फ्यूज तार, तारों तथा विद्युत उपकरण को ख़राब होने से बचाता है। जब परिपथ में धारा इसके अधिकतम मान से बढ़ जाती है तो यह शीघ्र ही पिघल जाता है तथा परिपथ टूट जाता है। फ्यूज तार के पिघलने के कारण हैं :-
1. नंगे विद्युन्मय तार के उदासीन तार के साथ सीधे सम्पर्क में आने से।
2. विद्युत आपूर्ति प्रणाली में धारा के परिवर्तन से।
खुला परिपथ : जब स्विच

बंद परिपथ :- जब स्विच

विद्युत बल्बों का उपयोग प्रकाश के लिए किया जाता है , परन्तु बल्ब उष्मा भी उत्पन्न करते हैं हैं , जो लाभदायक नहीं है। इससे विद्युत कि क्षति होती है, तथा प्रतिदीप्त लैंप (CFL) विद्युत की क्षति में कमी करता है और बल्ब के मुकाबले ज़्यादा प्रकाश देता है ।
जब किसी तार से कोई विद्युत धारा प्रवाहित होती है , तो वह तप्त हो जाती है। विद्युत बल्ब में तंतु उपयोग होती है जिससे जो विद्युत धारा प्रवाह होने से बहुत इतने अधिक ताप तक तप्त हो जाते हैं कि दीप्त होकर प्रकाश देना आरम्भ कर देते हैं।
जब विद्युत धारा चालक तार में से प्रवाहित की जाती है तो यह तार चुम्बक की तरह व्यवहार करता है। इसे विद्युत धारा का चुंबकीय प्रभाव कहते हैं। विद्युत चुम्बक केवल इसी प्रभाव के कारण बने होते हैं। तथा इस प्रकार, विद्युत धारा चुम्बक बनाने के लिए उपयोग की जा सकती है।
विद्युत हीटर वह उपकरण है जो विद्युत ऊर्जा को ऊष्मीय ऊर्जा में परिवर्तित करता है। यह विद्युत धारा के ऊष्मीय प्रभाव के सिद्धान्त पर आधारित होता है। विद्युत उपकरण तारों की कुंडलियों से मिलकर बना होता है जिसे तन्तु के नाम से जाना जाता है। जब विद्युत हीटर का स्विच ऑन करते हैं तो इसके माध्यम से धारा के गुज़रने से तन्तु रक्त तप्त हो जाता है। यह रक्त तप्त तन्तु बाहर ऊष्मा प्रदान करता है।
विद्युत बल्ब भी समान सिद्धान्त पर आधारित होता है। अर्थात विद्युत धारा के ऊष्मीय प्रभाव पर। विद्युत बल्ब की स्थिति में, इसका तन्तु उच्च ताप पर गर्म हो जाता है और जलना शुरू हो जाता है। जबकि विद्युत हीटर का तन्तु उच्च ताप पर गर्म नहीं होता है और इसलिए, यह विद्युत बल्ब की तरह नहीं जलता है।
उपरोक्त परिपथ दो बल्बों तथा एक बैटरी से मिलकर बना होता है।
बल्ब का परिपथ प्रतीक :

बैटरी का परिपथ प्रतीक :

दिये गए परिपथ में, बैटरी का धनात्मक टर्मिनल, बल्ब A के एक टर्मिनल से जुड़ा है जबकि, बल्ब A का दूसरा टर्मिनल बल्ब B के एक टर्मिनल से जुड़ा है। बल्ब B का दूसरा टर्मिनल बैटरी के ऋणात्मक टर्मिनल से जुड़ा होता है।
उपरोक्त सूचनाओं के आधार पर, परिपथ चित्र है

A.
DNA
B.
अमीनो अम्ल
C.
शर्करा
D.
लिपिड
प्रकाश संश्लेषण वह प्रक्रिया है जो कार्बन डाइऑक्साइड को सूर्य के प्रकाश की ऊर्जा की सहायता से कार्बनिक यौगिक जैसे शर्करा में परिवर्तित कर देते हैं।
A.
श्वसन
B.
प्रकाश संश्लेषण
C.
रसोसंश्लेषण
D.
पाचन
प्रकाश संश्लेषण की प्रक्रिया के द्वारा स्वपोषी (हरे पौधे और प्रकाश संश्लेषी) प्रकाश और क्लोरोफिल के उपयोग से जल और कार्बन डाइऑक्साइड की सहायता से कार्बोहाइड्रेट (ऊर्जा) का संश्लेषण करते हैं।
A.
पादप प्लवक
B.
साइनोबैक्टीरीया
C.
कवक
D.
कैक्टस
पादप प्लवक, साइनोबैक्टीरीया और कैक्टस स्वपोषी है। स्वपोषी स्वयं के लिए भोजन सरल पदार्थों से बनाते हैं। कवक मृतजीवी होते हैं। मृतजीवी मृत और विघटित पदार्थों के घुलित रूप से पोषण प्राप्त करते हैं।
A.
स्टार्च
B.
ग्लाइकोजन
C.
ग्लूकोज
D.
कार्बन डाइऑक्साइड
प्रकाश संश्लेषण में पौधे प्रकाश ऊर्जा का उपयोग करके कार्बन डाइऑक्साइड से कार्बोहाइड्रेट (ग्लूकोज) का उत्पादन करते हैं। ग्लूकोज हरितलवक में स्टार्च कणों के रूप में संग्रहित होते हैं।
A.
कवक
B.
शैवाल
C.
बैक्टीरिया
D.
लाइकेन
स्थिर जल या तलाबों की सतह पर निर्मित चिपचिपी हरी परत के धब्बे कुछ जीवों द्वारा बनते हैं जिन्हें शैवाल कहते हैं।
सहजीवी बैक्टीरिया की सहायता से जैविक नाइट्रोजन का स्थिरीकरण होता है।
एक जीव द्वारा भोजन लेने और शरीर की अनेक क्रियाविधियों द्वारा उसका उपभोग करने की विधि पोषण कहलाती है।
मृदा में खाद या उर्वरक मिलाकर पोषक तत्वों की पूर्ति की जा सकती है।
भोजन शरीर की देखभाल, वृद्धि, विकास और कार्य करने के लिए ऊर्जा प्रदान करता है। इसलिए जीवों को भोजन की आवश्यकता होती है।
वर्षा के मौसम में कवक की वृद्धि के कारण ब्रेड में परिवर्तन आते हैं।
स्टार्च ।
लाइकेन, कवक और शैवाल का संबंध होता है।
रंध्र ।
पत्तियों में हरे रंग का वर्णक क्लोरोफिल होता है।
घटपादप
शरीर के विकास, वृद्धि और मरम्मत के लिए आवश्यक भोजन के घटक, पोषक तत्व कहलाते हैं। ये कार्बोहाइड्रेट, प्रोटिन्स, वसा, विटामिन और खनिज पदार्थ हैं।
स्वयंपोषी(ओटोट्रॉफ) जो कि ओटो = स्वयं, ट्रोफ = पोषण से मिलकर बना होता है।
स्वयंपोषी पोषण, पोषण की एक विधि है जिसमें एक जीव सरल पदार्थों से स्वयं के लिए भोजन बनाता है। हरे पौधे और शैवाल स्वयंपोषी होते हैं।
शब्द हीटरोट्रोफ जो कि हीटरो = दूसरे, ट्रोफ = पोषण से बना है।
जीव जो पादपों द्वारा पहले से तैयार भोजन प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से लेते हैं, विषमपोषी कहलाते हैं। उदाहरण- सभी जंतु जैसे गाय, शेर, पक्षी आदि।
पत्तियों पर तनु आयोडिन विलयन की 2 से 3 बुँदे डाले।
नीले-काले रंग का दिखाई देना पत्तियों में स्टार्च की उपस्थिति को दर्शाता है।
घट पादप को सभी आवश्यक तत्व मृदा से नहीं मिल पाते हैं जैसे नाइट्रोजन, इसलिए नाइट्रोजन की कमी को पूरा करने के लिए ये पादप कीटों को खाते हैं।
i. सूक्ष्मात्रिक तत्व
ii. वाष्पोत्सर्जन
iii. संवहनी ऊतक
मूलरोमों के तीन विशिष्ट लक्षण हैं-
� मूलरोम जल के लिए बडा सतही क्षेत्र उपलब्ध कराते हैं, जिसके परिणामस्वरूप पादपों में अधिक अवशोषण होता है।
� मूलरोमों में कोशिका रस की सान्द्रता बाहरी मृदा से कम होती है। ये मृदा से मूलरोमों में विसरण द्वारा अवशोषण संभव बनाते हैं।
� मूलरोम एक पतली, पारदर्शक कोशिका भित्ति रखते हैं जो खनिज तत्वों को कोशिका से अन्दर-बाहर मुक्त गमन होने देती है।
एक पादप में जड़ों के कोई तीन प्राथमिक कार्य हैं-
� जड़ें पौधे को मिट्टी में साधे रखती है।
� जड़ें मृदा से जल व खनिज लवणों का अवशोषण करती हैं।
� जड़ें अवशोषित पदार्थों को पौधे के ऊपरी भागों में संवहन करने में सहायता करती हैं।
i. प्रकाश संश्लेषण, हरे पौधों द्वारा कार्बन डाईऑक्साइड और जल से, हरे वर्णक क्लोरोफिल की उपस्थिति में, सूर्य की प्रकाश ऊर्जा का उपयोग कर, ऑक्सीजन उपउत्पाद के रूप में मुक्त कर भोजन बनाने का प्रक्रम है।
ii. पत्तियाँ प्रकाश संश्लेषण का मुख्य स्थल हैं।
मानव में पाचन के मुख्य चरण हैं-
1. अर्न्तग्रहण
2. पाचन
3. अवशोषण
4. स्वांगीकरण
5. बहि:क्षेपण
मानव में चार प्रकार के दाँत होते हैं-
1. कृतनक
2. रदनक
3. अग्रचवर्णक
4. चवर्णक
हम चीरने और फाडने में रदनक दाँतों को काम लेते हैं।
प्रत्येक जबडे में चार रदनक दाँत होते हैं। इसप्रकार रदनकों की कुल संख्या आठ है।
अग्र चवर्णक और चवर्णक दाँत चबाने और पीसने के काम आते हैं। प्रत्येक जबडे में अग्रचवर्णक दाँतों की संख्या 4 और चवर्णक 6 होती हैं।
ग्लूकोज कार्बोहाइड्रेट का सरल रूप है जो आसानी से टूट जाता है और ऊर्जा प्रदान करता है। इसलिए, हमें ग्लूकोज से तुरंत ऊर्जा मिलती है।
समानता-
अमीबा
और मनुष्य
दोनों पाचन
के लिए पाचन
रसों का
उपयोग करते
हैं।
असमानता-
मनुष्य
भोजन को
चबाते हैं
जबकि अमीबा
में ऐसी कोई
प्रक्रिया
नहीं होती
है।
जो जीवधारी जीवित पौधों तथा जंतुओं के शरीर में निवास करते हैं तथा उनसे अपना भोजन प्राप्त करते हैं, परजीवी कहलाते हैं। जैसे अमरबेल, जो अपने पोषक पौधे से चूषककाँगों द्वारा भोजन प्राप्त करती हैं।
दुग्ध दाँत और स्थाई दाँत में अन्तर इसप्रकार है-
|
दुग्ध दाँत |
स्थाई दाँत |
|
(1) यह दाँतों का प्रथम सैट है जो शैशवास्था के दौरान उगते हैं। (2) ये दाँत छ: से आठ वर्ष की आयु तक गिर जाते हैं। (3) इन दाँतों की कुल संख्या बीस होती है। |
(1) यह दाँतों का दूसरा सैट है जो दुग्ध दाँतों को प्रतिस्थापित करता है। (2) ये सम्पूर्ण जीवनकाल में रहते हैं या वृद्धावस्था के दौरान गिर जाते हैं। (3) इन दाँतों की कुल संख्या बत्तीस होती है। |
जीभ के कार्य इसप्रकार हैं-
� बोलने में काम आती है।
� यह चबाने के दौरान भोजन के साथ लार मिश्रित करती है और भोजन निगलने में सहायता करती है।
� यह इन पर स्वाद कलिकाओं की उपस्थिति के कारण भोजन के स्वाद जैसे मीठे व नमकीन आदि को पहचानने में काम आती है।
घास खाने वाले जन्तु जैसे गाय, भेस आदि घास को जल्दी से निगल लेते हैं और आमाशय के एक पृथक भाग में संग्रहित हो जाते हैं जिसे रुमेन कहते हैं।
रुमेन में भोजन आंशिक रूप से पच जाता है और जुगाल कहलाता है।
जुगाल मुख में छोटे पिंडकों के रूप में पुनःवापस आता है और जन्तु द्वारा चबाया जाता है। इस प्रक्रिया को जुगाली करना कहते हैं और इन जंतुओं को रोमन्थी या रूमिनैन्ट कहते हैं।
सेल्यूलोज कार्बोहाइड्रेट का एक प्रकार है जो रोमन्थी द्वारा पच सकता है लेकिन मनुष्यों द्वारा नहीं। रोमन्थी में बड़े थैले के समान संरचना पायी जाती है जिसे रुमेन कहते हैं, रुमेन क्षुद्रांत्र और बृहद्रांत्र के बीच में उपस्थित होता है। सेल्यूलोज बैक्टीरिया द्वारा यहाँ पचता है जो मनुष्य में उपस्थित नहीं होता है।
एक निरंतर नाल जो शरीर के मुख गुहा से आरंभ होती है और गुदा पर समाप्त होती है वह आहार नाल या पाचन पथ कहलाती है।
आहार नाल में निम्न भाग होते हैं-
(1) मुख गुहा
(2) ग्रासनाल
(3) आमाशय
(4) क्षुद्रांत्र
(5) बृहद्रांत्र
(6) मलाशय और गुदा
आमाशय मोटी भित्ति वाला, U के आकार का चपटा थैला है।
ये एक ओर से ग्रासनली से भोजन को प्राप्त करता है और दूसरी ओर से भोजन को क्षुद्रांत्र में भेज देता है।
आमाशय
की आंतरिक
परत म्यूकस,
हाइड्रोक्लोरिक
अम्ल और पाचक
रस का स्राव
करती है।
म्यूकस
आमाशय की परत की
रक्षा करता
है, अम्ल
बैक्टीरिया
को नष्ट करता
है जो भोजन के साथ
प्रवेश करते
हैं उसके साथ
आमाशय का
माध्यम अम्लीय
भी बनाता है, जिससे पाचक
रसों को
क्रिया करने
में सहायता मिलती
है।
पाचक रस प्रोटिन्स को सरल पदार्थ में विघटित कर देते हैं।
क्षुद्रांत्र की आंतरिक भित्ति में हजारों अंगुली के समान अतिवृद्धियाँ होती हैं जिन्हें रसांकुर कहते हैं।
रसांकुर
पचित भोजन के
अवशोषण के
लिए सतही क्षेत्र
को बढ़ाते
हैं।
प्रत्येक
रसांकुर में
इसकी सतह के
निकट छोटी और
पतली रक्त
वाहिकाएँ
होती हैं।
रसांकुर
की सतह पचित
भोजन पदार्थ
का अवशोषण करती
है।
अवशोषित
पदार्थ रक्त
वाहिकाओं के
माध्यम से
शरीर के
विभिन्न अंगों
में पहुँच
जाता है।
i. आमाशय एक U आकार का पेशीय थैला है जो ग्रासनाल के एक सिरे से भोजन प्राप्त करता है और दूसरे से क्षुद्रांत्र में खुलता है आमाशय की आन्तरिक भित्ति म्यूकस, हाइड्रोक्लोरिक अम्ल, और पाचक रस स्त्रावित करती हैं। म्यूकस इसकी भित्ति की सुरक्षा करता है, HCl भोजन के बैक्टीरिया को मारता है और रस में पाचक एन्जाइम होते हैं।
ii. यकृत उदर के उपरी भाग में दायीं ओर स्थित लाल भूरे रंग की ग्रन्थि है। यह हमारे शरीर में सबसे बडी ग्रन्थ्िा है। यह पित्त रस स्त्रावित करता है, जो कि एक कोष में संचित रहता है जो पित्ताशय कहलाता है। पित्त वसा के पाचन में सहायता करता है।
A.
चीन
B.
भारत
C.
न्यूजीलैण्ड
D.
ऑस्ट्रेलिया
ऑस्ट्रेलिया कच्ची ऊन का सबसे बड़ा उत्पादक है जो मुख्यतः मेरिनो भेड़ से प्राप्त की जाती है । ऑस्ट्रेलिया विश्व की लगभग 80% मेरिनो ऊन का उत्पादन करता है ।
A.
केरल में
B.
उत्तरप्रदेश में
C.
मध्यप्रदेश में
D.
लद्दाख में
याक ऊन लद्दाख और तिब्बत में बहुत अधिक प्रचलित है ।
A.
वसा के
B.
प्रोटीन के
C.
कार्बोहाइड्रेट के
D.
विटामिन के
कैटरपिलर प्रोटीन से निर्मित रेशे का स्राव करता है, जो वायु में खुला रहने पर कठोर हो जाता है और रेशम का रेशा बन जाता है ।
A.
प्यूपा अवस्था में
B.
लार्वा अवस्था में
C.
अंडे में
D.
व्यस्क अवस्था में
जब कैटरपिलर अपने आकार में वृद्धि करके प्यूपा अवस्था में जाने से पूर्व अपने चारों तरफ एक जाल बुनता है इसे कोकून कहते हैं ।
A.
ऊन
B.
रेशम
C.
नाइलॉन
D.
रेयॉन
ऊन कोमल होती है और यह रेशम, नाइलॉन और रेयॉन से अधिक वायु धारण करती है ।
परजीवी और मृतजीवी में अन्तर इसप्रकार है-
परजीवी |
मृतजीवी |
|
i. एक परजीवी मुख्यत: सजीव पोषी पर रहते हैं। ii. परजीवी भोजन सजीवों से प्राप्त करते हैं। iii. जैसे − कुस्कुटा (अमरबेल) |
i. एक मृतजीवी मृत और अपघटित होते पदार्थों पर रहते हैं। ii. मृतजीवी भोजन मृत और अपघटित होते पदार्थों से प्राप्त करते हैं। iii. जैसे - कवक |
(i) वायु
में सामान्य
रूप से कवक
बीजाणु पाये
जाते हैं। जब
ये बीजाणु
गर्म और नम
वस्तु के
संपर्क में आते
हैं तब ये
विकसित और
अंकुरित
होते हैं।
वर्षा के
मौसम के
दौरान अधिक
संभावना है
कि वस्तुएँ
गीली हो सकती
हैं। कवक
अचार, चमड़े,
कपड़े और
विभिन्न
अन्य
वस्तुओं पर
विकसित होती
है जो एक लंबे समय
के लिए गर्म
और आर्द्र
मौसम में रखा
जाता है।
इसलिए,
कवक वर्षा के
मौसम में
अधिकतर
दिखाई देती
है।
(ii) कवक
में मृतजीवी
पोषण विधि
होती है। ये
मृत और
विघटित
पदार्थों पर
पाचन रस का
स्राव करते
हैं और
इन्हें
घुलनशील
पदार्थों
में
परिवर्तित
कर देते हैं।
ये विलयन
उन्हें पोषक
तत्व प्रदान
करता है जो
उनके द्वारा
आसानी से
अवशोषित हो
जाते हैं।
पत्तियों
को पौधों के
खाद्य
कारखानों के
रूप में जाना
जाता है
क्योंकि-
- हरी
पत्तियों
में प्रकाश
संश्लेषण की
प्रक्रिया
को पूरा करने
के लिए
आवश्यक सभी
कच्ची
सामग्री
होती है।
- इनमें
क्लोरोफिल
(हरा वर्णक)
होता है जो
सूर्य के
प्रकाश को
संग्रहित
करता है।
- पत्तियों
में उनकी
सतहों पर
छोटे छिद्र
होते हैं
जिन्हें
रंध्र कहते
हैं।
- वायु से
कार्बन
डाइऑक्साइड
रंध्रों
द्वारा अंदर
ली जाती है।
- जल और खनिज
पदार्थ मृदा
से जड़ों
द्वारा
अवशोषित
होते हैं और
वाहिकाओं
द्वारा
पत्तियों
में
स्थानांतरित
हो जाते हैं।
- पत्तियाँ
सभी कच्ची
सामग्री को
एकत्र कर पौधों
के सभी भागों
के लिए भोजन
तैयार करती
हैं और
उन्हें
कार्बोहाइड्रेट
(स्टार्च) में
परिवर्तित
कर देती है, जो उसके बाद
पौधों के
अन्य भागों
में भेज दिया
जाता है
जिससे पौधे
की वृद्धि और
विकास होता
है।
कुछ
जीव एक दूसरे के
साथ रहते हैं
तथा अपना आवास
एवं पोषण
तत्व एक
दूसरे के साथ
बाँटते हैं
जिससे दोनों
को लाभ होता
है, इसे सहजीवी
संबंध कहते
हैं।
उदाहरण -
(i) लाइकेन
में,
क्लोरोफिल
युक्त
भागीदार
शैवाल और कवक
दोनों साथ
रहते हैं।
कवक आवास,
जल और खनिज
पदार्थ
शैवाल को
देता है और
उसके बदले
में शैवाल
प्रकाश
संश्लेषण की
प्रक्रिया
से भोजन बना
कर कवक को
देता है।
(ii) वृक्षों
की जड़ों और
कवक में
सहजीवी
संबंध। वृक्ष
कवक को पोषण
प्रदान करते
हैं बदले में
उन्हें
कवकों से जल
एवं पोषक
तत्वों के
अवशोषण में
सहायता
मिलती है।
वृक्ष के लिए
इस संबंध का विशेष
महत्त्व है।
कुछ पादप कीटों को पकड़ सकते हैं और उन्हें पचा सकते हैं। कीटों को खाने वाले पादपों को कीटभक्षी पादपों के रूप में जाना जाता है, जैसे घट पादप। घट पादप में पत्तियाँ घड़े की संरचना में रूपांतरित हो जाती हैं। पत्ती का शीर्ष ढक्कन के रूप में खुलता और बंद होता है। घट के अंदर रोम नीचे की ओर की दिशा में पाये जाते हैं। जब कोई कीट घट के अंदर आता तो ढक्कन बंद हो जाता है और कीट उसके रोम के अंदर फस जाता है। घट में पाचक रसों का स्राव होता है जिससे कीट पच जाता है। पौधे मृत कीट से पोषक तत्व प्राप्त करते हैं।

A.
पक्ष्माभिका
B.
कूटपाद
C.
स्पर्शक
D.
कशाभिका
हाइड्रा अपने स्पर्शकों का उपयोग करके शिकार को अचेत और उन्हें स्थिर कर देता है उसके बाद वह इनके द्वारा भोजन को मुख में धकेलता है।
A.
क्लोरोफिल की उपस्थिति में जल और कार्बन डाइऑक्साइड से ग्लूकोज का तैयार होना।
B.
बड़े भोजन के कणों का सरल यौगिकों में टूटना।
C.
ऊर्जा मुक्त करने के लिए भोजन का ऑक्सीकरण।
D.
कूपिकाओं और हीमोग्लोबिन के बीच ऑक्सीज़न का विनिमय।
श्वसन एक अपचयिक प्रक्रिया है जिसमें भोजन ऑक्सीज़न के साथ मिश्रित हो कर ऊर्जा मुक्त करता है।
A.
सूंड
B.
कूटपाद
C.
पक्ष्माभ
D.
स्पर्शक
साधारण जीवों जैसे अमीबा में भोजन को किसी भी स्थान से झूठे पादों द्वारा ग्रहण किया जाता है जिसे कूटपाद कहते हैं।
A.
लार ग्रंथि
B.
पीयूष ग्रंथि
C.
हाइपोथेलेमस ग्रंथि
D.
बाह्य कोशिकीय ग्रंथि
मुख में लार ग्रंथियों के तीन जोड़े होते हैं। ये ग्रंथि जलीय पदार्थ का स्राव करती है जिसे लार कहते हैं। लार भोजन के पाचन में सहायता करती है। लार में एमाइलेज नामक एंजाइम पाया जाता है।
A.
सांद्रित हाइड्रोक्लोरिक अम्ल
B.
तनु सल्फ्यूरिक अम्ल
C.
तनु साइट्रिक अम्ल
D.
तनु नाइट्रिक अम्ल
आमाशय एक रस जिसे आमाशयिक रस कहते हैं और एक अम्ल (सांद्रित हाइड्रोक्लोरिक अम्ल) का स्राव करता है। अम्ल का pH 1 से 2 होता है।
A.
एमाइलेज
B.
ट्रिप्सिन
C.
पेप्सिन
D.
सेरोटोनिन
आमाशय की भित्ति में ग्रंथि पाचक रस का स्राव करती है जिसमें अम्ल और एंजाइम होते हैं उसे पेप्सिन कहते हैं।
A.
कार्बोहाइड्रेट्स का पाचन
B.
आमाशय को साफ करना
C.
जीवाणुओं को नष्ट करना
D.
प्रोटिन्स को तोड़ना
पाचक रस में अम्ल जीवाणुओं को नष्ट करते हैं और पेप्सिन प्रोटीन के टुकड़े करने में सहायता करता है।
A.
6मी - 7मी
B.
7मी − 8मी
C.
8मी − 9मी
D.
9मी − 10मी
हलका (अर्द्ध तरल) खाना एक लंबी, कुंडलित ट्यूब में प्रवेश करता है जिसे क्षुद्रांत्र कहते है। यह आहार नली का सबसे लंबा (लगभग 6 मीटर) भाग है। भोजन का पाचन और अवशोषण के अधिकांश क्षुद्रांत्र में जगह लेता है।
A.
अमाश्य
B.
क्षुद्रांत्र
C.
अग्न्याशय
D.
यकृत
भोजन एंजाइम के साथ घुल जाता है जो क्षुद्रांत्र की भित्ति से स्रावित होते हैं, यकृत से पित्त स्रावित होता है और अग्न्याशय से अग्न्याशयी रस स्रावित होता है।
A.
मुख, क्षुद्रांत्र
B.
मुख, बृहद्रांत्र
C.
मुख, गुदा
D.
मुख, मलाशय
पाचन की प्रक्रिया मुख में आरंभ होती है और क्षुद्रांत्र में समाप्त होती है, भोजन आहार गुहा से गुजरती है जिसे आहार नाल कहते हैं।
A.
रसांकुर
B.
कुटपाद
C.
स्पर्शक
D.
कूपिकाएँ
अनेक अंगुली नुमा अतिवृद्धियाँ होती हैं जिन्हें रसांकुर कहते हैं। ये आहार नाल के क्षुद्रांत्र में पायी जाती हैं जो भोजन के सम्पूर्ण अवशोषण में सहायता करती हैं।
A.
गुदा
B.
आंत्र
C.
मलाशय
D.
रसांकुर
अपाच्य भोजन मलाशय में एकत्र और संग्रहित होता है जो गुदा से निष्कासन की प्रक्रिया से बाहर निकाल दिया जाता है।
A.
गमन
B.
पंप
C.
क्रमाकुंचन
D.
अनुशिथिलन
आहार नाल की भित्ति भोजन को पूरे समय एक लहर के समान गति में नीचे भेजती है जिसे क्रमाकुंचन कहते हैं। क्रमाकुंचनी लहरे भोजन को ग्रासनली से आमाशय में भेजती हैं।
A.
अपने जीवनकाल के दौरान दाँतों के दो सेट
B.
दाँत का एक सेट जो एक जीवन भर के लिए रहता है
C.
कुल चौबीस दाँत
D.
कुल सौलह दाँत
मनुष्यों में दाँतों के दो सेट अपने सम्पूर्ण जीवन काल के दौरान विकसित होते हैं। दूध के दाँतों के सेट में बीस दाँत होते हैं जबकि स्थायी दाँतों में बत्तीस दाँत होते हैं।
A.
अग्न्याशय
B.
आमाशय
C.
वृक्क
D.
क्षुद्रांत्र
पाचन एंजाइम आमाशय, अग्न्याशय और क्षुद्रांत्र द्वारा स्रावित होते हैं। वृक्क पाचन की प्रक्रिया में शामिल नहीं होता है। ये नाइट्रोजन अपशिष्ट के उत्सर्जन में शामिल हैं।
A.
बैक्टीरिया
B.
लाइकेन
C.
कवक
D.
शैवाल
ब्रेड पर भूरे, सफ़ेद या हरे रोएँदार धब्बे कवक के विकास के कारण दिखाई देते हैं। कवक में मृतजीवी पोषण की विधि होती है।
A.
CO2
B. H2O
C.
सूर्य का प्रकाश
D.
नाइट्रोजन
पौधे स्वपोषी हैं जो सूर्य के प्रकाश की उपस्थिति में खनिज पदार्थ, जल और कार्बन डाइऑक्साइड के उपयोग के द्वारा अपना भोजन स्वयं तैयार करते हैं। नाइट्रोजन प्रकाश संश्लेषण में आवश्यक नहीं होता है।
A.
गैसों का विनिमय
B.
जल का अवशोषण
C.
भोजन को तैयार करना
D.
पत्तियों की रक्षा करते हैं
छोटे छिद्र जिन्हें रंध्र कहते हैं पत्तियों की ऊपरी सतह पर उपस्थित होते हैं। ये छिद्र गैसों के विनिमय का कार्य करते हैं यानि पत्तियों में कार्बन डाइऑक्साइड का प्रवेश और ऑक्सीज़न के निष्कासन को नियंत्रित करते हैं।
A.
लवण
B.
कार्बन
C.
नाइट्रोजन
D.
ऑक्सीज़न
कीटभक्षी पौधे वास्तव में स्वपोषी के समान वातावरण और मृदा से कच्चा माल (कार्बन डाइऑक्साइड, जल और सूर्य का प्रकाश) भोजन बनाने के लिए प्राप्त करते हैं। इन पौधों की नाइट्रोजन की आवश्यकता इन पौधों द्वारा कीटों को पकड़ने से प्राप्त होती है।
A.
मृतजीवी
B.
सहजीवी संबंध
C.
परजीवी
D.
विषमपोषी
जब दो जीव दो भिन्न जातियों के अंतर्गत आते हैं लेकिन फिर भी साथ रहते हैं एसे संबंध को सहजीवी संबंध कहते हैं। उदाहरण- फलीदार पौधों की जड़ों के पिंड में रहने वाले राइज़ोबियम।
A.
ये हरे रंग के होते हैं।
B.
ये पौधे वर्षा के दौरान ही दिखाई देते हैं।
C.
यीस्ट मृतजीवी पोषण की विधि दर्शाती है।
D.
ये पौधे अपना भोजन स्वयं संश्लेषित नहीं कर सकते हैं।
इनमें हरा रंग नहीं होता है। ये मृत और सादे हुए कार्बनिक पदार्थों से पोषण प्राप्त करते हैं।
A.
क्लोरोफिल
B.
एंथोसाइनिन
C.
जीवद्रव्य
D.
हरितलवक
पत्तियों में हरे रंग का वर्णक होता है जिसे क्लोरोफिल कहते हैं। ये सूर्य के प्रकाश की ऊर्जा का संग्रहण करने में पत्तियों की सहायता करते हैं। ये ऊर्जा जल और कार्बन डाइऑक्साइड की सहायता से भोजन का संश्लेषण करती है।
A.
पत्तियाँ और जड़
B.
तना और जड़
C.
पत्तियाँ और तना
D.
जड़े
पत्तियों के अलावा, पौधे के अन्य भागों जैसे हरा तना और हरी शाखाओं में भी प्रकाश संश्लेषण की प्रक्रिया होती है। रेगिस्तानी पौधों में शल्क के समान या काटों के समान पत्तियाँ होती हैं जो वाष्पोत्सर्जन से होने वाली जल की हानि को रोकती है। इन पौधों में हरा तना होता है जो प्रकाश संश्लेषण की प्रक्रिया का कार्य करता है।
A.
हरे पौधों स्वपोषक हैं।
B.
प्रकाश संश्लेषण अधिकतर हरी पत्तियों में होता है जिसमें हरितलवक में हरे रंग का वर्णक क्लोरोफिल पाया जाता है।
C.
अहरित पौधे और जन्तु विषमपोषी होते हैं।
D.
प्रकाश संश्लेषण गहरे लाल, बैंगनी या भूरे रंग के पत्तों में जगह नहीं लेता है।
हरी पत्तियों के अलावा भी अन्य पत्तियों में क्लोरोफिल पाया जाता है। लाल, भूरे और अन्य वर्णक की एक बड़ी मात्रा हरा रंग बनाती है। इसलिए, प्रकाश संश्लेषण इन पत्तियों में भी होता है।
A.
शैवाल भागीदार
B.
कवक भागीदार
C.
शैवाल और कवक भागीदार
D.
बैक्टीरियल भागीदार
लाइकेन में कवक और नीली हरी शैवाल के बीच सहजीवी संबंध होता है। कवक भागीदार खनिज पदार्थों को अवशोषित करता है और शैवाल भागीदार भोजन बनाता है और प्रकाश संश्लेषण की प्रक्रिया करता है।
A.
राइज़ोबियम वातावरणीय नाइट्रोजन को लेते हैं और घुलित रूप में परिवर्तित कर देता है।
B.
हालांकि नाइट्रोजन गैस हवा में प्रचुर मात्रा में उपलब्ध है, पौधे कार्बन डाइऑक्साइड को जिस तरह उपयोग में ले सकते हैं उस तरह नाइट्रोजन को नहीं ले पाते हैं।
C.
पौधों को नाइट्रोजन घुलित रूप में चाहिए।
D.
राइज़ोबियम वातावरणीय नाइट्रोजन से पोषण प्राप्त करता है।
राइज़ोबियम वातावरणीय नाइट्रोजन से भोजन प्राप्त नहीं करता है। यह अपना भोजन स्वयं बनाता है। इसलिए ये मूँग दाल, मटर, चना और अन्य फलियों की जड़ों में रहते हैं और उन्हें नाइट्रोजन प्रदान करवाते हैं। इसके बदले में, पौधे बैक्टीरिया को रहने का स्थान और भोजन प्रदान करते हैं।
A.
यीस्ट
B.
गाय
C.
घास
D.
पैरामिशियम
उत्पादक अपना भोजन स्वयं बना सकते हैं। घास स्वयं का भोजन स्वयं बना सकती है। इनमें प्रकाश संश्लेषण के लिए सूर्य के प्रकाश की ऊर्जा को संचित करने के लिए क्लोरोफिल होता है। अन्य जीव अपना भोजन स्वयं तैयार नहीं कर सकते हैं क्योंकि उनमें क्लोरोफिल नहीं होता है।
A.
मशरूम और यीस्ट एक प्रकार के प्रकाश संश्लेषी कवक हैं।
B.
कवक में क्लोरोफिल होता है।
C.
कुछ कवक दवाइयों में प्रयोग किए जाते हैं।
D.
कवक अपना भोजन स्वयं बना सकते हैं।
मशरूम एक कवक है जो हमारे भोजन में सब्जी की तरह उपयोग होता है। कुछ कवक मनुष्यों के लिए दवाइयों के रूप में उपयोगी होते हैं। कवक में क्लोरोफिल नहीं होता है। इसलिए ये स्वयं का भोजन नहीं बना सकते हैं।
A.
प्राकृतिक प्रक्रिया
B.
रासायनिक प्रक्रिया
C.
मानव निर्मित प्रक्रिया
D.
भौतिक प्रक्रिया
प्रक्ष संश्लेषण वह प्रक्रिया है जो सूर्य के प्रकाश और क्लोरोफिल की उपस्थिति मेन कार्बन डाइऑक्साइड और जल की सहायता से हरे पौधे भोजन का निर्माण करते हैं।
| I. पोषण |
A. जीव जो अपना भोजन मृत और सड़े हुए पौधों और जंतुओं से प्राप्त करता है। |
| II. परजीवी | B. दो भिन्न जीवों का संबंध जिसमें दोनों का लाभ होता है। |
| III. मृतजीवी | C. प्रक्रम जिससे भोजन प्राप्त और उसका उपयोग होता है। |
| IV. सहजीवी संबंध | D. जीव जो अपना भोजन अन्य जीव के शरीर से प्राप्त करता है। |
A.
I-B, II-C, III-D, IV-A
B.
I-C, II-D, III-A, IV-B
C.
I-D, II-A, III-B, IV-C
D.
I-A, II-B, III-C, IV-D
पोषण वह प्रक्रम है जिससे भोजन प्राप्त और उसका उपयोग होता है। परजीवी वह जीव हैं जो अपना भोजन अन्य जीव के शरीर से प्राप्त करता है। मृतजीवी वह जीव है जो अपना भोजन मृत और सड़े हुए पौधों और जंतुओं से प्राप्त करता है। सहजीवी संबंध दो भिन्न जीवों का संबंध है जिसमें दोनों को लाभ मिलता है।
द्वार कोशिका ।
कीटभक्षी पादप ।
राइज़ोबियम ।
प्रकाश संश्लेषण ।
कवक अपना पोषण मृत एवं अपघटित जैव पदार्थों से प्राप्त करते हैं, इन्हें मृतजीवी कहते हैं।
A.
डेंटिन
B.
इनेमल
C.
दंत गुहा
D.
मसूडे
सभी दाँत इनेमल से आवरित होते हैं जो शरीर का सबसे कठोर पदार्थ है। इसके नीचे डेंटिन होता है जो इनेमल से थोड़ा कोमल है।
A.
मृत और सड़े हुए जीवों को खाते हैं।
B.
अन्य जीवों के जीवित ऊतकों से पोषण प्राप्त करते हैं।
C.
भोजन के लिए अन्य स्रोत पर निर्भर रहते हैं।
D.
अपना भोजन स्वयं बनाते हैं।
पोषण के सामान्य रूप से दो प्रकार होते हैं- स्वयंपोशी और विषमपोषी। हरे पौधे सरल कच्ची सामाग्री से अपना भोजन बनाते हैं जिसे स्वयंपोषी कहते हैं। अन्य जीव विषमपोषी इसलिए कहते हैं क्योंकि ये अन्य स्रोतों पर भोजन के लिए निर्भर रहते हैं।
A.
जल
B.
पचा हुआ भोजन
C.
अपचित भोजन
D.
सेलूलोज़
अपचित भोजन क्षुद्रांत्र में रहता है जो उसके बाद बृहद्रांत्र में स्थानांतरित होता है। जल की कुछ मात्रा बृहद्रांत्र में अवशोषित होती है। शेष अर्द्ध ठोस अपशिष्ट (मल) गुदा के माध्यम से बाहर निकाल दिया जाता है।
A.
दाँत
B.
जन्तु
C.
पौधे
D.
पेशियाँ
रदनक दाँत हैं जो फाड़ने में उपयोगी होते हैं।
A.
मांसाहारियों में रदनक अच्छे से विकसित होते हैं।
B.
शाखाहारियों में रदनक अच्छे से विकसित होते हैं।
C.
मांसाहारियों में रदनक अच्छे से विकसित नहीं होते हैं।
D.
मांसाहारियों में चर्वणक अच्छे से विकसित होते हैं।
रदनक जीवित शरीर के मांस को फाड़ने में उपयोगी होते हैं इसलिए मांसाहारियों में रदनक अच्छे से विकसित होते हैं।
रोमन्थी या रुमिनैन्ट ।