कर्णावर्त, दाब परिवर्तनों को विद्युत संकेतों में परिवर्तित कर देता है।
समारोह हॉल तथा सम्मेलन हॉल की छत यह सुनिश्चित करने के लिए सामान्यतया वक्राकार बनाई जाती है कि ध्वनि छतों से परावर्तन के बाद हॉल मे बैठे सभी लोगों के कानों तक पहुँच जाये।
साधारण कमरे मुश्किल से 17 मीटर लम्बे या चौड़े होते हैं । प्रतिध्वनि सुनने के लिए, ध्वनि के स्त्रोत तथा परावर्ती वस्तु के बीच की न्यूनतम दूरी 17 मीटर होती है।
किसी ध्वनि तरंग की प्रबलता या मधुरता
किसी भिन्न प्रतिध्वनि के लिए ध्वनि स्त्रोत तथा परावर्तक के बीच यह न्यूनतम दूरी कम से कम 17.2 मीटर होनी चाहिए।
चमगादड़ तथा डॉल्फिन अपने मार्गदर्शन के लिए प्रतिध्वनि का उपयोग करते हैं।
सोनार (Sound Navigation And Ranging) से बना है।
अवश्रव्य कम्पन की आवृत्ति 20 Hz से कम होती है जबकि पराध्वनि कम्पन की आवृत्ति 20,000 Hz से अधिक होती है।
सोनार तकनीक घाटियों
ध्वनि के परावर्तन के नियम अनुसार, जिस दिशा में ध्वनि आपतित तथा परावर्तित होती है परावर्तित सतह के अभिलम्ब के साथ समान कोण बनाती है तथा आपतन बिंदु पर तीनों समान तल में होते हैं।
हॉल की छत, फर्श तथा दीवारों से लगातार परावर्तन के कारण बड़े हॉल में ध्वनि की पुनरावृत्ति प्रतिध्वनि कहलाती है।
ध्वनि तरंग की सीमा इसकी आवृत्ति द्वारा निर्धारित की जाती है।
सामान्यतया मानव कान की श्रव्य परिसर लगभग 20 Hz से 20,000 Hz होती है।
A.
बर्फ
B.
शुष्क बर्फ
C.
जल
D.
जल वाष्प
किसी पदार्थ का ठोस अवस्था से बिना द्रव अवस्था में आये सीधे गैसीय अवस्था में परिवर्तन उर्ध्वपातन कहलाता है | शुष्क बर्फ ठोस CO2 होती है |
A.
दाब और ताप
B.
दाब और आयतन
C.
आयतन और ताप
D.
ताप
ठोस CO2 का दाब 1atm तक कम करने पर यह बिना द्रव अवस्था में आये सीधे गैसीय अवस्था में परिवर्तित हो जाती है | यही कारण है की ठोस कार्बन डाइऑक्साइड शुष्क बर्फ भी कहलाती है | अतः हम कह सकते हैं कि दाब और ताप एक पदार्थ की अवस्था का निर्धारण करते हैं कि यह ठोस, द्रव या गैस होगा |
A.
जल में स्याही की एक बूँद
B.
नाइट्रोजन में ऑक्सीजन
C.
जल में दूध
D.
नमक में चीनी
गैसों के कणों की उच्च गतिज ऊर्जा और कणों के मध्य अधिक स्थान के कारण गैसें दूसरी गैसों में तीव्र विसरित होने का गुण दर्शाती है |
A.
जल
B.
बर्फ
C.
ऑक्सीजन
D.
वाष्प
बर्फ एक ठोस है और केवल ठोसों का आकार और आयतन निश्चित होता है |
A.
शहद
B.
कपास
C.
आटा
D.
प्लास्टिसीन
प्लास्टिसीन एक ठोस है, जिसे एक ईंट के साथ गर्म करने पर यह टुकड़ों में टूट जाता है | कपास और आटा अक्रिस्टलीय ठोस है | केवल शहद एक गाढा द्रव है |
A.
0°C पर जल
B.
100°C पर जल
C.
0°C पर बर्फ
D.
0°Cपर गैस
0°Cपर बर्फ का शीतलन प्रभाव अधिक होता है क्योंकि इसके संलयन की गुप्त ऊष्मा अधिक होती है इसलिए यह परिवेश से अधिक ऊर्जा का अवशोषण करती है और इसीकारण इसका शीतलन प्रभाव अधिक होता है |
A.
ठोस
B.
प्लाज्मा
C.
द्रव
D.
गैस
ठोसों का आकार और आयतन निश्चित होता है द्रवों का आयतन निश्चित होता है लेकिन आकार नहीं, गैसों का न तो आकार निश्चित होता है और न ही आयतन | प्लाज्मा अत्यधिक ऊर्जा युक्त कण है |
A.
40°K
B.
100°F
C.
− 40°C
D.
− 100°C
−40°C को फारेनहाइट में निम्न प्रकार दर्शाया जाता है
किसी पदार्थ की वाष्प के द्रव अवस्था में परिवर्तित होने की क्रिया को संघनन कहते हैं |
समुद्र के जल से नमक प्राप्त करना वाष्पन का एक उदाहरण है।
यदि किसी पात्र में कोई द्रव रखा हो तो उसके ऊपरी पृष्ठ से द्रव के अणु मुक्त होकर वायुमंडल में जाते रहते हैं। यह क्रिया जो प्रत्येक ताप पर होती रहती है, वाष्पन कहलाती है।
आयोडीन एक ऊर्ध्वपातित पदार्थ है।
कुछ ठोस पदार्थ दाब तथा ताप की सामान्य अवस्था में अथवा दाब कम करने पर, ठोस अवस्था से सीधे वाष्प अवस्था में परिवर्तित हो जाते हैं, इस प्रक्रिया को ऊर्ध्वपातन कहते हैं।
सर्दियों के मौसम में रात को वायुमंडल का ताप कम हो जाने पर वायु में उपस्थित जल वाष्प, जल (द्रव) की बूँदों के रूप में वस्तुओं पर संघनित हो जाती है , जिसे ओस कहते हैं।
द्रव का आयतन निश्चित तथा आकार अनिश्चित होता है।
नमक के कण जल के कण के मध्य स्थापित हो जाते हैं जिसके कारण मिश्रण का आयतन नहीं बढ़ता है।
द्रव्य के अणुओं के बीच रिक्त स्थान रहता है जिसे अंतरा-अणुक स्थान कहते हैं।
ठोस
ताप बढ़ने पर द्रव्य के अणुओं की गतिज ऊर्जा बढ़ जाती है।
जल, हमें द्रव के रूप में , बर्फ ठोस के रूप में तथा भाप गैस के रूप में प्राप्त होती है।
कोई भी वस्तु जिसका कुछ द्रव्यमान हो तथा जो स्थान घेरती हो, द्रव्य कहलाती हैं।
ठोस अवस्था में द्रव्य का आकार तथा आयतन सुनिश्चित होता है।
द्रव अवस्था में द्रव्य का आयतन तो निश्चित रहता है परन्तु आकृति निश्चित नहीं होती अर्थात द्रव को जिस बर्तन में रखा जाता है वह उसी की आकृति ग्रहण कर लेता है।
(i) आकार- द्रव के अणु गति करते रहते हैं जिसके फलस्वरूप इनका स्थान स्थिर नहीं रहता, इसलिए द्रवों का आकार निश्चित नहीं होता है।
(ii) तरलता - द्रव, अणुओं की गतिशीलता के कारण ही तरल होते हैं।
(i) आकार- गैस के अणु गति करते रहते हैं अर्थात उनका स्थान स्थिर नहीं होता, इसलिये गैसों का आकार अनिश्चित होता है।
(ii) गतिज ऊर्जा- गैसीय अवस्था में स्थितिज ऊर्जा पूर्णतया गतिज ऊर्जा में बदल जाती है, अत: गैस की गतिज ऊर्जा सर्वाधिक होती है।
एक ही द्रव्य के अणुओं के पारस्परिक आकर्षण बल को संसजन बल कहते हैं। ठोस अवस्था के अणुओं के मध्य संसजन बल सबसे अधिक होता है।
द्रव्य की वह अवस्था जिसमें उच्च ताप पर परमाणु आयनित अवस्था में रहते हैं, प्लाज्मा कहलाती है। यह अवस्था विद्युत् की सुचालक है।
गैसीय अवस्था में द्रव्य का आकार तथा आयतन दोनों निश्चित नहीं होते हैं। उन्हें जिस बर्तन में रखा जाता है उसी का आकार ले लेते हैं तथा बर्तन में उपलब्ध सम्पूर्ण स्थान को घेर लेते हैं। उदाहरण: वायु जल और वाष्प या भाप।
द्रव्य
की तीन
प्रमुख
भौतिक
अवस्थाएं
होती हैं।
i. ठोस
ii. द्रव
iii. गैस
किताब- किताब द्रव्य की ठोस अवस्था है। ठोस के अणुओं के मध्य अन्तरा अणुक स्थान बहुत कम होता है तथा आकर्षण बल बहुत अधिक होता है जिसके कारण ठोस के अणु बहुत पास-पास होते हैं।
पेट्रोल - पेट्रोल द्रव्य की द्रव अवस्था है। द्रव के अणुओं के मध्य अन्तरा अणुक स्थान ठोस की तुलना में अधिक होता है तथा आकर्षण बल कम होता है जिसके कारण द्रव के अणु दूर-दूर होते हैं।
ठोस के भौतिक गुण उसकी आणविक संरचना पर निर्भर करते हैं अर्थात परमाणु किस प्रकार परस्पर बंधे हैं इस पर निर्भर करते हैं ।
उदाहरण- हीरा और ग्रेफाइट
|
ठोस |
द्रव |
गैस |
|
बर्फ |
पारा |
ऑक्सीजन |
|
चीनी |
शर्बत |
नाइट्रोजन |
|
सोडियम |
ब्रोमीन |
वायु |
|
|
दूध |
|
द्रव्य
के तीन मूल
लक्षण हैं:
i. द्रव्य
स्थान घेरता
है।
ii. द्रव्य के
कण निरंतर
गतिशील होते
हैं।
iii. द्रव्य के
कण एक-दूसरे
को आकर्षित
करते हैं।
द्रव के अणुओं में ठोस अवस्था की अपेक्षा गतिज ऊर्जा अधिक होती है। जिसके परिणामस्वरूप अणुओं के मध्य अन्तरा अणुक स्थान अधिक होता है। अन्तरा अणुक स्थान अधिक होने के कारण उनके मध्य आकर्षण बल ठोस की तुलना में कम होता है तथा द्रव के अणु, द्रव की बाहरी सीमाओं के भीतर एक दूसरे के सापेक्ष फिसल जाते हैं। अणुओं के इस गुण को तरलता कहते हैं। द्रव अवस्था के अणुओं में तरलता पायी जाती है।
1. गलनांक:- वायुमंडलीय दाब पर कोई पदार्थ जिस न्यूनतम निश्चित ताप पर ठोस अवस्था से द्रव अवस्था में परिवर्तित होता है, उसे पदार्थ का गलनांक कहते हैं।
2. हिमांक:- वायुमंडलीय दाब पर कोई पदार्थ जिस निश्चित ताप पर द्रव अवस्था से ठोस अवस्था में परिवर्तित होता है, उसे पदार्थ का हिमांक कहते हैं।
द्रव्य या पदार्थ वह वस्तु है
द्रव्य के अणुगति सिद्धांत की चार अभिधारणाएँ इस प्रकार हैं -
i. अणुओं में परस्पर आकर्षण एवं प्रतिकर्षण बल होता है, जिसके फलस्वरूप उनमें स्थितिज ऊर्जा होती है।
ii. एक ही द्रव्य के अणुओं में पारस्परिक आकर्षण बल को संसजन बल कहते हैं।
iii. द्रव्य के अणुओं के मध्य की दूरी बढ़ने पर आकर्षण बल कम होता है।
iv. ताप बढाने पर द्रव्य के अणुओं की गतिज ऊर्जा बढ़ती है।
(i) आकार- ठोस अवस्था में अणुओं की स्थितियाँ एक निश्चित क्रम में व्यवस्थित होती हैं।
(ii) आयतन- ठोस पर दाब डालने पर उसके आयतन में परिवर्तन नहीं होता क्योंकि इसके अणु पास-पास स्थित होते हैं।
(iii) आकर्षण बल- ठोस के अणु पास-पास स्थित होते हैं जिसके कारण अन्तरा अणुक स्थान बहुत कम होता है।
(iv) घनत्व - अणुओं के परस्पर अत्यधिक निकट होने के कारण ठोस का घनत्व अधिक होता है।
(v) समाकृतिकता- कुछ ठोसों की आकृति एक जैसी होती है, इन ठोसों को समाकृतिक कहते है तथा उनके इस गुण को समाकृतिकता कहते हैं।
लकड़ी की भौतिक अवस्था ठोस है। लकड़ी में उपस्थित अणु अत्याधिक पास-पास होते हैं और अणुओं के बीच आकर्षण बल बहुत अधिक होता है। परिणामस्वरूप अणुओं में गति नगण्य होती है जिसके कारण ठोस का आयतन तथा आकार दोनों ही निश्चित होते हैं।
जल की भौतिक अवस्था द्रव है। द्रव के अणुओं में, ठोस अवस्था की अपेक्षा गतिज ऊर्जा अधिक होती है जिसके परिणामस्वरूप अणुओं के बीच का अंतरा-अणुक स्थान अधिक होता है और आकर्षण बल ठोस अवस्था की तुलना में कम होता है।इसके कारण द्रव की अपनी कोई निश्चित आकृति तथा आयतन नहीं होता है।
वायु की भौतिक अवस्था गैस है।गैस के अणुओं में ठोस एवं द्रव की अपेक्षा अधिक गतिज ऊर्जा होने के कारण उनके बीच का आकर्षण बल नगण्य होता है और गैस के अणु विभिन्न दिशाओं में विभिन्न चालों से अनियमित गति करते रहते हैं। अणुओं की अनियमित गति के कारण ही गैसों का आयतन एवं आकार दोनों ही अनिश्चित होते हैं।
A.
सॉल का
B.
फोम का
C.
इमल्शन का
D.
जैल का
कीचड़ सॉल का एक उदाहरण है क्योंकि सॉल में परिक्षिप्त प्रावस्था ठोस है जबकि परिक्षेपण माध्यम द्रव है ।
A. 
B. 
C. 
D. 
ऐल्कोहॉल और जल मिश्रणीय विलयन बनाते हैं इसके कणों को नग्न आँखों से नहीं देखा जा सकता है । मिट्टी का तेल जल के साथ अमिश्रणीय होता है और दो परते बनाता है । जल और साबुन का विलयन कोलॉइड बनाता है ।
1 किग्रा द्रव्यमान को 1 मीटर/सेकंड2 पर त्वरित करने के लिए आवश्यक बल, 1 न्यूटन के बराबर होता है। 1न्युटन (N) = 1kg x 1ms-2
गतिशील निकाय हमेशा गतिशील नहीं रहते हैं, क्योंकि उन पर हमेशा असंतुलित बल कार्यरत होता है। उदाहरण के लिए, टेबल पर फिसल रही पुस्तक असन्तुलित बल (घर्षण बल) के कारण कुछ समय बाद धीमी हो जाती है और रुक जाती है।
द्रव्यमान,m का SI मात्रक = kg
त्वरण, a का SI मात्रक = m/s2
हम जानते हैं कि
F = ma
इसलिये बल का SI मात्रक होगा kg-m/s2
आ रहे मुक्के के प्रभाव को कम करने के लिए, मुक्केबाज अपने सिर को पीछे की दिशा में ले जाता है जिससे उसे मार के लिए समय मिल जाता है। यह संवेग के परिवर्तन की दर में कमी का कारण बनता है। परिणामस्वरूप मुक्के द्वारा लगाया गया बल कम हो जाता है।
किसी निकाय पर आरोपित आवेग, निकाय पर आरोपित बल तथा वह समय जिसमें वह बल निकाय पर कार्यरत रहा है, के गुणनफल के बराबर होता है।
आवेग = बल x समय
किसी वस्तु का संवेग उसके द्रव्यमान तथा वेग का गुणनफल होता है। यह एक सदिश राशि है, जिसकी दिशा वही होती है जो वेग की दिशा होती है।
समान वेग से गति कर रही क्रिकेट की गेंद की बजाय टेनिस की गेंद को रोकना आसान है, क्योंकि टेनिस की गेंद क्रिकेट की गेंद की तुलना में हल्की होती है। टेनिस की गेंद का संवेग कम होता है क्योंकि निकाय का संवेग, द्रव्यमान के समानुपाती होता है। इस प्रकार, टेनिस की गेंद को रोकने के लिए कम बल की आवश्यकता होती है क्योंकि बल, संवेग में परिवर्तन के समानुपाती होता है।
वस्तु का द्रव्यमान, m = 5 किग्रा
वस्तु का वेग, v = 8 मी/से
अतः वस्तु का संवेग, p = m × v = 5 किग्रा × 8 मी/से = 40 किग्रा मी/से
जब बस अचानक रवाना होती है, तो वह लड़का विरामवस्था के जड़त्व के कारण पीछे की दिशा में जाता है और इस प्रकार वह लड़का पीछे की दिशा में गिर जाता है।
न्यूटन की गति के प्रथम नियम को जड़त्व के नियम के रूप में भी जाना जाता है।
बल = 1


संवेग, निकाय की गति का माप माना जाता है। किसी निकाय का संवेग द्रव्यमान तथा वेग के गुणनफल के रूप में परिभाषित किया जाता है। संवेग का SI मात्रक
किसी निकाय के वेग में परिवर्तन की दर को उस निकाय का त्वरण कहते हैं।
वस्तु का प्रारंभिक संवेग = 20 × 12 = 240 किग्रा मी/से
वस्तु का अंतिम संवेग = 20 × 28 = 560 किग्रा मी/से
वस्तु के संवेग में परिवर्तन = 560 - 240 = 320 किग्रा मी/से
संवेग परिवर्तन कि दर
= संवेग परिवर्तन / समय

kg-m/s2
न्यूटन तथा डाईन के बीच सम्बन्ध:
इस प्रकार,
एक चुम्बक आकर्षण बल के कारण लोहे की कील को गतिशील बना सकती है और लोहे की कील गति की अवस्था में स्थापित हो जाती है। खिलाड़ी हॉकी से मारकर गेंद को गति प्रदान करते हैं।
सामान्यतया, जब हम धरती पर चलते हैं तो हम धरती को अपने पैरों से पीछे की ओर धक्का मारते हैं और धरती हम पर प्रतिक्रिया करती है जो हमें आगे की दिशा में धक्का मारती है। यदि यह प्रतिक्रिया नहीं मिलती है, तो घर्षण बल लगभग नगण्य हो जाता है और हम गिर जाते हैं। केले के छिलके की सतह चिकनी होती है, इस पर हम जैसे ही कदम रखते हैं तो हमें प्रतिक्रिया नहीं मिल पाती है और हम हमारा संतुलन खो देते हैं और गिर जाते हैं।
नाविक यात्रियों को नाव से उतरने की अनुमति देने से पहले हमेशा अपनी नाव को बाँधता है, क्योंकि जब यात्री नाव से उतरता है तो वह अपने पैरों से नाव को पीछे की ओर धकेलता है।
इस स्थिति में, नाव झटके से पीछे की ओर हट जाती है।
बैडमिंटन मैदान की सतह अत्यधिक पॉलिश की हुई होती है, जिसके कारण वह बहुत चिकनी हो जाती है। चिकनी सतह के लिए घर्षण बल बहुत कम होता है। खिलाड़ी राल में अपने जूते घिसकर चलते हैं, क्योंकि राल जूतों के तलवों को खुरदरी बनाती है जिससे घर्षण बल में वृद्धि होती है तथा खिलाड़ी फिसलने से बच जाता है।
बल, F = 6N
द्रव्यमान m1 के लिए त्वरण, a1=9m/s2
द्रव्यमान m2 के लिए त्वरण, a2 = 9m/s2
F = ma

इस प्रकार अन्तिम त्वरण जब m1 तथा m2 बंधे हैं

A. दोनों का जड़त्व कम होगा।
B. दोनों का जड़त्व समान होगा।
C. B का जड़त्व अधिक होगा।
D. A का जड़त्व अधिक होगा।
A का जड़त्व अधिक होगा, क्योंकि जड़त्व, द्रव्यमान से सम्बंधित होता है।
A. kg ms–1
B. kg ms
C. kg ms–2
D. kg m2
संवेग = द्रव्यमान × वेग में परिवर्तन। द्रव्यमान का मात्रक kg होता है तथा वेग का मात्रक ms–1 होता है| अत: संवेग का मात्रक kg ms–1 होगा |
A. ऊर्जा - संरक्षण के सिद्धान्त पर।
B. द्रव्यमान - संरक्षण के सिद्धान्त पर।
C. संवेग - संरक्षण के सिद्धान्त पर।
D. जड़त्व के नियम पर।
रॉकेट, गति के तृतीय नियम का उदाहरण है। अर्थात्, संवेग - संरक्षण का नियम।
A. घनत्व।
B. भार।
C. बल।
D. द्रव्यमान।
निकाय का द्रव्यमान जड़त्व की माप होता है।
A. पदार्थ का एक गुण।
B. बल का एक प्रकार।
C. किसी निकाय की चाल।
D. किसी निकाय का त्वरण।
जड़त्व पदार्थ का एक गुण होता है, जिसके कारण यह अपनी विरामावस्था या समरूप गति की अवस्था में परिवर्तन का विरोध करता है।
A. आरोपित बल की दिशा में।
B. गति की दिशा में।
C. गति की दिशा के विपरीत दिशा में।
D. गति की दिशा के लम्बवत दिशा में।
घर्षण बल गति की दिशा के विपरीत दिशा में कार्यरत होते हैं।
A. 9 : 64
B. 
C. 27 : 512
D. 3 : 8
संवेग = वेग x द्रव्यमान
चूँकि, दोनों निकाय समान द्रव्यमान के हैं इसलिए, इनके संवेगों का अनुपात भी वेग के अनुपात के समान होगा।
A. 1000 डाईन।
B. 100 डाईन।
C. 10 डाईन।
D. 1,00,000 डाईन।
1 डाईन = 1g x [(1cm/s)/s] 1 N (न्यूटन) = (1kg) x [(1m/s)/s] = [1000g] x [(100cm/s)/s] = 1,00,000 डाईन।
A. इसकी चाल में हमेशा वृद्धि होती है।
B. इसके वेग में हमेशा वृद्धि होती है।
C. यह हमेशा पृथ्वी की ओर गिरता है।
D. हमेशा इस पर एक बल कार्यरत होता है।
जब कोई निकाय त्वरण से गुज़रता है, तो इस पर हमेशा एक बल कार्यरत होता है।
A. संतुलित बल।
B. असंतुलित बल।
C. द्रव्यमान।
D. स्थिरवैद्युत बल।
किसी निकाय पर कार्यरत सभी बलों का परिणामी, शून्य नहीं होता है, अत: किसी निकाय में त्वरण, असंतुलित बल के कारण होता है।
A. स्थिति के परिवर्तन से।
B. बल आरोपित होने की अवधि से।
C. गति की दिशा से।
D. द्रव्यमान तथा त्वरण के गुणनफल से।
गति के द्वितीय नियम के अनुसार, बल = द्रव्यमान × त्वरण।
A. शून्य से अधिक।
B. शून्य से कम।
C. शून्य।
D. अनुमान नहीं लगाया जा सकता है।
क्रिया तथा प्रतिक्रिया बलों का परिणामी शून्य से अधिक होता है।
A. 11.2 m/s
B. 8.2 m/s
C. 6 m/s
D. 11.6 m/s
a = (v – u) / t के उपयोग से, a = (5.6 – 2.8) m/s / 3 s = 2 m/s2 फिर, v = u + at का उपयोग करते है। v = 0 + 3xx2 = 6 m/s
A. बल कुछ अन्य निकाय पर कार्यरत है।
B. बल गति की दिशा के विपरीत दिशा में कार्यरत होता है।
C. बल गति की दिशा के समान दिशा में कार्यरत है।
D. गुरुत्वाकर्षण बल निकाय पर कार्यरत है।
बल = FS cos . जब बल गति की दिशा से विपरीत दिशा में कार्यरत होता है तब =180o और cos 180o = - 1 अत: बल ऋणात्मक होता है जब वह गति की दिशा के विपरीत दिशा में कार्यरत होता है।
A. 3 N
B. 2 N
C. 5 N
D. 50 N
दो द्रव्यमानों के संयोजन का त्वरण = F / (m1 + m2) = 5 / (4+6) = 0.5 m s–2 फिर, हल्के निकाय पर बल को ज्ञात करने के लिए, त्वरण के इस मान का उपयोग करते हैं:- F = m a = 4 × 0.5 = 2 N
A. न्यूटन की गति का द्वितीय नियम।
B. जड़त्व का नियम।
C. न्यूटन की गति का तृतीय नियम।
D. गुरुत्वाकर्षण का नियम।
जड़त्व किसी वस्तु का वह गुण है जिसके कारण वह अपनी गतिमान अवस्था को बनाये रखने का प्रयत्न करती है, जब तक उस पर कोई बाह्य बल कार्यरत न हो। जड़त्व का नियम बल की गुणात्मक परिभाषा प्रदान करता है।
A. विस्थापन के।
B. त्वरण के।
C. बल के।
D. आवेग के।
संवेग में परिवर्तन की दर = m x [(v - u)/t] त्वरण, a = [(v - u)/t] इसलिए, बल = m x [(v - u)/t]= द्रव्यमान x त्वरण।
A. अर्ग।
B. जूल।
C. न्यूटन।
D. डाईन।
बल का SI मात्रक न्यूटन (N) है। 1 न्यूटन = 1 किलोग्राम मीटर प्रति वर्ग सेकण्ड।
उदाहरण :जब हथोड़े से कील पर बाईं ओर बल लगाते है, तो कील भी समान तथा विपरीत दिशा दाईं तरफ, हथोड़े पर बल लगाती है।

उच्च गति वाले वाहनों के कारण सड़क दुर्घटनाओं में सूक्ष्म समय अंतराल में संवेग में बहुत अधिक परिवर्तन होता है। इस प्रकार, उच्च गति के वाहनों की दुघटनाओं में बहुत अधिक बल निहित होता है जो भयानक दुर्घटना का कारण बन सकता है।
आवर्तकाल = 1/आवृत्ति
= 1/2 s
= 0.5 s
कुल तय की गई दूरी = 2 x 10 m = 20 m
लिया गया समय = 4 s
गति = कुल तय की गई दूरी/लिया गया समय
= 20 m/4 s = 5 ms-1
एक इकाई समय में पूर्ण होने वाली दोलोनों की संख्या को आवृत्ति कहते हैं|
तरंग को इस प्रकार लिखिए: CRCRCRCRCR
इस पैटर्न से हम तीन पूर्ण दोलन पाते पाते हैं: CRC, RCR तथा CRC
अतः, आवृत्ति = 3/5 Hz = 0.6 Hz
डॉलफिन उच्च सीमा की पराध्वनि उत्पन्न करती है। इसमें से कुछ पराध्वनि डॉलफिन की ओर लौट आती हैं। जब ये आवाज़ किसी वस्तु से टकरा कर वापस आती है तो पराध्वनि के सुनने में लिए गए समय से डॉलफिन पता लगा लेती है कि वस्तु की दूरी क्या है।
किसी विशेष माध्यम में, विक्षोभ द्वारा एक सेकण्ड में तय की गई दूरी इसका तरंग वेग कहलाती है। यह ‘v’ अक्षर द्वारा निरूपित की जाती है। इसका SI मात्रक मीटर / सेकंड है।
तरंग का वेग ,
जहाँ,
=तरंग कि तरंगदैर्ध्य
T= तरंग का समाय अन्तराल
आवृत्ति, 
