दुमटी मृदा
मृदा की विभिन्न परतों के माध्यम से गुजरती हुई ऊर्ध्वाधर काट मृदा परिच्छेदिका कहलाती है।
सड़े गले जैव पदार्थों से मिलकर बनी मृदा हयूमस के रूप में जानी जाती है।
मृदा की परतें अपनी बनावट, रंग, गहराई, कण के आकार तथा रासायनिक संरचना के आधार पर एक दूसरे से भिन्न होती है।
मृदा में पोषक तत्व और जल की उपलब्धता मृदा के उपजाऊ होने में सहायता करते है। यदि पोषक तत्व तथा जल अधिक मात्रा में उपस्थित होते है, तो मृदा अति उपजाऊ के रूप में जानी जाती है। मृदा परिच्छेदिका में, A - संस्तर − स्थिति जो शीर्षमृदा के रूप में भी जानी जाती है, पौधों की वृद्धि के लिए सबसे उपयुक्त होती है।
मृदा अपरदन मुख्यत: वर्षा, हवा, बाढ, अतिचारण और वनोन्मूलन के कारण होता है। मृदा अपरदन कम या वानस्पतिक सतह रहित क्षेत्रों में जैसे मरूस्थल या खाली पड़ी भूमि में अत्यधिक भयावह है।
जब मृदा के नमूने को एक परखनली में गर्म करते हैं, यह साधारणतया दर्शाता है कि मृदा में नमी थी, और गर्म करने पर यह नमी या जल जलवाष्प में परिवर्तित हो जाता है, जो कि परखनली के ठण्डे भाग में संघनित हो जाती है और जल की बूँदों के रूप में दिखाई देती है।
वायु, वर्षा, तापमान, प्रकाश तथा आर्द्रता मृदा को प्रभावित करते हैं।
वायु, जल और जलवायु की क्रिया के द्वारा चट्टानों के टूटने की प्रक्रिया को अपक्षय कहते हैं।
मृदा
इनके आधार पर वर्गीकृत
होती है-
• विभिन्न
आकार के कणों का
अनुपात
• मृदा
द्वारा जल की
मात्रा का
अवशोषण
• मृदा
का रंग
बलुई मृदा की कोई तीन विशेषताऐं हैं-
1. इसमें मुख्यत: बालू और कुछ मात्रा रेत की होती है।
2. इसकी जलधारण क्षमता कम होती है।
3. मृदा कणों के बीच वायु अवकाश अधिक होते हैं।
दुमटी मृदा की कोई तीन विशेषताऐं हैं-
1. यह चिकनी मृदा, बालू और गाद की बराबर मात्रा की बनी होती है।
2. यह अत्यधिक जल धारण क्षमता रखती है।
3. यह ह्यूमस प्रचूर होती है।
मृदा संरक्षण की तीन विधियाँ हैं:-
1. वृक्षारोपण
2. पहाड़ी ढलानों में सीढीनुमा कृषि
3. शुष्क मृदा नियमित कृषि पर अपरदन के लिए संवेदी होती है।
अंत:श्वसन
में ली गई
वायु − 21% ऑक्सीजन
और 0.04% कार्बन
डाई ऑक्साइड
उच्छवसन में
छोडी गई वायु − 16.4% ऑक्सीजन
और 4.4% कार्बन
डाईऑक्साइड
ऊर्जा को मुक्त करने के लिए कोशिकाओं में भोजन के टूटने की प्रक्रिया को कोशिकीय श्वसन कहते हैं।
कोशिकीय श्वसन सभी जीवों की कोशिका में होता है।

शरीर के अंदर ऑक्सीजन प्रचुर वायु लेना अंत:श्वसन और कार्बन डाइऑक्साइड प्रचुर वायु बाहर छोड़ना उच्छवसन कहलाता है।
ऑक्सीजन के अभाव में रहने वाले सजीव अवायवीय कहलाते हैं। ऑक्सीजन के अभाव में ग्लूकोज एल्कोहोल और कार्बन डाइऑक्साइड में विखण्डित हो जाता है।
यीस्ट।
यह अवायवीय श्वसन करता है और शर्करा के विलयन से एल्कोहोल उत्पन्न करता है। यही कारण है कि इसे शराब और बीयर बनाने में उपयोग किया जाता है।
a) हमारे घरों में खिडकियाँ और रोशनदान होने चाहिए जिससे कि ताजी वायु कमरे में प्रवेश कर सके।
b) कण्ठद्वार निगलते समय श्वसन नली को बंद कर देता है।
c) कूपिकाऐं
गिल्स, त्वचा की अतिवृद्धियाँ हैं। मछलियाँ गिल्स की सहायता से साँस लेती हैं। निगला हुआ दबावयुक्त पानी मुंह से सिर के एक ओर एक गिल प्रकोष्ठ में बहता है। जैसे ही पानी गिल्स के पार बहता है, उनके भीतर स्थित ऑक्सीजन रक्त में विसरित हो जाती है। इसके साथ ही, मछली के रक्त प्रवाह से कार्बन डाइऑक्साइड पानी में विसरित हो जाती है और शरीर से बाहर निकाल दी जाती है।
केंचुआ अपनी नम और श्लेष्मी त्वचा के माध्यम से श्वसन करता है। गैसें इसमें से गुजर सकती हैं। जबकि मेंढ़क में फेफड़ों की एक जोड़ी होती है जो मनुष्यों के समान गैसीय विनिमय का एक महत्वपूर्ण अंग हैं । ये भी अपनी नम और श्लेष्मी त्वचा के माध्यम से श्वसन कर सकते हैं।
जब हम श्वास में, धुआँ, धूल, परागकण जैसे विभिन्न अवांछित कणों को ले लेते हैं, हमारी नासिका गुहा में उपस्थित रोम में ये फंस जाते हैं। कभी-कभी ये कण रोम से गुजरकर नासिका गुहा में चले जाते हैं। तब वे गुहा कि भित्ति में जलन करते हैं जिसके कारण हमें छींक आती है।
भारी व्यायाम के दौरान हमारे शरीर को अधिक ऊर्जा की मात्रा की आवश्यकता होती है लेकिन इस ऊर्जा का उत्पादन करने के लिए आवश्यक ऑक्सीजन की आपूर्ति सीमित है। इस कारण हमारी मांसपेशियों की कोशिकाऐं ऊर्जा की मांग की आपूर्ति के लिए अवायवीय रूप से श्वसन करती हैं।
साँस लेने के दौरान हम ऑक्सीजन से प्रचुर वायु को अंदर लेते हैं और कार्बन डाइऑक्साइड से समृद्ध को बाहर छोड़ते हैं। वायु जो लेते हैं, शरीर के सभी भागों को और अंततः प्रत्येक कोशिका को परिवहित हो जाती है।
i) लैक्टिक
अम्ल
ii) फेफड़े
iii) वायु
कोष या
कूपिकाऐं
iv) श्वसन
नली
v) मुखीय
श्वसन
a) श्वसनिकाऐं
b) हिचकी
c) अंत:श्वसन
d) गिल तंतु
e) डायाफ़्राम
- दूसरे कीटों की तरह एक कॉकरोच के शरीर के एक ओर छोटा छिद्र होता है जो स्पाइरेकल कहलाता है।
- कॉकरोच में गैस विनिमय के लिए वायु नलियों का नेटवर्क होता है, जो श्वसन नली कहलाती हैं।
- ऑक्सीजन प्रचुर वायु स्पाइरेकल द्वारा श्वसन नली में प्रवेश करती है, शरीर के ऊतकों में विसरित हो जाती है और शरीर की प्रत्येक कोशिका तक पहुँचती है।
- इसी तरह, कोशिकाओं से कार्बन डाइऑक्साइड श्वसन नली में जाती है और स्पाइरेकल्स के द्वारा बाहर निकाली जाती है।
-ये वायु नलियाँ या श्वसन नली केवल कीटों में पायी जाती हैं और जंतुओं के दूसरे समूह में नहीं पायी जाती हैं।
A.
शिराओं में
B.
धमनियों में
C.
केशिकाओं में
D.
WBC में
धमनियाँ ऑक्सीजनित रक्त हृदय से शरीर के दूसरे भागों को ले जाती हैं। धमनियों में रक्त का प्रवाह तेज और उच्च दाब के साथ होता है ।
A.
एरिथ्रोसाईट
B.
ल्यूकोसाईट
C.
थ्रोम्बोसाईट
D.
मोनोसाईट
RBC में लाल वर्णक होता है जो फेफड़ों से शरीर के विभिन्न भागों को ऑक्सीज़न का परिवहन करता है।
A.
आलिंद
B.
निलय
C.
केशिकाएं
D.
मायोकार्डियम
मानव ह्रदय चार प्रकोष्ठों में विभाजित होता है। ऊपरी दो आलिंद और निचले दोनों निलय कहलाते हैं।
A.
लिंफोसाइट
B.
ईओसिनोफिल्स
C.
न्यूट्रोफिल्स
D.
बेसोफिल्स
बेसोफिल्स रसायन हिस्टेमिन स्त्रावित कर एलर्जी और एंटीजन के प्रति अनुक्रिया करती हैं जो सूजन की क्रिया करता है।
A.
मोनोसाइट
B.
ल्यूकोसाइट
C.
हीमोग्लोबिन
D.
मायोग्लोबिन
श्वेत रक्त कोशिकाएं ल्यूकोसाइट भी कहलाती हैं।
A.
मृण्मय मृदा
B.
लाल मृदा
C.
काली मृदा
D.
बलुई मृदा
काली मृदा इसकी बनावट और ढलाई के गुण के कारण मटकी और सुराही आदि बनाने के लिए उपयोग में ली जाती है।
A.
अधिक पौधे लगाने से
B.
पेड़ों को काटने से
C.
वनों को हटाने से
D.
अधिक चराई से
पादपों की जड़े मृदा को पकड़े रखती हैं और उसे बहने से रोकती हैं।
A.
अपक्षय
B.
वनोन्मूलन
C.
अपरदन
D.
रिसाव
पादपों की जड़े मृदा के कणों को कसकर पकड़े रखती हैं। अगर पादप लुप्त हो जाएँगे तो मृदा वायु और जल द्वारा हट जाएगी।
A.
खनिज पदार्थ देती है।
B.
जल देती है।
C.
सूक्ष्मजीवों को मार देती है।
D.
प्रकाश प्रदान करती है।
मृदा में प्लास्टिक की थैलियाँ प्रदूषक के रूप में देखी जाती हैं क्योंकि ये सूक्ष्म जीवों को मार देती है। ये अजैव अपघटनीय है जो अपघटकों द्वारा अपघटित नहीं होती है और सूक्ष्मजीवों को मार देती है जो मृदा के लिए आवश्यक होते हैं।
A.
रंग देता है।
B.
छिद्रों को खोलने में सहायता करता है।
C.
मृदा को कठोर बनाता है।
D.
मृदा के कणों के आकार को परिवर्तित करता है।
जला हुआ घोड़े का गोबर मृदा के छिद्रों को खुलने में सहायता करता है। इसलिए जल मटकी और सुराही से बाहर नहीं आता और जल को अंदर ठंडा रखता है।
A.
खनिज पदार्थ
B.
पोषक तत्व
C.
गाद
D.
मृदा
मृदा चट्टानों और अन्य पदार्थों के छोटे टुकड़ों में टूटने से पृथ्वी की सतह पर बनी थी।
A.
मृण्मय मृदा
B.
दुमटी मृदा
C.
बलुई मृदा
D.
गाद
मृत्तिका के कण बहुत छोटे होते हैं और एक दूसरे से वायु के लिए स्थान छोड़े बिना चिपके होते हैं। इसलिए, मृण्मय मृदा में बहुत कम वायु होती है। लेकिन अधिक जल पकड़ने के कारण ये भारी होती हैं।
A.
A-संस्तर
B.
B-संस्तर
C.
C-संस्तर
D.
आधार
A-संस्तर मृदा संस्तर की सबसे ऊपरी परत है। A-संस्तर नीचे की परतों की तुलना में अधिकतर गहरे रंग का होता है। क्योंकि इसमें कार्बनिक पदार्थ की मात्रा अधिक होती है। ये कार्बनिक पदार्थ या ह्यूमस मृदा को अधिक उपजाऊ बनाते हैं और पादप के विकास में पोषक तत्व प्रदान करते हैं।
A.
अधिक से अधिक
B.
कम से कम
C.
स्थिर
D.
घटने बढ़ने वाला
पीड़कनाशक में रसायन होते हैं जो पीड़कों को मारता है लेकिन ये मृदा में उपस्थित उपयोगी सूक्ष्मजीवों को भी हानि पहुँचाता है और ये रसायन मृदा में अधिक समय तक रहते हैं तथा पादपों के माध्यम से मनुष्यों तक पहुँच जाता है। इसलिए पीड़कनाशकों का प्रयोग कम से कम होना चाहिए।
A.
जलवायु
B.
जल
C.
खनिज पदार्थ
D.
चट्टान
किसी भी मृदा की प्रकृति चट्टानों पर निर्भर होती है जिससे ये बनी है और वनस्पति का प्रकार जो इसमें विकसित होते है।
| (i) ह्यूमस और चट्टानों के कणों का मिश्रण | (A) आधार शैल |
| (ii) मृदा | (B) गाद |
| (iii) मृदा की कठोर परत | (C) मृदा |
| (iv) नदियों में अवसादन | (D) प्राकृतिक संसाधन |
A.
(i) A; (ii) D; (iii) C; (iv) B
B.
(i) B; (ii) C; (iii) D; (iv) A
C.
(i) D; (ii) A; (iii) B; (iv) C
D.
(i) C; (ii) D; (iii) A; (iv) B
मृदा ह्यूमस की शीर्षमृदा के साथ चट्टानों का मिश्रण है जो नीचे की ओर उपस्थित होती है। मृदा एक प्राकृतिक संसाधन और पोषक तत्व प्रदान करती है। आधार शैल सबसे कठोर और सबसे निचली परत है। गाद नदियों के किनारों पर मृदा के अवसादन हैं और कृषि के लिए मृदा को उपजाऊ बनाते हैं।
A.
मृदा
B.
वायु
C.
चट्टान
D.
महासागर
जल मृदा के कणों में उपस्थित होता है और पादप के विकास के लिए आवश्यक होता है। इसी प्रकार, मृदा में उपस्थित पोषक तत्व पादप के विकास और वृद्धि के लिए आवश्यक होते हैं।
A.
जल
B.
कीट
C.
ह्यूमस
D.
गाद
ह्यूमस मृदा की सबसे ऊपरी परत है जो मृत और सड़े हुए पदार्थों की बनी होती है। इसके परिणामस्वरूप इसमें विभिन्न पोषक तत्व उपस्थित होते हैं जो पादप के विकास के लिए आवश्यक होते हैं।
A.
ह्यूमस
B.
मृत्तिका
C.
खनिज पदार्थ
D.
जल
मृदा चट्टानों के कणों और ह्यूमस के मिश्रण से बनी होती है। जहाँ ह्यूमस मृत और सड़े हुए पदार्थों से बनता है और शीर्षमृदा का गठन करता है जबकि चट्टानें सबसे निचली परत का गठन करती हैं। सबसे बड़ी चट्टान सबसे निचली परत का गठन करती है जिसे आधार शैल कहते हैं।
A.
दुमटी मृदा
B.
मृण्मय मृदा
C.
बलुई मृदा
D.
काली मृदा
दुमटी मृदा मिश्रित मृदा है। इसे कृषि प्रयोजनों के लिए आदर्श माना जाता है।
मृदा के तीन मूलभूत प्रकार हैं-
1. मृत्तिका या चिकनी
2. बलुई मिट्टी
3. दुमटी मिट्टी
भारत में पायी जाने वाली मृदा के दो प्रकार हैं-
1. जलोढ़ मिट्टी
2. लाल मिट्टी
काली मिट्टी में उगायी जा सकने वाली दो फसलें हैं-
कपास
गन्ना
पहाडी के ढलानों पर चरणों मे कन्टूर के साथ कृषि सीढीनुमा कृषि कहलाती है।
केंचुआ, किसान का मित्र कहलाता है।
A.
केशिकाओं
B.
धमनियों द्वारा
C.
शिराओं द्वारा
D.
RBC
शिराएं शरीर के भागों से हृदय को रक्त ले जाती हैं। इनमें वाल्व उपस्थित होते हैं, जो की रक्त के विपरीत प्रवाह को रोकते हैं।
A.
WBC
B.
RBC
C.
हीमोसाएनिन
D.
हीमोलिम्फ़
RBC में हीमोग्लोबिन होता है, और लौह युक्त प्रोटीन जो ऑक्सीज़न के परिवहन को उत्प्रेरित करते हैं।
A.
WBC
B.
RBC
C.
हीमोसाएनिन
D.
हीमोलिम्फ़
सफ़ेद रक्त कोशिकाएं ल्यूकोसाइट कहलाती हैं और संक्रमण के प्रति लड़ने के लिए उत्तरदायी हैं और प्रतिरक्षा तंत्र का महत्वपूर्ण भाग है।
A.
पसीने में लवणों की उपस्थिति
B.
पसीने में शर्करा की उपस्थिति
C.
पसीने में जल की उपस्थिति
D.
पसीने में अमीनो अम्लों की उपस्थिति
तेज गर्मियों में पसीने का आना कपड़ों पर सफ़ेद धब्बों का निर्माण कर देता है। पसीने में लवण होते हैं जो शरीर द्वारा मुक्त किए जाते हैं।
A.
92% जल
B.
98% जल
C.
99% जल
D.
95% जल
वयस्क मानव में मूत्र का संगठन 95% जल, 2.5% यूरिया और 2.5% दूसरे अपशिष्ट पदार्थ होते हैं।
A.
प्लेटलेट्स
B.
हीमोग्लोबिन
C.
प्लाज्मा
D.
WBCs.
हीमोग्लोबिन लाल रक्त कोशिकाओं की सतह पर उपस्थित लाल रंग का वर्णक है। हीमोग्लोबिन की उपस्थिति के कारण रक्त लाल दिखाई देता है।
A.
RBC.
B.
WBC.
C.
हीमोग्लोबिन
D.
प्लाज्मा
रक्त एक तरल है जिसमें अनेक कोशिकाएं निलंबित होती हैं। रक्त का तरल भाग प्लाज्मा है, जिसमें रक्त के दूसरे घटक जैसे RBC, WBC और प्लेटलेट्स तैरते रहते हैं।
A.
R.B.C.
B.
W.B.C.
C.
प्लेटलेट्स
D.
प्लाज्मा
W.B.C. श्वेत रक्त कोशिकाएँ हैं। इनमें हीमोग्लोबिन नहीं होता है इसकारण रंगहीं होती हैं। इनका मुख्य कार्य हमारे शरीर में प्रवेश करने वाले कीटाणुओं के विरुद्ध लड़ाई कर उन्हें नष्ट करना है।
A.
श्वसन
B.
परिसंचरण
C.
उत्सर्जन
D.
बहिश्वसन
वृक्क रक्त से हानिकारक अपशिष्टों का निस्यंदन करती है। मानव शरीर का मुख्य नाइट्रोजनी अपशिष्ट यूरिया है।
A.
मूत्र
B.
अमोनिया
C.
यूरिक अम्ल
D.
यूरिया
पक्षी, छिपकलियाँ और साँप स्थलीय जन्तु हैं। इनमें जल की आपूर्ति सीमित होती है, अतः ये यूरिक अम्ल स्त्रावित करते हैं। यूरिक अम्ल एक अर्धठोस सफ़ेद क्रिस्टलीय पदार्थ है और इसके उत्सर्जन के लिए जल की कम मात्रा की आवश्यकता होती है।
A.
वृक्क
B.
यकृत
C.
हृदय
D.
फेफड़े
हीमोग्लोबिन ऑक्सीज़न को फेफड़ों से शेष शरीर को परिवहित करता है जहां यह कोशिका के उपयोग के लिये ऑक्सीज़न मुक्त करती है।
A.
अस्थि मज्जा
B.
उपास्थि
C.
केशिकीय
D.
शिराएँ
अस्थि मज्जा एक प्रत्यास्थ ऊतक है जो की अस्थि के खोखले अग्र भाग में पाया जाता है। व्यस्कों में बड़ी अस्थियों की मज्जा में नयी रक्त कोशिकाएं उत्पन्न होती हैं।
A.
3,000-11,000 WBC.
B.
4,000-11,000 WBC.
C.
4,500-11,000 WBC.
D.
5,000-11,000 WBC.
श्वेत रक्त कोशिकाएं ल्यूकोसाइट कहलाती हैं ये कोशिकाएं संक्रमण से लड़ने के लिए उत्तरदायी है और प्रतिरक्षा तंत्र का मुख्य भाग है।
A.
जाइलम
B.
फ्लोएम
C.
केंबियम
D.
मज्जा
जाइलम और फ्लोएम पादपों का मुख्य संवहनी तंत्र है। जाइलम जड़ों द्वारा पत्तियों तक जल के परिवहन में सहायता करता है। और फ्लोएम पत्तियों में निर्मित भोज्य पदार्थों को जड़ों तक पहुँचाता है।
A.
अमोनिया
B.
मूत्र
C.
यूरिया
D.
स्वेद
वृक्क रक्त में उपस्थित नाइट्रोजनी अपशिष्टों को निस्यंदन के द्वारा हटाता है। उपयोगी पदार्थ वापस रक्त में अवशोषित हो जाते हैं और रक्त में घुलित अपशिष्ट पदार्थ मूत्र बनाने के लिए निस्यंदन के द्वारा हटा दिया जाता है।
वाष्पोत्सर्जन की दर को प्रभावित करने वाले दो कारक है:-
i)
सूर्य
प्रकाश।
ii) हवा।
जाइलम तथा फ्लोएम पादपों में संवहन तंत्र के दो भाग होते है।
कार्डियोवेस्कूलर रोगों में, रक्त का बहिर्वाह (प्रवाह) कम हो जाता है।
महाधमनी हृदय से ऑक्सीज़न समृद्ध रक्त को शरीर के विभिन्न भागों में ले जाती है।
फुफ्फुस शिरा ऑक्सीज़न समृद्ध रक्त को फेफड़ों से हृदय तक लाती है।
हृदय का विभिन्न कक्षों में विभाजन यह सुनिश्चित करता है कि कार्बन - डाईऑक्साइड तथा ऑक्सीज़न समृद्ध रक्त परस्पर मिश्रित नहीं हो। यह ऑक्सीज़न के परिसंचरण तथा परिवहन की उच्च दक्षता सुनिश्चित करता है।
पादप अपनी पत्तियों की रंध्रों के माध्यम से अतिरिक्त जल को वाष्प रूप में उत्सर्जित करते है। यह प्रक्रिया वाष्पोत्सर्जन कहलाती है।
पौधे का भाग जो मृदा के अंदर विकसित होता है मूल तंत्र कहलाता है।
हृदय में वाल्व यह सुनिश्चित करता है कि रक्त का प्रवाह केवल एक ही दिशा (हृदय की ओर) में प्रवाहित होता है।
जल के अणुओं का अधिक ससंजक बल होने के कारण रसारोहण होता है।
जाइलम उत्तक के दो संवहन घटक है:-
i)
वाहिनिका।
ii) वाहिनियाँ।
वाष्पोत्सर्जन रंध्र के माध्यम से उत्पन्न होता है।
हृदय मानव शरीर का पम्पिंग अंग होता है। यह शरीर के सभी भागों तक रक्त परिवहन के लिए एक पंप के रूप में निरंतर स्पंद का कार्य करता है। हृदय कार्बन − डाइऑक्साइड समृद्ध रक्त को फेफड़ों से पंप करता है तथा ऑक्सीज़न समृद्ध रक्त को शरीर के सभी भागों में पंप करता है। हृदय किसी व्यक्ति के जीवन पर्यन्त बिना रुके रक्त को पंप करने का कार्य करता रहता है।
हीमोग्लोबिन ऑक्सीज़न को अपने साथ संयुक्त करके इसका शरीर के सभी अंगों तथा सभी कोशिकाओं तक परिवहन करता है।
परिसंचरण तंत्र हृदय तथा रक्त वाहिनियों से मिलकर बना होता है।
रक्तवाहिनियों में बहते रक्त द्वारा वाहिनियों की दीवारों पर डाले गए दबाव को रक्त दाब कहते हैं । रक्त दाब को स्टेथोस्कोप द्वारा मापा जाता है ।
i) पादप के ऊपरी भाग से पानी का जल वाष्प के रूप वाष्पीकरण वाष्पोत्सर्जन कहलाता है।
ii) पानी के सतत अंतर्वाह के कारण मूल (जड़) में उत्पन्न दाब मूल दाब कहलाता है।
जब रक्त धमनियों में दबाव के कारण प्रवाहित होता है, तो यह धमनियों में स्पंदन के कारण होता है। यह स्पंदन नाड़ी स्पंद के रूप में जाना जाता है। स्पंदन की यह दर स्पंदन दर के रूप में जानी जाती है। किसी सामान्य व्यक्ति की स्पंदन दर लगभग 72 से 80 स्पंदन प्रति मिनट होती है।
एक हृदय स्पंद हृदय की पेशियों के लयबद्ध रूप से संकुचन तथा लयबद्ध रूप से विश्रांति करने के कारण होता है।
मानव रुधिर के दो भाग होते हैं - रुधिर कणिकाएँ तथा प्लाज्मा । रुधिर का लगभग 40% भाग रुधिर कणिकाओं से बनता है तथा 50 से 60% भाग प्लाज्मा से बनता है ।
पादप मिट्टी से पानी तथा खनिज लवणों को जड़ों (मूलों) द्वारा अवशोषित करते हैं । जड़ों में मूलरोम होते हैं । यह मूलरोम पानी में घुले हुए खनिज पोषक पदार्थो को अवशोषित करते हैं । यह मूलरोम मिट्टी के कणों के बीच उपस्थित जल के संपर्क में रहते हैं ।
यह वह प्रक्रिया है जिसमें किसी पादप की पत्तियों की सतह पर उपस्थित रंध्रों के माध्यम से जल वाष्पित हो जाता है। यह प्रक्रिया पादप के तापमान को कम करने में सहायता करती है।
सबसे पहले दाताओं का रुधिर लेकर रुधिर वर्ग ज्ञात किया जाता है। रुधिर वर्ग निर्धारित होने के बाद आधुनिक उपकरण एवं विधियों द्वारा रुधिर काँच या प्लास्टिक की वायुरूद्ध बोतलों में सुरक्षित रखा जाता है। रुधिर को संरक्षित रखने के लिए उसमे सोडियम साइट्रेट मिलाकर रखा जाता है ।
पादप
की जड़ (मूल) से
अवशोषित जल तथा
खनिज (रस) का
पादप के शिखर
के लिए
परिवहन की
प्रक्रिया
रसारोहण कहलाती
है।
पादपों
में रसारोहण
का पथ जो इस
प्रकार है :-
i) पानी
पादप की
मूलरोम
द्वारा
अवशोषित कर
लिया जाता
है।
ii) परासरण
तथा विसरण की
प्रक्रिया
द्वारा, रस
मूल (जड़) की
आंतरिक
कोशिकाओं के
माध्यम से
प्रवाहित होता
है तथा
संचालन
तंत्र के
केन्द्रीय
भाग तक पहुँचता
है।
iii) मूल
दाब जाइलम
ऊतक में रस की ऊपर
की ओर गति का
कारण बनता
है।
iv) पत्तियों
में,
पानी
वाष्पीकरण
द्वारा
वाष्पित हो
जाता है तथा रस
के सतत
संचालन के
लिए खिंचाव
बल उत्पन्न
हो जाता है।
|
लाल रुधिर कणिकाएँ |
श्वेत रुधिर कणिकाएँ |
|
1. मनुष्य के एक घन मिमी. रक्त में लाल रुधिर कणिकाओं की संख्या 45 से 55 लाख होती है। 2. लाल रुधिर कणिकाओं में हीमोग्लोबिन नामक रंगायुक्त प्रोटीन होता है। 3. इनका जीवनकाल 120 दिन का होता है। 4. ये गोल व उभयावातल होती हैं। |
1. मनुष्य के एक घन मिमी. रक्त में श्वेत रुधिर कणिकाओं की संख्या 5000 से 9000 होती है । 2. श्वेत रुधिर कणिकाओं में रंगायुक्त प्रोटीन नहीं होने के कारण ये रंगहीन होती हैं । 3. इनका जीवनकाल 1 से 4 दिन तक का होता है । 4. ये अनियमित आकार की होती हैं ।
|
1.
पोषक पदार्थों व उत्सर्जी
पदार्थों तथा
गैसों का परिवहन
करता है ।
2. बाहरी कणों
(जीवाणुओं एवं
विषाणुओं) से श्वेत
रुधिर कणिकाओं
द्वारा शरीर की
रक्षा करता है
।
3. बिम्बाणुओं
द्वारा रुधिर
को जमाने का कार्य
करता है ।
A.
जल
B.
एल्कोहॉल
C.
पेट्रोल
D.
ईथर
जल को सार्वभौमिक विलायक कहते हैं क्योंकि इसमें विभिन्न पदार्थ घुल जाते हैं।
A.
भूमध्य रेखा
B.
कर्क रेखा
C.
मकर रेखा
D.
ध्रुव
जल का ठोस रूप हिम और बर्फ है। यह पृथ्वी के ध्रुवों पर हिम आच्छादन के रूप में उपस्थित है। हिम पहाड़ों और ग्लेशियरों पर भी पाया जाता है।
A.
निस्पंदन
B.
अंतःस्पदंन
C.
वाष्पीकरण
D.
जल का संग्रह
जैसे ही जल भूमि में मृदा के कणों के माध्यम से रिस जाता है, ये भोम जल के स्तर में वृद्धि करता है। जड़े मृदा के कणों को कसकर पकड़ती हैं इसलिए अंतःस्पदंन की प्रक्रिया में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
A.
तरल
B.
ठोस
C.
गैसीय
D.
छोटे बुलबुले
सीवेज नालियों या अपवाहिकाओं के माध्यम से ले जाने वाला ठोस अपशिष्ट युक्त गंदा जल है। औद्योगिक अपशिष्ट उद्योगों से निकला हुआ तरल अपशिष्ट है।
A.
औद्योगिक कार्यों
B.
कृषि अभ्यास
C.
घरेलू उपयोग
D.
पीने के उद्देश्य
भारत में ज्यादातर किसान अपनी फसलों की सिंचाई के लिए वर्षा पर निर्भर रहते हैं। सिंचाई प्रणाली जैसे नहर केवल कुछ स्थानों में ही हैं। यहां तक कि ये प्रणालियाँ पानी की कमी से अनियमित वर्षा के कारण पीड़ित हैं। इसलिए, किसान सिंचाई के लिए भूमिगत जल का उपयोग करते हैं।
A.
दी गई मात्रा से अधिक
B.
दी गई मात्रा से कम
C.
दी गई मात्रा के समान
D.
दी गई मात्रा के आसपास
यूनाइटेड नैशन के द्वारा दी गई मात्रा के अनुसार प्रति व्यक्ति पीने के लिए, कपड़े धोने के लिए, खाना बनाने के लिए और अपनी स्वच्छता को बनाए रखने के लिए 50 लीटर या लगभग ढाई बाल्टी का उपयोग कर सकता है। एक बाल्टी का औसत जल का 20 लीटर है। इसलिए रोहित दी गई मात्रा से अधिक जल का उपयोग कर रहा है।
A.
वाष्पोत्सर्जन
B.
श्वसन
C.
प्रकाश संश्लेषण
D.
संघनन