक नियत राशि। D. हमेशा धनात्मक। चाल एक अदिश राशि है। यह निकाय की गति की दिशा के बारें में कोई विचार प्रदान नहीं करती है। निकाय की चाल शून्य या धनात्मक हो सकती है लेकिन, कभी भी ऋणात्मक नहीं हो सकती है।
B. cm s-1 C. h Km-1 D. m s-1 चाल, किसी निकाय द्वारा तय की गई दूरी तथा इसके द्वारा लिए गए समय का अनुपात होती है। दूरी (लम्बाई) का SI मात्रक मीटर है तथा समय का SI मात्रक सेकण्ड है। इस प्रकार, चाल का SI मात्रक m/s है।
B. समरूप गति की अवस्था में। C. दोलन गति की अवस्था में। D. असमरूप गति की अवस्था में। कोई निकाय समरूप गति की अवस्था में कहलाता है, यदि इसका वेग समरूप है। अर्थात्, यह समान समय अंतराल में समान विस्थापन से गुज़रता है। चाहे, ये अन्तराल कितने भी सूक्ष्म हों।
B. प्रारम्भिक स्थिति। C. अंतिम स्थिति। D. दूरी। एक निकाय को गतिशील की अवस्था में कहा जाता है यदि इसकी स्थिति में परिवेश के सापेक्ष समय के साथ परिवर्तन होता है। जब कोई बिंदु निकाय गति की अवस्था में होता है, और हम इसकी स्थिति का वर्णन करना चाहते हैं, तो हम एक निर्देश बिंदु का उपयोग करेंगे, जो मूल बिंदु कहलाता है।
B. असमरूप चाल से गतिशील एक निकाय। C. एक समरूप त्वरित गति। D. असमरूप त्वरित गति। विस्थापन – समय ग्राफ़ में एक वक्र असमरूप चाल से गतिशील एक निकाय की गति को निरुपित करता है।
B. प्रारम्भिक तथा अंतिम स्थितियों के बीच वास्तविक दूरी। C. निकाय द्वारा तय की गई दूरी। D. एकांक समय में निकाय द्वारा तय की गई दूरी। दिए गए समय में किसी गति में किसी निकाय का विस्थापन निकाय की स्थिति में परिवर्तन होता है। यह निकाय की दो स्थितियों के बीच न्यूनतम दूरी होती है तथा इसकी दिशा दिए गए समय अंतराल के दौरान निकाय की प्रारम्भिक दिशा से अंतिम दिशा की ओर होती है।
B. 400 km h-2 C. 0.066 m s-2 D. 2400 m s-2 समरूप त्वरण दिया जाएगा,
B. 0.23m/s C. 0.4m/s D. 0.6m/s चाल = दूरी/चाल
तय की गई दूरी = 30m
लिया गया समय = 1.5m = 1.5 x 60s
= 90s
इस प्रकार, चाल = 30/90
= 0.33m/s
B. 3 km C. 36 km D. 18 km दूरी = चाल x समय, सूत्र के उपयोग से,
ट्रेन द्वारा तय की गई दूरी = 36 km
B. एक सदिश राशि। C. व्युत्पित राशि। D. हमेशा धनात्मक। विस्थापन एक सदिश राशि होती है क्योंकि, इसकी परिमाण के साथ – साथ दिशा भी होती है।
B. समरूप मंदन की स्थिति में । C. सम्पूर्ण गति में समरूप वेग की स्थिति में। D. सम्पूर्ण गति में असमरूप वेग की स्थिति में । x – अक्ष के समानान्तर सरल – रेखा, समरूप वेग को निरुपित करती है।
B. प्रथम 2 सेकण्ड में त्वरण ऋणात्मक है। C. दूसरी तथा दसवीं सेकण्ड के बीच गति असमरूप है। D. निकाय t=2 तथा t=10 सेकण्ड पर विरामवस्था में आ जाता है। प्रथम 2 सेकंड में वेग समय के साथ बढ़ रहा है इसलिए प्रथम २ सेकण्ड में त्वरण धनात्मक है |
B. मध्य बिन्दु C. अंतिम बिन्दु D. परिमाण किसी निकाय की स्थिति को स्पष्ट करने के लिए हमें एक निर्देश बिन्दु की आवश्यकता होती है, जिसे मूल बिन्दु कहते हैं|
किसी वस्तु द्वारा चली गयी दूरी से यह पता नहीं चलता कि वस्तु किस दिशा में जा रही है तथा अंत में किस स्थान पर पहुँचेगी पिण्ड की औसत-चाल = (सम्पूर्ण दूरी)/(सम्पूर्ण समय) = 2 किसी क्षण पर किसी गतिशील वस्तु का वेग उसका तात्क्षणिक वेग कहलाता है।
A. प्रारम्भिक स्थिति से अंतिम स्थिति तक पहुँचने वाले मार्ग पर SOLUTION
A. रासायनिक ऊर्जा से गतिज ऊर्जा में SOLUTION
A. 1 न्यूटन प्रति सेकंड SOLUTION
A. 1 जूल SOLUTION
A. दुगुनी हो जाएगी SOLUTION
Right Answer is: B
SOLUTION
Right Answer is: B
SOLUTION
A. कार्य = बल / विस्थापन SOLUTION
A. 20 मीटर/सेकण्डSOLUTION
SOLUTION
SOLUTION
A. गतिज उर्जा SOLUTION
A. धनात्मक होता है।SOLUTION
A. 30 जूल होगा।SOLUTION
A. न्यूटन है।SOLUTION
A. धनात्मक होता है।SOLUTION
A. गुरुत्वीय स्थितिज ऊर्जाSOLUTION
A. परिवर्तित होता रहता है SOLUTION
SOLUTION
SOLUTION
SOLUTION
= 5kg × 10ms-2 × 10m = 500 JSOLUTION
SOLUTION
SOLUTION
SOLUTION
SOLUTION
SOLUTION
SOLUTION
( वेग)2 SOLUTION
SOLUTION
SOLUTION
SOLUTION
SOLUTION
SOLUTION
SOLUTION
SOLUTION
गतिज ऊर्जा = (1/2 )mv2
= (1/2) X 10kg X (4m/s)2
= 20 JSOLUTION
SOLUTION
SOLUTION
Right Answer is:
SOLUTION
SOLUTION

(i) जब द्रव्यमान = 2m

इसका तात्पर्य है कि गतिज ऊर्जा दुगुनी होगी।
SOLUTION

(a) जब लोलक को B स्थिति से A स्थिति तक खींचा जाता है, तो हमारी ऊर्जा स्थितिज ऊर्जा के रूप में संग्रहीत हो जाती है।
(b) जैसे ही यह मुक्त किया जाता है, यह उसी ऊर्जा के कारण स्थिति B की ओर गति करना शुरू कर देता है।

(d) इस प्रकार, A स्थिति पर इसकी स्थितिज ऊर्जा इसकी गतिज ऊर्जा में रूपांतरित हो जाती है।

(f) इस प्रकार, स्थिति B से स्थिति C की ओर लोलक की गतिज ऊर्जा इसकी स्थितिज ऊर्जा में रूपांतरित हो जाती है।SOLUTION

SOLUTION
SOLUTION
SOLUTION

आइये विभिन्न बिन्दुओं जैसे A, B तथा C पर गेंद की ऊर्जा की गणना करते हैं।
A स्थिति पर: इस बिंदु पर, गेंद स्थिर है। इसलिए इसका वेग (v) शून्य है।
निकाय की गतिज ऊर्जा, T = 0 ………………….. (1)
स्थितिज ऊर्जा,U = mgh………………………………. (2)
कुल यांत्रिक उर्जा = गतिज उर्जा + स्थितिज उर्जा
कुल ऊर्जा = mgh…………………………. (3)
B स्थिति पर: माना यह गेंद बिंदु A से B की ओर गति कर रही है। तथा x दूरी तय करती है। माना v इस स्थिति पर गेंद का वेग है।
चित्र के अनुसार, ऊंचाई h-x के बराबर है।
गति के समीकरण से, v2 = u2 + 2ax………………………. (4)
समीकरण (4) में u = o रखने पर, क्योंकि प्रारम्भिक वेग शुन्य है।
इस प्रकार, हमें प्राप्त होता है, v2 = 2ax = 2gx
गतिज ऊर्जा

स्थितिज ऊर्जा = U = mg (h-x)
=mgh - mgx……………………… (5)
कुल यांत्रिक उर्जा = गतिज उर्जा + स्थितिज उर्जा
इस प्रकार, समीकरण (4) तथा (5) से,
कुल ऊर्जा = mgh………………………… (6)
स्थिति C पर : माना भूमि पर पहुँचने से पहले उस बिंदु पर गेंद का वेग v है।
समीकरण v2 = u2 + 2gh से,
v2 = 0 + 2gh
![]()
इस प्रकार, समीकरण (7) से,
कुल ऊर्जा =mgh + 0
कुल ऊर्जा = mgh…………………………………(8)
समीकरण (3), (6) तथा (8) से, यह स्पष्ट है कि यांत्रिक ऊर्जाओं का योग स्वतन्त्र रूप से गिर रहे निकाय के पथ में प्रत्येक बिंदु पर समान होता है।SOLUTION
SOLUTION
ii) बल की दिशा में विस्थापन
चूँकि आदमी प्लेटफार्म पर खड़ा रहता है, अतः विस्थापन शून्य होगा, इसलिए वह चाहे कितनी भी देर खड़ा रहे लेकिन कार्य शून्य ही रहेगा|

A. समरूप वृत्ताकार गति की।SOLUTION
A. समरूप।SOLUTION
A. बढ़ते हुए वेग को।SOLUTION
A. एक सरल – रेखा।SOLUTION
A. यह एक निश्चित दिशा में गति कर रहा है।SOLUTION
A. बढती हुई चाल से।SOLUTION
A. तय की गई दूरी / लिया गया समयSOLUTION
A. एक अदिश राशि।SOLUTION
A. km h-1SOLUTION
A. वृत्ताकार गति की अवस्था में।SOLUTION
A. मूल बिन्दु।SOLUTION
विस्थापन – समय ग्राफ़ दर्शाता है:-
A. समरूप वेग से गतिशील एक निकाय।SOLUTION
A. प्रारम्भिक तथा अंतिम स्थितियों के बीच न्यूनतम दूरी।SOLUTION
A. 40 km h-2SOLUTION
A. 0.5m/sSOLUTION
A. 15 kmSOLUTION
A. एक अदिश राशि।SOLUTION
A. समरूप त्वरण की स्थिति में ।SOLUTION
उपरोक्त किसी गतिशील निकाय के वेग – समय ग्राफ में
A. प्रथम 2 सेकण्ड में त्वरण धनात्मक है।SOLUTION
A. निर्देश बिन्दु SOLUTION
Right Answer is:
SOLUTION
SOLUTION
SOLUTION