राष्ट्रीय ग्रामीण रोज़गार गारंटी अधिनियम की स्थापना 2 फरवरी 2006 में संसद के द्वारा की गयी। इस अधिनियम में एक वर्ष में हर ग्रामीण बेरोजगार परिवार के एक सदस्य को वर्ष में कम से कम 100 दिनों के काम का वादा किया जाता है। 2 अक्टूबर 2009 को इस अधिनियम का नाम बदल कर महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोज़गार गारंटी योजना कर दिया। अगर सरकार आवेदक को पंद्रह दिनों के अंदर रोज़गार देने में विफल रहती है तो आवेदक बेरोजगारी भत्ता पाने का अधिकारी है। यह सूखे, निर्वनीकरण और मृदाक्षय के कारणों का समाधान करने के लिए स्थाई विकास पर ध्यान देता है।
अगर मैं भारत का प्रधानमंत्री होता तो मैं भारत में गरीबी मिटाने के लिए निम्न कदम उठाता:
(i) सभी बच्चों के लिए निशुल्क शिक्षा
(ii) स्त्री सशक्तिकरण
(iii) समाज के कमजोर वर्गों का सशक्तिकरण
(iv) जनसंख्या नियंत्रण
(v) सरकार के द्वारा शुरु किए गए गरीबी रोधी कार्यक्रमों का उचित क्रियान्वयन
जाति व्यवस्था के माध्यम से, कुछ व्यक्तियों या समूहों को उन मूल सुविधाओं से वंचित कर दिया जाता है, जिसका दूसरे वर्ग के लोग लाभ उठाते हैं। जाति प्रथा, अशिक्षा, अज्ञान, रूढ़िवादिता, लिंग भेदभाव जैसे कारक निर्धन व्यक्तियों के लिए निर्धनता रेखा से ऊपर आने में सबसे प्रमुख बाधाएं हैं।
निम्न जाति और आदिवासी समूहों के लोग विभिन्न विशेषाधिकारों से वंचित रहे हैं। वे न केवल आर्थिक बल्कि सामाजिक और राजनैतिक निर्बलता से भी ग्रस्त हैं।
वे उभरते हुए आर्थिक अवसरों में भागीदारी करने में सक्षम नहीं हैं क्योंकि उनके पास पर्याप्त ज्ञान तथा कौशल नहीं है। इसलिए वे निर्धन ही बने रह जाते हैं।
सामाजिक अपवर्जन गरीबी की एक वृहद अवधारणा है जो गरीबी के सामाजिक पहलू पर ध्यान देती है। यह अवधारणा कहती है कि गरीबी को इस आधार पर देखा जाना चाहिए कि गरीब केवल गरीबों के ही बीच रहते है। यह वह प्रक्रिया है जिसके माध्यम से व्यक्ति या समूहों को उन सुविधाओं, लाभों और अवसरों से वंचित किया जाता है जो दूसरों के पास होती है।
सामाजिक अपवर्जन का एक उदाहरण है भारत में मौजूद जाति व्यवस्था। कुछ जातियों को समान अवसरों का लाभ उठाने से रोका जाता है। इससे गरीबी बढ़ती है जिससे समाज के उस वर्ग को बहुत नुकसान होता है जिसकी बहुत ही कम आय है।
भारत में गरीबी के लिए आर्थिक और सामजिक रूप से सबसे संवेदनशील समूह हैं:
(i)
(ii)
गरीबी कम करने के लिए शुरू किए गए विविध कार्यक्रमों के अप्रभावी क्रियान्वयन के लिए मुख्य कारण हैं अधिकारियों के विभिन्न स्तरों पर भ्रष्टाचार, गंभीरता का अभाव, लोगों की अज्ञानता आदि। इन कार्यक्रमों को और प्रभावी बनाने के लिए निम्न उपायों को अपनाया जा सकता है:
सरकार दिल्ली को प्रदूषण मुक्त बनाना चाहती है और गरीबी रेखा से नीचे रहने वाले लोगों की मदद करना चाहती है। यह एक चुनी हुई सरकार का दायित्व है कि वह अपने नागरिकों को मूलभूत सुविधाए प्रदान करे और उनके जीवन की गुणवत्ता में सुधार करे। सरकार ने ये कदम गरीब परिवारों की मदद करने के लिए और दिल्ली को साफ रखने के लिए उठाए हैं। इस कदम के साथ गरीबों तक एलपीजी गैस पहुंचेगी और समाज के अमीर और गरीब दोनों ही वर्गों को कम प्रदूषित वातावरण मिलेगा।
उपभोग मानदंड: भारत में औसत कैलोरी आवश्यकता शहरों में प्रतिव्यक्ति 2400 कैलोरी प्रतिदिन है तो वहीं ग्रामीण क्षेत्रों में यह प्रतिव्यक्ति आवश्यकता यह 2100 कैलोरी प्रतिदिन है। इस मानदंड से अधिक उपभोग करने वाले व्यक्ति को भारत में गरीब नहीं माना जाएगा।
आय मानदंड: वर्ष 2011-12 से, गरीबों की पहचान करने के लिए ग्रामीण क्षेत्रों में कम से कम 816 रुपए की आय एवं शहरी क्षेत्रो में 1000 रुपए की आय होनी आवश्यक है। इस मानदंड से अधिक आय वाले व्यक्ति को गरीब नहीं माना जाएगा।
गरीबी हटाने के लिए सरकार के द्वारा अपनाई गयी योजनाएं हैं:
i. स्वर्णजयंती ग्राम स्वरोजगार योजना: इस कार्यक्रम के अंतर्गत कई छोटे उपक्रमों को ग्रामीण क्षेत्रों में स्थापित किया गया। गरीबों को बैंक से ऋण और छूटों को छोटे उपक्रम स्थापित करने के लिए दिया गया।
ii. प्रधानमंत्री ग्रामोदय योजना: इसका लक्ष्य है ग्रामीण क्षेत्रों में स्वास्थ्य, प्राथमिक शिक्षा, पेयजल, आवास, सड़कें जैसी मूल सेवाओं को विक्सित करने के द्वारा ग्रामीण नागरिकों के जीवनयापन के स्तर में सुधार करना।
iii. ग्रामीण रोजगार सृजन कार्यक्रम: इस योजना की शुरुआत वर्ष 1995 में ग्रामीण क्षेत्रों और कस्बों में स्व-रोज़गार अवसरों का निर्माण करने के उद्देश्य के साथ हुई थी। इस योजना के अंतर्गत ऋणी को परियोजना का महज़ 10% ही निवेश करना होता है और बैंक परियोजना लागत का 90% अनुमोदित करता है।
iv. राष्ट्रीय काम के बदले अनाज कार्यक्रम : इसको 2004 में देश के 150 सबसे पिछड़े जिलों में शुरू किया गया था । इसका उद्देश्य सूखा ग्रस्त क्षेत्रों में रोजगार के माध्यम से खाद्य सुरक्षा बढ़ाना और आंशिक रूप से वस्तु और नकद के रूप में मजदूरी का भुगतान करना है |
भारत के विभिन्न राज्यों में निर्धनता कम होने के कारण:
i.
ii.
iii.
iv.
आर्थिक संवृद्धि और निर्धनता अनुमान के बीच एक बहुत ही गहरा संबंध है। आर्थिक संवृद्धि जितनी अधिक होगी, निर्धनता उतनी ही कम होगी और जितनी कम आर्थिक संवृद्धि होगी, निर्धनता उतनी ही अधिक होगी। अगर आर्थिक संवृद्धि के परिणाम निर्धनों तक पहुँचते हैं तो निर्धनता कम होती है। यह देखा गया है कि जैसे जैसे अर्थव्यवस्था का विस्तार होता है वैसे वैसे अमीरों की जेब भारती जाती है। यह अमीर और गरीब के बीच अंतर को बढ़ाता है।
आर्थिक संवृद्धि मानव विकास में निवेश करने के लिए जरूरी संसाधन प्रदान करती है जैसे शिक्षा, स्वास्थ्य आदि। और आर्थिक संवृद्धि से निर्धनों की आय में वृद्धि होती है।
निर्धनता की आधिकारिक परिभाषा निर्धनता के केवल एक सीमित हिस्से को प्रदर्शित करती है। आय के अतिरिक्त कई और कारक भी होते हैं जो निर्धनता के साथ सम्बन्धित होते हैं मगर भारत में निर्धनता मापने के लिए उन्हें संज्ञान में नहीं लिया जाता है। उदाहरण के लिए, आम आवश्यकताएं जैसे स्वास्थ्य देखभाल, पीने का सुरक्षित पानी, रोज़गार, शिक्षा, आवास आदि। इस प्रकार भारत में निर्धनता की परिभाषा पर एक बार और विचार की आवश्यकता है।
मानव विकास सूचकांक को विकसित किया गया है और यह निर्धनता को मापने का बेहतर उपाय है।
भारत में निर्धनता अनुपात में महत्वपूर्ण रूप से कमी आई है और यह 1993-94 में 44.3$% से घटकर 2011-12में 21.9% तक रह गयी है । निर्धनता की विशेषताएं दो मोर्चों पर देखी जा सकती हैं, जो निम्न हैं:
· ग्रामीण और शहरी निर्धनता : ग्रामीण क्षेत्रों में निर्धनता रेखा से नीचे रहने वाले लोगों का अनुपात वर्ष 1993-94 में 50.1% था जो शहरी क्षेत्रों में 31.8% था। ग्रामीण क्षेत्रों में जहाँ निर्धनता रेखा से नीचे रहने वाले लोगों का प्रतिशत घटकर 25.7% रह गया था तो वहीं ग्रामीण क्षेत्रों में यह केवल 13.7% तक ही कम हो सका था। ग्रामीण क्षेत्रों में जहां छोटे किसान निर्धन थे तो वहीं शहरी लोगों में ढाबे पर काम करने वाले, रिक्शा चालक आदि लोग निर्धनों में शामिल थे।
· राज्यों के अनुसार भिन्न भिन्न: बिहार और ओड़िशा 33.7% और 37.6% के निर्धनता अनुपात के साथ सबसे निर्धन राज्य बने हुए हैं। केरल, जम्मू और कश्मीर, आंध्र प्रदेश। तमिल नाडू, गुजरात और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में गरीबी काफी हद तक कम हो चुकी है। पंजाब और हरियाणा कृषि में वृद्धि के साथ निर्धनता को कम करने में सफल हुए हैं।
A.
सार्वजनिक दुकानें
B.
फेयरप्राइस शॉप
C.
मूल आवश्यकता की दुकानें
D.
किराने की दुकान
राशन दुकानों को फेयर प्राइस दुकान के नाम से भी जाना जाता है, जिसमें खाद्यान्न, चीनी, केरोसीन आदि का स्टॉक रखा जाता है। वे गरीबी रेखा से नीचे रहने वाले लोगों को बहुत ही कम मूल्य (सरकार द्वारा निर्धारित मूल्यों) पर राशन उपलब्ध कराती हैं।
A.
बफर स्टॉक
B.
भण्डार
C.
सरकारी भंडार
D.
खाद्यान्न
भारतीय खाद्य प्राधिकरण उन राज्यों में किसानों से गेंहू और चावल खरीदता है जहां पर अधिक उत्पादन होता है। इस प्रकार अधिप्राप्त खाद्यान्नों के भण्डार को बफर स्टॉक कहते हैं।
चावल की खेती में पानी के अत्यधिक प्रयोग से जलस्तर में गिरावट आई है और इससे इन क्षेत्रों में कृषि विकास के स्थायित्व को खतरा पैदा हुआ है।
भारतीय खाद्य प्राधिकरण द्वारा खरीदे गए खाद्यान्नों का वितरण सरकार द्वारा राशन की दुकानों के द्वारा समाज के गरीब वर्ग को किया जाता है। इसे सार्वजनिक वितरण प्रणाली कहते हैं।
खाद्य सुरक्षा से अभिप्राय है, सभी लोगों के लिए सदैव भोजन की खाद्य उपलब्धता, पहुँच और उसे प्राप्त करने का सामर्थ्य |
एफसीआई (भारतीय खाद्य निगम) के उद्देश्य निम्नलिखित हैं:
किसानों से कृषि फसल का क्रय करना और
गरीबों या समाज के कमजोर वर्ग के लिए को खाद्यान्न को उचित मूल्य पर उपलब्ध करना
खाद्य सुरक्षा के लिए बफर स्टॉक बनाए रखना
मूल्य स्थिरीकरण के लिए बाजार में हस्तक्षेप करना |
कृषि श्रमिक, मछुआरे, परिवहन श्रमिक और अन्य आकस्मिक मजदूर बंगाल के अकाल से सबसे अधिक पीड़ित हुए थे|
भारत में सबसे अधिक विनाशकारी अकाल 1943 में बंगाल में पड़ा था जिसने बंगाल के प्रांत में तीस लाख लोग मृत्यु को प्राप्त हुए थे|
भारतीय खाद्य प्राधिकरण उन राज्यों में किसानों से गेंहू और चावल खरीदता है जहां पर अधिक उत्पादन होता है। इस प्रकार अधिप्राप्त खाद्यान्नों के भण्डार को बफर स्टॉक कहते हैं।
सरकार द्वारा किसानों को उनकी उपज के लिए खरीद के लिए एक निर्धारित अथवा पूर्व घोषित कीमत का भुगतान किया जाता है। इस कीमत को न्यूनतम समर्थन मूल्य कहा जाता है।
भारतीय खाद्य निगम द्वारा खरीदे गए खाद्यान्नों को समाज के गरीब वर्ग में सरकार द्वारा विनियमित राशन की दुकानों के माध्यम से वितरित किया जाता है। इसे ही सार्वजनिक वितरण प्रणाली कहा जाता है।
सहकारी का एक उदाहरण दिल्ली में मदर डेयरी है, जो दिल्ली सरकार द्वारा निर्धारित नियंत्रित मूल्य पर उपभोक्ताओं को दूध और सब्जियां उपलब्ध कराती है।
सार्वजनिक वितरण प्रणाली (पी.डी.एस), 1940 के दशक में शुरू की गयी थी|
तीन कार्यक्रमों को मध्य 1970 के दशक में शुरू किया गया:
1. सार्वजनिक वितरण प्रणाली (पीडीएस)
2. समेकित बाल विकास सेवाएं। (आईसीडीएस)
3. अनाज के बदले काम। (एफएफडब्ल्यू)
सहायिकी वह भुगतान है जो एक सरकार किसी वस्तु के बाज़ार मूल्य की अनुपूर्ति करने के लिए उत्पादकों को दी जाती है । यह उत्पादकों को अधिक लाभ प्रदान करने में मदद करता है। इस प्रकार, सब्सिडी उत्पादकों के साथ ही उपभोक्ताओं की भी मदद करते हैं।
इस अधिनियम में प्रावधान किया गया है कि खाद्य और पोषण संबंधी सुरक्षा सस्ती कीमतों पर उपलब्ध कराई जाए जिससे मानव गरिमामय जीवन निर्वाह कर सके ।
भारत में राशनिंग व्यवस्था की शुरुआत 1940 हुई |
खाद्य सुरक्षा के निम्नलिखित आयाम हैं: :
(क) उपलब्धता - भोजन की उपलब्धता से अर्थ है देश के भीतर खाद्य उत्पादन, खाद्य आयात और पिछले साल सरकारी अन्न भंडारों में सरकार द्वारा किया गया अन्न का भंडार।
(ख) पहुँच - इसका मतलब है कि भोजन हर व्यक्ति की पहुंच के भीतर है।
(ग) सामर्थ्य - इससे संकेत मिलता है एक व्यक्ति के पास अपनी आहार संबंधी आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए पौष्टिक, सुरक्षित, और पर्याप्त भोजन है।
सरकार बफर स्टॉक का निर्माण करती है और खरीदे हुए खाद्यान्नों को अन्न भंडारों में भंडारित किया जाता है। भारतीय खाद्य निगम खाद्यान्नों को ऐसे क्षेत्रों में वितरित करता है जहां कमी है और यह समाज के गरीब लोगों के बीच बाज़ार भाव से कम कीमत पर वितरित किया जाता है। इस मूल्य को निर्गम कीमत कहते हैं।
भोजन जीवन की मूल आवश्यकता और पोषण का एक महत्वपूर्ण स्रोत है। केवल स्वस्थ लोग ही विकास के लिए मानव संसाधन का गठन करते हैं। कम खाना खाने वाले और कुपोषित लोग इस भूमिका का प्रदर्शन नहीं कर सकते। जितने अधिक कम भोजन लेने वाले और कुपोषित लोग होंगे, उतना ही अधिक बोझ देश पर पड़ेगा। इसके विपरीत एक अच्छी तरह से पोषित और खाद्य सुरक्षित जनसंख्या देश के विकास के लिए एक मूल्यवान संपत्ति होती है।
उष्णकटिबंधीय
चक्रवातों के
तीन अलग-अलग प्रभाव
निम्नलिखित हैं:
(क) जब ये चक्रवात
अन्तःस्थलीय
क्षेत्र में आते
हैं, तो मानव बस्ती
के लिए भारी नुकसान
पहुँचाते हैं। इससे घरों की छतें और दीवारें उड़ जाती हैं,
जिसके कारण बहुत से लोग बेघर हो जाते हैं।
(ख) चक्रवातों
से फसलों को भारी
नुकसान पहुँचता
है और अनेक पेड़
उखड़ जाते हैं।
(ग) ये
विशाल ज्वारीय
तरंगों के कारण
बनते हैं जिससे
समुद्र तट जल प्लावित
हो जाते हैं।
भूस्खलन निम्नलिखित
कारणों से उत्पन्न
होते हैं:
(i) कुछ पहाड़ी
पर्वतमालाएँ, जैसे हिमालय
में शिवालिक तलछट
से बनी हैं। उच्चावच
प्रारूप के इस
प्रकार के भू-भाग,
भूस्खलन के लिए
उचित परिस्थितियाँ
प्रदान करते हैं|
(ii) असमेकित
श्रेणियों के
माध्यम से बहने
वाली नदियों से पहाड़ियों
की नींव कमजोर
हो जाती है, जिसके परिणामस्वरूप
वे कभी भी गिरती
हैं।
(iii) कभी-कभी
ये भूस्खलन मानव-निर्मित
होते हैं। अगर
इन कमजोर आधार
वाली पहाड़ियों
पर भारी ढाँचा
बनाया जाता है, तो इसके कारण
भूस्खलन होता
है।
चक्रवातों
के तीन विशिष्ट
प्रभाव निम्नलिखित
हैं:
(i) भौतिक
क्षति: पवन वेग, बाढ़, तूफान और
भूस्खलन द्वारा
संरचनाएँ क्षतिग्रस्त
या नष्ट हो जाती
हैं| हल्की सामग्री
की छतों को भारी
नुकसान होता है।
(ii) जनहानि
और जन स्वास्थ्य:
बाढ़
और उड़ती हुई वस्तुओं
के कारण, जल
की आपूर्ति के
प्रदूषण से वायरल
प्रकोप,
दस्त
और मलेरिया हो
सकता है।
(iii) जल आपूर्ति: बाढ़
के पानी से जमीन
और पाइप का पानी
दूषित हो सकता
है|
सूखे की तीन मंदन कार्य नीतियाँ
निम्न हैं:
(i) सूखा निगरानी, वर्षा की स्थिति, जलाशयों, झीलों, नदियों में पानी की उपलब्धता और मौजूद पानी की समाज के विभिन्न क्षेत्रों की जरूरतों की तुलना का निरंतर निरीक्षण है।
(ii) घरों और किसानों के खेतों में वर्षा जल संचयन के माध्यम से जल आपूर्ति आवर्धन और संरक्षण से उपलब्ध जल की मात्रा में वृद्धि होती है।
(iii) सिंचाई सुविधाओं के विस्तार से सूखा असुरक्षा कम हो जाती है।
प्राकृतिक संकटों को निम्न प्रकार से वर्गीकृत किया जा सकता है:
(i) अचानक घटित होने वाले संकट जैसे भूकंप और सुनामी|
(ii) मंद घटित होने वाले संकट जैसे अकाल और सूखा|
(iii) महामारी: जल/भोजन से उत्पन्न बीमारियाँ, विषाणु से उत्पन्न बीमारियाँ|
A.
भूस्खलन
B.
सूखा
C.
बाढ़
D.
बिजली अवरोध
भूस्खलन, सूखा, बाढ़, आदि जैसे कुछ संकट सामाजिक और प्राकृतिक संकट हैं, क्योंकि उनके कारण प्राकृतिक और मानव-प्रेरित दोनों हैं। उदाहरण के लिए, एक क्षेत्र में बाढ़ अत्यधिक बारिश के कारण आ सकती है, जो एक प्राकृतिक घटना है या खराब जल निकासी सुविधा के कारण भी आ सकती है, जो मानवीय लापरवाही के कारण होता है। बिजली अवरोध एक सामान्य घटना है, कोई संकट नहीं है।
A.
सभी खाने-पीने वाली चीजों और पानी को ढककर न रखें।
B.
सभी दरवाजे और खिड़कियाँ बंद कर दें और घर के अंदर रहें।
C.
आग के विस्फोटों की ओर न देखें।
D.
सभी खाने-पीने वाली चीजों और पानी को ढककर रखें।
परमाणु विकिरण और हमलों से बचने के कुछ महत्त्वपूर्ण तरीके ये हैं: (i) सभी खाने-पीने वाली चीजों और पानी को ढककर रखें। (ii) सभी दरवाजे और खिड़कियाँ बंद कर दें और घर के अंदर रहें। (iii) अग्नि ब्लास्ट को न देखें, क्योंकि इससे तत्काल अंधापन हो सकता है।
A.
मानव-निर्मित संकट
B.
गरीब व्यक्ति का संकट
C.
प्राकृतिक संकट
D.
सूखा
मानव निर्मित खतरे को इस प्रकार वर्गीकृत किया जा सकता है: i) औद्योगिक एवं तकनीकी दुर्घटनाएँ:विस्फोट, रासायनिक रिसाव/फैलाव, आग, आदि। युद्ध/नागरिक हड़ताल: बाहरी देश द्वारा युद्ध थोपना, आंतरिक गड़बड़ी, सांप्रदायिक दंगे, हमले, लूट, आदि।
A.
अज्ञात वस्तु को उठाकर फेंक देना चाहिए।
B.
पुलिस को सूचित करना चाहिए।
C.
भय का वातावरण बनाना चाहिए।
D.
अज्ञात वस्तु के आस-पास लोगों को इकट्ठा करना चाहिए।
बम होने की सूचना की स्थिति में हमें पुलिस को सूचित करना चाहिए। परिसर को छोड़ देना चाहिए, भगदड़ से बचना चाहिए और किसी भी अज्ञात वस्तु को छूना नहीं चाहिए और अन्य लोगों को भी ऐसा नहीं करने देना चाहिए।
A.
ध्यान से सुरक्षा विवरण कार्ड को पढ़ना चाहिए।
B.
शांत नहीं बैठना चाहिए।
C.
सीट पर बैठने पर कभी भी सीट बेल्ट नहीं लगानी चाहिए।
D.
फ्लाईट कर्मी दल सुरक्षा प्रदर्शन पर ध्यान नहीं देना चाहिए।
एक विमान में, हमें फ्लाईट कर्मी दल सुरक्षा प्रदर्शन पर ध्यान देना चाहिए। ध्यान से सुरक्षा विवरण कार्ड को पढ़ना चाहिए। पता कर लें कि निकटतम आपातकालीन निकास कहाँ है और आपात स्थिति के मामले में इसे कैसे खोलें तथा सीट पर बैठने पर हमेशा अपनी सीट बेल्ट लगा लें।
A.
समर्थ होने पर ही ड्राइविंग करें।
B.
सड़क के संकेतों को जानें और उनका सम्मान करें।
C.
गति को अचानक तेज एवं कम करने से बचें।
D.
जैसा वांछित हो उसके अनुसार सड़क लेन बदलें।
सड़क पर चलते समय, अचानक वेग को तेज या कम करने से बचें, सड़क के निशान से परिचित रहें, अपनी खुद की सुरक्षा के लिए निर्धारित पथ पर ड्राइविंग करें।
A.
यातायात
नियमों का उल्लंघन
B. लेन में रहना
C. रात में हेडलाइट्स का उपयोग करना
D. ज़ेब्रा क्रॉसिंग पर रुकना
बेहतर संपर्क और सेवा के लिए सड़कों का जाल बिछाया गया है, लेकिन साथ ही, दुर्घटनाओं की संख्या भी बढ़ रही है। इसके मुख्य कारण हैं: यातायात नियमों का उल्लंघन, तेज गति, नशे में ड्राइविंग और वाहन का खराब रखरखाव।
A.
विषाक्त पदार्थों के भंडारण स्थानों के मानचित्र प्रदर्शित किए जाने चाहिए तथा इसकी सभी को जानकारी होनी चाहिए।
B.
समुदाय को संकट अधिष्ठापन का पता होना चाहिए।
C.
सघन जनसँख्या वाले आवासीय क्षेत्र औद्योगिक क्षेत्रों से दूर होने चाहिए।
D.
क्षेत्र का हवा प्रवाह आरेख बना होना चाहिए।
भूमि उपयोग नियोजन में, सघन जनसँख्या वाले आवासीय क्षेत्र औद्योगिक क्षेत्रों से दूर होने चाहिए। औद्योगिक क्षेत्र और आवासीय क्षेत्रों के बीच में एक प्रतिरोधक क्षेत्र (हरित पट्टी) होना चाहिए।
A.
घर में अत्यधिक ज्वलनशील तरल पदार्थ रखें।
B.
एक सॉकेट में कई डिवाइसों को लगाएं।
C.
घर से निकलते समय सभी विद्युत स्विच और गैस, आदि को बंद करना सुनिश्चित करें।
D.
अलमारी या किसी भी फर्नीचर द्वारा प्रवेश मार्गों को बंद करें।
घर पर आग रोकथाम के लिए सुरक्षा उपाय: अपने घर में अग्नि सुरक्षा के सामान्य नियमों और सुरक्षित निकलने के मार्ग को याद रखें, घर में इक्स्टिंगग्विशर (आग बुझाने का सिलेंडर) रखें और उसका प्रयोग करना सीखें, अपने घर को छोड़ते समय सभी विद्युत और गैस अनुप्रयोगों को बंद करना सुनिश्चित करें।
A.
एक बीमारी या अन्य स्वास्थ्य संबंधी बीमारियों की घटना जो असामान्य रूप से बहुत व्यापक या अप्रत्याशित होती है।
B.
जानवरों के कारण होने वाली एक बीमारी का नाम है।
C.
प्रदूषण के कारण होती है।
D.
एक दीर्घकालीन बीमारी है।
किसी रोग का प्रकोप कुछ समय पहले की अपेक्षा बहुत अधिक हो तो वह महामारी या प्रकोप होती है और इसलिए, इसमें आपातकालीन नियंत्रण उपायों के कार्यान्वयन की माँग की जाती है।
A.
घनी आबादी वाले आवासीय क्षेत्रों को औद्योगिक क्षेत्रों से अलग करना चाहिए।
B.
संभावित प्रभावित क्षेत्र और निकासी के लिए सुरक्षित मार्ग चिह्नित किए जाने चाहिए।
C.
सामुदायिक सदस्यों को उद्योग के प्रदूषण स्तर की निगरानी करनी चाहिए और नकली अभ्यास में भाग लेना चाहिए।
D.
सरकार को लोगों को वित्तीय सहायता देना चाहिए।
संकट मानचित्रण आसानी से पढ़ा जा सकने वाला, शीघ्रता से सुलभ चार्ट और मानचित्र का निर्माण करता है, जिससे प्रशासकों और योजनाकारों को खतरे के क्षेत्रों की पहचान करने और उनके मंदन/कार्यवाही प्रयासों में सुगमता होती है।
A.
यूनियन कार्बाइड कीटनाशक कारखाना
B.
प्रतिक्रिया गैसों का संयंत्र
C.
विषाक्त गैस निर्गमन कारखाना
D.
ताप विद्युत संयंत्र
भोपाल आपदा, जिसे यूनियन कार्बाइड आपदा या भोपाल गैस त्रासदी भी कहा जाता है, 3 दिसंबर, 1984 को भारतीय शहर भोपाल (मध्य प्रदेश) में यूनियन कार्बाइड कीटनाशक संयंत्र में घटित हुई एक औद्योगिक आपदा थी। रात के लगभग 12 बजे कारखाने से मिथाइल आइसो साइनेट गैस और अन्य विषाक्त गैसों के रिसाव होने से 500,000 लोग प्रभावित हुए। इस दुर्घटना में अनुमानित मौतों के आंकड़े में भिन्नता है। तत्काल मौतों का आधिकारिक आंकड़ा 2259 था और मध्य प्रदेश सरकार ने गैस के रिसाव से संबंधित कुल 3787 मौतों की पुष्टि की।
A.
मंद एवं तीव्र प्रारंभ आपदा
B.
कृत्रिम एवं प्राकृतिक आपदा
C.
तीव्र एवं मंद आपदा
D.
प्राकृतिक एवं मानव-निर्मित आपदा
एक आपदा को उसकी गति के आधार पर मंद या तीव्र कहा जा सकता है। सूखा, अकाल आदि मंद-प्रारंभ आपदा के उदाहरण हैं। तीव्र-प्रारंभ आपदा एक आपदा होती है, जो किसी तात्कालिक झटके से प्रेरित होने वाली आपदा होती है। उदाहरण के लिए, बाढ़, ज्वालामुखी विस्फोट, चक्रवात आदि। इसका प्रभाव अल्पकालिक और दीर्घकालिक होता है।
A.
तीव्र आपदा
B.
मंद-प्रारंभ आपदा
C.
तीव्र-प्रारंभ आपदा
D.
मंद आपदा
एक आपदा को गति एवं उत्पत्ति के आधार पर वर्गीकृत किया जा सकता है। सूखा, अकाल आदि मंद-प्रारंभ आपदा के उदाहरण हैं।
A. रेल दुर्घटना
B. भूकंप
C. भूस्खलन
D. चक्रवात
प्राकृतिक आपदा को एक भौतिक घटना के रूप में परिभाषित किया जाता है, जो चोट या मौत, संपत्ति के नुकसान, सामाजिक और आर्थिक व्यवधान या पर्यावरण क्षरण का कारण हो सकती है। प्राकृतिक आपदाओं के कुछ उदाहरण भूकंप, भूस्खलन और चक्रवात हैं। मानव निर्मित आपदाओं के कारण बड़ी दुर्घटनाएँ हो सकती हैं और अनजाने या जान बूझकर व्यक्तियों, समूहों या सरकारों पर कार्रवाई हो सकती है। उदाहरण के लिए, रेल या हवाई दुर्घटनाएँ, परमाणु हमले, आदि।
A.
रेल
दुर्घटना
B. भूकंप
C. नाभिकीय बमबारी
D. आग
मानव-निर्मित आपदाओं से मानव कष्ट, जीवन की हानि और देश की अर्थव्यवस्था तथा उत्पादक क्षमता के दीर्घकालिक नुकसान के रूप में कीमत चुकानी पड़ती है। उदाहरण के लिए, रेल, सड़क और वायु दुर्घटनाएँ मानव-निर्मित आपदा हैं जबकि भूकंप, भूस्खलन, बाढ़ और चक्रवात प्राकृतिक संकट हैं।
A.
फैट गाय
B.
इनोला गे
C.
फैट मैन
D.
थिन मैन
6 अगस्त, 1945 को जापान के हिरोशिमा शहर पर पहला परमाणु बम गिराया गया था। यह 8,900 पौंड का बम, बमवर्षक विमान “इनोला गे” द्वारा गिराया गया था। शहर का 10 वर्ग मील से अधिक का क्षेत्र तुरंत तबाह हो गया। धरातल से 2,000 फुट ऊपर "लिटिल बाय" नामक बम के विस्फोट से लगभग 66,000 लोगों की मौत हुई तथा 69,000 घायल हो गए।
A.
जन
विनाशकारी
आयुध
B. व्यापक विनाशकारी आयुध
C. निम्न विनाशकारी आयुध
D. मानव विनाशकारी आयुध
इससे जीवन, संपत्ति और पर्यावरण को भारी हानि होती है। इनमें नाभिकीय, जैविक और रासायनिक आयुध शामिल हैं। रासायनिक जन विनाशकारी आयुध रंगहीन और गंधहीन होते हैं, और इनका निर्माण करना भी सरल होता है।
A.
पूर्वकथनीय
B.
कृत्रिम
C.
प्राकृतिक
D.
मानव-प्रेरित
कारण के आधार पर, आपदा प्राकृतिक या मानव प्रेरित हो सकती हैं। मानव-प्रेरित संकट सामान्य जीवन में एक गंभीर व्यवधान, आर्थिक एवं पर्यावरणीय नुकसान का कारण बनता है जिसका सामना प्रभावित लोगों के लिए स्वयं कर पाना संभव नहीं हो पाता है। उदाहरण के लिए, 1984 में भोपाल गैस त्रासदी, 2002 में राजधानी एक्सप्रेस रेलगाड़ी का पटरी से उतरना, 2008 में जयपुर में बम विस्फोट, आदि।
A.
देश की अर्थव्यवस्था में एक बड़ा उभार है।
B.
समाज के सामान्य कामकाज में व्यवधान है।
C.
जीवन, संपत्ति और आजीविका की बड़े पैमाने पर क्षति और बड़ी संख्या में लोगों पर पड़ने वाला प्रभाव है।
D.
देश की अर्थव्यवस्था के लिए बड़ा आघात है।
आपदा के परिणामस्वरूप व्यापक मानवीय हानि होती है। आम तौर पर कुछ सामान्य विशेषताएँ जिन्हें आपदा से प्रभावित क्षेत्रों में देखा जाता है, उनमें जीवन, संपत्ति और आजीविका की बड़े पैमाने पर क्षति, संपत्ति एवं आजीविका से प्रभावित समुदाय जिसे नुकसान की भरपाई के लिए बाहरी सहायता की आवश्यकता होती है| यह देश की अर्थव्यवस्था के लिए एक बड़ा झटका होता है, और समाज के सामान्य कामकाज में अवरोध उत्पन्न होने से बड़ी संख्या में लोग प्रभावित हो सकते हैं।
भारत दुनिया में सबसे अधिक दुर्घटना दरों वाले देशों में से एक है। प्रत्येक वर्ष 3,00,000 दुर्घटनाएँ रिकार्ड की जाती हैं। मृत्यु दर 6,000 के रूप में उच्च है। इन आंकड़ों के प्रकाश में, हम यह कह सकते हैं कि भारतीय सड़कें सुरक्षित नहीं हैं।
23 दिसंबर 2003, चीन में चौंगकिंग के गाआकियाओ में गैस की टंकी फट गई। इस दुर्घटना में. खतरा बना रहता है। उद्योग में काम करने 243 लोग मर गए, 9000 घायल हुए तथा 64,000 लोगो को बेघर होना पड़ा।
महामारी के दो प्रभाव हैं:
1. महामारी बीमारी और मृत्यु का कारण है।
2. यह आर्थिक क्षति का भी कारण है।
आतंकवाद एक प्रकार के हिंसात्मक गतिविधि के रूप में परिभाषित किया जाता है, जो कि अपने आर्थिक, धार्मिक, राजनीतिक एवं विचारात्मक लक्ष्यों की प्रतिपूर्ति के लिए गैर-सैनिक अर्थात नागरिकों की सुरक्षा को भी निशाना बनाते हैं।
एंथ्रेक्स बेसिलस ऐंथरैसिस की वजह से होने वाला एक रोग है, जो मिट्टी में रहने वाला कीटाणु होता है। यह बैक्टिरिया संक्रामक नहीं है और मुख्य रूप से जानवरों में फैलता है, फिर भी खाने–पीने से ले कर सांस के साथ इसके स्पॊर हमारे शरीर में पहुँच कर अंकुरित हो सकते हैं।
मानव निर्मित आपदा वे आपदाएं हैं जिनका कारण मानवीय गतिविधियाँ होती हैं। भारत में हुई सबसे बड़ी औद्योगिक दुर्घटना भोपाल गैस त्रासदी एवं नागासाकी परमाणु विस्फ़ोट, मानव निर्मित आपदाओं के उदाहरण हैं|
परमाणु
विकिरण और हमलों
से खुद को बचाने
के तीन तरीके निम्नलिखित
हैं:
(i) सभी भोजन
और पानी को ढक दीजिए।
(ii) सभी दरवाजे
और खिड़कियाँ बंद
कर दें और घर में
रहें।
(iii) विस्फोट
के आग की ओर मत देखिए। यह अंधेपन का कारण हो सकता है।
रेल दुर्घटनाओं के मुख्य कारण इस प्रकार हैं:
1. रखरखाव की कमी के कारण पटरी से उतरना।
2. मानव त्रुटि या तोड़-फोड़
3. ईंधन तेल जैसे खतरनाक माल का परिवहन
सड़क दुर्घटना के
3. वाहनों और सड़कों के खराब रख-रखाव
सड़कों पर वाहन चलाते समय कुछ सुरक्षा उपायों को ध्यान में रखा जाना चाहिए।
यह वस्तु के जलने की प्रक्रिया है और प्रायः जीवन और संपत्ति को नष्ट कर देती है।
आग के विभिन्न कारण हैं, उनमें से दो हैं:
1. दहनशील सामग्री: इसमें पैकिंग सामग्री, गोंद, विलयन, तरल पदार्थ या कार्यस्थल में संग्रहीत गैस शामिल हैं। ये बेहद खतरनाक हो सकते हैं|
2. खतरनाक सामग्री: इसमें पेंट, रसायन या गैस सिलेंडर शामिल होते हैं और उन्हें दूर रखा जाना चाहिए।
महामारी को बीमारी या अन्य स्वास्थ्य संबंधी बीमारियों की घटना के रूप में परिभाषित किया जा सकता है, जो असामान्य रूप से बहुत बड़े पैमाने पर या अनपेक्षित होती हैं।
दो मुख्य कारणों में शामिल हैं:
1.
खराब
स्वच्छता की स्थिति
जो भोजन और पानी
को दूषित कर सकती
है और पर्यावरण
को भी प्रदूषित
कर सकती है।
2. मौसमी
बदलाव रोगवाहक
कीड़ों के पनपने
में सहायक होते
हैं, जैसे कि वर्षा
के मौसम में मच्छर।
प्रमुख संभावित खतरे में कमी के उपायों में शामिल हैं:
1. संकट मानचित्रण: विषाक्त पदार्थों या खतरनाक पदार्थों के भंडारण स्थानों की सूची और मानचित्र|
2. भूमि उपयोग नियोजन: सघन जनसंख्या वाले आवासीय क्षेत्र औद्योगिक क्षेत्रों से अलग किए जाने चाहिए।
3. सामुदायिक तैयारी: समुदाय को खतरनाक प्रतिष्ठानों और दुर्घटना की स्थिति में बचाव के तरीकों के बारे में जानकारी होनी चाहिए।
आग के प्रति मंदन कार्यनीतियों के तीन पहलू निम्नलिखित हैं:
1. निकास के दौरान घने धुएँ से भरे गलियारों से बचा जाना चाहिए।
2. एस्बेस्टस जैसे फाइबर खनिजों से बने सुरक्षात्मक कपड़ों का उपयोग करें।
3. घर और कार्य स्थल पर सुरक्षा सावधानी अवश्य बरतें।
उद्योगों और आवासीय क्षेत्रों के आस-पास में आग फैलने का निम्नलिखित कारण होता है:
1. विभिन्न उत्पादों और ऊष्मा तरंगों का दहन
3. आस-पास
का वातावरण प्रदूषित
होना।
बम रखे होने की स्थिति में निम्नलिखित उपाय किए जाने चाहिए।
1. सार्वजनिक स्थान पर रखी गई लावारिस वस्तुओं (सूटकेस, बक्से, गट्ठर, इत्यादि) से सावधान रहें।
2. पुलिस को सूचित करें और उनके आने के बाद स्थान को छोड़े।
3. घबड़ाहट से बचें।
भूस्खलन चट्टानों, मिट्टी और मलबों के ऐसे फिसलने वाले ढेर होते हैं, जो भार की शक्ति से पर्वतीय ढालों या नदी के तटों पर आ जाते हैं।
बहु-उद्देशीय
चक्रवात आश्रय
का महत्व निम्नलिखित
है:
(i) बहु-उद्देशीय
चक्रवात आश्रयों
का उपयोग चक्रवात
की स्थिति में
आश्रय स्थल के
रूप में किया किया
जा सकता है। जैसे
कि दो या तीन
मंजिला इमारत
अर्थात् स्कूल
की इमारत।
(ii) निचली मंजिल
का उपयोग मवेशियों
को रखने के लिए
किया जाता है।
(iii) पहली
मंजिल का उपयोग
समुदाय के सदस्यों
के लिए किया जा
सकता है।
(i) मंदन
व्यक्तियों और
समुदायों को, आपदाओं
से तेजी से उबरने
के योग्य बनाता
है।
(ii) यह वित्तीय
व्यय को कम करता
है।
(iii) यह जीवन और
संपत्ति के नुकसान
को कम करता है।
लाभ: यह भूमि और जल के सर्वोत्तम उपयोग में मदद करता है।
वर्षा जल संचयन: वर्षा के जल को किसी खास माध्यम से संचय करने या इकट्ठा करने की प्रक्रिया को कहा जाता है। विश्व भर में पेयजल की कमी एक संकट बनती जा रही है। जलग्रहण क्षेत्र में प्रदूषणकारी गतिविधियों को होने की अनुमति न दे करके पानी को साफ रखने के उपायों को किया जाता है। वर्षा जल संचयन के निम्न लाभ हैं:
(i) पीने का पानी उपलब्ध कराना
(ii) सिंचाई के लिए पानी उपलब्ध कराना
(iii) भूजल पुनर्भरण में वृद्धि
इंजीनियर
संरचनात्मक डिजाइन
के बुनियादी मानदंड
हैं:
(i) धरातल के
डोलते समय भी टिके
रहने के लिए इंजीनियर
संरचनाएं तैयार
की जानी चाहिए।
(ii) निर्माण
से पहले मृदा प्रकार
का विश्लेषण किया
जाना चाहिए। मुलायम
मिट्टी पर ढांचे
का निर्माण नहीं
किया जाना चाहिए।
(iii)
भवनों की डिजाइनों
और निर्माण की
परिपाटी को सुधारना
चाहिए।
(i) भूस्खलन, लोगों की मौत, पेड़, फसलों और अन्य वृक्षारोपण को नष्ट करने के कारण होते हैं।
(ii) यह विपदा
ऊंचे क्षेत्र
के निकट रहने वाले
हर किसी को प्रभावित
कर सकती है।
(iii) इससे
परिवहन और
संचार नेटवर्क
को नुकसान पहुँचता
है।
संकट मानचित्रण भूस्खलन प्रवण क्षेत्र का चित्रण एवं पहचान है। यह ऐसे क्षेत्रों की पहचान करने में मदद करेगा जहाँ बस्तियाँ नहीं बसानी चाहिए।
चक्रवात
संबंधी तूफान
से संबंधित खतरे
आम तौर पर तीन परत
में होते हैं:
i. बहुत
भारी वर्षा बाढ़
का कारण होती है।
ii. तूफान
संपत्ति एवं संचार
माध्यमों को नुकसान
पहुँचाने के कारण
होते हैं।
iii. तूफान
महोर्मि एक प्रचंड
विनाशकारी लक्षण
होता है, जिसे ज्वारीय
लहरें कहा जाता
है।
बाढ़ के तीन प्रमुख कारण हैं:
(i) नदी जलग्रहणों में अत्यधिक वर्षा
(ii) खराब प्राकृतिक जल निकासी
(iii) भू-भूस्खलन नदी के प्रवाह में बाधा और नदी मार्ग में परिवर्तन के कारण होता है।
बाढ़
चेतावनी की सूचना
निम्नलिखित तरीकों
से प्रसारित की
जाती है:
(i) ऑल
इंडिया रेडियो
(ii) उपग्रह
आधारित आपदा
चेतावनी प्रणाली
(iii) टेलीफोन
(iv) दूरदर्शन
और स्थानीय केबल
चैनल
(v) फैक्स
(vi) प्रेस
बुलेटिन
मंदन किसी आपदा या संभावित आपदा के प्रभाव को कम करने के लिए किया गया उपाय है। इसे आपदा से पहले, दौरान या बाद में शुरू किया जा सकता है
जन
जागरूकता के तीन
तरीके हैं:
(i) आपदा
से निपटने की आजीविका
की योजना
(ii) पारंपरिक
जल संरक्षण कार्यनीति
जैसे-तालाबों, टैंकों, झीलों का
पुनरुद्धार आदि।
(iii)
जल संरक्षण पर
जन जागरूकता पैदा
करना जैसेकि दैनिक
जीवन में पानी
की बचत।
तीन मंदन कार्यनीतियाँ हैं:
(i) तटीय पट्टी
में वृक्षारोपण:
तट ओर रक्षक मेखला
का रोपण तेज पवनों
के प्रभाव को कम
कर देता है।
(ii) इंजीनियरिंग
निविष्टियों
का उपयोग करके
अच्छा निर्माण
किया जाना चाहिए।
कन्याकुमारी
से पूर्वी तटीय
सड़क ऐसा ही एक
उदाहरण है।
(iii) बेहतर
पूर्वानुमान
और समय पर चेतावनी
लोगों के बेहतर
तैयारी में सहायक
होती है।
तीन मंदन
कार्य नीतियाँ
हैं:
(i) ऊंचे क्षेत्रों
में इमारत का निर्माण
(ii) मानसून की
शुरुआत से पूर्व
सभी प्राकृतिक
जल भंडार स्थल
की सफाई।
(iii) बाढ़ का पूर्वानुमान
और चेतावनी
चट्टानों, मिट्टी और वनस्पतियों का किसी ढलान पर नीचे की ओर खिसकना ही भूस्खलन है।
(i) भौतिक
क्षति: संरचनाएँ
पानी और भूस्खलन
के कारण क्षतिग्रस्त
और जल संतृप्त
हो जाती हैं। तटीय
क्षेत्रों में
नौकाएँ और मछली
पकड़ने के उपकरण
खो सकते हैं या
क्षतिग्रस्त
हो सकते हैं।
(ii)
जन
हानि और जन स्वास्थ्य: लोगों
और पशुओं की मौत
डूबने के कारण
से होती है। महामारियों
जैसे- दस्त, वायरल
संक्रमण और मलेरिया
का प्रकोप आम हैं।
(iii)
जल
आपूर्ति: जल (भूजल, पाइप
से आपूर्ति होने
वाला जल) प्रदूषित
हो जाता है, स्वच्छ
पेय जल मिलने में
कठिनाई हो सकती
है|
पृथ्वी के भूपटल में उत्पन्न तनाव का, उसकी सतह पर अचानक मुक्त होने के कारण पृथ्वी की सतह का हिलना या कांपना, भूकंप कहलाता है|
भारतीय मानक ब्यूरो ने भवनों के संहिता और भूकंपों के विरुद्ध सुरक्षित निर्माण के लिए दिशानिर्देश प्रकाशित किए हैं।
सूखा एक प्राकृतिक संकट है, जिसके परिणामस्वरूप वर्षा की मात्रा शून्य या किसी भी क्षेत्र में अपेक्षा से कम होती है। यह तब बहुत घातक होता है जब ऐसी स्थिति लम्बी अवधि तक बनी रहती है।
मानव, पौधों और
जानवरों को सूखे
के दौरान जीवित
रहने के लिए अपनी
बुनियादी जरूरतों
को पूरा करना कठिन
लगने लगता है।
दो
मंदन कार्यनीतियाँ
निम्न हैं
(i) वर्षा
जल संचयन
(ii) सूखा
निगरानी
बाढ़ विशाल प्रदेशों का अस्थाई रूप से जलमग्न होना होता है।
तटीय राज्य ओडिशा और आंध्र प्रदेश चक्रवात के कारण बाढ़ प्रवण क्षेत्र हैं।
हरित क्रांति ने कीटनाशक, उर्वरक और अन्य आधुनिक प्रौद्योगिकी का उपयोग आवश्यक था जो केवल बड़े और अमीर किसान ही कर सकते थे | इन प्रौद्योगिकी का प्रयोग छोटे और गरीब किसानों के लिए संभव नहीं है। अमीर किसान तो अपनी उत्पादकता बढाने में सक्षम रहे जबकि गरीब किसान ऐसा नहीं कर पाए । इस प्रकार अमीर और अमीर होते गए और गरीब और गरीब हो गए, जिसके कारण आय की असमानता में और वृद्धि हुई।
भूखमरी के दो मुख्य आयाम हैं:
मौसमी भूखमरी : यह स्थिति तब उत्पन्न होती है जब किसी व्यक्ति को साल के विशिष्ट मौसम में पर्याप्त मात्रा में भोजन प्राप्त नहीं होता है। अनियमित रूप से काम (जैसे मौसमी कृषि, अनियमित श्रम) मिलने के कारण आमदनी भी अनियमित हो जाती है, जिसके परिणामस्वरूप भोजन खरीदने की क्षमता भी कम हो जाती है।
दीर्घकालिक भूखमरी: लंबे समय तक मात्रा या / और गुणवत्ता के आधार पर अपर्याप्त आहार ग्रहण करने के कारण भूख की स्थिति उत्पन्न हो जाती है, जिसे दीर्घकालिक भूखमरी कहते है| कम आय वाले गरीब लोग अच्छी गुणवत्ता वाला और पर्याप्त मात्रा में नियमित रूप से भोजन नहीं खरीद सकते |
इस बात की पूरी संभावना है कि गरीबी रेखा से ऊपर रहने वाले लोग भी खाद्य असुरक्षा समूह में आ सकते हैं। यह तब होता है जब देश में भूकंप, बाढ़ आदि जैसी कोई प्राकृतिक आपदा आती है।
प्राकृतिक आपदा के कारण, खाद्यान्नों का उत्पादन कम होता है जिससे प्रभावित क्षेत्रों में खाद्यान्नों की कमी होती है। खाद्यान्नों की कमी से मूल्यों में वृद्धि होती है। उच्च कीमतों पर वे लोग जो गरीबी रेखा से ऊपर होते हैं वे भी भोजन का खर्च नहीं पूरा कर पाते हैं। इससे यह संभव है कि वे खाद्य असुरक्षित लोगों की श्रेणी में आ जाएं।
भारतीय खाद्य निगम की स्थापना खाद्य निगम अधिनियम 1964 के अंतर्गत खाद्य नीति के उद्देश्यों का पालन करने के लिए की गयी थी:
· किसानों के हितों की रक्षा के लिए प्रभावी मूल्य समर्थन का परिचालन
· सार्वजनिक वितरण प्रणाली के माध्यम से पूरे देश में खाद्यान्न का वितरण
· राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए खाद्यान्नों के बफर स्टॉक और परिचालन के संतोषजनक स्तर को बनाए रखना
· राष्ट्र की सेवा के अपने 40 वर्षों में, भारतीय खाद्य निगम ने संकट प्रबंधन उन्मुख खाद्य सुरक्षा के एक स्थिर सुरक्षा प्रणाली के परिवर्तन में भारत की सफलता में एक प्रमुख भूमिका निभाई है।
भारत की खाद्य सुरक्षा नीति का एक ही उद्देश्य है कि भारत के सभी लोगों को बहुत ही कम लागत पर खाद्यान्न उपलब्ध कराना। इसने गरीबों के लिए भोजन को सुगम किया है। इस नीति ने कृषि उत्पादन और गेंहू एवं चावल भंडार की खरीद और रखरखाव के लिए समर्थन मूल्य पर जोर दिया है। खाद्यान्नों के भंडार की खरीद और रखरखाव की जिम्मेदारी भारतीय खाद्य निगम के पास है और खाद्यान्नों के वितरण का उत्तरदायित्व सार्वजनिक वितरण प्रणाली पर है (PDS)।
प्राकृतिक आपदा खाद्य असुरक्षा का एक प्रमुख कारण हैं क्योंकि
· प्राकृतिक आपदा से प्रभावित क्षेत्र में खाद्यान के भंडारों में भारी मात्रा में खाद्यान हानि होती हैं |
· प्राकृतिक आपदा के दौरान, कुल उपज में गिरावट आती हैं और खाद्य पदार्थों की कमी हो जाती हैं जिससे खाद्य पदार्थों की कीमतों में वृद्धि हो जाती है |
स्वतंत्रता के समय से ही, भारत में खाद्यान्नों की भारी कमी रही है। भारत की जनसंख्या की मूल आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए, उसे विदेशों से भारी मात्रा में खाद्यान्नों का निर्यात करना पड़ा था।
स्वतंत्रता
के बाद, सरकार
ने
खाद्यान्नों
में
आत्मनिर्भरता
हासिल करने
के लिए कई
उपाय किए हैं,
जो निम्न
प्रकार हैं:
1. 1960 में
गेंहू और
चावल के
उत्पादन में
हरित क्रांति
2. एचवीवाई
बीजों और
उर्वरकों को
शुरु करना
3.खेती के नए और बेहतर तरीके
हरित क्रांति ने न केवल भारत को खाद्यान्नों में आत्म निर्भरता हासिल करने में सहायता की बल्कि अकाल की समस्या को भी हल करने में भारत को सक्षम किया है ।