नहीं, सभी गतियाँ समान नहीं होती हैं। हमारे दैनिक जीवन में, हम विभिन्न वस्तुओं की गतियों से गुज़रती हैं तथा हम इन गतियों के लिए विभिन्न शब्दों का प्रयोग करते हैं। उदाहरण के लिए यदि तरल गति करता है, हम कहते हैं कि यह बह रहा है या जब एक बच्चा छत पर चल रहा है तो हम कहते है की वह धीरे-धीरे चल रहा है।
जब कोई निकाय निश्चित समय अन्तराल के बाद अपनी गति को दोहराता है तो इस प्रकार की गति आवर्तिक गति कहलाती है।
चाल = दूरी / समय
तय की गई दूरी = 20m
लिया गया समय = 1.5 मिनट = (1.5 x 60) s
= 90 s
इस प्रकार, चाल = 20m / 90s
= 0.23 m/s
1) स्थिर गति के साथ बस की गति के लिए दूरी- समय ग्राफ़ का आकार इस प्रकार होगा:
2) सड़क के किनारे खड़ी बस के लिए दूरी- समय ग्राफ़ का आकार इस प्रकार होगा:
समरूप चाल :- जब कोई पिण्ड समान समय–अंतरालों में समान दूरियाँ तय करता है, तो उसकी इस तरह की चाल समरूप चाल कहलाती है|
असमरूप चाल :- जब कोई पिण्ड समान समय–अंतरालों में भिन्न-भिन्न दूरियां तय करता है, तो उसकी इस तरह की चाल असमरूप चाल कहलाती है|
वृत्तिय गति की अवस्था में निकाय केवल तब तक रहता है जब तक उपयुक्त बाहय बल इस पर कार्यरत है। जैसे ही बाहय बल हटा दिया जाता है, निकाय सीधी रेखा में गति करना शुरु कर देता है। इस प्रकार, यदि रस्सी टूट जाती है तो यह पत्थर सीधे पथ पर गति करेगा।
किसी वस्तु द्वारा एकांक समय में चली गयी दूरी चाल कहलाती है चाल की गणना हम इस सूत्र की सहायता से कर सकते हैं।
चाल = दूरी / समय
चाल की इकाई एसo आईo प्रणाली में मीटर/ सेकंड है।
विरामवस्था तथा गति की अवस्था सापेक्षिक होती है क्योंकि, एक वस्तु दूसरी वस्तु के सापेक्ष लगभग गति की अवस्था में हो सकती है लेकिन तृतीय वस्तु के सापेक्ष सम्भवतः विरामवस्था में होती है।
उदाहरण के लिए : ट्रेन के अन्दर बैठा कोई व्यक्ति, सहयात्री के सापेक्ष विरामवस्था में होता है लेकिन ट्रेक के पास खड़े व्यक्ति के सापेक्ष गति की अवस्था में होता है।
1. लोलक की लम्बाई: निलम्बन के बिन्दु से गोलक के गुरूत्वाकर्षण के केन्द्र की दूरी होती है।
2. लोलक की माध्य स्थिति: यह लोलक की विरामवस्था है।
3. लोलक का आयाम: दोलन के समय, माध्य स्थिति से गोलक का अधिकतम विस्थापन इसका आयाम कहलाता है।
क्योंकि, लोलक द्वारा 5 दोलन पूरे करने में लिया गया समय 15 सेकण्ड है।
इस प्रकार, लोलक द्वारा 1 दोलन पूरा करने में लिया गया समय है- (15/5) सेकण्ड = 3 सेकण्ड।
इसलिए, लोलक का समय अन्तराल 3 सेकंड है।
दूरी तथा विस्थापन में अंतर :
|
दूरी |
विस्थापन |
|
1. गतिमान वस्तु द्वारा तय किए गए पथ की लम्बाई दूरी कहलाती है | |
1. गतिमान वस्तु की अंतिम तथा प्रारम्भिक स्थितियों के बीच की न्यूनतम दूरी विस्थापन कहलाती है| |
|
2. दूरी हमेशा धनात्मक होती है। |
2. विस्थापन धनात्मक, ऋणात्मक अथवा शून्य भी हो सकता है। |
|
3. यह वस्तु द्वारा तय किये गए पथ पर निर्भर करती है। |
3. यह वस्तु द्वारा तय किये गए पथ पर निर्भर नहीं करता है। |
किसी ग्राफ़ को बनाने के लिए सबसे उपयुक्त पैमाने का चयन करते समय निम्न बिन्दुओं को ध्यान में रखा जाना चाहिए:-
(a) राशियों के उच्चतम तथा निम्नतम मानों के बीच अन्तर जो ग्राफ़ में X- अक्ष तथा Y- अक्ष के सापेक्ष लिया जाता है।
(b) प्रत्येक राशि के मध्यवर्ती मानों को ग्राफ़ पर चुने गए पैमाने के आधार पर अंकित करना सुविधाजनक हो।
(c) पेपर के अधिकतम भाग का उपयोग होना चाहिए जिस पर ग्राफ़ बनाना है।
हाँ, निकाय एक समय पर दो प्रकार की गति से गुज़रता है।
उदाहरण के लिए, खाती की ड्रिल।
छिद्र करने के लिए खाती द्वारा उपयोग की गई ड्रिल स्थानान्तरण तथा घूर्णन दोनों गति करती है। यह इसलिए क्योंकि समान समय पर लकड़ी के अन्दर यह घूमता है(घूर्णन गति) तथा आगे कि तरफ धक्का लगाता है (स्थानान्तरण गति)।
पार्श्व परिवर्तन के कारण किसी समतल दर्पण में वस्तु का बायाँ पार्श्व प्रतिबिम्ब का दायाँ पार्श्व प्रतीत होता है|
बहुमूर्तीदर्शी एक प्रकाशिक खिलौना है जो समतल दर्पणों की सहायता से बनाया जाता है| यह प्रकाश के बहुपरावर्तन के नियम पर आधारित है|
B. केवल श्वेत रंग का होता है C. केवल लाल रंग का होता है D. विभिन्न रंगों से मिलकर बनता है जब सूर्य का प्रकाश किसी प्रिज़्म पर पड़ता है तो सात रंगों में बिखर जाता है| यह दर्शाता है कि सूर्य का प्रकाश सात विभिन्न रंगों से मिलकर बना है|
B. अपसारी लेंस C. समतल लेंस D. आवर्धक लेंस अवतल लेंस को अपसारी लेंस के नाम से भी जाना जाता है क्योंकि यह इसके फोकस पर पड़ने वाली सभी समांनतर किरणों को अपसारित कर देता है|
जब हम दर्पण द्वारा किसी वस्तु का प्रतिबिम्ब उत्पन्न करते हैं तो हम पाते हैं कि दर्पण से वस्तुओं की विभिन्न दूरियों के लिए प्रतिबिम्ब की प्रकृति तथा आकर भी भिन्न होते हैं।
पारदर्शी काँच जो मध्य से कोनों की तुलना में मोटे होते हैं, वे उत्तल लेंस होते हैं तथा उत्तल लेंस को अभिसारी लेंस कहते हैं|
एक उत्तल दर्पण द्वारा बनया गया प्रतिबिम्ब परदे पर नहीं लाया जा सकता| इससे यह सिद्ध होता है कि प्रतिबिम्ब काल्पनिक है| किन्तु बना हुआ प्रतिम्ब सीधा तथा छोटा होता है| उदाहरण के तौर पर गाड़ी के पाशर्वदृश्य दर्पण द्वारा बनाया गया प्रतिबिम्ब हमेशा छोटा और सीधा होता है|
B. परिदर्शी C. पाशर्वदृश्य दर्पण D. आवर्धक लेंस परिदर्शी एक प्रकाशिक यंत्र है जो प्रकाश के परावर्तन के नियम पर आधारित है| इसके द्वारा प्रेक्षक छिपा रहकर भी अपने चारों ओर के वातावरण को देख सकता है। इसका उपयोग पनडुब्बी, युद्धपोत, क्रूज़र युद्धक्षेत्र में छिपे सैनिकों द्वारा, एवं तोपखाने के तोपची अफसर द्वारा लक्ष्य को देखने और शत्रु की गतिविधि का ज्ञान करने केलिए होता है।
B. C. D. परावर्तन के नियम के अनुसार, आपतन कोण परावर्तन कोण के बराबर होता है| इसलिए, जिस श्रृंखला में आपतन कोण का मान घटेगा, सामान श्रृंखला में परावर्तन कोण का मान भी घटेगा| तथापि, i1> i2> i3 है तो, r1> r2> r3 होगा|
दर्पण का हर टूटा हुआ भाग एक स्वतंत्र समतल दर्पण का कार्य करेगा इसलिए पांच दर्पणों द्वारा कुल पांच प्रतिबिम्ब बनेंगे।
किसी समतल दर्पण द्वारा बनाया गया वस्तु का प्रतिबिम्ब हमेशा दर्पण के पीछे दर्पण से वस्तु के समान दूरी पर होता है| अर्थात, यदि वस्तु की दूरी दर्पण के सामने दर्पण से 50 cm है तो प्रतिबिम्ब की दूरी दर्पण के पीछे 50 cm होगी|
समतल दर्पण के गुणों के अनुसार इसके द्वारा बनाया गया वस्तु का प्रतिबिम्ब हमेशा सीधा, काल्पनिक, वस्तु के आकार के समान तथा दर्पण के पीछे दर्पण से वस्तु के समान दूरी पर होता है।
दिए गए चित्र में एक समतल दर्पण द्वारा बना प्रतिबिम्ब दर्शाया गया है| चित्र के माध्यम से देखा जा सकता है कि दर्पण पर आपतित किरणें वास्तविक रूप से नहीं मिलती, किन्तु, मिलती हुई प्रतीत होती हैं|
किसी समतल दर्पण द्वारा बनाए गए प्रतिबिम्ब का आकार वस्तु के आकार के बराबर होता है| इसलिए, एक 10 cm की पेंसिल के प्रतिबिम्ब की लम्बाई पेंसिल की लम्बाई के बराबर अर्थात 10 cm ही होगी|
उत्तल दर्पण द्वारा बने प्रतिबिंब के गुण है: -
उत्तल दर्पण स्कूटर तथा कारों में पार्श्व दर्शक दर्पणों के रूप में उपयोग किया जाता है। उत्तल दर्पण, बड़े क्षेत्र में फैली हुई वस्तुओं के प्रतिबिंब बना सकता है। इसके अलावा, उत्तल दर्पण द्वारा बना प्रतिबिंब सीधा, आभासी तथा आकार में छोटा होता है। ये चालक की अपने पीछे के यातायात को देखने के लिए सहायता करते हैं।
उत्तल दर्पण के उपयोग: 1. कारों में पार्शव दर्शक दर्पण के रूप में। 2. दुकानों में सुरक्षा दर्पणों के रूप में । हम मुड़े हुए पाइप के माध्यम से मोमबत्ती की लौ को नहीं देख पाते हैं क्योंकि प्रकाश हमेशा सीधी रेखा मे गमन करता है। कोई भी चिकनी पॉलिश की हुई सतह जो प्रकाश किरण को समान माध्यम मे लौटा सकती है दर्पण कहलाता है। उदाहरण: अत्यधिक पॉलिश की हुई कोई भी धात्विक सतह दर्पण की तरह व्यवहार करती है। शीशा भी एक दर्पण है। किसी समतल दर्पण के पीछे बने प्रतिबिम्ब की दूरी दर्पण के आगे रखी वस्तु की दूरी के समान होती है| इसलिए, दर्पण के पीछे बने प्रत्बिम्ब की दूरी दर्पण से 1 मीटर होगी| पवन की गति बढ़ने के साथ – साथ वायुदाब में कमी होने लगती है। तीव्र गति से चलने वाली पवन जैसे ही छत के ऊपर से गुज़रती है , वहाँ, वायुदाब कम हो जाता है। यदि छतें कमज़ोर हैं, तो वे भी पवन के साथ उड़ जायेंगी क्योंकि, छतों के नीचे का दाब उन्हें ऊपर की ओर धकेलता है। 1. जब तेज़ हवा चल रही होती है तो हमें हवा के विपरीत दिशा में पैदल चलने में कठिनाई होती है। वायु का दाब हमारे शरीर को पीछे की ओर धकेलता है। जिससे हमें वायु के विपरीत दिशा में अतिरिक्त बल लगाना पड़ता है। 2. जब किसी गुब्बारें में आवश्यकता से अधिक वायु भर दी जाती है, तो वह ध्वनि के साथ फट जाता है। गुब्बारे के अन्दर वायु का दाब इतना बढ़ जाता है कि गुब्बारा अधिक समय तक वायु का दाब वहन नहीं कर पाता है, और फट जाता है। चक्रवात की तेज़ पवन समुद्र के जल को तट की ओर धकेलती है, भले ही चक्रवात तट से सैकड़ों किलोमीटर दूर हो। चक्रवात के नेत्र से निम्न दाब के कारण उसके केन्द्र में जल सतह उच्च स्तर तक उठ जाता है। परिणामस्वरूप समुद्र का पानी कम ऊँचाई पर स्थित तटीय क्षेत्रो में प्रवेश कर जाता है, जिससे जीवन और सम्पति की गंभीर हानि होती है। आधुनिक तकनीकी जैसे:- रडार और उपग्रहों की सहायता से, किसी भी संभावित चक्रवात के आने से 48 घंटे पहले उसके बारे में चेतावनी प्राप्त की जा सकती है। जब कोई चक्रवात तट के निकट होता है तो प्रत्येक आधे या एक घंटे के बाद संदेशों का प्रसारण किया जाता है। चक्रवात बनने में सहायक कारक हैं:- 1. वायु गति। 2. वायु की दिशा। 3. तापमान। 4. आर्द्रता। लगभग समान आकार के दो गुब्बारे लेकर दोनों गुब्बारों में थोड़ा पानी भरते हैं। दोनों गुब्बारों को फुलाकर धागे से बाँध देते हैं। अब इन दोनों गुब्बारों को किसी छड़ के माध्यम से लटका देते हैं। अब दोनों के बीच के स्थान में फूंक मारते हैं। हम देखते हैं कि वे दोनों एक दूसरे की ओर आने का प्रयास करते हैं। यह तभी सम्भव है जब गुब्बारों के बीच के स्थान कि वायु का दाब किसी तरह से कम हो जाए। अतः, जब हम गुब्बारों के बीच के स्थान में फूंक मारते हैं, तो वहां पवन का वेग बढ़ जाता है और वायुदाब कम हो जाता है। क्षेत्र को कम करके वायु से बचाने के लिए लटकने वाले बैनर तथा होर्डिंग्स में छेद किए जाते हैं। दाब, P = F /A या, F = PA वायुमण्डलीय दाब स्थिर हो जाती है, F ∝ A इसलिए, जब क्षेत्र को कम किया जाता है तो वायु दाब भी कम हो जाता है। हम ऐसा घर खरीदेंगे जिसमें खिड़कियाँ तथा रोशनदान दोनों हो। क्योंकि, जब हम सांस लेते हैं तो जो वायु हमारे भीतर से निकलती है वह गर्म और हल्की होती है। हल्की होने के कारण वह ऊपर की ओर उठती है। यदि छत के पास रोशनदान खुला हो तो वह उसमें से बाहर निकल जाती है और उसके स्थान पर ताज़ी और अपेक्षाकृत भारी वायु खिडकियों से अन्दर प्रवेश कर जाती है। इस प्रकार, संवहन धाराओं द्वारा कमरे की वायु सदैव स्वयं स्वच्छ बनी रहती है और हमें स्वांस लेने के लिए ताज़ा वायु मिल जाती है। जब वायु गर्म हो जाती है, यह विस्थापित होती है और हल्की हो जाती है। इस कारण, यह ऊपर की दिशा में गति करती है। इस प्रकार, ऊपर की ओर उठ रही वायु बढ़ते तापमान के कारण उत्पन्न होती है। पानी की बूँदें इन हवाओं द्वारा ऊपर की दिशा में ले जाई जाती है।जहाँ ये ठंडी हो जाती है और नीचे की ओर गिरती है। बिजली तथा ध्वनि उठती वायु के साथ पानी की बूंदों के गिरने से उत्पन्न होती है। यह घटना तड़ित झंझा के रूप में जानी जाती है। इस प्रकार, तड़ित झंझा सामान्यतया गर्म, नम उष्ण कटिबन्धीय क्षेत्रों में उत्पन्न होते हैं। गर्मियों में, भूमध्य रेखा के पास की धरती तेज़ी से गर्म होती है तथा अधिकांश समय तक धरती का तापमान महासागर के पानी की तुलना में उच्च रहता है। इस प्रकार, धरती के ऊपर की वायु गर्म हो जाती है और ऊपर उठती है तथा इसका स्थान लेने के लिए महासागरों से ठंडी हवा स्थल की ओर बहती है। महासागरों से धरती की ओर प्रवाहित होने वाली पवन मानसूनी हवाएँ कहलाती हैं। महासागरों से आने वाली पवन अपने साथ जलवाष्प लाती है, जिसे वर्षा कहते हैं । 1. वायु दाब डालती है। 2. गर्म करने पर वायु प्रसारित और ठंडा करने पर संकुचित होती है। 3. गर्म वायु, ठंडी वायु की तुलना में हल्की होती है। 4. वायु अधिक दाब वाले क्षेत्र से कम दाब वाले क्षेत्र की ओर गति करती है। 5. पवन का वेग बढ़ने पर वायुदाब घट जाता है। चक्रवात प्रभावित क्षेत्र में रखने वाली सावधानियाँ होनी चाहिए: (i) दूषित पानी न पियें। (ii) गीले स्विच और खम्भों से टूट कर गिर गए बिजली के तारों को न छुएं। (iii) महज़ मनोरंजन के लिए बाहर नहीं निकलें। (iv) अपने पड़ोसियों को यथासम्भव सहयोग और सहायता प्रदान करें। (v) बचाव दल पर अनावश्यक मांगों की आपूर्ति के लिए दबाव न डालें। चक्रवात आने पर, हम 1. आने वाले खतरों के प्रति सभी को सावधान करेंगे। 2. आश्रय की खोज करेंगे। 3.पानी और भोजन का संग्रहण करेंगे। 4. प्राथमिक चिकित्सा सुविधा का प्रबंध करेंगे। चक्रवात के नेत्र का व्यास 10 से 30 किमी. होता है। पानी वातावरण से ऊष्मा का अवशोषण करके वाष्प अवस्था में परिवर्तित हो जाता है। जब जल वाष्प वर्षा की बूंदों के रूप में पुनः द्रव रूप में परिवर्तित होती है, तो यह ऊष्मा वायुमण्डल में निर्मुक्त हो जाती है। निर्मुक्त होने वाली ऊष्मा से आस पास की वायु गर्म हो जाती है। इस प्रकार गर्म वायु ऊपर की ओर उठती है, जिससे वायु दाब कम हो जाता है। फलस्वरूप तड़ित झंझा (तूफान) के केंद्र की ओर उच्च वेग की अधिक वायु गति करने लगती है। इस चक्र की पुनरावृति अनेक बार होती रहती है। घटनाओं की इस श्रृंखला का अंत बहुत ही निम्न दाब के एक ऐसे तन्त्र के निर्माण के साथ होता है, जिसके चारों ओर उच्च वेग की वायु की अनेक परते कुण्डली के रूप में घूमती रहती हैं। मौसम की यह स्थिति चक्रवात कहलाती है। B. AMBULANCE C. D. शब्द ‘AMBULANCE’ का पाशर्वपरिवर्तित रूप है| जब एम्बुलेंस के आगे चल रहे वाहन अपने पाशर्वदृश्य दर्पण में शब्द शब्द को पढ़ते हैं तो पाश्र्व परिवर्तन के कारण वह उन्हें ‘AMBULANCE’ दिखाई देता है तथा वे एम्बुलेंस को आगे जाने के लिए पथ प्रदान कर सकते हैं|
अवतल पृष्ट वाले परावर्तक प्रकाश की किरणों को अभिसारित करके अधिक क्षमता वाला एवं केन्द्रित प्रकाश उत्पन्न करते हैं जिसकी सहायता से आगे का पथ अँधेरे में भी स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है|
प्रकाश केवल सरल रेखा में संचरण करता है| इसलिए पाइप को मध्य से मोड़ देने पर उसका पथ अवरोधित हो गया एवं मोमबत्ती दिखाई देना बंद हो गयी |
हम किसी भी वस्तु को केवल तभी देख पाते हैं जब प्रकाश उसकी सतह से टकरा कर परावर्तित होता है तथा परावर्तित प्रकाश हमारे नेत्रों में प्रवेश करता है|
न्वूटन ने इन्द्रधनुष के रंगों को एक डिस्क पर प्रयोग करके ये दर्शाया कि सूर्य का श्वेत प्रकाश वास्तव में सात विभिन्न रंगों से मिलकर बना है| इसें न्यूटन की डिस्क भी कहते हैं| जब इस डिस्क को तेज़ गति से घुमाया जाता है तो सातों रंग मिल जाते हैं तथा डिस्क का रंग सफ़ेद नज़र आने लगता है|
वाहन के पश्च दृश्य दर्पण के रूप में उत्तल दर्पण का उपयोग किया जाता है| उत्तल दर्पण द्वारा बनाए गये प्रतिबिम्ब सदैव आभासी, सीधे एवं आकार में वस्तु से छोटे होते हैं|
घास-फूस की छत अधिक मात्रा में वायु को रोकती है। इसके अलावा मिट्टी ऊष्मा का दुर्बल चालक है। इसलिए, गर्मियों में बाहर से अन्दर की ओर तथा सर्दियों मे अन्दर से बाहर की ओर ऊष्मा का प्रवाह नहीं होने देती है। परिणामस्वरूप, मिट्टी के घर सर्दियों में गर्म और गर्मियों मे ठंडे रहते हैं। ऊनी कपड़े के रेशों के बीच वायु फंसी रहती है। वायु शरीर की ऊष्मा को बाहर क़ी ओर जाने से रोकती है। क्योंकि यह ऊष्मा का दुर्बल चालक हैं। इसलिए, हम गर्म महसूस करते हैं क्योंकि हमारा शरीर वातावरण से परिबद्ध है। संवहन तरल और गैसों की स्थिति में ही सम्भव है। यह ठोस की स्थिति में सम्भव नहीं होता है। क्योंकि ठोस की स्थिति मे, अणु मुक्त अवस्था मे गति नहीं करते हैं तथा अन्तराण्विक बल बहुत कम होता है। डॉक्टरी थर्मामीटर में बल्ब के ऊपर केशनली को मोड़कर कुछ संकरा कर लेते हैं जिससे ताप बढ़ते समय पारा ऊपर तो चढ़ सकता है किन्तु थर्मामीटर को मनुष्य वह पदार्थ जो अपने माध्यम से ऊष्मा को गुज़रने देते हैं, वह ऊष्मा का सुचालक कहलाता है। उदाहरण के लिए, कॉपर, आयरन आदि। वह पदार्थ जो अपने माध्यम से ऊष्मा को गुज़रने नहीं देते हैं वह ऊष्मा का कुचालक कहलाता हैं। उदाहरण के लिए, लकड़ी, प्लास्टिक आदि। प्रयोगशाला थर्मामीटर के उपयोग : डॉक्टरी थर्मामीटर का आरेख नीचे दिखाया गया है : काँच की नली : यह काँच की नली होती है जिसके बाहर की तरफ पैमाना चिन्हित किया होता है। केशिका नली : यह काँच की नली के अन्दर स्थित होती है जिसमे मर्करी चढ़ता और गिरता है। बल्ब : केशिका नली बल्ब के अन्दर होती है जो मोटे काँच तथा एल्कोहल या मर्करी से मिलकर बना होता है। चालन : एक कण के गर्म सिरे से पड़ोसी कण के ठंडे सिरे की ओर ऊष्मा स्थानान्तरण की प्रक्रिया चालन कहलाती है। कुछ उपकरण जैसे केतली, विद्युत इस्त्री आदि में प्लास्टिक या लकड़ी के हेंडल होते हैं क्योंकि लकड़ी और प्लास्टिक, ऊष्मा के दुर्बल चालक हैं जो गर्म उपकरण से हमारे हाथों की ओर ऊष्मा का प्रवाह नहीं होने देते हैं। इस प्रकार, हम बिना किसी कठिनाई के इनके हेंडलों को संभालने मे सक्षम हैं। ऊष्मा तथा तापमान के बीच तीन प्रमुख अंतर है : ऊष्मा तापमान • यह निकाय के अंदर ऊर्जा की (स्थितिज ऊर्जा + गतिज ऊर्जा) की कुल राशि होती है। • यह निकाय के सभी अणुओं की गतिज ऊर्जा का औसत होता है। • मापित ऊष्मा का मात्रक जूल है। • मापित तापमानों के लिए मात्रक केल्विन, सेल्सियस तथा फारेनहाइट है। • यह तापांतर के कारण एक निकाय से दूसरे निकाय के लिए स्थानान्तरित तापीय ऊर्जा है। • यह निकाय के गर्म तथा ठंडे होने का माप होती है। तापमितीय द्रव होना चाहिए : 1. विशिष्ट ऊष्मा निम्न होनी चाहिए ताकि ऊष्मा ऊर्जा की पर्याप्त मात्रा के अवशोषण के बिना यह ताज़ी से किसी पदार्थ का तापमान प्राप्त कर ले। और इस प्रकार, बिना राशि के परिवर्तन के तापमान मापा जाता है। 2. तापमान में इकाई डिग्री के लिए बड़ा प्रसार होना चाहिए ताकि इसका विस्तार खुली आँखों द्वारा देखा जा सके। 3. ऊष्मा के अच्छे चालक होने चाहिए। तापमितीय तरल के रूप में एल्कोहोल की तुलना में मर्करी को प्राथमिकता देने के निम्न कारण हैं : 1.मर्करी, ऊष्मा का अच्छा चालक होता है। अर्थात यह आसपास के तापमान से शीघ्र विस्तारित हो जाता है तथा विस्तार करने के लिए बहुत कम तापमान की आवश्यकता होती है। 2.इसका उच्च क्वथनांक 35 0C तथा निम्न हिमांक -39 0C होता है। 3.यह तरल अवस्था में चमकीला तथा अपारदर्शी होता है अर्थात यह केशिका नली में स्पष्ट धागे के रूप में आसानी से देखा जा सकता है। 4.यह केशिका नली को गीला नहीं करता है तथा सही तापमान रिकॉर्ड करता है। प्रयोगशाला थर्मामीटर मानव शरीर के अलावा अन्य वस्तुओं के तापमान को मापने के लिए उपयोग किया जाता है। इस थर्मामीटर का परास 10°C से 110°C तक होता है। प्रयोगशला थर्मामीटर को उपयोग करने के लिए निम्नलिखित सावधानियाँ बर्ती जानी चाहिए:- 1. हमें सुनिश्चित करना चाहिए कि थर्मामीटर का बल्ब चारों ओर से उस पदार्थ से घिरा हुआ है जिसका ताप मापना है। 2. हमें सुनिश्चित कर लेना चाहिए कि थर्मामीटर का बल्ब पात्र की दीवार से स्पर्श नही करे। 3. हमें उस समय पाठयांक ले लेना चाहिए जब थर्मामीटर उस पदार्थ में डूबा हुआ होता है जिसका तापमान ज्ञात किया जाना है। हमें थर्मामीटर को सीधी स्थिति में रखना चाहिए। जब समुद्र के ऊपर की गर्म हवा ऊपरी दिशा में बढ़ जाती है, तो ठंडी हवा रात के समय भूमि से समुद्र की ओर चलती है। यह ठंडी हवा थल समीर के रूप में जानी जाती है। थल समीर की संरचना:- तटीय इलाकों में रात के समय, i. समुद्र में पानी, धरती की तुलना में बहुत धीरे ठण्डा होता है। ii. समुद्र के ऊपर हवा गर्म हो जाती है और ऊपर की दिशा में बढ़ जाती है। iii. भूमि की ठंडी हवा, गर्म हवा की जगह ले लेती है। iv. भूमि से प्राप्त होने वाली ठंडी हवा, थल समीर कहलाती हैं। जब भूमि के ऊपर की गर्म हवा ऊपरी दिशा में बढ़ जाती है, तो ठंडी हवा समुद्र से भूमि की ओर चलती है। यह ठंडी हवा समुद्र समीर के रूप में जानी जाती है। समुद्र समीर की संरचना:- तटीय क्षेत्रों में, दिन के समय, i.भूमि, समुद्र के पानी से अधिक तेज़ी से गर्म होती है | ii. भूमि के ऊपर हवा गर्म हो जाती है और ऊपर की दिशा में बढ़ती है। iii. समुद्र की ठंडी हवा, गर्म हवा की जगह ले लेती है। iv. भूमि की गर्म हवा समुद्र की ओर चलती है, जिससे चक्र पूरा हो सके। समुद्र से प्राप्त होने वाली ठंडी हवा समुद्र-समीर कहलाती है। B. समय और आवृत्ति की। C. वेग और दूरी की। D. दिशा और समय की।
गति की गणना करने के लिए सुत्र है :
गति = दूरी तय / लिया गया समय।
इसलिए दूरी और समय की ज़रूरत है।
B. 1200 मीटर। C. 1000 मीटर। D. 800 मीटर।
दूरी = गति x समय
समय = 10 मिनट = 10 x 60 = 600 सेकंड
गति = 2 मी /से
दूरी = 2 x 600 = 1200 मीटर
B. स्थिति 2 से स्थिति 3 से स्थिति 1 तक। C. स्थिति 3 से स्थिति 2 से स्थिति 1 से स्थिति 2 से स्थिति 3 तक। D. स्थिति 2 से स्थिति 3 से स्थिति 2 से स्थिति 1 से स्थिति 2 तक। सरल लोलक एक दोलन पूरा करता है जब गोलक 3-2-1-2-3 पूरा करता है। जबकि स्थिति 1 और 3 अंतिम स्थिति के रूप में जाने जाते हैं।
B. एक कार सड़क पर खड़ी है। C. एक कार एक स्थिर गति से बढ़ रही है। D. एक कार परिपत्र गति के दौर से गुजर रही है । दूरी समय ग्राफ़ यहाँ यह दर्शाता है कि एक कार स्थिर गति के साथ आगे बढ़ रही है जो एक सीधी रेखा है इससे यह भी निष्कर्ष लगा सकते हैं कि कार एकसमान गति में है।
B. पृथ्वी द्वारा अपनी दूरी पर एक चक्कर पूरा करने के लिए लिया गया समय। C. पृथ्वी द्वारा सूरज के चारों तरफ एक क्रांति को पूरा करने के लिए लिया गया समय। D. दो ग्रहणों के बीच का समय। प्राचीन समय में, एक साल के समय को पृथ्वी द्वारा लगाया गया समय जो सूरज के चारों तरफ एक क्रांति को पूरा करने के लिए तय किया गया हो, एक साल मन जाता था । पृथ्वी की क्रांति का समय एक निश्चित अंतराल के बाद दोहराया जाता है।
B. वह क्वार्ट्ज घड़ी है । C. वह इलेक्ट्रॉनिक घड़ी है। D. वह अनुरूप घड़ी है । घड़ियाँ जिनमें क्वार्ट्ज क्रिस्टल का प्रयोग होता है, क्वार्ट्ज घड़ियों के रूप में जानी जाती हैं। इसके क्रिस्टल कंपन बहुत तेजी और सटीक दर से करते हैं । समय इन कंपन का उपयोग करके सही मापा जा सकता है। वे पहले इस्तेमाल की गयी घड़ियों की तुलना में अधिक सटीक होती हैं।
B. धरातलीय पवन। C. वायु - दाब। D. जल - दाब। एक उष्णकटिबंधीय चक्रवात, अत्यधिक निम्न दाब केंद्र द्वारा चित्रित एक तूफ़ान या तड़ितझंझा है जो प्रबल पवन तथा भारी वर्षा उत्पन्न करता है। अपनी स्थिति तथा तीव्रता पर निर्भरता के आधार पर, उष्णकटिबंधीय चक्रवात अमेरिका महाद्वीप में “हरिकेन” के रूप में जाना जाता है।
B. तापमान। C. प्रसार। D. संकुचन। वायु द्वारा लगाया जाने वाला दाब, वायुमंडलीय दाब कहलाता है। वायुमंडलीय दाब, किसी सतह के ऊपर वायु के भार द्वारा सतह पर प्रति एकांक क्षेत्रफल लगाए जाने वाले बल के रूप में परिभाषित किया जाता है।
B. दुर्बल। C. शुन्य परिमाण के। D. केवल महासागरों में ही पता लगाये जाते हैं। टॉरनेडो, सामान्यतया दुर्बल होते हैं क्योंकि, ये सामान्यतया 300 km/h से कम चाल से संचरण करते हैं जो इनको दुर्बल बनाता है। ये चक्रवातों के भीतर भी बन सकते हैं।
B. पृथ्वी तल से आकाश की ओर। C. धरातल से महासागर की ओर। D. महासागर से धरातल की ओर। टॉरनेडो गहरे काले रंग के कीपाकार बादल होते हैं जो आकाश से पृथ्वी तल की ओर आते हुए प्रतीत होते हैं । इनमें से अधिकतम दुर्बल होते हैं । ये चक्रवातों के भीतर भी बन सकते हैं । लगभग 300 km/h की चाल से गतिशील टॉरनेडो प्रकृति में विनाशकारी होता है।
चक्रवात के उत्पन्न होने में पवन का वेग, पवन की दिशा, तापमान तथा आदर्ता आदि योगदान करते हैं । वायु की गति के पीछे मुख्य कारण पृथ्वी की सतह का असमान रूप से गर्म होना है। यदि वायु के वेग में वृद्धि की जाती है तो वायु के दाब में कमी होती है। किसी क्षेत्र में पवन की दिशा उत्तर से दक्षिण या दक्षिण से उत्तर होती है। लेकिन पृथ्वी के घूर्णन के कारण, पवन की दिशा में निरन्तर परिवर्तन होता है। उपग्रह तथा राडार से प्राप्त सूचनाओं की सहायता से पहले ही चक्रवातों के बारे में पता लगा सकते हैं । जब साईकिल कि ट्यूब में बहुत अधिक हवा भर दी जाती है तो भीतर का दाब बाह्य वायुमण्डलीय दाब के तुलना में अधिक हो जाता है। वायुमण्डलीय दाब को बराबर करने के लिए अंदर से वायु बाहर की ओर जाती है जिससे यह ट्यूब फट जाती है। जब ठंडा पानी गर्म पात्र पर डाला जाता है तो पात्र के अन्दर की कुछ भाप जल के रूप में संघनित हो जाती है। परिणामस्वरूप, पात्र के अंदर की वायु का दाब कम हो जाता है। दाब के इस अंतर के कारण पात्र विकृत हो जाता है। पृथ्वी के ध्रुव पृथ्वी के अन्य क्षेत्रों की तुलना में सूर्य से अधिक दूरी पर होते हैं| जिससे ये सूर्य से कम ऊष्मा प्राप्त करते हैं जबकि, भूमध्य रेखा के निकट वाले क्षेत्र अधिकतम ऊष्मा प्राप्त करते हैं और इस प्रकार, ध्रुव ठंडे होते हैं । जब हम बोतल के मुँह में फूंख मारते हैं तो मुख के पास की वायु का वेग अपेक्षाकृत अधिक हो जाता है जिससे, वहां वायु दाब घट जाता है और बोतल के अंदर वायु दाब अधिक होता है। इसी कारण से कागज़ अंदर नहीं जाता है। किसी चक्रवात का केंद्र शांत क्षेत्र होता है जो तूफान का ‘नेत्र’ कहलाती है। यह बादलों से मुक्त क्षेत्र होता है और इसमें पवन का वेग न्यूनतम होता है। जब वायु गति करती है तो इसे पवन कहते हैं। पवन पृथ्वी की सतह के असमान रूप से गर्म होने के कारण बनती है। वायु का वेग मापने के लिए पवनमापी (एनिमोमीटर) का उपयोग किया जाता है। वायु धाराओं के बनने के दो कारक:- 1. भूमध्य रेखा तथा ध्रुवों के बीच असमान तापन। 2. धरातल और पानी का असमान रूप से तापन। चक्रवात को विश्व के विभिन्न भागों में भिन्न – भिन्न नामों से जाना जाता है। अमेरिका में हरिकेन तथा फिलीपीन्स और जापान में यह टाइफून के नाम से जाना जाता है। 1. कपड़े के एक टुकड़े को एक लकड़ी की छड़ी से बाँधकर अपने सिर के ऊपर उस छड़ी को उठाकर देखते हैं कि कपड़ा किस दिशा में उड़ रहा है। 2. कागज़ के छोटे – छोटे टुकड़े लीजिए और इन टुकड़ों को ऊपर से छोड़ने पर हम देखते हैं कि ये वायु की दिशा में ही उड़ेंगे। जब विद्युत धारा चालक विलयन या तरल में से प्रवाहित की जाती है तो रासायनिक अभिक्रिया उत्पन्न होती है। विद्युत धारा के कारण यह विलयन आयनों में टूट जाता है। इस प्रभाव को विद्युत धारा का रासायनिक प्रभाव कहते हैं। जब विद्युत धारा तार के माध्यम से प्रवाहित की जाती है तो धारावाही तार चुम्बक की तरह व्यवहार करता है। जब चुम्बकीय सुई इसके पास लाते हैं तो सुई विक्षेपण दिखाती है। यह प्रभाव विद्युत धारा का चुम्बकीय प्रभाव कहलाता है। नहीं, फ्यूज को तार के टुकड़े से प्रतिस्थापित करना सुरक्षित नहीं है। फ्यूज विशेष तारों के बने होते हैं। जो अधिक विद्युत धारा के प्रवाहित होने से शीघ्र ही पिघल या टूट जाते हैं। इस प्रकार, विद्युत स्विच एक सुरक्षित उपकरण है जो विद्युत परिपथ को ख़राब होने से बचाता है। लघु परिपथ विच्छेदक (MCB) कम्पास सुई, छोटी चुम्बक होती है जिसके बिन्दु उत्तर-दक्षिण दिशा में निहित होते हैं । जब चुम्बक को कम्पास सुई के पास लाते हैं तो यह विक्षेपित हो जाती है और चुम्बक की उपस्थिति दर्शाती है। दो सेलों की एक बैटरी, प्रथम सेल के ऋणात्मक टर्मिनल को द्वितीय सेल के धनात्मक टर्मिनल से जोड़कर बना सकते हैं, जो मोटे तार तथा धात्विक पट्टी के माध्यम से इससे बिलकुल निकटतम है। विद्युत घंटी में एक विद्युत चुंबक होता है। इसमें लोहे के टुकड़े पर तांबे के तार कि कुंडली लिपटी होती है ।विद्युत चुंबक के निकट लोहे की पत्ती लगी होती है, जिसके एक सिरे से हथौड़ा जुड़ा होता है। लोहे की पत्ती के समीप एक संपर्क पेच होता है। जब लोहे की पत्ती इस पेच के संपर्क में आती है तो विद्युत परिपथ पूरा हो जाता है तथा कुंडली से विद्युत धारा प्रवाहित होती है। जिस से वह विद्युत चुंबक बन जाती है, तब यह लोहे कि पत्ती को अपनी ओर खींचती है। इस प्रक्रिया में पत्ती के सिरे से जुड़ा हथौड़ा घंटी से टकराता है और ध्वनि उत्पन्न होती है ।
A. बायां पार्श्व प्रतीत होता हैSOLUTION
Right Answer is: A
SOLUTION
A. केवल काले रंग का होता हैSOLUTION
A. अभिसारी लेंसSOLUTION
A. प्रयोग के समय परSOLUTION
A. अभिसारी लेंस होते हैंSOLUTION
A. वास्तविक, उल्टा तथा बड़ा होता हैSOLUTION
A. बहुमूर्तीदर्शीSOLUTION
A. SOLUTION
SOLUTION
Right Answer is: B
SOLUTION
A. सीधा होता हैSOLUTION
A. वास्तविक रूप से मिलती हैंSOLUTION
SOLUTION
SOLUTION
(a) सीधा ।
(b) आभासी।
(c) वस्तु से आकार में छोटा होता है।SOLUTION
SOLUTION
SOLUTION
SOLUTION
SOLUTION
SOLUTION
SOLUTION
SOLUTION
SOLUTION
SOLUTION
SOLUTION
SOLUTION
SOLUTION
SOLUTION
SOLUTION
SOLUTION
SOLUTION
SOLUTION
SOLUTION
A. ECNALUBMASOLUTION
A. समतल पृष्ठ वाले होते हैंSOLUTION
Right Answer is: C
SOLUTION
A. वस्तुएं प्रकाश को सोख लेती हैंSOLUTION
A. सातों रंग धुंधले दिखाई पड़ते हैंSOLUTION
A. वस्तु के आकार के समान होता हैSOLUTION
SOLUTION
SOLUTION
SOLUTION
SOLUTION
SOLUTION
SOLUTION
(i) बल्ब ।
(ii) केशिका नली।
(iii) संकीर्ण भाग ।
(iv) तापमान पैमाने पर उच्च तथा निम्न सीमाएँ ।
चित्र से काँच की नली, केशिका नहीं, तथा बल्ब को परिभाषित कीजिए।
SOLUTION

SOLUTION

SOLUTION
SOLUTION
SOLUTION
SOLUTION
SOLUTION

SOLUTION

A. दूरी और समय की।SOLUTION
A. 1600 मीटर ।SOLUTION
एक सरल लोलक का एक दोलन पूरा होता है,जब यह चलता है:-
A. स्थिति 2 से स्थिति 3 तक।SOLUTION
गया चित्र यह दर्शाता हैं कि
A. एक कार चर गति के साथ घूम रही है।SOLUTION
A. चंद्रमा द्वारा पृथ्वी के एक क्रांति को पूरा करने के लिए लिया गया समय।SOLUTION
A. वह लोलक घड़ी है।SOLUTION
A. चक्रवात।SOLUTION
A. दाब।SOLUTION
A. प्रबल।SOLUTION
A. आकाश से पृथ्वी तल की ओर।SOLUTION
SOLUTION
SOLUTION
SOLUTION
SOLUTION
SOLUTION
SOLUTION
SOLUTION
SOLUTION
SOLUTION
SOLUTION
SOLUTION
SOLUTION
SOLUTION
SOLUTION
SOLUTION
SOLUTION
SOLUTION
SOLUTION
SOLUTION
SOLUTION
SOLUTION
SOLUTION
SOLUTION
PreviousNext