औद्योगिक उत्पादन की वृद्धि के साथ, ब्रिटिश व्यवसायियों ने अपने औद्योगिक उत्पादों के लिए एक विशाल बाजार के रूप में भारत को देखा। इंग्लैंड में निर्मित माल की भारतीय बाजारों में बाढ़ सी आ गई।
18 वीं सदी में पूर्वी बंगाल में ढाका अपने मलमल एवं जामदानी बुनाई के लिए प्रसिद्ध था।
2)1900 तक, मुंबई में 84 मिल सक्रिय थीं और उनमें से कई की स्थापना भारतीय व्यापारियों द्वारा की गई थी, सबसे पहली कपास मिल क्रमशः 1861 और 1862 में अहमदाबाद और कानपुर जैसे शहरों में स्थापित की गई थी ।
3)कपास मिलों के विकास से इन सभी शहरों में श्रम के लिए एक मांग उत्त्पन्न कर दी, हजारों गरीब किसानों, कारीगरों और खेतिहर मजदूरों ने मिलों में काम करने के लिए शहरों की ओर प्रस्थान किया
भारत में अंग्रेजों के आगमन से पूर्व भारत सूती वस्त्रों का सबसे बड़ा उत्पादक देश था,भारतीय वस्त्र उनकी उत्तम गुणवत्ता और सुंदर शिल्प कौशल के लिए पहचाने जाते थे, उत्पादित सूती वस्त्रों का जावा, सुमात्रा, पेनांग जैसे दक्षिण पूर्व एशियाई देशों में और पश्चिम और मध्य एशिया में व्यापार किया जाता था, लेकिन 16 वीं सदी से, भारतीय वस्त्र-उत्त्पादन का यूरोप में बिक्री हेतु यूरोपीय व्यापार कंपनियों द्वारा क्रय किया गया था
1. वस्त्रों के उत्पादन में पहला चरण कताई था। कताई का ज्यादातर काम महिलाओं द्वारा चरखा और तकली के उपयोग से घरों पर ही किया जाता था।
2. धागा चरखा पर घूमती था और तकली पर लिपटता था। जब कताई कार्य समाप्त हो जाता था तोबुनकर धागे से कपड़े बुनता था। आम तौर पर समुदायों में बुनाई का काम अधिकांश पुरुषों द्वारा किया जाता था।
3. जहां तक कपड़ों को रंगने की बात थी,तो धागों को रंगा जाता था उत्तर भारत में धागा रंगने वालों को रंगरेज़ कहते थे
4. परन्तु छपाईदार कपडा बनाने के लिए बुनकरों को चिप्पीगार नामक माहिर कारीगरों की जरूरत होती थी।
अठारहवीं सदी की शुरुआत तक आते आते भारतीय कपड़े की लोकप्रियता से इंग्लैंड के ऊन व् रेशम निर्माता बेचैन होने लगे थे उन्होंने भारतीय सूती कपड़े के आयात का विरोध शुरू कर दिया।
इस अवधि के दौरान इंग्लैंड में वस्त्र उद्योग ने केलिको, जो भारतीय शैली की एक नकल थी का इंग्लैंड में विकसित करना शुरू कर दिया।
अब इंग्लैंड में कपड़ा उत्पादक भारतीय वस्त्रों के साथ प्रतिस्पर्धा करने लगे और इस प्रकार भारतीय कपड़ा के प्रवेश को रोकने के द्वारा इंग्लैंड में एक सुरक्षित बाजार बनाना चाहते थे इसी दबाव के कारण १७२० में ब्रिटिश सरकार ने इंग्लैंड में छापेदार सूती कपड़े – छींट- के प्रयोग पर पाबन्दी लगाने के लिए एक कानून पारित कर दिया।
इस कानून को कैलिको अधिनियम कहा जाता था ।
1.भारतीय वस्त्रों की लोकप्रियता और इतिहास को हम अन्य भाषाओं के शब्दों से पता लगाया जा सकता है।
2. यूरोपीय व्यापारी सबसे पहले भारत के बारीक सूती कपडो से वर्तमान इराक के मोसुल शहर में अरब के व्यापारियों के द्वारा संपर्क में आये थे। बारीक बुनाई वाले सभी कपड़ों को "मस्लिन" (मलमल) कहने लगे थे ।
3. केलिको नाम पुर्तगाली व्यापारियों द्वारा केरल में कालीकट के कपास को दिया गया था
4. छींट एक अन्य मुद्रित सूती कपडे का अंग्रेजी नाम है । यह शब्द हिंदी के शब्द छींट से लिया गया है
5. बंडाना भी एक अन्य शब्द है जिस्सका प्रयोग गले या सिर पर पहनने वाले चटक रंग के छापेदारगुलूबंद के लिए किया जाता है यह शब्द हिंदी के बांधना शब्द से निकला है
1. लोहा गलाने के बाद छोड़ दिये गये बड़े अपशिष्ट पदार्थ के टीले को लावा ढेर कहा जाता है।
2 निम्म कारकों से 19 वीं सदी में लोहा गलाने में गिरावट आई । अ) नए वन कानूनों के तहत औपनिवेशिक सरकार द्वारा लोगो को वनों के उपयोग से वंचित रहा गया था । ब) लौह अयस्कक्षेत्रों में हैं जहां प्रवेश की अनुमति दी थी हर भट्टी के इस्तेमाल के लिए वन विभाग को उच्च कर का भुगतान करना होता था।स) लोहा और इस्पात के ब्रिटेन से आयात की वृद्धि हुई थी ,जिसने स्थानीय लोहा गलानेवालो द्वारा उत्पादित लोहे की मांग को कम कर दिया था ।
1) सबसे पहली कपास मिल भारत में 1854 ई० में मुंबई में एक कताई मिल के रूप में स्थापित की गई थी। धीरे धीरे बम्बई, बंदरगाह और कपास कृषि क्षेत्रों के निकट-स्थिति के कारण सूती वस्त्रों का एक महत्वपूर्ण केंद्र बन गया।
2) 1900 ई० तक, मुंबई में 84 मिल सक्रिय थीं और उनमें से कई की स्थापना भारतीय व्यापारियों द्वारा की गई थी। सबसे पहली कपास मिल क्रमशः 1861 ई० और 1862 ई० में अहमदाबाद और कानपुर जैसे शहरों में स्थापित की गई थी।
3) कपास मिलों के विकास से इन सभी शहरों में श्रम के लिए एक मांग उत्त्पन्न कर दी, हजारों गरीब किसानों, कारीगरों और खेतिहर मजदूरों ने मिलों में काम करने के लिए शहरों की ओर प्रस्थान किया।
भारत में अंग्रेजों के आगमन से पूर्व भारत सूती वस्त्रों का सबसे बड़ा उत्पादक देश था। भारतीय वस्त्र उनकी उत्तम गुणवत्ता और सुंदर शिल्प कौशल के लिए पहचाने जाते थे। उत्पादित सूती वस्त्रों का जावा, सुमात्रा, पेनांग जैसे दक्षिण पूर्व एशियाई देशों में और पश्चिम और मध्य एशिया में व्यापार किया जाता था, लेकिन 16 वीं सदी से, भारतीय वस्त्र-उत्त्पादन का यूरोप में बिक्री हेतु यूरोपीय व्यापार कंपनियों द्वारा क्रय किया गया था।
1. यह अंश बंगाली समाचार पत्र ‘समाचार दर्पण‘ लिया गया है ।
2. कताई कपडा उत्पादन का पहला चरण था । यह कार्य मुख्यत महिलाओं द्वारा किया जाता था ।
एक बार जब कताई समाप्त हो जाती थी तो बुनकर धागे से कपडा बनता था। 19 वीं सदी में, अंग्रेजी और यूरोपीय कंपनियों ने भारतीय माल को खरीदना बंद कर दिया था ।उनके एजेंटों द्वारा आपूर्ति सुरक्षित करने के लिए तब बुनकरों को ऋण देने से मना कर दिया गया था ।
इस दृष्टिकोण से केवल विशेषज्ञ बुनकरों ही नहीं कताई करने वाले भी बुरी तरह प्रभावित हुए थे ।
हजारो ग्रामीण महिलाये जो कपास की कताई से जीवन निर्वाह करती थी को कम से बाहर कर दिया गया और इसने उनको और कष्ट दिया।
1.औरंग – फारसी भाषा में गोदाम को औरंग कहा जाता है। इसमे बिक्री से पहले चीजों को जमा करके रखा जाता है। वर्कशॉप के लिए भी यह शब्द प्रयोग होता है
2. भारतीय कपड़ों को यूरोप और अमेरिका के बाजारों में ब्रिटिश उद्द्योगो में बने कपड़ों से मुकाबला करना पड़ता था व ब्रिटिश सरकार ने भारत से आने वाले कपड़ों पर भारी शुल्क लगा दिया था जिसने भारतीय कपडा उत्पादको को पार्भावित किया था । उन्नीसवीं सदी की शुरुआत तक भारतीय माल को अंग्रेजी कपडा उद्योग द्वारा अफ्रीका, अमेरिका और यूरोप के लंबे समय से स्थापित बाजारों से सफलतापूर्वक अपदस्थ किया गया, परिणाम स्वरुपभारत में हजारों बुनकर अब बेरोजगार हो गये थे ।
इंग्लैंड के कपड़ा निर्माता , ग्रेट ब्रिटेन में भारतीय वस्त्रों की लोकप्रियता के बारे में चिंतित थे । उन्होंने अपनी सरकार से इंग्लैंड के वस्त्र उद्योग की रक्षा के लिए कदम उठाने के लिए आग्रह किया ।
इन चरणों में शामिल थे :
(i) कानूनी मार्ग : ब्रिटिश कपड़ा व्यापार मालिकों के द्वारा दबाव दिए जाने के कारण अंग्रेजी सरकार इंग्लैंड ने केलिको अधिनियम पारित किया। इस अधिनियम द्वारा देश में भारतीय मुद्रित सूती कपडों के उपयोग को रोक दिया गया ।
(ii)केलिको मुद्रण: ब्रिटिश कपड़ा व्यापार मालिकों ने सफेद मलमल और सादे भारतीय कपड़े पर केलिको मुद्रण विधियों का उपयोग कर ब्रिटेन में केलिको की मांग को पूरा करने के लिए शुरूआत की । (iii) तकनीकी नवाचार: ब्रिटेन में स्पिनिंग जेनी का आविष्कार कपड़ा बनाने की प्रक्रिया में तेजी लाने के लिए किया गया था। इससे कपडों की एक बड़ी मात्रा को अब सस्ते दामों पर बनाया जा सकता था । (iv) उपनिवेशवाद: अंत में,ब्रिटिश ने भारत से सस्ता कच्चा माल इंग्लैंड को आयात करने के लिए कॉलोनी की स्थापना की । इस प्रकार उन्होंने भारतीय कपड़े खरीदने के लिए भारत से वसूले गए राजस्व का प्रयोग किया । इसने भारत से इंग्लैंड के लिए धन के अपवाह की शुरुआत हुई।
A. शिक्षा।
B. धर्म।
C. अर्थव्यवस्था।
D. शासन प्रबंध।
लार्ड मैकाले ने भारत को एक असभ्य देश, जिसे सभ्य बनाना चाहिए, के रूप में देखा। उन्होंने अंग्रेज़ी भाषा को सिखाने की ज़रुरत पर बल दिया। वह शिक्षा के क्षेत्र में सुधारों के लिए जाना जाता है।
A. जवाहर लाल नेहरू।
B. महात्मा गांधी।
C. रवीन्द्रनाथ टैगोर।
D. सुभाष चंद्र बोस।
महात्मा गांधी ने तर्क दिया कि औपनिवेशिक शिक्षा ने भारतीयों के मन में हीनता की भावना पैदा किया। इससे वे पश्चिमी सभ्यता को बेहतर मानने लगे, और उनका अपनी संस्कृति पर गर्व का विनाश हो गया।
A. सुपर सीखना।
B. स्वयं सीखना।
C. निर्देशित सीखने।
D. कल्पनाशील सीखने।
टैगोर का मानना है कि एक बच्चा अपने बचपन के अनुभवों द्वारा सीख सकता है। टैगोर, बच्चे की प्राक्रतिक व्यक्तित्वको बढ़ने हेतु, सुखद और व्यक्तिगत सीखने पर ज़ोर दिया। इस उद्देश्य से उन्होनें शांतिनिकेतन की स्थापना की।
A. 1900 ईसवी.
B. 1899 ईसवी.
C. 1905 ईसवी.
D. 1901 ईसवी.
रवींद्रनाथ टैगोर एक ऐसी शिक्षा की कल्पना करते थे, जो छात्र के तत्काल परिवेश से आरोपित हो, लेकिन व्यापक दुनिया की संस्कृतियों से जुड़ा हो, तथा बच्चे के सुखद सीखने व उसके व्यक्तित्व पर निर्धारित हो।
A. महात्मा गांधी।
B. रवीन्द्रनाथ टैगोर।
C. चार्ल्स वुड।
D. विलियम एडम
रवीन्द्रनाथ टैगोर स्वयं सीखने के प्रोत्साहक थे। उन्होंने, इस उद्देश्य से, बच्चों के लिए, शान्तिनिकेतन की स्थापना, कलकत्ता (कोलकाता) के निकट किया।
A. वार्षिक परीक्षा।
B. मासिक परीक्षा।
C. छमाही परीक्षा।
D. त्रैमासिक परीक्षा।
एडम की रिपोर्ट के आधार पर, वुडस का नितिपत्र (1854) में यह सुझाव दिया गया कि स्थानीय भाषाई स्कूलों में शिक्षा की प्रणाली में सुधार की ज़रुरत है। इसके अनुसार, वार्षिक परीक्षा का प्रावधान पेश किया गया था।
A. 30.
B. 15.
C. 20.
D. 25.
विलियम एडम स्कॉटलैंड का एक मिशनरी था। कंपनी ने उसे, भारत में स्थानीय भाषा शिक्षा व्यवस्था की स्थिति पर एक रिपोर्ट बनाने के लिए, बंगाल और बिहार के गाँवों का दौरा करने के लिए कहा। एडम की रिपोर्ट के अनुसार, एक पाठशाला में, औसतन, 20 छात्र थे।
A. 1853 ईस्वी
B. 1854 ईस्वी
C. 1857 ईस्वी
D. 1858 ईस्वी
1857 में, विश्वविद्यालय कलकत्ता, मद्रास और बंबई के शहरों में, अंग्रेज़ों द्वारा, स्थापित किए गए थे।
A. 1851 ईस्वी
B. 1853 ईस्वी
C. 1854 ईस्वी
D. 1856 ईस्वी
चार्ल्स वुड अंग्रेज़ी ईस्ट इंडिया कंपनी के कंट्रोल बोर्ड के अध्यक्ष थे। उन्होंने भारत में शिक्षा के विकास पर एक प्रारूप जारी किया। यह कोर्ट ऑफ़ डायरेक्टर्स द्वारा संलग्न किया गया था, और भारत के गवर्नर जनरल- लार्ड डलहौज़ी - के लिए भेजा गया था।
A. जेम्स मिल।
B. जे.एस. मिल।
C. थॉमस बबिंगटन मैकाले।
D. वारेन हेस्टिंग्स।
थॉमस बबिंगटन मैकाले एक कट्टर अंग्रेज़ था, जो अंग्रेज़ी शिक्षा को बढ़ावा देने का समर्थक था, पर भारतीय शिक्षा का नहीं। वह प्रच्यावादी शिक्षा का सबसे मुखर और प्रभावशाली आलोचक था।
A. एच. टी. कोलब्रूक।
B. जे.एस. मिल।
C. जेम्स मिल।
D. विलियम जोन्स।
भारत में शिक्षा की विधि के सवाल पर दो समूह उभरे थे। एक उन लोगों का था जो भारतीय भाषाओं में शिक्षा प्रदान करना चाहते थे। इन लोगों को 'प्राच्य' के रूप में जाना जाने लगा। दूसरे समूह के लोग, जो चाहते थे कि शिक्षा अंग्रेज़ी में दी जाये, उन्हें 'पाश्चात्य' के रूप में जाना जाने लगा। जेम्स मिल, 19वीं सदी के प्रारंभ में, प्रच्यावादी शिक्षा के प्रमुख विरोधियों में से एक था।
A. कोलकाता।
B. दिल्ली।
C. बनारस।
D. मद्रास।
ब्रिटिश अधिकारियों का एक वर्ग भारतीय शिक्षा को बढ़ावा चाहते थे। वे मानते थे कि भारतीय जिस भाषा से पहले से ही परिचित थे, उस भाषा में शिक्षा ग्रहण करना आसान होगा। इस बात को ध्यान रखते हुए, प्राचीन संस्कृत ग्रंथों की पढाई को बढ़ावा देने हेतु, बनारस में, हिंदू कॉलेज स्थापित किया गया था।
A. नैतिक शिक्षा
B. स्थानीय भाषाओं की शिक्षा
C. प्राथमिक शिक्षा
D. पश्चिमी शिक्षा
1813 के चार्टर अधिनियम इसीलिए महत्वपूर्ण क्योंकि कंपनी, अब कम से कम, पहली बार, शिक्षा के क्षेत्र में, ज़िम्मेदारी संभाली। 1 लाख रुपए की राशि, जन शिक्षा के लिए नहीं; बल्कि संस्कृत, फारसी और अरबी की शिक्षा के लिए अलग रखा गया था।
A. 1793 ईस्वी
B. 1803 ईस्वी
C. 1813 ईस्वी
D. 1833 ईस्वी
1813 के चार्टर अधिनियम के अनुसार, अंग्रेज़ी ईस्ट इंडिया कंपनी ने भारत में प्रचारक गतिविधियों की अनुमति दी।
A. थॉमस बबिंगटन मैकाले।
B. विलियम कैरी।
C. चार्ल्स वुड।
D. रिचर्ड वेस्टमकोत्त।
भारत में पालन किया जाने वाले शिक्षा नीति को रेखांकित करते हुए, इसने यूरोपीय शिक्षा की प्रणाली के व्यावहारिक लाभ पर बल दिया।
A. विलियम कैरी
B. डेविड लिविंगस्टोन
C. डेविड मैटसन
D. लोरों मार्लेर
विलियम कैरी स्कॉटिश मिशन के सदस्य थे। उन्होंने डेनिश ईस्ट इंडिया कंपनी कोसेरामपुर मिशन की स्थापना करने में मदद की।
A. गंगा
B. हुगली
C. ब्रह्मपुत्र
D. पद्म
हुगली नदी गंगा नदी के दाहिने किनारे की सहायक नदी है। इस नदी के तट पर, 1818 में, मिशनरियों ने सेरामपुर कॉलेज को स्थापित किया| यह क्षेत्र डेनमार्क के प्रभुत्व के तहत में थी।
A. भारत के प्रांतों।
B. भारत की रियासतों।
C. न्याय प्रणाली।
D. भारत में शिक्षा प्रणाली।
भारतीय शिक्षा पर 1854 के वुड्स डिस्पैच ने यह साफ ज़ाहिर किया कि सरकार भारत में अंग्रेज़ी शिक्षा के विकास के लिए प्रयास करेगा। यह ईस्ट इंडिया कंपनी के आर्थिक लक्ष्यों के अनुसार किया गया था।
A. कलकत्ता के राज्यपाल।
B. भारत के गवर्नर जनरल।
C. सुप्रीम कोर्ट में न्यायाधीश।
D. मद्रास के गवर्नर।
विलियम जोन्स कलकत्ता (कोलकाता) में स्थापित उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश थे।
A. ईसाई धर्म का प्रसार करना
B. गुलामी का उन्मूलन करना
C. मूल निवासी कोसभ्य बनाना
D. शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व स्तापित करना
अंग्रेज़ों ने 'गोरे आदमी का बोझ' के सिद्धांत को लोकप्रिय बनाया। वे खुद को सबसे सभ्य मानते थे, और उन्होंने सोचा कि क्षेत्र को नियंत्रित करने के साथ, उन्हें देशी आबादी को सभ्य बनाने की जिम्मेदारी भी थी।
1854 के बाद कंपनी ने पंडितों को बहुत सारे उत्तरदायित्व सौंपे जैसे-
1)कंपनी ने बहुत सारे पंडितों को सरकारी नौकरी पर रख लिया। इनमें से प्रत्येक पंडित को 4-5 स्कुलों की देखरेख का जिम्मा सौंपा जाता था।
2)पंडितों का काम पाठशालाओं का दौरा करना और वहाँ अध्यापन की स्थितियों में सुधार लाना था।
3)प्रत्येक गुरु को निर्देश दिया गया कि वे समय.समय पर अपने स्कुल के बारे में रिपोर्ट भेजें और कक्षाओं को नियमित समय-सारणी के अनुसार पढ़ाएँ।
पाठशालाओं की कार्यप्रणाली को कारगर बनाने के क्रम में-
1)कंपनी एक नई दिनचर्या, नए नियमों और नियमित निरीक्षणों के जरिए पाठशालाओं को और व्यवस्थित करना चाहती थी।
2) सरकार ने अनुदान और सहायता राशि का इस्तेमाल किया। नए नियमों पर चलने वाली पाठशालाओं को सरकारी अनुदान मिलने लगे।
3)कंपनी ने बहुत सारे पंडितों को सरकारी नौकरी पर रख लिया। इनमें से प्रत्येक पंडित को 4-5 स्कुलों की देखरेख का जिम्मा सौंपा गया था।
अब अध्यापन पाठ्यपुस्तकों पर आधारित हो गया और विद्यार्थियों की प्रगति को मापने के लिए वार्षिक परीक्षाओं की रूपरेखा तैयार की जाने लगी। विद्यार्थियों से कहा गया कि वे नियमित रूप से शुल्क दें,नियमित रूप से कक्षा में आएँ, तय सीट पर बैठें और अनुशासन के नियमों का पालन करें।
टैगोर का मानना था कि मौजुदा स्कुल बच्चों की सृजनात्मक बनने की अपनी स्वाभाविक इच्छा का दमन करते थे। टैगोर का मानना था कि सृजनात्मक शिक्षा को केवल प्राकृतिक परिवेश में ही प्रोत्साहित किया जा सकता है। इसीलिए उन्होंने कलकत्ता से 100 किलोमीटर दूर एक ग्रामीण परिवेश में अपना स्कुल खोलने का फैसला लिया। उन्हें यह जगह निर्मल शांति से भरी (शांतिनिकेतन) दिखाई दी जहाँ प्रकुति के साथ जीते हुए बच्चे अपनी स्वाभाविक सृजनात्मक मेध को और विकसित कर सकते थे। स्वाभाविक सृजनात्मक मेध को और विकसित कर सकते थे।
जिन कारणों ने 1870 के शिक्षा अधिनियम की शुरूआत का नेतृत्व किया वे इस प्रकार थे:
1.1870 में शिक्षा अधिनियम लागू होने तक आमतौर पर पूरी आबादी के लिए व्यापक शिक्षा व्यवस्था नहीं थी।
2.बाल मजदूरी बहुत बड़े पैमाने पर थी इसलिए गरीब अपने बच्चों को स्कुल नहीं भेज पाते थे क्योंकि परिवार चलाने के लिए उनकी आय महत्त्वपूर्ण थी।
3.स्कुल भी बहुत कम थे। ज्यादातर स्कुल चर्च या रईसों द्वारा स्थापित किए गए थे।
शिक्षा अधिनियम लागू होने के बाद ही सरकार ने नए-नए स्कुल खोलने शुरू किए और अनिवार्य शिक्षा का प्रावधान किया गया।
गांधी का तर्क था कि:
1.महात्मा गांधी का कहना था कि औपनिवेशिक शिक्षा ने भारतीयों के मस्तिष्क में हीनता का बोध पैदा कर दिया है। इसके प्रभाव में आकर यहाँ के लोग पश्चिमी सभ्यता को श्रेष्ठतर मानने लगे हैं और अपनी संस्कृति के प्रति उनका गौरव भाव नष्ट हो गया है।
2. संस्थानों में पढ़ने वाले भारतीय ब्रिटिश शासन को पसंद करने लगे थे। महात्मा गांधी एक ऐसी शिक्षा के पक्षधर थे जो भारतीयों के भीतर प्रतिष्ठा और स्वाभिमान का भाव पुनर्जीवित करे।
3. महात्मा गांधी का कहना था कि पश्चिमी शिक्षा मौखिक ज्ञान की बजाय केवल पढ़ने और लिखने पर केंद्रित है।गांधी का तर्क था कि शिक्षा से व्यक्ति का दिमाग और आत्मा विकसित होनी चाहिए। उनकी राय में केवल साक्षरता यानी पढ़ने और लिखने की क्षमता पा लेना ही शिक्षा नहीं होती।
1.गांधी का तर्क था कि शिक्षा से व्यक्ति का दिमाग और आत्मा विकसित होनी चाहिए। इसे व्यक्ति में जो सर्वोत्तम है उसे बाहर लाना चाहिए। गांधी एक ऐसी शिक्षा के पक्षधर थे जो भारतीयों के भीतर प्रतिष्ठा और स्वाभिमान का भाव पुनर्जीवित करे। महात्मा गांधी की दृढ़ मान्यता थी कि शिक्षा केवल भारतीय भाषाओं में ही दी जानी चाहिए।
2.गांधी का तर्क था कि पढ़ने और लिखने की क्षमता पा लेना ही शिक्षा नहीं होती।शिक्षा से व्यक्ति का जितना सभंव है उतना दिमाग और आत्मा विकसित होते हैं। लोगों को कम से कम एक हस्तकला सीखनी चाहिए और यह जानना चाहि कि विभिन्न चीज़े किस तरह काम करती हैं।इन शिल्प कलाओं की शिक्षा के प्रति यांत्रिक की तुलना में एक वैज्ञानिक दृष्टिकोण होना चाहिए ।
1854 ई में ईस्ट इंडिया कंपनी के लन्दन स्थित कोर्ट ऑफ़ डायरेक्टर्स ने भारतीय गवर्नर जनरल को शिक्षा के विषय में एक नोट भेजा। कंपनी के नियंत्रक मंडल के अध्यक्ष चार्ल्स वुड के नाम से जारी किये गये इस सन्देश को वुड का नीतिपत्र (वुड्स डिसपैच) के नाम से जाना जाता है :
1. महात्मा गांधी ने तर्क दिया कि शिक्षा को एक व्यक्ति के मन और आत्मा का विकास करना चाहिए। इसको एक व्यक्ति का सर्वश्रेष्ठ रूप दिखाना चाहिए। उन्होंने कहा कि भारतीयों को इस तरह की शिक्षा मिलनी चाहिये जो उनकी गरिमा और आत्म सम्मान की भावना को ठीक बनाये रखने में मदद कर सके । उन्होंने दृढ़ता से महसूस किया है कि शिक्षण का माध्यम भारतीय भाषाओं को होना चाहिए।
2. महात्मा गांधी की राय है कि बस पढ़ने के लिए, सीखने और लिखने को शिक्षा के रूप में स्वीकार्य नहीं होना चाहिये। शिक्षा मन के उच्चतम विकास और आत्मा को संभव बनाती है। लोग को कम से कम एक हस्तकला जानने व अलग-अलग चीजें के संचालित का पता होना चाहिए। इन शिल्प के सीखने की ओर यह एक वैज्ञानिक दृष्टिकोण है न कि यांत्रिकी ।
प्राच्यवादी, प्राच्य विद्या विशारद इतिहास और भारत की संस्कृति का अध्ययन करने के बारे में उत्सुक थे। वे सामान्य विश्वास रखते थे , जो उनके विचारो का प्रतिनिधित्व करते थे। ये इस प्रकार रेखांकित किये गए हैं
1. वे भारत और पश्चिम,१. दोनों की प्राचीन संस्कृतियों के प्रति गहरा आदर भाव रखते थे।
2. उन्हें विश्वाश था कि भारतीय सभ्यता प्राचीन काल में अंपने वैभव के शिखर पर थी ।
3. उन्होने इन सभ्यताओं की एक बेहतर समझ विकसित करने के लिए प्राचीन पवित्र और कानूनी ग्रंथों का अध्ययन आवश्यक माना।
4. वे भारत के भविष्य के विकास के लिए इन ग्रंथों को एक मंच पर लाना चाहते थे।
5. प्राच्य विद्या विशारद अपने अध्ययन के आधार पर ब्रिटिश भारतीय संस्कृति के रखवाले और स्वामी बनाना चाहते थे।
A. दिल्ली
B. बंबई
C. गुजरात
D. उड़ीसा
जाति के उन्मूलन के काम करने के लिए परमहंस मंडली की स्थापना 1840 में की गयी थी।
A. कलकत्ता
B. लखनऊ
C. उड़ीसा
D. पटना
विधवाओं के घर विधवाओं को आश्रय प्रदान करते थे। यहाँ विधवाओं को प्रशिक्षित किया जाता था ताकि वह आर्थिक रूप से खुद की मदद कर सकें।
A. पंडिता रमाबाई
B. ताराबाई शिंदे
C. बेगम रुक़य्या सखावत हुसैन
D. मुमताज अली
इस पुस्तक "स्त्रीपुरुषतुलना" (महिलाओं और पुरुषों के बीच एक तुलना है), जो ताराबाई शिंदे द्वारा लिखी और प्रकाशित की गयी थी, लेखिका ने पुरुषों और महिलाओं के बीच सामाजिक मतभेद की आलोचना की है।
A. 1790
B. 1810
C. 1830
D. 1880
लार्ड कैनिंग, भारत के पहले वायसराय थे जिन्होंने 1857 में कलकत्ता, मद्रास और बंबई में विश्वविद्यालयों की स्थापना की।
A. असम और बंगाल
B. दिल्ली और लखनऊ
C. पटना और कलकत्ता
D. मुंबई और गुजरात
बेगम रुक़य्या सखावत हुसैन रूढ़िवादी विचारों की निडर आलोचक थी और उन्होंने इस तरफ इशारा किया किधार्मिक गुरुओं ने महिलाओं को नीचा स्थान दिया है।
A. 17वीं सदी
B. 18वीं सदी
C. 19वीं सदी
D. 20 वीं सदी
उर्दू उपन्यास धर्म और घरेलू प्रबंधन के बारे में महिलाओं को पढ़ने के लिए और उन्हें प्रोत्साहित करने के लिए लिखे गए थे।
A. स्वामी दयानंद सरस्वती
B. एनी बेसेंट
C. ईश्वरचंद्र विद्यासागर
D. राममोहन राय
1875 में स्वामी दयानंद ने हिंदू धर्म में सुधार करने के इरादे से आर्य समाज नाम के एक संगठन की स्थापना की।
A. 1829
B. 1835
C. 1842
D. 1856
लार्ड कैनिंग ने विधवा पुनर्विवाह कानून अधिनियमित किया। वह भारत का सबसे पहला वाइसराय था।
A. स्वामी विवेकानन्द
B. दयानन्द सरस्वती
C. राजा राम मोहन रॉय
D. बाल गंगाधर तिलक
ब्रह्म सभा में एक महत्वपूर्ण सुधार एसोसिएशन बंगाल से राममोहन राय द्वारा स्थापित किया गया था। उन्हें यह विचार फ्रांस में 1789 की फ्रांसीसी क्रांति से आया था।
A. प्रतिभाशाली।
B. पुनर्जन्म
C. आध्यात्मिक
D. गुणी
सती मुख्य रूप से राजपूत महिलाओं में आम थी, जो अपने पति की चिता पर आत्मदाह कर देती थीं।
A. मध्य प्रदेश
B. आंध्र प्रदेश
C. केरल
D. महाराष्ट्र
अधिकाँश महार अंग्रेजी सेना में नौकरी करते थे और अंग्रेजी फ़ौज में एक महार रेजिमेंट भी थी।बी आर आंबेडकर के पिता भी अंग्रेजी फ़ौज में नौकरी करते थे।
टिस्को(T I S C O) जमशेदजी टाटा द्वारा 1912 में स्थापित किया गया था
टिस्को का अभिप्राय, टाटा आयरन एंड स्टील कंपनी से है
आगरिआ,19 वीं सदी के दौरान मध्य भारत में लौह अयस्क थे
भारत में पहली कपास मिल 1854 में बंबई में एक कताई मिल के रूप में स्थापित की गई थी
औरांग,एक गोदाम, के लिए प्रयुक्त एक फारसी शब्द है, एक ऐसा स्थान जहाँ पर माल को विक्रय से पूर्व एकत्रित किया जाता है
18 वीं सदी में पूर्वी बंगाल में ढाका अपने मलमल एवं जामदानी बुनाई के लिए प्रसिद्ध था
कोचीन में डच बस्तियां सत्रहवीं सदी में अस्तित्व में आई थीं
जेम्स वाट के द्वारा भाप इंजन का आविष्कार और 1786 में रिचर्ड आर्कराइट द्वारा वस्त्र-उद्योगों में इसके उपयोग ने कपास बुनाई के क्षेत्र में क्रांति ला दी थी
भारत में बन्डाना शैली के कपड़ों का उत्त्पादन राजस्थान और गुजरात में किया जाता था
छींट, डिजाइन के साथ छपाईदार कपडे का उत्त्पादन, आंध्र प्रदेश में मसुलीपट्नम में किया जाता था।
पटोला बुनाई, इंडोनेशिया में लोकप्रिय थी ।
भारत में पटोला बुनाई, सूरत, अहमदाबाद और पटना में लोकप्रिय थी
सूती वस्त्र के यंत्रीकृत उत्पादन ने ब्रिटेन को विश्व में सबसे महत्वपूर्ण औद्योगिक राष्ट्र बना दिया।
कपास उद्योगों के लिए अधिकांश कच्चे माल का आयात भारत से किया जाता था
कपास औद्योगीकरण का प्रतीक था।
लौह प्रगालकों के एक समुदाय अगरिआ ने, दोराबजी टाटा को राजहरा पहाड़ियों में लौह अयस्क की उपलब्धता के बारे में संकेत दिए थे।
भारत से तलवारें और हथियार निर्माण उद्योग अंग्रेजों द्वारा भारत की विजय के साथ समाप्त हो गए, इंग्लैंड से लोहा और इस्पात के आयात ने भारतीयों द्वारा उत्पादित लौह और इस्पात का स्थान ले लिया
बुनकर उन समुदायों से सम्बंधित थे जो बुनाई के क्षेत्र में पारंगत थे, बुनाई का उनका कौशल एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को हस्तांतरित कर दिया गया था।
16 वीं सदी में, यूरोपीय व्यापारिक कंपनियों ने, यूरोपीय बाजारों में विक्रय हेतु भारतीय कपड़ा खरीदना शुरू किया था।
मीजी शासन जो जापान में सत्ता में था, ने पश्चिमी वर्चस्व का विरोध करने के लिए औद्योगीकरण को महत्वपूर्ण माना
यूरोपीय वैज्ञानिक, माइकल फैराडे (बिजली और विद्युत के आविष्कारक) भारतीय वुट्ज से आकर्षित थे, उन्होंने चार वर्ष तक भारतीय वुट्ज के अवयवों का अध्ययन किया था
वुट्ज़, कन्नड़ शब्द उक्कु का एक आंग्लीकृत संस्करण है, इस्पात अर्थ - तेलुगु में इसे हुक्कू और तमिल और मलयालम में उरुक्कु सम्बोधित किया जाता है।
बंगाल, अपनी उपजाऊ भूमि एवं डेल्टा में कई नदियों के साथ अपनी स्थिति जो कि उत्पादित माल के परिवहन के लिए उपयोगी थी, के कारण भारत के महत्वपूर्ण वस्त्र उत्पादन क्षेत्रों में से एक था
"कपड़े के थान" यूरोपीय व्यापार में कपास और रेशमी वस्त्रों की किस्मों के लिए प्रयुक्त किया जाने वाला एक आम नाम था, प्रत्येक वस्त्र थान, बुना हुआ वस्त्र थान हुआ करता था, जो कि लम्बाई में 20 यार्ड और चौड़ाई में 1 यार्ड हुआ करता था।
ब्रिटेन, को "दुनिया की कार्यशाला' के रूप में जाना जाता था, क्योंकि 19 वीं सदी में औद्योगिक क्रांति के दौरान ब्रिटेन के लौह और इस्पात उद्योग की संख्या में बढ़ौतरी होना शुरू हो गई थी।
स्पिनिंग जेनी का आविष्कार 1764 में जेम्स हरग्रीव्ज़ द्वारा किया गया था
टिस्को(T I S C O) जमशेदजी टाटा द्वारा 1912 में स्थापित किया गया था
टिस्को का अभिप्राय, टाटा आयरन एंड स्टील कंपनी से है
आगरिआ,19 वीं सदी के दौरान मध्य भारत में लौह अयस्क थे
भारत में पहली कपास मिल 1854 में बंबई में एक कताई मिल के रूप में स्थापित की गई थी
औरांग, एक गोदाम, के लिए प्रयुक्त एक फारसी शब्द है, एक ऐसा स्थान जहाँ पर माल को विक्रय से पूर्व एकत्रित किया जाता है।
कोचीन में डच बस्तियां सत्रहवीं सदी में अस्तित्व में आई थीं
जेम्स वाट के द्वारा भाप इंजन का आविष्कार और 1786 में रिचर्ड आर्कराइट द्वारा वस्त्र-उद्योगों में इसके उपयोग ने कपास बुनाई के क्षेत्र में क्रांति ला दी थी
भारत में बन्डाना शैली के कपड़ों का उत्त्पादन राजस्थान और गुजरात में किया जाता था
भारत में छींट, डिजाइन के साथ छपाईदार कपडे का उत्त्पादन आंध्र प्रदेश में, मसुलीपट्नम में किया जाता था।
भारत से बाहर पटोला बुनाई, इंडोनेशिया में लोकप्रिय थी।
भारत में पटोला बुनाई, सूरत, अहमदाबाद और पटना में लोकप्रिय थी।
सूती वस्त्र के यंत्रीकृत उत्पादन ने ब्रिटेन को विश्व में सबसे महत्वपूर्ण औद्योगिक राष्ट्र बना दिया।
कपास उद्योगों के लिए अधिकांश कच्चे माल का आयात भारत से किया जाता था
ब्रिटेन में कपास औद्योगीकरण का प्रतीक था।
प्राच्यविद एवं आंग्ल विद्वानों के मध्य ब्रिटिश भारत में, भारतीय उच्च शिक्षा के लिए प्रयोग की जाने वाली भाषा को लेकर एक विवाद था, एक तरफ ब्रिटिश प्राच्यविद थे जो संस्कृत, फारसी और अरबी भाषा का उपयोग करना चाहते थे, जबकि दूसरी तरफ आंग्ल विद्वान अंग्रेजी भाषा लागू करना चाहते थे। लॉर्ड मैकाले ने आंग्ल विद्वानों के विचारों का समर्थन किया था। 1835 ई० में, लॉर्ड मैकाले ने, इस विवाद का अंत अंग्रेजी शिक्षा अधिनियम की शुरुआत के द्वारा किया।
मिशनरियों ने व्यावहारिक शिक्षा की धारणा की दृढ़ता से आलोचना की थी। उन्होंने महसूस किया कि, शिक्षा को लोगों के नैतिक चरित्र को सुधारने का प्रयत्न करना चाहिए। नैतिकता में केवल ईसाई शिक्षा के माध्यम से सुधार किया जा सकता है।
उन्नीसवीं सदी के पूर्वार्द्ध से, प्राच्यविदों की अध्ययन दृष्टि की कई ब्रिटिश अधिकारियों द्वारा आलोचना की गई थी, उनका विचार था कि प्राच्य शिक्षा अवैज्ञानिक और त्रुटियों से भरी हुई थी, उन्होंने पूर्वी साहित्य को गम्भीरता रहित माना, इसलिए उनका विचार था, कि ब्रिटिश शासन द्वारा अरबी और संस्कृत भाषा के अध्ययन को प्रोत्साहित करने में इतना अधिक व्यय करना गलत था
जोन्स और कोलब्रूक का, भारत और पश्चिम दोनों की प्राचीन संस्कृतियों के प्रति गहरा सम्मान था। उन्होंने महसूस किया था कि भारतीय सभ्यता का गौरव समय के साथ धूमिल हो गया था । उनके दृष्टिकोण के अनुसार प्राचीन काल में रचित, पवित्र और कानूनी ग्रंथ भारत का बोध प्राप्त करने के लिए महत्वपूर्ण स्रोत थे। उन्होंने कईं प्राचीन ग्रंथों की खोज की थी और उन्हें अनुवादित किया था। उन्होंने अर्थ को समझने का प्रयास किया था और अपनी खोज से दूसरों को अवगत कराया था।
महात्मा गांधी की दृढ़ मान्यता थी कि शिक्षा केवल भारतीय भाषाओं में ही दी जानी चाहिए। उनके मुताबिक अंग्रेजी में दी जा रही शिक्षा भारतीयों को अपाहिज बना देती है, उसने उन्हें अपने सामाजिक परिवेश से काट दिया है और उन्हें अपनी ही भूमि पर अजनबी बना दिया है।
गांधीजी ने पश्चिमी सभ्यता और उसके द्वारा मशीनों और तकनीक की प्रशंसा की आलोचना की। टैगोर आधुनिक पश्चिमी सभ्यता और भारतीय परंपरा के श्रेष्ठ तत्वों का सम्मिश्रण चाहते थे। उन्होंने शांतिनिकेतन में कला, संगीत और नृत्य के साथ-साथ विज्ञान और प्रौद्योगिकी की शिक्षा पर भी जोर दिया।