A.
एक्वीफर
B.
अंतःस्पदंन
C.
सिंचाई
D.
जल संचयन
एक्वीफर जलस्तर के नीचे ठोस चट्टानों की परतों के बीच भूमिगत जल का संग्रहण है। एक्वीफर में संग्रहित जल को हेंड पंप या कुओं के द्वारा निकाला जा सकता है।
A.
जल संचयन
B.
नलिका सिचाई विधि
C.
बूँद बूँद सिचाई विधि
D.
पौधों की कटाई
बूँद बूँद सिचाई विधि संकरी नलियों द्वारा पौधों को पानी देने की एक विधि है जिससे जल सीधे पौधे के आधार पर जाता है। एक किसान इस विधि के उपयोग से आर्थिक रूप से पानी का उपयोग कर सकते हैं।
A.
विद्युत
B.
कपड़े
C.
ऊष्मा
D.
जल
जल सभी सजीवों के लिए आवश्यक है। ये विभिन्न कार्यों जैसे पीने, कपड़े धोने, खाना बनाने, आदि के लिए उपयोग में लिया जाता है ।
A.
भूरा
B.
नीला
C.
हरा
D.
लाल
अंतरिक्ष से देखने पर, पृथ्वी नीले रंग की दिखाई देती है क्योंकि इसकी सतह 71% जल से आवरित है।
A.
45%
B.
61%
C.
71%
D.
80%
पृथ्वी के सतह की 71% मात्रा जल द्वारा आवरित है जिसमें से लगभग 1% जल उपयोगी है।
A.
12 जनवरी।
B.
22 मार्च।
C.
16 जून।
D.
14 जुलाई।
22 मार्च को विश्व जल दिवस मनाया जाता है।
A.
कुएँ का जल
B.
समुद्री जल
C.
हैंड पंप का जल
D.
वर्षा जल
समुद्री जल हमारे लिए अनुपयोगी जल है क्योंकि इसमें विभिन्न घुलित लवण पाए जाते हैं।
A.
सूखा पड़ता है।
B.
जल की कमी होती है।
C.
जल स्तर में कमी होती है।
D.
बाढ़ आती है।
अधिक वर्षा बाढ़ का कारण बनती है। बाड़ फसल, सड़कों, घरों आदि को नष्ट कर देती है।
जल प्रबंधन जल के अपव्यय को कम करने के लिए एक अभ्यास है।
मनुष्य कोशिकाओं से बना होता है जिनमें लगभग 70% जल होता है। इसलिए ये कहा जाता है कि हमारे शरीर में लगभग 70% जल होता है।
अशुद्धियों को दूर करना, रोग के कीटाणुओं से जल को मुक्त करना ही जल का शोधन कहलाता है।
समुद्र, झील, नदी, तालाब, भूमिगत जल तथा वर्षा, जल के मुख्य स्त्रोत हैं ।
जल पदार्थों के तीन प्रारूप में उपस्थित होता है। जल ठोस अवस्था में बर्फ के रूप में उपस्थित है, तरल अवस्था में तरल जल के रूप में उपस्थित है और गैसीय अवस्था में जल वाष्प के रूप में उपस्थित है।
a. पुष्प
b. लैंगिक जनन
a. परपरागण
b. पत्तियों के किनारे पर
मांसल फलों के अण्डाशय की भित्ति मांसल होती है, तो बनने वाला फल भी मांसल फल होता है। जैसे : टमाटर और बैंगन
जबकि शुष्क फलों के अण्डाशय की भित्ति शुष्क होती है, तो बनने वाला फल भी शुष्क होता है। जैसे : चावल, गेंहू, मक्का और अन्य अनाज शुष्क फल हैं।
पुंकेसर से परागकणों का उसी पुष्प के वर्तिकाग्र पर पहुँचना स्वपरागण कहलाता है जबकि पुंकेसर से परागकणों का उसी पौधे के दूसरे पुष्प या एक भिन्न पौधे के पुष्प के वर्तिकाग्र पर पहुँचना परपरागण कहलाता है।
कायिक प्रवर्धन द्वारा उत्पादित पौधों के लाभ हैं:
i.पौधे, जनक पादपों से गुणों में बिल्कुल समान होते हैं।
ii.पौधों में फूलों और फलों का उत्पादन, बीजों की तुलना में जल्दी होता है।
a. आलू एक तना है जिसकी सतह पर निशान होते हैं जो आँखें कहलाती हैं। इन संरचनाओं से एक नए पौधे का विकास होता है।
b. जबकि गन्ने के पौधे में अगली फसल प्राप्त करने के लिए इसके निचले खंड जमीन में ही छोड़ दिये जाते हैं।
पुष्प में निषेचन पूर्व:- जब परागकण वर्तिकाग्र पर गिरते हैं, ये परागनली बनाने के लिए अंकुरित हो जाते हैं जो वर्तिका के साथ लंबाई में वृद्धि कर अण्डाश्य तक पहुँचती है।
निषेचन:- परागनली बीजाण्ड तक पहुँचते ही, इनकी भित्ती घुल जाती है और नर युग्मक बीजांड द्वार द्वारा अंदर प्रवेश कर मादा युग्मक से संलयित हो जाता है ।
निषेचन पश्च परिवर्तन :- निषेचित कोशिका, युग्मनज अंतत: बीज बनाती है । इस संलयन के साथ अण्डाशय मोटा होना प्रारम्भ हो जाता है और बीजों को आवरित करते हुए फल में रूपांतरित हो जाता है। बाह्यदल एवं दल गिर जाते हैं।
बीजों के प्रकीर्णन द्वारा बीज विविध स्थानों पर पहुँच जाते हैं अन्यथा एक ही स्थान पर वृद्धि करने पर उनमें एक ही प्रकार के होने के कारण उनकी जल, सूर्य का प्रकाश, खनिज लवणों व पोषण संबंधी आवश्यकताएं समान होने से प्रतिस्पर्धा होने से अच्छे स्वस्थ पौधे वृद्धि नहीं कर पाएंगे। बीजों का प्रकीर्णन पौधों को नए आवास में फलीभूत होने में सक्षम बनाता है।
a. सजातपुष्पी:
यह एक पुष्प के परागकोष में बने परागकणों का उसी पौधे के दूसरे पुष्प के वर्तिकाग्र पर पहुँचने का प्रक्रम है।
b. एलोगैमी
यह एक पुष्प के परागकोष में बने परागकणों का किसी भिन्न पौधे के दूसरे पुष्प के वर्तिकाग्र पर पहुँचने का प्रक्रम है।
c. प्रजनन
जनकों से नए जीवों का उत्पादन प्रजनन कहलाता है।
a. जड़, तना और पत्तियाँ
b. वायु परागित पुष्प के विशिष्ट लक्षण
1. परागकण बड़ी संख्या में बनते हैं।
2. परागकोष पुष्प से बाहर लटके होते हैं ताकि वे आसानी से बह सकें।
c. यह अलैंगिक प्रजनन का एक प्रकार है, जिसमें जड़ों, तने, पत्तियों और कलियों से, नए पौधे उत्पन्न होते हैं, इसप्रकार पौधे के कायिक भागों से जनन कायिक प्रवर्धन कहलाता है।
(a) स्पाइरोगायरा
(एक शैवाल)
कायिक रूप से
विखंडन द्वारा
विभाजित
होता है।
शैवाल जल और
पोषक तत्वों
की उपस्थिति
में तेजी से
वृद्धि करता है। एक
शैवाल खंड, दो
या दो से अधिक
खंडों में
टूट जाता है
और प्रत्येक
खंड नए पादप
में
परिवर्धित
हो जाता है,
यह प्रक्रम
निरंतर चलता
रहता है और वे
एक छोटे
अंतराल में
एक बड़ा भाग
आवरित कर
लेते हैं।
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(b) बीजाणुजनन बीजाणुओं से जनन का एक प्रक्रम है। यह जननिक संरचनाओं में होता है जो बीजाणुधानियाँ कहलाती हैं। जैसे- मोस और फर्न
(c) एक पत्ती में शिराओं का विन्यास पर्ण विन्यास कहलाता है। यह दो प्रकार का होता है:-
� जालिकावत शिराविन्यास : इस विन्यास में शिराएँ एक जाल बनाती हैं।
� समान्तर शिराविन्यास : इस विन्यास में शिराएँ एक दूसरे के समानान्तर चलती हैं।
a. कायिक, अलैंगिक और लैंगिक
b. आँखें
c. अंडाशय परिवर्धित होकर फल और बीजांड बीज में विकसित हो जाता है, जिसमें परिवर्धनशील भ्रूण होता है।
a. गलत, फर्न्स में कायिक प्रजनन बीजाणुजनन द्वारा होता है।
b. गलत, आलू में प्रजनन एक भूमिगत तने (कंद) द्वारा होता है।
c. सही
d. गलत, पर्व और पर्वसंधियाँ तने की विशेषताऐं हैं।
e. गलत, कायिक प्रजनन द्वारा विकसित पौधे समरूप होते हैं, इसलिए इनके खेत में एक बीमारी के प्रसारण से प्रभावित होने की संभावना अधिक है।
a. सही
b. गलत, गाजर में कायिक जनन जड़ों द्वारा होता है।
c. गलत, स्टॉक और सियॉन ग्राफ्टिंग के आवश्यक भाग हैं।
d. गलत, पुनरावृत कायिक जनन द्वारा संततियों में ओज की क्षति होती है।
e. सही
a. बाह्यदलपुंज
b. युग्मनज
c. बीज
d. जायांग
e. बीज प्रकीर्णन
A.
जल स्तर
B.
सतही जल
C.
बूँद के रूप में जल
D.
स्थिर जल
सतह के नीचे उपस्थित जल को सतही जल कहते हैं। ये भूमि पर धाराओं, महासागरों, आदि के रूप संग्रहित होता है। जल प्राकृतिक रूप से वर्षण द्वारा पुनः वापस आ जाता है और वाष्पीकरण द्वारा लुप्त भी हो जाता है।
A.
कृषि गतिविधियों में वृद्धि
B.
वर्षा में वृद्धि
C.
जनसंख्या में वृद्धि
D.
घरेलू उपयोग में कमी
जनसंख्या में वृद्धि घरों, दुकानों, कार्यालयों, सड़कों और फुटपाथ के निर्माण के लिए मांग उत्पन्न करती है। यह पार्क और खेल के मैदान जैसे खुले क्षेत्रों में कमी करती है जो बदले में भूमि में वर्षा जल के रिसाव को कम करती है।
A.
बाढ़
B.
वर्षा
C.
सूखा पड़ना
D.
रेगिस्तान का वितरण
कुछ क्षेत्रों में बहुत अधिक वर्षा होती है जबकि कुछ अन्य क्षेत्रों में बहुत कम वर्षा होती है। अधिक वर्षा बाढ़ का कारण बनती है जबकि वर्षा की अनुपस्थिति से सूखा पड़ जाता है।
A.
अम्लीय ऑक्साइड
B.
उदासीन ऑक्साइड
C.
क्षारीय ऑक्साइड
D.
उभयधर्मी ऑक्साइड
जल हाइड्रोजन का उदासीन ऑक्साइड है। इसका उस पर कोई आवेश नहीं होता है। इसलिए, ये एक उदासीन यौगिक है।
A.
इसमें उच्च विशिष्ट ऊष्मा होती है।
B.
100�C पर गर्म हो जाता है।
C.
0�C पर जम जाता है।
D.
ये एक तरल है।
जल गर्म और ठंडा होने में अधिक समय लेता है क्योंकि इसमें उच्च विशिष्ट ऊष्मा होती है। इसलिए, ये एक अच्छा शीतलन कारक है।
A.
टमाटर
B.
मूली
C.
गाजर
D.
आलू
एक पौधे की कायिक कलिकाएँ प्ररोह में विकसित हो जाती हैं। आलू पर भी ये कलिकाएँ होती हैं जो आँखें कहलाती हैं।
A.
वर्तिका से वर्तिकाग्र को
B.
परागकोष से वर्तिकाग्र को
C.
वर्तिकाग्र से वर्तिका को
D.
परागकोष से अंडाशय को
पराग कणों का पराग कोष से पुष्प के वर्तिकाग्र को पहुँचना परागण कहलाता है।
A.
वर्तिकाग्र
B.
बीजांडद्वार
C.
वर्तिका
D.
पुतन्तु
बीजांडद्वार बीजीय पौधों के बीजांड में स्थित एक छिद्र है जिससे प्रायः पराग नलिकाएं प्रवेश करती हैं।
A.
लैंगिक जनन
B.
एकलिंगी जनन
C.
द्विलिंगी जनन
D.
कायिक प्रवर्धन
कायिक प्रवर्धन एक प्रक्रम है जिसके द्वारा बीज के अलावा किसी और भाग जैसे जड़ तंत्र या पत्तियों या कलम रोपण द्वारा नए पादप का परिवर्धन होता है ।
A.
सक्रिय
B.
सुप्त
C.
निष्क्रिय
D.
मृत
कुछ कवक और शैवाल प्राथमिक रूप से प्रतिकूल वर्धन काल में सुप्त बीजाणु बनाते हैं। अनुकूल परिस्थितियों के आरंभ होने पर ये जल के संपर्क में आने के साथ ही वृद्धि करना प्रारम्भ कर देते हैं ।
द्विलिंगी
यह एक पुष्प के परागकोष में बने परागकणों का उसी पुष्प के वर्तिकाग्र पर पहुँचने का प्रक्रम ओटोगैमी कहलाता है।
गुलाब और साल्विया कीटपरागित पुष्प हैं।
वायुपरागण
टमाटर और बैंगन, दो वास्तविक फल हैं।
सेब और नाशपति, कूट फलों के उदाहरण हैं।
कमल और सिंघाडा (ट्रापा) दो जलीय पौधे हैं जो कीटों द्वारा परागित होते हैं।
बहुविखण्डन
अदरक और पोदीना
जड़ें
ब्रायोफिल्लम
दल पुष्प का रंगीन व चमकीला भाग है जो परागणकारकों को जैसे- मधुमक्खी, बीटल, तीतली, पक्षी, चमगादडों को आकर्षित करते हैं और परागण व निषेचन में सहायता करते हैं।
परागकोषों से परागकणों का उसी या भिन्न पुष्पों के स्त्रीकेसर में स्थानांतरित होने को परागण कहते हैं।
1. बड़े, चमकीले, रंगीन दल
2. सुगंधित पुष्प
पुंकेसर और स्त्रीकेसर हैं।
A.
92%
B.
90%
C.
97%
D.
87%
सक्रियत आपंक में लगभग 97% जल होता है । इसका निर्माण ठोस अपशिष्टों और निलंबित सूक्ष्मजीवों के टैंक में नीचे बैठ जाने से होता है । शीर्ष भाग से जल को निकाल लिया जाता है ।
A.
एक यौगिक
B.
प्रयोग किये जाने योग्य जल
C.
एक मिश्रण
D.
एक ठोस पदार्थ
वाहित मल घरों, उद्योगों, अस्पतालों, कार्यालयों और अन्य उपयोगों के बाद उत्पन्न होने वाला द्रव अपशिष्ट होता है । इसमें घुले हुए और निलंबित अपद्रव्य होते हैं, ये संदूषक कहलाते हैं । यह कार्बनिक और अकार्बनिक पोषकों, जीवाणुओं और अन्य सूक्ष्मजीवों का एक मिश्रण होता है ।
A.
औषधियाँ
B.
खाना पकाने का तेल और वसायें
C.
नमक का घोल
D.
प्रयुक्त चाय की पत्ती, रूई
रूई, सेनेटरी टॉवेल, प्रयुक्त चाय की पत्ती, बचे हुए ठोस खाद्य पदार्थ, इन सभी को जब नालियों में फेंका जाता है तो ये उन्हें अवरूद्ध कर सकते हैं । इसके परिणामस्वरूप ऑक्सीजन का मुक्त प्रवाह नहीं होने देते हैं जिससे निम्नीकरण का प्रक्रम बाधित होता है । अतः इन अपशिष्टों को सही तरीके से कूड़ेदान में फेंका जाना चाहिए ।
A.
भोजन
B.
संदूषक
C.
बायो गैस
D.
क्लोरीन
संदूषक वे पदार्थ होते हैं जो जल की स्वच्छता को नष्ट कर देते हैं या इसे विषैला बना देते हैं ।
A.
कठोर जल का
B.
मृदु जल का
C.
आसुत जल का
D.
पेय जल का
मनुष्य द्वारा स्वच्छ जल का उपयोग पीने के लिए किया जाता है यह पेय जल कहलाता है ।
अपशिष्ट जल के पुनः उपयोग या जल स्रोतों
क्लोरीन ।
जल को उबालकर उपयोग करना ।
विब्रियो कॉलेरी ।
70%
वर्मी कम्पोस्ट कार्बनिक पदार्थों के केंचुएँ की एक विशेष प्रजाति द्वारा अपघटन के अंत मे बनने वाला उत्पाद है । यह पोषकों से समृद्ध कार्बनिक उर्वरक है ।
नालियाँ एक प्रवाह तंत्र है जो गंदे पानी को इसके उत्पादन से निपटान बिन्दु तक लेकर जाता है ।
स्लज (आपंक) और जैव-गैस ।
टाइफाइड और कोलेरा ।
वाहित मल में घुली हुई और निलंबित अशुद्धियाँ संदूषक कहलाती हैं ।
शलाका छन्ने द्वारा अपशिष्ट जल में उपस्थित बड़े आकार के संदूषक जैसे प्लास्टिक की थैलियां, गत्ते, डंडियाँ डिब्बे आदि पृथक कर लिए जाते हैं ।
दस्त और बहुत तेज पेट दर्द ।
जल को विसंक्रमित करने के लिए क्लोरीन और ओज़ोन का उपयोग किया जाता है ।
उर्वरक और कीटनाशक
धरातल के नीचे पाये जाने वाले जल के स्रोतों को भौम- जल स्रोत कहते हैं। उदहरणार्थ; कुएँ, हैंडपंप ।
बूँद बूँद सिंचाई, पौधों को सीधे उनके आधार पर पानी देने के लिए संकीर्ण नलियों का उपयोग करने की एक विधि है। यह जल के संरक्षण में सहायता करती है।
कभी कभी, जल चट्टानों के ऊपर एकत्रित हो जाता है, और दबाव डालता है। इसलिए यह पृथ्वी से किसी भी छिद्र द्वारा झरने के रूप में बाहर आता है। यह स्प्रिंग वाटर कहलाता है।
अंत:स्य दन प्रक्रिया द्वारा भूजल पुन: भर जाता है।
हम वर्षा जल संचयन विधि की सहायता से वर्षा जल का उपयोग कर सकते हैं।
यदि पादप मुरझा और सुख गया है, तो हम कह सकते हैं कि उसमें जल की कमी है।
ट्यूबवेल से हमें भूमिगत जल मिलता है।
हम 22 मार्च को जल के संरक्षण के महत्त्व की ओर लोगों का ध्यान केन्द्रित करने के लिए जल दिवस मनाते हैं।
हमारी पृथ्वी का लगभग 71% जल से आवरित है।
पीने के लिए मृदु जल का उपयोग इसलिए किया जाता है क्योंकि इसमें खनिज पदार्थों की कुछ मात्रा होती है जो हमारे शरीर के ठीक से कार्य करने में सहायता करते हैं।
भौमजल स्तर पर प्रभाव भूमिगत जल की आपूर्ति पर निर्भर करता है। केवल 5 परिवार ही घरेलू प्रयोजन के लिए एक एकल हैण्डरपम्पत का उपयोग कर रहे हैं। यह भौमजल स्तर को प्रभावित नहीं करेगा। लेकिन, एक मामले में वर्षा की कमी, परिवारों द्वारा एक बार उपयोग किए गए जल की पुन:आपूर्ति नहीं हो पाने से भौमजल स्तर के स्तर में गिरावट हो जायेगा।
दो जल बचत आदतें इस प्रकार हैं-
1. फर्श धोने के बजाय पौचा लगायें।
2. वाहनों को धोने में बाल्टी का उपयोग करें।
अंत:स्यंपदन की प्रक्रिया भूजल को पुन: भर देती है। कुछ स्थानों पर भूजल कठोर चट्टानों की परतों के बीच भौमजल स्तरर के नीचे संग्रहित रहता है, ये एक्वीफर कहलाते हैं। एक्वीफरों से जल ट्यूबवेल या हैण्डरपम्पोंह की सहायता से बाहर पंप किया जा सकता है।
गर्मियों के दौरान, जब तापमान उच्च होता है, पौधे स्व यं को ठण्डात रखने के लिए अधिक वाष्पो त्स र्जन करते हैं। अधिक वाष्पो त्सौर्जन के लिए अधिक पत्तों की आवश्यकता होती है। इस प्रकार, पौधे गर्मियों के मौसम के दौरान अधिक पत्ते प्राप्त करते हैं।
जल, पृथ्वी पर जीवन के लिए सबसे आवश्यक स्रोत है। सजीवों की सभी उपापचयी गतिविधियाँ जल के द्वारा होती हैं। जल अनेक जंतुओं और पौधों के लिए आवास प्रदान करता है। इसलिए कोई भी सजीव जल के बिना जीवित नहीं रह सकता है।
इमारतों और उद्योगों की छत पर वर्षा जल का संरक्षण वर्षा जल संचयन कहलाता है। इस संचित जल सीधे इस्तेमाल किया जा सकता है या सिंचाई के लिए मिट्टी में डाल दिया जा सकता है। यह प्रक्रिया भौम जलस्तहर को बढाती है।
अंतःस्पदंन भूमि के खाली स्थानों में जल के रिसाव की प्रक्रिया है।
जल की कमी के कारण इस प्रकार हैं-
1.जनसंख्या में वृद्धि − बढ़ती जनसंख्या के कारण, जल की मांग में भी वृद्धि हुई है। घरों, सड़कों, दुकानों आदि के निर्माण के लिए जल की बड़ी मात्रा की आवश्यकता होती है।
2.उद्योगों में वृद्धि − उद्योगों की संख्या निरंतर बढ़ती जा रही है। भोम जल की अत्यधिक मात्रा का उपयोग इन उद्योगों द्वारा हो रहा है जिसके परिणाम स्वरूप जल की कमी हो रही है।
3.जल का असमान वितरण − पृथ्वी के सभी क्षेत्रों में वर्षा एक जैसी नहीं होती है। कुछ स्थानों पर अधिक वर्षा होती है और कुछ स्थानों पर बिलकुल भी नहीं होती है।
वर्षा का जल पृथ्वी में रिस जाता है और जल स्तर को बनाए रखता है। इस प्रक्रिया को जल स्तर की आपूर्ति कहते हैं।
कारक जो जल स्तर को प्रभावित करते हैं वे इस प्रकार हैं-
• कम या बिलकुल वर्षा नहीं होना।
• जनसंख्या में वृद्धि
• औद्योगिक गतिविधियाँ
• कृषि गतिविधियाँ
i. बहते नल की तुरंत मरम्मत।
ii. कार धोने के लिए बडे पाइप की तुलना में एक बाल्टी का उपयोग करें।
iii. सब्जियाँ, चावल आदि धोने में काम आने वाले जल को न फेंकें।
iv. वर्षा जल संचयन ।
v. ब्रश करने या चेहरा धोने के दौरान नल को खुला न छोड़ें।
vi. स्नान के लिए हमेशा शावर का उपयोग न करें।
हम निम्न के द्वारा जल संरक्षित कर सकते हैं:
1. मकान और उद्योगों में अपव्यय को कम से कम करना।
2. वर्षा जल के संचयन के द्वारा ।
3. कृषि में बूँद बूँद सिंचाई विधि का उपयोग कर।
धमनियाँ तथा शिराएँ केशिकाओं के जाल से जुड़ी होती हैं जो मानव शरीर के प्रत्येक भाग के लिए रक्त की आपूर्ति करती है। धमनियाँ शरीर के अंगों की ओर ऑक्सीज़न समृद्ध रक्त को ले जाती हैं। उत्तकों तक पहुँचने पर, ये फिर अत्यंत पतली नलियों के रूप में विभाजित हो जाती हैं जिन्हें केशिकाएं कहते हैं ताकि, उत्तकों द्वारा ऑक्सीज़न आसानी से ली जा सके। जब ये केशिकाऐं ऊतकों से निकलती हैं ये ऊतकों से कार्बन डाई ऑक्साइड समृद्ध रक्त ले लेती हैं और शिराऐं बनाने के लिए संयुक्त हो जाती हैं। ये शिराऐं हृदय को रक्त ले जाती हैं। इस प्रकार केशिकाऐं धमनियों तथा शिराओं को जोड़ने के लिए एक नेटवर्क बनाती हैं। जो मानव शरीर के प्रत्येक भाग को रक्त की आपूर्ति करता है।
हृदय रक्त के परिवहन के लिए एक पंप का कार्य करता है। हृदय के चार कक्ष होते हैं। ऊपरी दो कक्ष आलिंद कहलाते हैं तथा निचले दो कक्ष निलय कहलाते हैं। कक्षों के बीच का विभाजन दीवार ऑक्सीज़न समृद्ध रक्त और कार्बन − डाइऑक्साइड से समृद्ध रक्त को परस्पर मिलने नहीं देती है।
(a) पादपों
में संवहन
उत्तकों के
दो प्रकार
जाइलम तथा
फ्लोएम हैं।
(b) पादप
मिट्टी से जल
तथा खनिज
पोषक तत्वों
को मूलों की
सहायता से
अवशोषित
करते हैं।
मूलों में
मूलरोम होते हैं
जो मूलों के
अवशोषण के
पृष्ठीय
क्षेत्रफल
को बढ़ा देते हैं।
जल फिर जाइलम
(जो नलियों का
सतत जाल
बनाता है) के
माध्यम से
पौधों के
ऊपरी भागों
में स्थानांतरित
हो जाता है।
ये मूलों को
तने तथा शाखाओं
के माध्यम से
पत्तियों से
जोड़ता है और इस
प्रकार, पानी तथा
अन्य पोषक
तत्व पादप के
सम्पूर्ण
भागों में
गति करते हैं।
(c) रंध्र पत्तियों की निचली सतह पर उपस्थित छिद्र या छोटे छिद्र होते हैं जो गैसों के आदान प्रदान के लिए उपयोग किए जाते हैं। यह छिद्र रंध्र के रूप में जाने जाते हैं जो रक्षक कोशिकाओं के युग्म द्वारा घिरी रहती है जो कि रंध्र के खुलने तथा बंद होने के लिए उत्तरदायी होती है। यह रंध्र उस समय खुला रहता है जब रक्षक कोशिका पानी से पूरी भरी हुई रहती है तथा उस समय बंद रहता है जब वाष्पीकरण के माध्यम से पानी की अधिकता रहती है। यह रक्षक कोशिकाएं रंध्र के पास आ जाती हैं।
i)
सही।
ii) गलत, फुफ्फुस
शिरा के भीतर
रक्त बायें
आलिन्द की ओर
वापस आता है।
iii) गलत,
स्पंद दर, हृदय
स्पंदन के
समान होती
है।
iv) सही।
v) गलत, हृदय
स्पंद को
सुनने के लिए
उपयोग किया
जाने वाला उपकरण
स्टेथोस्कोप
होता है।
(a) वाष्पोत्सर्जन
महत्वपूर्ण
होता है
क्योंकि:-
i. यह
मिट्टी से
पादपों के
शीर्ष तक
पानी के अंतर्ग्रहण
के लिए उत्तरदायी
होता है।
ii. यह
मूल (जड़) से
जल तथा विलेय
खनिज लवणों
को पादप के
विभिन्न
भागों तक पहुँचने
के लिए उत्तरदायी
होता है।
iii. इसके
परिणामस्वरूप,
पादप ठंडा
होता है।
(b) पत्तियों
से जल के
वाष्पन से
चूषण दाब विकसित
हो जाता है जो पानी
को लंबे
पेड़ों में
अधिक
ऊंचाईयों तक खींचता
है।
(c) रेगिस्तानीय
पादपों में, पत्तियों
को रंध्र की
संख्या कम
करने के लिए
काँटों में रूपांतरित
हो जाती हैं
और इस प्रकार,
वाष्पीकरण
द्वारा पानी
की कमी को रोकती
हैं।
A.
अलैंगिक जनन की
B.
लैंगिक जनन की
C.
कायिक प्रवर्धन की
D.
अनिषेकजनन की
विखंडन या क्लोनल विखंडन की एक विधि है जिसमें एक जीव दो या दो से अधिक खंडों में विभाजित हो जाता है।
A.
जंतुओं के द्वारा
B.
फलों के प्रस्फुटन से
C.
जल के द्वारा
D.
वायु के द्वारा