A.
वर्षण
B.
तापमान
C.
प्रकाश
D.
आर्द्रता
मौसम सीधे वर्षा, तापमान और आर्द्रता से संबंधित है क्योंकि इसे एक स्थान विशेष की दिन-प्रतिदिन वातावरणीय के रूप में परिभाषित किया जाता है।
A.
दाढ़ी वाला बंदर
B.
उछल्ने वाला बंदर
C.
रेंगने वाला बंदर
D.
लाल आँख वाला बंदर
यह एक दाढ़ी होती है जो इसकी पेड़ों की छाल के नीचे कीड़ों की तलाश में सहायता करती है।
A.
गंध का तीव्र ज्ञान रखती है
B.
भोजन को चबाने में
C.
सुनने का विशिष्ट ज्ञान
D.
चलने के दौरान सहारा प्रदान करता है
एक हाथी की ट्रंक, नाक का एक अनुकूलन है, जो गंध का तीव्र ज्ञान करने में सहायता करती है। यह भी भोजन को ऊपर उठाने और भोजन के लिए प्रतिस्पर्धा से निपटने में सहायता करती है।
A.
ये विभिन्न प्रकार का भोजन करते हैं
B.
ये अत्यधिक पानी पीते हैं
C.
ये केवल दूसरे जंतुओं को खाते हैं
D.
ये केवल पादपों को खाते हैं
उष्णकटिबंधीय वर्षावनों के जन्तुओं का अनुकुलन, इनमें भोजन और आश्रय के लिए प्रतियोगिता से बचने के लिए विभिन्न प्रकार का भोजन करने में सक्षम होना है।
A.
केवल पक्षियों द्वारा
B.
केवल स्तनधारियों द्वार
C.
पक्षियों, कीटों और अनेक प्रकार की मछलियों के द्वारा
D.
सभी पक्षियों और जंतुओं द्वारा
जानवरों की विभिन्न प्रजातियां अपने अस्तित्व को सुनिश्चित करने के लिए प्रतिकूल से अनुकूल क्षेत्रों के लिए पलायन कर एक व्यवहार अनुकूलन दर्शाती हैं।
A.
इनके पंजे चौड़े और बड़े होते हैं
B.
इनमें तैराकी के लिए फिन्स होते हैं
C.
इनमें गैलस होते हैं
D.
इनके पैर जालीदार होते हैं
ध्रुवीय भालू अच्छे तैराक हैं क्योंकि इनके पंजे चौड़े और बड़े होते हैं। इनमें काफी देर तक नासाछिद्रों को बंद रखने और लंबे समय तक पानी के नीचे रहने की क्षमता होती हैं।
A.
फर के आवरण के द्वारा
B.
त्वचा के नीचे स्थित वसा के द्वारा
C.
शरीर में गति के द्वारा
D.
तैरकर
वसा की परत एक कुचालक के रूप में कार्य करती है इसलिए, बेहद ठंड की स्थिति में सुरक्षा प्रदान करती है। वसा भी सर्दियों के मुश्किल मौसम के लिए ऊर्जा भी संग्रहित रखती है।
A.
गरम और शुष्क
B.
मध्यम और आर्द्र
C.
ठंडी और शुष्क
D.
ठंडी और आर्द्र
तटीय क्षेत्रों में जलवायु मध्यम गर्म और वर्ष की एक अवधि के लिए गीली रहती है। यह ऊष्मा और नमी की वजह से आर्द्र हो जाती है।
A.
रेगिस्तान में बहुत कम वर्षा होती है
B.
रेगिस्तान में हवाएं बहुत तेजी से बहती है
C.
तापमान एक साल में अनेक बार बदलता है।
D.
दिन रात की तुलना में बड़े होते हैं
विशेष रूप से रेगिस्तानी जलवायु गर्म और शुष्क है क्योंकि यहाँ वर्षा बहुत कम होती है और सर्दियाँ केवल कुछ महीनों के लिए ही होती है। तापमान वर्ष के अधिकांश भाग के दौरान बहुत अधिक होता है।
A.
एक वर्ष
B.
दो से तीन वर्ष
C.
एक लंबी अवधि जैसे 25 वर्ष
D.
एक शताब्दी
जलवायु किसी स्थान के लगभग 25 वर्ष की अवधि के दौरान औसतन मौसमी प्रारूप है।
A.
सूर्य के आकार में परवर्तन
B.
सौर ऊर्जा पृथ्वी की सतह महासागरों और वातावरण से परावर्तित होती है
C.
सूर्योदय और सूर्यास्त की दिशा
D.
सौर ऊर्जा जो पृथ्वी तक नहीं पहुँच पाती
अलग-अलग स्थानों पर सौर ऊर्जा की भिन्न मात्रा अवशोषित होती है; इसलिए, तापमान भी भिन्न होता है। यह वायु दाब में भिन्नता केआर देता है। जिससे तेज हवाओं का प्रवाह उत्पन्न होता है जो मौसम में परिवर्तन कर देता है।
A.
भोर के समय
B.
दोपहर में
C.
शाम के समय
D.
रात्री में
दिन का अधिकतम तापमान सामान्यतः दोपहर में होता है। यह 3:00 बजे के आसपास होता है।
A.
मैनोमीटर
B.
बैरोमीटर
C.
थर्मोमीटर
D.
अधिकतम और न्यूनतम थर्मोमीटर
अधिकतम और न्यूनतम तापमान को रिकॉर्ड करने के लिए काम में लिया जाने वाला उपकरण अधिकतम और न्यूनतम थर्मामीटर कहलाता है। यह एक स्थान पर तापमान की चरम दशाओं को मापने में प्रयुक्त होता है; जैसे की , मौसम विज्ञान और कृषिविज्ञान में किया जाता है।
A.
नापना गिलास
B.
वर्षामापी
C.
जलमापी
D.
आर्द्रतामापी
वर्षा, वर्षामापी नामक उपकरण द्वारा मापा जाता है। यह एक निर्धारित अवधि में तरल वर्षण की मात्रा को मापने के लिए प्रयोग किया जाता है।
A.
मौसम के तत्व
B.
मौसम के कारक
C.
मौसम के घटक
D.
मौसम दशाएँ
मौसम के लिए उत्तरदायी कारक मौसम के तत्व कहलाती है। इनमें तापमान, हवा, आर्द्रता, आदि शामिल हैं।
A.
हवा, आर्द्रता, वर्षा और तापमान।
B.
सूरज, दिन की लंबाई, नमी और गर्मी।
C.
वर्षा, तापमान, धूप और हवा।
D. धूप, चांदनी, हवा और तापमान।
मौसम किसी स्थान के दिन-प्रतिदिन के तापमान, आर्द्रता, वर्षा, और हवा की गति की वातावरणीय दशाओं में होने वाले परिवर्तन हैं।
A.
लाल नेत्र वाले मेंढक
B.
हाथी
C.
पैंगविन
D.
ध्रुवीय भालू
लाल आंखों वाले वृक्षीय मेंढ़कों की आँखें चमकदार लाल होती हैं। लाल आंखों वाले मेंढ़क पेड़ पर रहने के लिए अनुकूलित होते हैं। इनके पैरों में स्थित चिपचिपी गद्दियाँ उनकी पेड़ों पर रहने में मदद करने के लिए विकसित हुई हैं।
A.
यहाँ वर्षा दुर्लभ है
B.
वे भूमध्य रेखा के पास हैं।
C.
साल भर दिन की लंबाई रातों की तुलना में अधिक होती है
D.
इन क्षेत्रों में सूरज जल्दी ही उगता है।
उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों मेंसामान्यतः जलवायु गर्म होती है, क्योंकि वे भूमध्य रेखा के पास होते हैं; इसलिए, सूर्य की किरणें सीधी पड़ती हैं।
अग्रपादों का पंखों में रूपान्तरण
पेंगुइन प्राय: गर्म रहने के लिए एक साथ सटकर रहते हैं और ऐसी घुमावदार स्थिति सुनिश्चित करते हैं कि प्रत्येक पेंगुइन अपने हीट पैक के केंद्र से मुड़ा हो।
ध्रुवीय और उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में
नहीं, वर्ष के दौरान सूर्योदय और सूर्यास्त के समयों में परिवर्तन होते हैं ।
भारत, मलेशिया, इंडोनेशिया, ब्राज़ील, कांगो गणराज्य, केन्या, युगांडा और नाइजीरिया।
सरकार के मौसम विभाग द्वारा मौसम रिपोर्ट तैयार जाती है। यह विभाग तापमान, हवा आदि के डेटा एकत्र करता है और मौसम की भविष्यवाणी करता है।
मौसम तापमान, आर्द्रता, वर्षा, वायु की गति आदि के संबंध में वातावरण की स्थिति को दर्शाता है।
प्रवासन
यह वायु में नमी की उपस्थिति है।
हाथी के बड़े कान उनकी मृदु ध्वनियों को सुनने में सहायता करते हैं। यह हाथी की वर्षावनों के गर्म और आर्द्र जलवायु में ठण्डा रखने में सहायता करते हैं।
साही अपने शरीर को काँटों से आवरित किये रहती है, स्वयं को बचाने के लिए अपने को गेंद के समान रोल कर लेता है और शिकारी को एक पत्थर या चुभने वाली गेंद के समान भ्रम देता है।
बिलकारी जंतुओं कि सिर नुकीले और खोदने और बिल बनाने के लिए थूथन होती है।
यह शत्रुओं से स्वयं की रक्षा के लिए अपने आपको अपने चारों के पर्यावरण में मिश्रित करने की क्षमता है।
बंदर और लीमर वृक्षाश्रयी जंतु हैं।
विशेषताऐं जो एक जीव को विशेष पर्यावरण में जीवनयापन के सक्षम बनाती हैं, अनुकूलन कहलाती हैं।
ध्रुवीय भालू के सफेद फर होते हैं ताकि वे हिमाच्छन्न सफेद पृष्ठभूमि में, आसानी से दृश्यमान न हो पायें, यह उन्हें अपने परभक्षीयों से बचने में सहायता करता है। यह उसकी शिकार पकड़ने में भी सहायता करता है। ध्रुवीय भालूओं में अत्यधिक ठंड से रक्षा करने के लिए में वसा की मोटी परत होती है।
मौसम की विपरीत एवं चरम शीट दशाओं से बचने के लिए जंतुओं और पक्षियों की अनेक प्रजातियों द्वारा नियमित अंतराल पर मौसमी यात्रा की जाती है जो प्रवासन कहलाती है। अनेक जंतु, पक्षी और मछलियाँ सर्दियों में गर्म क्षेत्रों की ओर प्रवासित होते हैं, और सर्दियाँ समाप्त होने पर वापस लौट आते हैं। प्रवासन वार्षिक मौसम से चिन्ह्ति होता है। उदाहरण- साइबेरियन सारस, जो कि साइबेरिया से भारत में राजस्थान के भरतपुर और हरियाणा के सुल्तानपुर में प्रवासित होते हैं।
यह एक निश्चित समयान्तराल में प्रकृति का पृथ्वी की सतह और इसके वातावरण के बीच विभवांतर बनाए रखने का तरीका है । आगे वातावरण (बादलों) से इलेक्ट्रोनों का कुल प्रवाह विद्युत उद्देश्यों के लिए हमेशा ऋणावेशित रखना आवश्यक है।
जब हम पश्चिमी क्षेत्रों की ओर जाते हैं, हम जटिल मरूस्थलीय जलवायु देखते हैं, जो वहाँ वर्ष के अधिकांश भागों के दौरान उच्च तापमान के कारण उपस्थित है। इस क्षेत्र में बहुत कम वर्षा होती है।
� जम्मू और कश्मीर - साधारणतया गर्म और आर्द्र
� केरल - बहुत ही गर्म और आर्द्र
� राजस्थान - जटिल मरूस्थलीय जलवायु
� उत्तरी-पूर्वी भारत - आर्द्र
जलीय जीवों की अनुकूलनी विशेषताएं निम्नानुसार हैं:
a. शरीर धारारेखित और शल्कों से आवरित किया जाता है।
b. एक जोड़ी पंख उपस्थित जो तैरने में और एक पूंछ होती है जो तैराकी के दौरान पानी में संतुलन को बनाए रखने में सहायता करती है।
1. छदमावरण जंतुओं में जन्मजात सुरक्षा है जो परजीवियों को छकाकर उत्त्रजीविता की संभावनाऐं बढा देते हैं।
2. अनेक ऊष्ण कटिबंधीय जंतुओं में संवेदी श्रवण, तीव्र नैत्रज्योति, मोटी त्वचा और त्वचा का रंग जो उनको अपने पर्यावरण के साथ मिश्रित होने में सहायता करता है। यह उनकी परजीवियों से सुरक्षा करने में सहायता करता है। उदाहरण बडी बिल्लियाँ जैसे शेर और चीते में मोटी त्वचा और संवेदी अंग कान पाये जाते हैं।
इसने वर्षावन की परिस्थितियों में अनेक उल्लेखनीय अनुकूलन अपनाये है:-
उष्णकटिबंधीय क्षेत्र की मुख्य विशेषताएं हैं:-
1. उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में सामान्य तौर पर इसकी भूमध्य रेखा के आसपास स्थिति के कारण जलवायु गर्म है।
2. यहां तक कि सबसे ठण्डे महीने में, तापमान 15�C से उच्च होता है और ग्रीष्मकाल में, तापमान 40�C से पार तक गर्म हो सकता है।
3. वर्ष भर दिन और रात लगभग बराबर लम्बाई के होते हैं।
4. इन क्षेत्रों में वर्षा की प्रचूरता होती है।
अनुकूलन एक जीव के प्राकृतिक चयन द्वारा समर्थन की गई विशेषताऐं हैं। अनुकूलन के निम्न प्रकार हैं:-
विशेषताऐं:-
-वर्तमान में ध्रुवीय क्षेत्रों में चरम जलवायु उपस्थित है।
-ये क्षेत्र बर्फ से आवरित होते हैं और ये वर्ष के अधिकांश भागों में बहुत ठंडे होते है।
-छह महीने के लिए सूर्यास्त नहीं होता, जबकि अन्य छह महीनों में सूर्योदय नहीं होता है।
-सर्दियों में, तापमान -370 C तक कम हो सकता है।
हाँ, सूर्य ऊर्जा का प्राथमिक स्रोत है जो मौसम में परिवर्तन का कारण बनता है क्योंकि सूर्य एक बहुत उच्च तापमान पर गर्म गैसों का एक विशाल गोला है। सूर्य से हमारी दूरी बहुत अधिक है। फिर भी, सूर्य द्वारा प्रेषित ऊर्जा इतनी अधिक है कि यह पृथ्वी पर सभी ऊष्मा और प्रकाश का स्रोत है। पृथ्वी की सतह, महासागरों और वायुमण्डल द्वारा अवशोषित और परावर्तित ऊर्जा, किसी भी जगह के मौसम के निर्धारण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। मौसम जगह-जगह पर बदलता है, यह एक रेगिस्तान, तटीय क्षेत्रों के पास या एक पर्वत के पास भिन्न-भिन्न होता है।
1. वर्षावन में जलवायवीय परिस्थितियाँ जंतुओं की विशाल संख्या और विभिन्न प्रकारों को समर्थन देती हैं। उष्णकटिबंधीय वर्षावन भूमध्य रेखा के पास स्थित होते हैं। इन क्षेत्रों में वर्ष भर नियमित रूप वर्षा होती है, एक वर्ष में लगभग 6-33 फुट वर्षा होती है। यह जमाव मुक्तष और वर्ष भर 70 � और 85 � F के बीच तापमान के साथ बहुत कम दैनिक अस्थिरता के साथ गर्म बना रहता है। सतत गर्मी और बारिश के कारण, यह क्षेत्र पौधों और जंतुओं की विस्तृत विविधता का समर्थन करता है। वर्षावनों में रहने वाले जंतुओं के प्रमुख प्रकारों में बंदर, वानर, गोरिल्ला, शेर, बाघ, हाथी, तेंदुए, छिपकली, साँप, पक्षी और कीड़े आदि हैं। उष्णकटिबंधीय वर्षावन भारत में पश्चिमी घाट और असम, दक्षिण पूर्व एशिया, मध्य अमेरिका और मध्य अफ्रीका में पाए जाते हैं।
2. भोजन और आश्रय के लिए प्रतियोगिता पर काबू पाने के लिए, कुछ जंतु भोजन जो कि आसानी से नहीं मिलता है को पाने के लिए अनुकूलित हो जाते हैं। उदाहरण, लाल नैत्र मेंढक ने, पेड़ जिस पर वह रहता है, पर चढ़ने में सहायता करने के लिए अपने पैरों पर चिपचिपी पैड विकसित कर ली है। एक अन्य उदाहरण टोकान बर्ड, जो एक लंबी, बड़ी चोंच रखती है। यह टोकान को उन शाखाओं पर जो कि इतनी कमजोर हैं कि उसका वजन सहन करने में सक्षम नहीं है, पर फलों तक पहुँचने में करती है।
i. उष्णकटिबंधीय वर्षावन कर्करेखा और मकर रेखा के बीच में, या भूमध्य रेखा के 1400 मील उत्तर और दक्षिण के बीच स्थित होते हैं। इन क्षेत्रों में वर्ष भर नियमित रूप वर्षा होती है, एक वर्ष में लगभग 6-33 फुट वर्षा होती है। यह जमाव मुक्त और वर्ष भर 70 � और 85 � F के बीच तापमान व बहुत कम दैनिक अस्थिरता के साथ गर्म बना रहता है। सतत गर्मी और बारिश के कारण, यह क्षेत्र पौधों और जंतुओं की विस्तृत विविधता का समर्थन करता है। उष्णकटिबंधीय वर्षावन भारत में पश्चिमी घाट और असम, दक्षिण पूर्व एशिया, मध्य अमेरिका और मध्य अफ्रीका में पाए जाते हैं। सतत गर्मी और बारिश के कारण, यह क्षेत्र पौधों और जंतुओं की विस्तृत विविधता का समर्थन करता है।
ii. वर्षावनों में रहने वाले जंतुओं के प्रमुख प्रकारों में बंदर, वानर, गोरिल्ला, शेर, बाघ, हाथी, तेंदुए, छिपकली, साँप, पक्षी और कीड़े आदि हैं। वर्षावन में जलवायवीय परिस्थितियाँ जंतुओं की विशाल संख्या और विभिन्न प्रकारों को समर्थन देती हैं। भोजन और आश्रय के लिए प्रतियोगिता पर काबू पाने के लिए, कुछ जंतु भोजन, जो कि आसानी से नहीं मिलता है को पाने के लिए अनुकूलित हो जाते हैं।
ध्रुवीय भालू की विशेषताएँ-
1. ध्रुवीय भालू के सफेद फर होते हैं ताकि वे हिमाच्छन्न सफेद पृष्ठभूमि में, आसानी से दृश्यमान न हो पायें, यह उन्हें अपने परभक्षीयों से बचने में सहायता करता है। यह उसकी शिकार पकड़ने में भी सहायता करता है।
2. ध्रुवीय भालूओं में अत्यधिक ठंड से रक्षा करने के लिए वसा की दो मोटी परतें होती है।
3. ये त्वचा के नीचे वसा की परत रखते हैं।
4. ध्रुवीय भालू गर्मी के दिनों में शरीर को आवश्यक रूप से ठंडा करने के लिए शारीरिक गतिविधियों के लिए तैराकी करते हैं।
5. इसके पंजे चौड़े और बड़े होते हैं जो इसे अच्छी तरह तैरने के लिए ही नहीं अपितु बर्फ में आसानी से चलने में सहायता करते हैं।
6. ध्रुवीय भालू लंबे अन्तराल के लिए पानी के नीचे रह सकते हैं।
7. इनकी गंध क्षमता मजबूत होती है जो इन्हें भोजन के लिए अपने शिकार को पकड़ने के सक्षम बनाती है।
A.
B-संस्तर
B.
शीर्षमृदा
C.
आधार शैल
D.
C- संस्तर
शीर्षमृदा या A-संस्तर वह परत है जिसमें अधिक मात्रा में पोषक तत्व शामिल होते हैं। यह वो परत है जिसमें कई चूहे रहते हैं और छोटे पौधों की जड़े शीर्षमृदा तक ही पहुँच पाती हैं।
A.
मृत्तिका
B.
ह्यूमस
C.
बालू
D.
बजरी
मृदा की सबसे ऊपरी परत में मृत और सड़े हुए पदार्थों के साथ ह्यूमस होता है और ये सबसे अधिक उपजाऊ परत भी है।
A.
दालों
B.
चावल
C.
मक्का
D.
गेहूं
चावल मृण्मय मृदा जो कार्बनिक पदार्थों में प्रचुर है उसमें विकसित होते हैं। इसके साथ इसमें जल को पकड़े रखने की क्षमता भी होनी चाहिए। इसका मतलब यह है की ये चावल के लिए सबसे अच्छी मृदा है क्योंकि इसमें जल की अधिक मात्रा को पकड़े रखने की क्षमता अधिक है।
A.
दुमटी
B.
बलुई
C.
गाद
D.
मृत्तिका
गाद वह मृदा है जो नदियों के किनारों पर अवसादित होते हैं। ये पहाड़ों की चट्टानों के टूटने से बनती है और नदियों में बह जाती है। ये सबसे अधिक उपजाऊ मृदा है और पादपों के लिए सबसे अच्छी मृदा है क्योंकि इसके कण जल को पकड़ने के लिए न तो अधिक बड़े हैं न ही अधिक छोटे हैं।
A.
दुमटी
B.
मृत्तिका
C.
बालू
D.
गाद
मृण्मय मृदा छोटे कणों की बनी होती है जो एक साथ बंधे होते हैं और इसमें जल को पकड़े रखने की क्षमता अधिक होती है। इसलिए ये मृदा भारी होती है क्योंकि इसमें जल की मात्रा अधिक होती है।
A.
एक मिनट में 5-10 बार
B.
एक मिनट में 10-13 बार
C.
एक मिनट में 15-18 बार
D.
एक मिनट में 22-25 बार
आराम की अवस्था में एक वयस्क मानव एक मिनट में 15-18 बार साँस लेता है। वे लगातार संवेदी प्रभाव की अवस्था में रहते हैं।
A.
परमाणु
B.
अणु
C.
इलेक्ट्रॉन
D.
कोशिका
एक कोशिका एक जीव की छोटी से छोटी संरचनात्मक और कार्यात्मक इकाई है। सभी जीव छोटी सूक्ष्म इकाई के बने हैं जिन्हें कोशिका कहते हैं।
A.
त्वचा
B.
गिल्स
C.
फेफड़े
D.
वायु मार्ग
जन्तु जैसे गाय, बाघ, कुत्ता आदि में श्वसनी अंग और श्वसन की प्रक्रिया मानव के समान होती हैं। इनमें मानव के समान इनकी छाती में एक जोड़ी फेफड़े हैं और मानव के समान ही साँस लेते हैं।
A.
डायाफ़्राम ऊपर की ओर उठता है।
B.
पसलियाँ समान रहती हैं।
C.
पसलियाँ अंदर की ओर जाती हैं।
D.
पसलियाँ बाहर की ओर जाती हैं।
अंतःश्वसन के दौरान, अंतःश्वसित वायु फेफड़ों में स्थान बना लेती हैं जिसके कारण पसलियाँ बाहर की ओर उठती हैं और डायाफ़्राम अंदर की ओर जाता है।
A.
अंतःश्वसन
B.
साँस लेना
C.
श्वसन
D.
छिकना
छिकना वह प्रक्रम है जिसके द्वारा बाह्य कणों को अंतःश्वसित वायु से बाहर निष्कासित करते हैं और धूल के कणों से मुक्त वायु हमारे शरीर में प्रवेश करती है।
मेंढ़क फेफड़ों और त्वचा द्वारा श्वसन करते हैं।
अंत:श्वसन और उच्छवसन
श्वसन
मछली।
त्वचा और श्वसन नली।
ये श्वसन की दर को बढ़ाती है।
एक श्वास का अर्थ एक अंत:श्वसन के साथ एक उच्छवसन है।
एक व्यक्ति एक मिनट में जितनी बार श्वसन करता है, वह श्वसन दर कहलाती है।
मांसपेशियों में लैक्टिक अम्ल के संचय के कारण ऐंठन हो जाता है ।
जीवों की कोशिकाओं में कोशिकीय श्वसन होता है।
लैक्टिक अम्ल।
जब भोजन ऑक्सीजन के उपयोग के बिना विखण्डित होता है, तो यह अवायवीय श्वसन कहलाता है।
जब ग्लूकोज अणु का ऑक्सीजन की सहायता से विखण्डन होता है तो यह वायवीय श्वसन कहलाता है।
कोशिका में ऊर्जा की मुक्ति के साथ भोजन के विखण्डन का प्रक्रम कोशिकीय श्वसन कहलाता है।
एल्कोहोल, कार्बन डाइऑक्साइड और ऊर्जा ।
पौधे वाष्पोत्सर्जन द्वारा पर्यावरण के लिए अत्यधिक जल मुक्त करते हैं और वे जल चक्र के लिए भी उत्तरदायी हैं। वनों की कटाई में वृद्धि के साथ, पौधों के माध्यम से जल के वाष्पीकरण में कमी आती है जो जलचक्र को प्रभावित करती है, जिसके परिणामस्वरूप वर्षा कम होती है।
मृदा की ऊपरी उपजाऊ परत का बहकर दूर जाना मृदा अपरदन कहलाता है। वर्षा के दौरान जंगल कैनोपी की सबसे ऊपरी परत वर्षा की बूंदों के प्रवाह, को शाखाओं और पेड़ों के तनों के माध्यम से नीचे लाती है। यदि वृक्ष न हो तो वर्षा का पानी सीधे मिट्टी पर गिरता है और मृदा क्षरण होता है।
लगातार
मृदा अपरदन
के
निम्नलिखित
प्रभाव हो सकते
हैं:
1. मृदा
की उपजाऊ परत के
बहने से खाद्य
उत्पादन
में कमी व
अकाल का
माहौल हो जायेगा।
2. नदियों
में वर्षा से
लाई मृदा के
जमने से छिछली
हो रही हैं
जिसके कारण
बाढ की
संभावनाऐं बढ़ जाती हैं।
3. मनुष्य
के साथ
जीवजंतुओं
के आवास व
आश्रय पर
खतरे से उनके
अस्तित्व
पर भी संकट आ
जायेगा।
4. जल में लवणों के असंतुलन से जलीय जीवों के पारिस्थितिक तंत्र पर प्रभाव पड़ेगा।
5. महासागरों का जल स्तर बढ़ जायेगा।
वन एक तंत्र है जो विभिन्न पौधों, जंतुओं और सूक्ष्मजीवों का बना होता है। आश्रय और भोजन प्रदान कर वन शाकाहारियों के लिए भोजन और आवास के अनेक अवसर प्रदान करते हैं। शाकाहारियों की बड़ी संख्या के लिए मांसाहारियों के लिए भोजन की बहुतायता को इंगित करते हैं। जंतुओं की विभिन्न किस्में वनों को पुनरूद्भवित और विकसित होने में सहायता करती हैं। अपघटक वन में बढ़ रहे पोषक तत्वों की आपूर्ति को बनाये रखने में सहायता करते हैं। इसलिए, वन एक गतिशील सजीव है जो जीवन और जीवन शक्ति को बनाए रखता है।
विभिन्न परतें संस्तर स्थिति के रूप में निर्दिष्ट की जाती है।
� ऊपरी परत, शीर्षमृदा जो A- संस्तर स्थिति के रूप में भी जानी जाती है सामान्यतया गहरे रंग की तथा उपजाऊ होती है क्योंकि, यह ह्यूमस तथा खनिज पदार्थों से समृद्ध होती है। यह परत आमतौर पर, मृदु, सरंध्र तथा अधिक जल धारण करने वाली होती है। यह शीर्षमृदा कर्मियों, कृंतकों, छछूंदरों तथा भृंगुओं जैसे अनेक जीवों को आवास प्रदान करती हैं। छोटे पादपों की जड़ें पूरी तरह से शीर्षमृदा में ही रहती है।
� अगली परत, मध्य परत जो B- संस्तर स्थिति कहलाती है इसमें ह्यूमस की मात्रा कम होती है लेकिन, खनिज की मात्रा अधिक होती है। यह परत सामान्यतया अधिक कठोर तथा अधिक घनी होती है।
� तीसरी परत C- संस्तर स्थिति के रूप में जानी जाती है जो दरारों और विदरों युक्त शैलों के छोटे ढेलों की बनी होती है। इस परत के नीचे आधार शैल होता है जो कठोर होता है तथा इसे फावड़ें से खोदना कठिन होता है। पानी छोटे रिक्त स्थानों में रुक जाता है।
A.
ऑक्सीज़न युक्त वायु का अंतःश्वसन
B.
कार्बन डाइऑक्साइड युक्त वायु का उच्छ्वसन
C.
एक अतःश्वसन के साथ एक उच्छ्वसन
D.
एक संकुचन के साथ एक शिथिलन
एक अतःश्वसन के साथ एक उच्छ्वसन साँस लेना कहलाता है। साँस लेने का अर्थ है कि ऑक्सीज़न युक्त वायु का अंतःश्वसन और कार्बन डाइऑक्साइड युक्त वायु का उच्छ्वसन।
A.
तने पर रोम की उपस्थिति
B.
पत्तियों पर रोम की उपस्थिति
C.
पत्तियों पर छोटे छिद्रों की उपस्थिति
D.
जड़ों पर छोटे छिद्रों की उपस्थिति
पादपों में श्वसन पत्तियों पर छोटे छिद्रों की उपस्थिति के कारण होता है जिसे रंध्र कहते हैं। रंध्र के माध्यम से ऑक्सीज़न और कार्बन डाइऑक्साइड का विनिमय होता है।
A.
अंतःश्वसन और उच्छ्वसन
B.
संकुचन और शिथिलन
C.
अंतःश्वसन और शिथिलन
D.
संकुचन और उच्छ्वसन
ऑक्सीज़न युक्त वायु को अंदर लेना अंतःश्वसन कहलाता है और कार्बन डाइऑक्साइड युक्त वायु को बाहर निकालना उच्छवसन कहलाता है। साँस लेने में अंतःश्वसन और उच्छ्वसन शामिल हैं।
A.
पसलियाँ
B.
डायाफ़्राम
C.
वायु मार्ग
D.
वायु पाइप
डायाफ़्राम छाती की गुहा का आधार बनाती है। अंतः श्वसन के दौरान डायाफ़्राम फेफड़ों के लिए स्थान बनाने के लिए ऊपर और नीचे जाता है। उच्छ्वसन के दौरान, डायाफ़्राम ऊपर की ओर उठता है जिससे फेफड़ों को संकुचन के लिए जगह मिलती है और फेफड़ों से वायु बाहर निकल जाती है। साँस लेने के लिए डायाफ़्राम का ऊपर और नीचे उठना आवश्यक है।
A.
फेफड़े
B.
वायु-नली
C.
त्वचा
D.
गिल्स
कीट जैसे कॉकरोच में उनके शरीर में वायु नलिकाओं का जाल होता है जिन्हें वायुनली कहते हैं। ये गैसीय विनिमय के लिए इनके मुख्य श्वसनी अंग है। इन नलिकाओं के माध्यम से वायु शरीर ऊतकों में प्रसारित होती हैं और शरीर की सभी कोशिकाओं में पहुँच जाती है। इसी प्रकार कोशिकाओं से कार्बन डाइऑक्साइड इन श्वसनी नलिका से शरीर के छोटे छिद्रों द्वारा बाहर निकल जाती है, इन्हें वायु मार्ग कहते हैं।
A.
वायवीय श्वसन
B.
अवायवीय श्वसन
C.
अंतःश्वसन
D.
उच्छ्वसन
जब ऑक्सीज़न की मात्रा कम होती है और ऊर्जा की आवश्यकता अधिक होती है तो कोशिकाएँ अवायवीय प्रक्रिया से श्वास करती हैं। अवायवीय श्वसन में ग्लुकोज़ पूर्ण रूप से टूट नहीं पता है तो ग्लुकोज़ आंशिक रूप से टूटता है और लैक्टिक अम्ल को उप उत्पाद के रूप में उत्पादित करते है।
A.
कम
B.
अधिक
C.
समान रहती है।
D.
या तो बड़ सकती है या कम हो सकती है।
अत्यधिक मांसपेशियों की गतिविधि में ऊर्जा की उच्च मात्रा की आवश्यकता होती है। ऊर्जा की बढ़ती मांग के साथ श्वसन की दर अधिक हो जाती है।
A.
उनकी छाती में उपस्थित फेफड़ों की एक जोड़ी।
B.
इनमें साँस लेने के लिए गिल्स होते हैं।
C.
ये मुँह से साँस लेती है।
D.
ये साँस लेती ही नहीं है।
इनमें साँस लेने के लिए गिल्स होते हैं। जलीय जन्तु जैसे मछ्ली जल में साँस लेती हैं जिसके लिए इनमें एक विशेष श्वसनी अंग होते हैं जिन्हें गिल्स कहते हैं। गिल्स कंघी के समान त्वचा के प्रक्षेपण होते हैं। गिल्स में गैसीय विनिमय के लिए रक्त वाहिकाएँ होती हैं। ये जल में घुलित ऑक्सीज़न का उपयोग करते हैं और कार्बन डाइऑक्साइड को जल में मुक्त कर देते हैं।
A.
वातावरण
B.
मृदा
C.
जल
D.
तना
पादप की जड़ों में छोटे रोम या अतिवृद्धियाँ होती हैं जिन्हें मूल रोम कहते हैं। ये मूल रोम मृदा में गहराई में उपस्थित होते हैं और मृदा कणों के बीच उपस्थित वायु अवकाशों से वायु को अवशोषित करते हैं।
A.
वायवीय श्वसन
B.
उच्छ्वसन
C.
अंतःश्वसन
D.
अवायवीय श्वसन
कार्बन डाइऑक्साइड वायवीय श्वसन के दौरान उत्पादित अपशिष्ठ या उपउत्पाद है। ये बाहर निकाली जाने वाली वायु के द्वारा निष्कासित होती है जिसे उच्छवसन कहते हैं।
A.
एल्कोहॉल और ऊर्जा
B.
कार्बन डाइऑक्साइड और ऊर्जा
C.
एल्कोहॉल और कार्बन डाइऑक्साइड
D.
ऑक्सीज़न और ऊर्जा
कोशिकीय श्वसन दो प्रकार का होता है वायवीय श्वसन और अवायवीय श्वसन। कोशिकीय श्वसन के दौरान ऑक्सीज़न का उपयोग कार्बन डाइऑक्साइड, जल और ऊर्जा के उत्पादन में किया जाता है।
A.
कॉकरोच
B.
यीस्ट
C.
मछली
D.
केंचुआ
यीस्ट एक कोशिकीय सूक्ष्मजीव है जो अवायुजीव कहलाते हैं। ये जीव ऑक्सीज़न की अनुपस्थित में जीवित रह सकते हैं। इन्हें अवायवीय श्वसन के माध्यम से ऊर्जा मिलती है। ऑक्सीज़न की अनुपस्थिति में, ये ग्लुकोज़ को एल्कोहॉल और कार्बन डाइऑक्साइड में तोड़ देते हैं।
A.
त्वचा
B.
रोम
C.
अस्थि
D.
तरल
वायु विभिन्न गैसों का मिश्रण है और उनमें कई छोटे अवांछित कण उपस्थित होते हैं। जब ऐसे कोई कण साँस द्वारा ले लिए जाते हैं तो वह नासा गुहा में उपस्थित रोम में फस जाते हैं। कभी कभी रोम द्वारा न फसने के बाद ये नासा गुहा के अस्तर पर पहुँच जाते हैं और जलन का कारण बनते हैं।
A.
उच्छवसन
B.
अंतःश्वसन
C.
श्वसन
D.
छिकना
साँस लेना श्वसन का हिस्सा है जिसके दौरान उच्छवसन और अंतःश्वसन द्वारा गैसों का विनिमय होता है।
A.
काष्ठ
B.
रंध्र
C.
जड़
D.
फल
पादपों में श्वसन छोटे छिद्रों द्वारा होता है जिन्हें रंध्र कहते हैं। रंध्र वृक्क के आकार की द्वार कोशिकाओं का बना होता है। रंध्र से ऑक्सीज़न और कार्बन डाइऑक्साइड का विनिमय होता है।
अवशेषी मृदा इसके बनने के स्थान पर घुलनशील तत्वों के घुल जाने के कारण शेष बची मृदा से बनी होती है।
मृदा भिन्न रंगों की हो सकती है, काली मिट्टी या भूरी मिट्टी उनके खनिज तत्वों पर निर्भर करती है। यह गाद के निक्षेपण के कारण सफेद या स्लेटी भी हो सकती हैं।
मृदा चट्टानों के कणों तथा ह्यूमस का मिश्रण होती है। मृदा अपक्षय की प्राकृतिक प्रक्रिया के माध्यम से तैयार होती है। यह हवा, जल आदि की क्रिया द्वारा चट्टानों के टूटने से तैयार होती है।
मृदा परिच्छेदिका।
जल, हवा तथा बर्फ के द्वारा मृदा की ऊपरी सतह का हटना अपरदन के रूप में जाना जाता है।
चट्टानों के कणों तथा ह्यूमस का मिश्रण मृदा कहलाती है।