A. 1236 में जज़िया
B. 1236 में रजिया
C. 1236 में सुल्ताना
D. 1236 में जहां आरा
रज़िया सल्तनत काल में प्रथम महिला मुस्लिम शासक थी। वह सुलतान इल्तुतमिश की पुत्री थी। वह 1236 ईसवी में सिंहासन पर बैठी। वह दिल्ली की एकमात्र शासक थी जिसका चुनाव दिल्ली की जनता तथा अमीरों द्वारा किया गया था।
A. वेतन
B. भूमि अनुदान
C. सोना
D. चांदी
राजस्व को एकत्र करना राजस्व प्रशासन के कार्य में से एक था।
गंगा और यमुना नदियों के मध्य का उपजाऊ क्षेत्र दोआब कहलाता है।
किसी शहर अथवा बंदरगाह का समीपवर्ती क्षैत्र, जिसे इनके द्वारा वस्तुओं और सेवाओं की आपूर्ति की जाती है। अंतक्षेत्रों कहलाता है, चौकी शहर, सैनिकों से परिपूर्ण एक दुर्गीकृत शहर होता है।
खलजी और तुगलक सम्राटों ने सैन्य-सेनापतियों की,राज्यपालों के रूप में, भिन्न आकार के प्रदेशों में नियुक्ति की थी। ये भूमि इकता कहलाती थी ।
इब्न बतूता, मोरक्को, अफ्रीका से एक चौदहवीं सदी का यात्री था।
'उलेमा' इस्लामी शिक्षा के विद्वान थे। वे आम तौर पर रूढ़िवादी दृष्टिकोण के थे।
उस युग के इतिहासकार, मिन्हाज-ए-सिराज, का मानना था कि रज़िया, उसके सभी भाइयों से अधिक सक्षम एवं योग्य थी।
तोमर और चौहानों के अन्तर्गत दिल्ली एक महत्वपूर्ण व्यापारिक केंद्र बन गया।
दिल्ली सुल्तानों के अन्तर्गत प्रशासनिक कार्यों में इस्तेमाल की जाने वाली भाषा फारसी थी।
कुतुब-उद-दीन ऐबक गुलाम वंश का संस्थापक था।
मुहम्मद तुगलक ने अपनी राजधानी 'दिल्ली' में बेगमपुरी मस्जिद का निर्माण करवाया था।
मुहम्मद तुगलक की राजधानी परिवर्तन योजना के पीछे दो प्रमुख उद्देशों निम्नलिखित है
1 - देवगिरि को राजधानी बनाने से दक्षिण के प्रदेशों पर मुहम्मद तुगलक का पूर्ण नियन्त्रण बना रह सकता था।
2 - देवगिरि उसके साम्राज्य के लगभग मध्य में स्थित था इस दृष्टि से उसके द्वारा घोषित नई राजधानी मंगोल आक्रमण के खतरों के भी मुक्त रह सकती थी।
हुमायूं भारत का दूसरा मुगल सम्राट था। वह 1530 ईसवीं में गद्दी पर बैठा। हुमायूं ने अपने पिता की इच्छानुसार अपने साम्राज्य का बंटवारा किया और अपने भाइयों में प्रांत का समान रूप से बटवारा कर दिया। उसके भाई मिर्जा कामरान की महत्वाकांक्षा ने अफगान प्रतिद्वंद्वियों के खिलाफ हुमायूं के पक्ष को निर्बल बना 1529 ईसवीं में चौसा के युद्ध में और 1540 ईसवीं में कन्नौज के युद्ध में वह 'शाह सूरी' से पराजित हो गया था जिसने उसे ईरान पलायन करने के लिए बाध्य कर दिया। 1555 ईसवीं में सफाविद शाह की सहायता प्राप्त कर वह पुनः दिल्ली के सिंहासन पर आरूढ़ हो गया। उसी वर्ष में उसका निधन हो गया।
बाबर का वास्तविक नाम जहीरुद्दीन था।
1.वह मध्य एशिया में एक छोटे से राज्य 'फरगना' का शासक था। उसने भारत पर 5 बार आक्रमण किया था।
2. भारत की अथाह धन-संपदा और खराब राजनीतिक स्थिति और दिल्ली के अमीरों से प्राप्त निमंत्रण ने बाबर को दिल्ली आने के लिए प्रेरित किया।
3.उसने 1526 ईसवीं में पानीपत के मैदान में लोदी वंश के अंतिम सुल्तान इब्राहिम लोदी को पराजित किया।
4. उसने पानीपत के प्रथम युद्ध में तोपों का प्रभावी ढंग से इस्तेमाल किया।
5.1527 ईसवीं में उसने राणा सांगा को पराजित किया। 1528 ईसवीं में उसने चंदेरी के युद्ध में राजपूतों को पराजित किया।
6. उसकी मृत्यु से पूर्व वह आगरा और दिल्ली पर प्रभावी नियंत्रण स्थापित कर चुका था। 1530 ईसवीं में उसका निधन हो गया।
औरग्जेब ने सिंहासन पर बैठकर निम्न प्रथ्बंधों को लागू किया था जो इस प्रकार है :-
1. मदिरा, भांग के सेवन पर सार्वजनिक रोक ।
2. अनैतिकता के कार्यों को रकने के लिए मुहतस्सिब की नियुक्ति।
3. मुस्लिमों पर धार्मिक कर जकात धार्मिक कर लिया जा रहा था।
4. गैर से मुस्लिमों पर जजिया कर पुनः वसूलना प्रारंभ ।
5. उसने दरबारी नृत्य, संगीत पर भी रोक लगाईं किन्तु संगीत को राज्य से प्रतिबंधित नहीं किया । गया वह स्वयं एक सिद्धहस्त वीणावादक था ।
अकबर सदैव विद्वानों से विचार-विमर्श करता था। इस समय की राजभाषा फारसी थी। इस समय अबुल फजल, फौजी, बदायूनी उच्चकोटि के लेखक तथा साहित्यकार थे। अबुल फजल ने अकबरनामा की रचना की। महाभारत तथा रामायण का फारसी में अनुवाद किया गया। अब्दुर्रहीम खानखाना के हिंदी में लिखे दोहे आज भी लोकप्रिय हैं। गोस्वामी तुलसीदास ने रामचरित मानस की रचना अकबर के काल में ही की। अकबर काल में ही कागज पर लिखने का कार्य आरम्भ हो गया था।
अकबर को सुदृढ़ता की ज़रूरत थी। इसके लिए अकबर ने अपने सैनिक-अधिकारियों और सिपाहियों को सुगठित किया । उसने इन लक्ष्यों की पूर्ति मनसबदारी प्रणाली से की। शासन का काम चलाने वाले कई अधिकारी और करमचारियों को मनसबदार कहा जाता था। पुरे मुग़ल साम्राज्य में हजारों छोटे-बड़े मनसबदार यानी शासकीय अधिकारी व कर्मचारी थे। मनसबदार साम्राज्य में बादशाह के कानून और आदेश लागू करते थे। बादशाह के खिलाफ अगर कोई विद्रोह करे तो मनसबदार विद्रोह दबाते थे। मुग़ल साम्राज्य की रक्षा करना और दूसरे क्षेत्रों में मुग़ल वंश का राज्य फैलाना भी मनसबदारों का काम था। यह मनसबदार सम्राट के लिए घुड़सवारों की सेना बनाते थे एवं ज़रूरत पड़ने पर सम्राट के साथ युद्ध में भी जाते थे ।
शेरशाह पूर्वी भारत में अफगान का शासक था 1538 ई० में हुमायूँ ने शेरशाह से चुनर जीत लिया इसके बाद शेरशाह ने गौड़ पर विजय प्राप्त की और बंगाल पर अधिकार कर लिया शेरशाह के बढ़ते हुए प्रभाव से हुमायूँ सशंकित था हुमायूँ मुंगेर के पास गंगा नदी को पार कर शेरशाह की तरफ बढ़ा यह युद्ध चौसा नामक स्थान पर 1539 ई० में हुआ चौसा का युद्ध 1539 ई० में शेरशाह सुरी और हुमायूँ के साथ हुआ था यह युद्ध बहुत भीषण था इसमें हुमायूँ को अपनी जान बचाकर भागना पड़ा था शेरशाह ने दिल्ली और आगरा पर अधिकार कर लिया तथा शेरशाह सुरी भारत का शासक बना था ।
बहादुरशाह गुजरात का शासक था वह दिल्ली का साम्राज्य प्राप्त करना चाहता था उसने 1535 ई० में चित्तौड़ पर आक्रमण करके अपने अधीन कर लिया फिर बहादुरशाह ने हुमायूँ पर आक्रमण किया हुमायूँ भी आक्रमण की तलाश में उसका पीछा कर रहा था हुमायूँ से बचते हुए बहादुरशाह ने पुर्तगाली द्वीप में ड्यू में शरण ली हुमायूँ वापस चला गया इस मौके का लाभ उठाकर बहादुरशाह ने पुर्तगालियों की मदद से गुजरात पर पुनः अधिकार कर लिया ।
1. बाबर एक कुशल सेनापति और नेता था।
2. यद्यपि उसके पास छोटी सेना थी किन्तु उसने बड़ी-बड़ी सेनाओं को पराजित किया था।
3. उसके पास श्रेष्ठ सैन्य तकनीक और कौशल था।
4. बाबर एक निपुण कवि, लेखक और उत्कृष्ट संगीतकार था।
5. वह एक महान विद्वान और साहित्य-प्रेमी था।
6. उसने अन्य धर्मों के प्रति धार्मिक सहिष्णुता की नीति का पालन किया।
औरंगजेब के समय से ही मुग़ल साम्राज्य के पतन के चिन्ह दृष्टिगोचर होने लगे थे और मृत्यु के बाद से दो मुग़ल साम्राज्य का बड़ी तेजी के साथ विघटन होने लगा था औरंगजेब के उत्तराधिकारियों की अयोग्यता ने इस साम्राज्य की अंत्येष्टि ही कर दी मुग़ल साम्राज्य के पतन के कारण इस प्रकार थे :-
अयोग्य उत्तराधिकारी :- औरंगजेब की मृत्यु के बाद मुग़ल वंश में कोई भी योग्य शासक नहीं हुआ । उसके बाद के शासक भोग-विलाप में लीन हराते थे जिससे शासन मंत्रियों और अमीरों के हाथो में चला गया और मुग़ल वंश पतन की और अग्रसर हो गया।
उत्तराधिकारी नियम का आभाव :- मुग़ल शासन में उत्तराधिकार का नियम निश्चित नहीं था इससे सम्राट की मृत्यु के बाद उत्तराधिकार के लिए युद्ध होते थे और उनकी शक्ति क्षीण होती थी ।
रिक्त राजकोष :- शाहजहाँ के भवन निर्माण और औरंगजेब के दक्षिण अभियान में अत्यधिक धन का व्यय हुआ था जिससे राजकोष रिक्त होने लगा था । कृषि, व्यापार एवं उद्योग भी ठप होने लगे थे राजस्व व्यवस्था में सुधार नहीं हो रहे थे जिसका परिणाम राजकोष रिक्त होने था ।
सरदारों का नैतिक पतन :- औरंगजेब से पूर्व मुग़ल शासकों को मुग़ल सरदारों व अमीरों का पर्याप्त सहयोग मिला था जिसे फलस्वरूप मुग़ल साम्राज्य की विस्तार होता रहा । लेकिन औरंगजेब के काल में सरोदारों एवं अमीरों के सहयाग का आभाव था ।
औरंगजेब की दक्षिण नीति :- औरंगजेब की महत्वकांक्षा थी कि वह उत्तर और दक्षिण राज्यों पर अपने पूर्ण अधिकार स्थापित करे । इसलिए वह उत्तर कि विजय के बाद दक्षिण में अपनी शक्ति को बढ़ने लगा ।
औरंगजेब ने राजपूतों के प्रति अनुदार नीति का पालन किया था इससे राजपूतों में असंतोष और विद्रोह की भावना का विकास हुआ । औरंगजेब द्वारा अपनाई नीति इस प्रकार है :-
राठौर राजपूतों के प्रति नीति :- जोधपुर के राठौर नरेश राजा जसवंत सिंह की मृत्यु के बाद औरंगजेब ने उसके पुत्र राजा अजीतसिंह को उसका उत्तराधिकारी स्वीकार नहीं किया और अल्पवयस्क अजीत सिंह को शाही हरम में नज़रबंद करा दिया । इससे राठौर राजपूत सरदार औरंगजेब से असंतुष्ट हो गये।
दुर्गादास राठौर ने अजीतसिंह को शाही हरम से निकालकर जोधपुर की गद्दी पर बैठा दिया । इस पर औरंगजेब ने मारवाड़ पर आक्रमण कर दिया । राजपूत मुग़ल सेना का सामना न कर सके लेकिन दुर्गादास, अजीत सिंह को मेवाड़ ले जाने में सफल रहा मेवाड़ के राणा ने राठौर राजपूतों का पक्ष लिया। और एक सेना जोधपुर भेज दी इससे रुष्ट होकर 1679 ई० में औरंगजेब ने मेवाड़ पर आक्रमण कर दिया ।
अकबर का विद्रोह :- इस बीच औरंगजेब का पुत्र शहजादा अकबर अपने पिता से विद्रोह करके राजपूतों से आकर मिल गया लेकिन औरंगजेब ने कूटनीति का पता चल गया और दुर्गादास राठौर ने अकबर को मराठा सरदार शम्भाजी के पास पहुंचा दिया ।
मेवाड़ नीति :- अजीतसिंह के उत्तराधिकार के पश्न पर मेवाड़ के राणा राजसिंह मुगलों के शत्रु बन गये । 1679 ई० में उन्होंने मुगलों से पराजित होने के बाद उनसे छापामार लड़ाई जारी रखी । राणा राजसिंह की मृत्यु के बाद उसके उत्तराधिकारी जगतसिंह ने औरंगजेब से संधि का ली परन्तु राठौर राजपूत इस संधि से संतुष्ट नहीं थे । अतः 1698 ई० एस मुगलों और राजपूतों के मध्य युद्ध चलता रहा औरंगजेब की मृत्यु के बाद राठौर राजपूतों ने सम्पूर्ण मारवाड़ पर अधिकार का लिया औरंगजेब के उत्तराधिकारी बहादुरशाह ने अजीतसिंह के साथ संधि कर ली और उसे जोधपुर का स्वतंत्र शासक स्वीकार कर लिया ।
राज्य की आय के दो प्रधान साधन थे। भूमि का लगान तथा व्यापार पर कर। प्रत्येक गाँव का लगान निश्चित कर दिया गया था। किसानों से उपज का एक तिहाई भाग लगान के रूप में वसूल किया जाता था। किसी भी भूमि में एक निश्चित उपज न होने के कारण अकबर लगान का प्रबन्ध समय-समय पर करने के पक्ष में था। उसने भूमि की नाप कराकर लगान का लेखा बनाने का कार्य राजा टोडरमल को सौंपा। लगान की इस व्यवस्था से किसानों को सुविधा हुई। उनको मालूम रहता था कि उपज का कितना भाग उनको लगान में देना है।
कृषि एवं भूराजस्व प्रबन्धन -- कृषि मुग़ल बादशाहों कि समृद्धि का आधार थी। कृषि उपज की वृद्धि के लिए विशेष ध्यान दिया गया। इस समय एक ही खेत से विभिन्न फसलों का उत्पादन किया जाता था। कृषि क्षेत्र का विस्तार किया गया। भू-कर निर्धारण के लिए पूरे राज्य कि पैमाइश की गयी। भूमि की पैमाइश गज-ए-इलाही द्वारा की जाती थी। यह पूर्ववर्ती गज-ए-सिकंदरी का परिवर्तित रूप था। खेत के माप के लिए बीघा का प्रयोग होता था। एक बीघा साठ गज लम्बा व साठ गज चौड़ा होता था। अकबर ने इस मकसद से कुछ नए अधिकारियों की नियुक्ति की थी । केंद्र में दीवान वित्तीय नियन्तरण रखता था । प्रांतीय दीवान राजस्व वसूली व वयय का विवरण रखता था । परगने में आमिल राजस्व वसूली करता था व कानूनगो उपज व राजस्व का विबरण रखता था । फोतदार परगने के स्टार पर कोष की व्यवस्था करता था । वहीं ग्राम अधिकारियों में पटवारी राजस्व का विवरण रखता था ।
अकबर जानता था कि हिन्दुओं के सहयोग के बिना वह न तो साम्राज्य का विस्तार कर सकता था और न ही साम्राज्य पर अपना अधिकार बनाये रख सकता था। इसलिए उसने अनेक हिन्दुओं को मनसबदार बनाया इनमें अधिकांश राजपूत राजा थे। राजपूतों के साथ अकबर ने वैवाहिक सम्बन्ध बनाये तथा व्यक्तिगत सम्बन्ध स्थापित किये। अकबर की धार्मिक सहिष्णुता का परिचय फतेहपुर सीकरी में इबादत खाना के निर्माण से पता चलता है। जिसमें वह सभी धर्मों के गुरुओं से उनके धर्म की अच्छी बातों को सुनता और उन पर चर्चा करता। उसने इस्लाम, हिन्दू, फारसी, जैन, ईसाई आदि धर्मों की अच्छी बातों को लेकर एक नए धार्मिक मार्ग दीन-ए-इलाही की रुपरेखा बनाई। इसका उद्देश्य एकता स्थापित करना था। अकबर ने सुलहकुल की नीति अपनाई जिससे इतने बड़े राज्य का काम शांतिपूर्ण ढंग से चल सके तथा सब लोगों का समर्थन मिलता रहे। इस नीति को अकबर के बाद आने वाले मुग़ल बादशाहों ने भी अपनाया। इस नीति पर हम भक्ति एवं सूफी आन्दोलनों का स्पष्ट प्रभाव देख सकते हैं। इस नीति का पालन करते हुए राजमहल में अकबर ने हिन्दू, पारसी आदि धर्मों की कुछ रीतियाँ माननी शुरू कर दीं। गीता, महाभारत, अथर्ववेद, बाइबिल, कुरान, पंचतंत्र, सिंहासनबत्तीसी व विज्ञान की भी कई पुस्तकों का फारसी भाषा में अनुवाद कराया गया ताकि फारसी बोलने वाले मुसलमान उन्हें पढ़कर समझ सकें। अकबर ने हिन्दुओं पर से यात्रा तथा जजिया कर हटा दिया। उसने गैर मुसलमानों के धर्म परिवर्तन की प्रथा को समाप्त किया। इन कार्यों से उसने एक ऐसे साम्राज्य की आधारशिला रखी जो बिना किसी भेदभाव के सभी लोगों के सामान अधिकारों पर आधारित था। इस प्रकार अकबर के शासनकाल में राज्य अनिवार्य रूप से धर्म निरपेक्ष, सामाजिक विषयों में उदार और चेतना तथा सांस्कृतिक एकता को प्रोत्साहन देने वाला बन गया है।
मुग़ल अधिकारी ज़िम्मेदारी
दीवान वित्तीय नियन्तरण
आमिल राजस्व वसूली
फोतदार कोष की व्यवस्था
पटवारी राजस्व का विवरण
मुकद्दम कानून एवं व्यवस्था
कानूनगो उपज एवं राजस्व का विवरण
क. हेमू
ख. बैरम खान
ग. अहमदनगर
घ. कोतवाल
ड़. तुलसीदास
च. गुजरात
पानीपत का तीसरा युद्ध भारतीय इतिहास में महत्वपूर्ण स्थान रखता है इस युद्ध ने भारत में मुगलों का मार्ग प्रशस्त किया 1526 ई० में बाबर ने पानीपत नामक स्थान पर इब्राहीम लोदी से युद्ध किया इस युद्ध में बाबर ने अपनी बारूदी तोपों का प्रयोग किया बाबर के पास कुशल घुड़सवार सेना थी उसकी सेना छोटी थी परन्तु अच्छी तरह प्रशिक्षित थी बाबर व उसकी सेना को अनेक युद्धों का अनुभव था बाबर ने अपनी सेना का बड़ी कुशलता के साथ संचालन किया इब्राहीम लोदी इस युद्ध में मारा गया और बाबर की विजय हुई दिल्ली तथा आगरा का क्षेत्र बाबर के अधीन हो गया इस प्रकार बाबर ने इब्राहीम लोदी को हराकर भारत मी एक नये वंश मुग़ल वंश की स्थापना की इसके बाद बाबर ने मवाद के शासक राणा सांगा को खानवा के युद्ध में पराजित किया उसने 1528 ई० में चन्देरी के शासक मेदिनीराय को, अफगान सरदारों को घाघरा के युद्ध में १५२९ ई० में पराजित किया मुगलों ने भारत में लगभग 200 वर्षों तक शासन किया ।
बाबर की मृत्यु के बाद हुमायूँ सिंहासन पर बैठा था उसे सिंहासन पर बैठते ही अनेक कठिनाइयों का सामना करना पड़ा उसके मुख्य शत्रु अफगान शासक थे बहादुरशाह गुजरात का शासक तथा
उसने 1535 ई० में चित्तौड़ पर आक्रमण करके अपने अधीन कर लिया फिर बहादुरशाह ने हुमायूँ पर आक्रमण किया हुमायूँ भी आक्रमण की तलाश में उसका पीछा कर रहा था हुमायूँ से बचते हुए बहादुरशाह ने पुर्तगाली द्वीप में ड्यू में शरण ली हुमायूँ वापस चला गया इस मौके का लाभ उठाकर बहादुरशाह ने पुर्तगालियों की मदद से गुजरात पर पुनः अधिकार कर लिया
शेरशाह पूर्वी भारत में अफगान का शासक था चौसा का युद्ध 1539 ई० में शेरशाह सुरी और हुमायूँ के साथ हुआ था यह युद्ध बहुत भीषण था इसमें हुमायूँ को अपनी जान बचाकर भागना पड़ा था शेरशाह ने दिल्ली और आगरा पर अधिकार कर लिया तथा शेरशाह सुरी भारत का शासक बना था शेरशाह की मृत्यु के उपरान्त हुमायूँ ने दिल्ली को पुनः प्राप्त करने के लिए प्रयास किये फारस के शासक की मदद से हुमायूँ ने पहले कंधार, पंजाब, आगरा और दिल्ली पर कब्ज़ा किया इस प्रकार उसने भारत में सफलता प्राप्त की।
क. पानीपत का युद्ध 1526 ई० में
ख. खानवा का युद्ध 1527 ई० में
ग. चन्देरी का युद्ध 1528 ई० में
घ. घाघरा का युद्ध 1529 ई० में
ड़. चौसा का युद्ध 1539 ई० में
च. कन्नौज का युद्ध 1540 ई० में
क. मध्य एशिया
ख. राणा सांगा
ग. कलम
घ. साहित्यकार
ड़. पूर्वी
च. चौसा नामक
A. ईंट के कुएं
B. झीलें
C. सीढ़ीदार कुएं
D. तालाब
आठवीं से तेरहवीं शताब्दी के बीच हर भवन सीढ़ीदार कुंओं (बावली) से जुड़े होते थे। ये कुएं इस काल के भवनों की एक महत्वपूर्ण विशेषता बन गए थे।
A. भगवान राजराजेश्वरम
B. भगवान शिव।
C. भगवान कृष्ण।
D. भगवान बुद्ध।
एक अभिलेख से इस बात का संकेत मिलता है कि तंजावूर में राजराजेश्वर मंदिर का निर्माण राजा राजदेव ने अपने देवता राजराजेश्वरम की उपासना हेतु किया था।
मुहम्मद तुगलक की प्रशासनिक भूमिका और उसकी योजनाओं की विफलताओं के लिए मुख्य कारण उत्तरदायी थे-
1. कश्मीर में उसके अभियान एक भीषण आपदा के शिकार हुए थे, जिसके पश्चात उसने ट्रांसऑक्सीआना पर आक्रमण करने की अपनी योजनाओं का परित्याग कर दिया था।
2. दिल्ली से दौलताबाद राजधानी का स्थानांतरण एक खराब निर्णय था।
3. गंगा यमुना के क्षेत्र में अकाल का पड़ना और करों में वृद्धि ने एक व्यापक विद्रोह का नेतृत्व किया।
4. अंततः टकसाल पर नियंत्रण न रखने के कारण सांकेतिक मुद्रा की विफलता इस हेतु उत्तरदायी कारण था।
भारतीय इतिहास में मुहम्मद तुगलक का व्यक्तित्व सर्वाधिक विविदास्पद रहा है । कुछ विद्वानों के मतानुसार वह पागल था और कुछ इतिहासकारों के अनुसार वह पागल नहीं वरन बुद्धिमान एवं गुणी था । वास्तव में उसका दोष यह था कि वह लोगो और अवसर को पहचाने कि क्षमता नहीं रखता था इसलिए वह अपने जीवन में असफल रहा उसकी योजनाओं को लोग ने काल्पनिक योजनाओं कि संज्ञा दी है ।
मध्यकालीन भारतीय इतिहास का एक विचित्र बादशाह था । उसकी योग्यता, विद्वत्ता, सैनिक सुशालता और न्यायाप्रिया असंदिग्ध थी तथापि उसके चरित्र कि कुछ आधारभूत दुर्बलताओं ने उसकी बुद्धिमत्तापूर्ण प्रशासनिक योजनाओं को असफल बना दिया । बरनी तथा इब्नेबतूता जैसे समकालीन इतिहासकार उसके चरित्र को समझ सके और अपने अपने ढंग से उसके चरित्र का वर्णन कर डाला समस्त इतिहासकारों ने सुल्तान को ध्यान में रखकर उसके चरित्र का विश्लेषण किया और उसके चरित्र कि अंतर्निहित शक्तियों को उजागार करने में असफल रहे । यदि मुहम्मद तुगलक को अपनी योजनाओं में सफलता मिल गई होती तो संभवतः उसका चरित्र इतना विवादास्पद विषय कदापि न होता ।सुल्तान के चरित्र का मापदंड यही हो सकता है कि वह योग्यता, विद्वता और विभिन्न गुणों का स्वामी होते हुए भी एक अभागा शासक था ।
मुहम्मद-बिन-तुगलक ने अपने साम्राज्य के कल्याण के लिए महत्वपूर्ण योजनाओं को चलाया था वे निम्न प्रकार है :-
दोआब में कर वृद्धि :- मुहम्मद-बिन-तुगलक ने अपने राज्य की आय बढ़ाने के लिए गंगा एवं यमुना के बीच समृद्ध एवं उर्वरक भूमि दोआब में कर बढ़ाने का एक प्रयोग किया उसने वहाँ भूमिकर में वृद्धि की तथा कुछ अन्य करों की भी वसूली शुरू कर दी जिस समय कर लगाया गया । उस समय भयानक अकाल पड़ा था परन्तु निरंकुश शासक के भय से अधिकारियों ने सुल्तान को जानकारी नहीं दी । इन कारणों से लोगो ने कर देने से इन्कार कर दिया अतः सुल्तान की कर बढ़ाने की योजना असफल हो गयी ।
राजधानी परिवर्तन :- सुल्तान ने कुशल प्रशासन के लिए द्वितीय राजधानी की योजना बनाई थी । सुल्तान ने देवगिरि का नाम बदल कर दौलताबाद रखा राजधानी परिवर्तन में लोगो को बहुत कठिनाइयों का सामना करना पड़ा । दौलताबाद की जलवायु दिल्ली के लोगो के अनुकूल नहीं थी इसलिए द्वितीय राजधानी की योजना भी असफल रही ।
सांकेतिक मुद्रा का प्रचलन :- सुल्तान ने विश्व में चाँदी उत्पादन में आई कमी से चाँदी के सिक्कों के स्थान पर ताँबे एवं पीतल से मिश्रित धातु की सांकेतिक मुद्रा के सिक्के चलाये थे । लोगो ने इस मुद्रा को घर पर की तैयार कर लिया और बाजार में इस मुद्रा की अधिकता हो गयी । विदेशी व्यापारियों ने इस मुद्रा को लेने से इन्कार कर दिया इस के बदले में सुल्तान को राजकोष में चाँदी के सिक्कों को देना पड़ा इस प्रकार यह योजना भी असफल रही।
दिल्ली सल्तनत के सुल्तानों में अलाउद्दीन खिलजी को सर्वश्रेष्ट शासक कहा जाता है। वह न केवल उच्च कोटि का प्रबन्धक था बल्कि एक महान् विजेता भी था। अलाउद्दीन में एक सैनिक कमाण्डर तथा अच्छे प्रशासक के गुण थे। उसका शासन शक्ति पर आधारित था। अलाउद्दीन खिलजी ने उत्तर व दक्षिण भारत में अपने साम्राज्य का विस्तार किया। वह समस्त भारत का एकछत्र सम्राट बनने का इच्छुक था।
दक्षिणी भारत की विजय - सुल्तान जलालुद्दीन खिलजी के शासन काल में भी अलाउद्दीन खिलजी दक्षिण के देवगिरि राज्य पर आक्रमण करके वहाँ से बहुत अधिक धन - दौलत लूट कर लाया था। वह महत्वकांक्षी सुल्तान था। उसने दक्षिण की राजनीतिक दशा को देखा और मलिक काफूर को दक्षिण के राज्य जीतने का कार्यभार सौंपा। उसकी दक्षिण विजयों का वर्णन निम्नलिखित शीर्षकों में किया जा सकता है -
देवगिरि पर आक्रमण - 1306 ई. मलिक काफूर ने देवगिरि की ओर प्रस्थान किया। राजा रामचन्द्र देव ने डटकर उसका सामना किया। वह हार गया और दिल्ली लाया गया। अलाउद्दीन ने उसका स्वागत किया। रामचन्द्र देव ने सुल्तान से सन्धि कर ली और फिर उसने दिल्ली साम्राज्य के विरूद्ध कभी विद्रोह की बात नहीं सोची।
तेलंगाना की विजय - 1308 ई. में मलिक ने वारंगल का घेरा डाला। राजा हार गया और सन्धि हो गई। राजा ने 300 हाथी, 7000 घोड़े तथा बहुत अधिक सम्पत्ति भेंट में दी।
द्वारसमुद्र की विजय - 1310 ई. में मलिक काफूर ने द्वारसमुद्र पर आक्रमण किया। वहाँ का राजा असावधान था। उसने अधीनता स्वीकार कर ली।
पाण्डव राज्य की विजय - पाण्डव राज्य के दो भाइयों में उत्तराधिकारी का झगड़ा चल रहा था। अतः शासन कमजोर था। मदुरा पहुँचकर मलिक काफूर ने नगर को खूब लूटा और रामेश्वर की ओर बढ़ा। वहाँ उसने एक मस्जिद बनवाई। 1310 ई. में अपार धन के साथ वह दिल्ली लौट आया।
देवगिरि पर पुनः आक्रमण - देवगिरि के शासक शंकर देव ने दिल्ली राज्य से स्वतन्त्र होना चाहा उसने वार्षिक कर देना बन्द कर दिया। 1311 ई. में मलिक काफूर ने पुनः आक्रमण किया। शंकर देव हार गया और मारा गया। मलिक काफूर अपना अन्तिम अभियान समाप्त कर दिल्ली की ओर चला गया।
खलजी और तुगलक सम्राटों ने विभिन्न आकार के प्रांतो के राजयपाल के रूप में सैन्य सेनापतियों की नियुक्ति की थी। ये प्रांत-भूमि इक्ता कहलाती थी और भूमि-धारक इक्तेदार अथवा मुक्ति कहलाते थे। वे दिल्ली के सुल्तान को सैन्य सेवाएँ प्रदान किया करते थे। वे बदले में इन भूमि से राजस्व एकत्र कर सकते थे और उनके वेतन के रूप में इसका एक हिस्सा रख सकते थे। वे इस राजस्व से अपने सैनिकों का भी भुगतान किया करते थे। मुक्तियों द्वारा एकत्र किये गये राजस्व की राशि की जाँच करने हेतु राज्य द्वारा लेखाकार नियुक्त किए गए थे, इस बात का भी ख्याल रखा जाता था कि मुक्तियों द्वारा मात्र राज्य द्वारा निर्धारित करों को ही एकत्र किया जाए और यह भी कि उनके द्वारा सैनिकों की एक आवश्यक संख्या की व्यवस्था की जा रही है अथवा नहीं, राजाओं द्वारा सामंत अभिजात वर्ग को उनकी अधीनता(सत्ता) स्वीकार करने हेतु बाध्य किया जाता था।
'प्राईमस इन्टेपेरिस' से तात्पर्य समान जनों में प्रमुख व्यक्ति है। लोदी सुलतान विशेषकर बहलोल लोदी ने इसी का पालन किया। अफगान लोग अपने कबायली नियमों का पालन करते थे । बहलोल लोदी सुल्तान होते हुए भी अपने सरदारों के साथ खता पीता था व उनके घरों में भी जाता था उसने शासक वाला अधिकार नही जताया था । इस की वजह से जब उसके उत्तराधिकारी शासक बने उन्होंने इस वजह से काफी परेशानियों का सामना करना पड़ा । सिकंदर लोदी जिसने बहलोल के बाद सत्ता संभाली एक शक्तिशाली शासक था उसने इन सरदारों की ताकत को क्षति पहुँचाने के मकसद से साम्राज्य की राजधानी को दिल्ली से बदल कर आगरा कर लिया । उसने सरदारों का मिलना व वैवाहिक संबंधों को भी नियंत्रित करने का प्रयास किया । इब्राहीम लोदी जो दुर्भाग्य से इस वंश का आखिरी शासक था उसने इन सरदारों पर कड़े प्रतिबन्ध लगाये जिससे वे अपनी शक्ति का दुरूपयोग न कर सकें । इन सरदारों को यह बात अच्छी नहीं लगी जिस कारण उन्होंने विद्रोह कर दिया । कुछ सरदार अत्यधिक रुष्ट थे तथा राज्य पाने के लोभ में उन्होंने काबुल के शासक बाबर से मिलकर षड्यंत्र किया । बाबर ने योजनानुसार भारत पर आक्रमण किया व 1526 में पानीपत की प्रथम लड़ाई में उसने इब्राहीम लोदी को हराकर भारत में मुग़ल साम्राज्य की नींव रखी ।
फ़िरोज़ शाह तुगलक ने जौनपुर शहर की स्थापना की थी। मलिक सरवर ने जौनपुर को सबसे पहले स्वतंत्र राज्य घोषित किया। उसे फ़िरोज़ ने विद्रोह का उन्मूलन करने के लिए भेजा था। परन्तु कमज़ोर उत्तराधिकारियों के कारण उसने अपनी स्वतंत्रता घोषित कर दी। शीघ्र ही जौनपुर का साम्राज्य पश्चिम में अलीगढ़ तक पहुँच गयी। इसके शासकों ने दिल्ली के शासकों खास कर सैयद वंश को कड़ी चुनौती दी। दिल्ली पर तैमुर के आक्रमण के बाद तैमुर ने सरवर को "सुल्तान उस शर्क" की उपाधि प्रदान की मलिक सरवर के बाद मुबारक शाह नया शासक बना वह पहला शर्क शासक था जिसने सुल्तान की उपाधि धारण की थी। उसने अपने नाम से सिक्के व खुतबा पढवाया था जिससे वह वैधानिक शासक बन गया।
उसके बाद उसका छोटा भाई इब्राहीम शाह नया शासक बना। इब्राहीम शाह शर्की वंश का सबसे महान शासक था। उसने साम्राज्य विस्तार करना चाहा परन्तु उसे विफलता ही हाथ लगी। उसके पुत्र महमूद शाह ने दिल्ली पर भी आक्रमण किया परन्तु उसे बहलोल लोदी ने परास्त कर दिया।
इस वंश के शासकों ने सामाजिक तथा आर्थिक सुधार किये थे । उन्होंने कई निर्माण कार्य भी करवाए थे जिनमे से जौनपुर स्थित अटाला मस्जिद प्रमुख है। जो अपने विशिष्ट स्थापत्य के लिए जानी जाती है ।
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क. |
फ़िरोज़ शाह |
आगरा |
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ख. |
खिज्र खान |
शर्की वंश |
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ग. |
बहलोल |
सैयद वंश |
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घ. |
मलिक सरवर |
लोदी वंश |
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ड़. |
सिकंदर |
तुगलक वंश |
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च. |
नसीरुद्दीन महमूद |
जौनपुर |
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क. |
फ़िरोज़ शाह |
जौनपुर |
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ख. |
खिज्र खान |
सैयद वंश |
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ग. |
बहलोल |
लोदी |
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घ. |
मलिक सरवर |
शर्की वंश |
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सिकंदर |
आगरा |
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च. |
नसीरुद्दीन महमूद |
तुगलक वंश |
क. 1398
ख. मलिक सरवर
ग. महमूद गज़नी
घ. सैयद
ड़. सिकंदर
च. बाबर
A. शेरशाह
B. अलाउद्दीन खिलजी
C. मोहम्मद तुगलक
D. सिकंदर लोदी
शेरशाह बिहार में रियासत का शासक था। शेरशाह ने बाबर की ओर से पानीपत की पहली लड़ाई में इब्राहिम लोदी के खिलाफ लड़ाई लड़ी थी। उसने मुगल सम्राट हुमायूँ को हराया जो बाबर का सबसे बड़ा पुत्र और उत्तराधिकारी था और अपना शासन स्थापित किया।
A. इटली
B. मोरक्को
C. पुर्तगाल
D. फारस
इब्न-बतूता एक यात्री था, वह 1333 ईस्वी में मुहम्मद बिन तुगलक के शासनकाल के दौरान आया था। रेहला उनके यात्रा वृत्तांतों की पुस्तक का नाम है। वह न्यायशास्त्र के इस्लामी कानून में पारंगत था; इसलिए, मुहम्मद तुगलक ने उन्हें दिल्ली का क़ाज़ी नियुक्त किया।
A. चौहान राजपूतों
B. परमार राजपूतों
C. सिसोदिया राजपूतों
D. हिंदुशाही वंश
चित्तौड़ के शासकों ने मुगलों के अधीन अधीनस्थ शासकों के रूप में शासन करने के लिए अकबर की पेशकश को स्वीकार करने से इनकार कर दिया। इसने उनका मुगलों के साथ संघर्ष शुरु हो गया। 1568 में, सिसोदिया राजाओं की राजधानी पर कब्जा कर लिया गया था।
A. अबुल फजल
B. फैजल
C. टोडर मल
D. अकबर
'अकबरनामा', अकबर के शासनकाल के तीन खंड में इतिहास अबुल फजल ने लिखा था। इसमें, 'ऐन-ए अकबरी' तीसरा खंड है।
A. मेहरुनिसा
B. नुरुनिसा
C. जेबेउनिसा
D. शमसुनिसा
नूरजहाँ, जिसने 1611 में मुगल सम्राट जहाँगीर से शादी की थी, मूल रूप से मेहरुनिसा के रूप में जानी जाती थी।
A. बाबर
B. जहाँगीर
C. शाहजहाँ
D. अकबर
1571 में, अकबर ने फतेहपुर सीकरी का निर्माण किया। यह आगरा में स्थित है। इसमें, कई भवन परिसर थे। इस नवनिर्मित शहर में प्रवेश बुलंद दरवाजे से होता था, जिसका निर्माण अकबर ने गुजरात पर अपनी जीत के उपलक्ष में किया था।
A. सुलह-ए कुल
B. दीन-ए-इलाही
C. जवाबित
D. मनसबदारी
'सुलह-ए कुल' का अर्थ है "सार्वभौमिक शांति", जो सहिष्णुता का विचार था, और वह अपने शासन में विभिन्न धर्मों के लोगों के बीच भेदभाव नहीं करता था।
A. चौहान
B. सिसोदिया
C. परमार
D. गहढ़वाल
सिसोदिया वंश के शासकों ने, लंबे समय तक, मुगल को, उनके नियमों को नहीं मानने से, नाराज किया। बाद में, वे पराजित हो गए, लेकिन उनसे मुगलों द्वारा स्नेहपूर्वक व्यवहार किया गया। उन्हें अपनी वतन जागीरें भी दी गईं।
A. शाहजहाँ
B. जहाँगीर
C. अकबर
D. औरंगजेब
दिल्ली में प्रसिद्ध लाल किला शाहजहाँ द्वारा बनवाया गया था। लाल किला शाहजहाँ के बाद मुगल सम्राटों का आधिकारिक निवास था। इसका निर्माण लाल पत्थर का उपयोग करके किया गया था।
A. जोधाबाई
B. हरखा बाई
C. मानबाई
D. मनुबाई
हरखा बाई कछवाहा राजकुमारी और अम्बर के राजपूत शासक की बेटी थी। अकबर ने भारत में मुगल शासन को मजबूत करने के लिए वैवाहिक गठबंधन की स्थापना की। अकबर ने अपने प्रशासन में राजपूतों को ऊंचे पद दिए।
A. बाबर
B. हुमायूँ
C. अकबर
D. शाहजहाँ
बाबर पहला मुगल सम्राट था। उसने 1526 में पानीपत की पहली लड़ाई में इब्राहिम लोदी को हराने के बाद एक विशाल साम्राज्य की स्थापना की।
A. प्रांत
B. ज़िला
C. तालुक़
D. गाँव
आईन-ए-अकबरी में मुगल साम्राज्य के प्रशासनिक तंत्र की जानकारी विस्तार से दी गई है। इसमें दर्ज है कि साम्राज्य को कई प्रांतों में बांटा गया था जिन्हें सूबा कहा जाता था।
A. फैज्दारों के लिए था।
B. जागीरदारों के लिए था ।
C. मनसबदारों के लिए था
D. काजी के लिए था।
ज़ब्ती प्रथा मुग़ल सम्राटों ने मनसबदारों के लिए अपनाई थी मृतक मनसबदारों की सम्पत्ति पर उसके पुत्रों अथवा संबंधियों के स्थान पर राज्य का अधिकार माना जाता था ।
A. व्यापार से ।
B. सेना से ।
C. राजस्व से ।
D. धर्म से ।
जात और सवार का सम्बन्ध सेना से होता है । मनसबदारी प्रथा में जात और सवार होते है जात और सवार का अर्थ
1. जात पद का अर्थ है पैदल सैनिक ।
2. सवार पद का अर्थ है घुड़सवार ।
A. जजिया था ।
B. खम्स था।
C. जकात था।
D. खिराज था।
जजिया कर उन हिन्दुओं पर लगता था जो इस्लाम धर्म स्वीकार नहीं करते थे । राज्य की आय में इस कर से पर्याप्त वृद्धि होती थी। धनिक वर्ग से 48 टंका, माध्यम वर्ग से 24 टंका और साधारण लोगों से 12 टंका जजिया कर लिया जाता था।
A. बाबर ने चलाया था।
B. अकबर ने चलाया था।
C. हुमायूँ ने चलाया था।
D. औरंगजेब ने चलाया था।
अकबर ने सभी धर्मों का समान रूप से आदर किया तथा सभी धर्मों में एकता स्थापित करने के लिए दीन-ए-इलाही नामक धर्म चलाया था ।
A. किसान थे ।
B. उलेमा थे ।
C. सामंत थे
D. दास थे ।
मध्य वर्ग - इसमें सामंत, मुस्लिम अमीर, जमीदार तथा जागीरदार आदि आते थे यह उच्च वर्ग के बाद का वर्ग था ।
A. बाबर ने की थी ।
B. हुमायूँ ने की थी ।
C. अकबर ने की थी ।
D. औरंगजेब ने की थी ।
मुग़ल वंश का संस्थापक बाबर तुर्की एवं फारसी का बड़ा विद्वान था बाबरनामा उसकी प्रसिद्द रचना है मुग़ल-काल में फारसी ग्रंथों की रचनाओं का बाहुल्य रहा इस काल में अनेक हिंदी एवं संस्कृत के ग्रंथों का फारसी भाषा में अनुवाद किया गया ।
शाहजहां वर्ष 1628 ई. में मुगल बादशाह बना था।
सम्राट जहांगीर ने 1605 से 1627 ईसवी तक शासन किया था।
सम्राट जहांगीर के पिता अकबर थे।
राणा सांगा खानवा के युद्ध के दौरान राजपूतों का नेता था।
शेर खान उर्फ शेर शाह सूरी ने चौसा के युद्ध में हुमायूं को पराजित किया था।
जहाँगीर ने नूरजहाँ से 1611 ई० में विवाह किया था।
मुकद्धम
मुगल पितृ पक्ष से तैमूर के वंशज थे। मातृ पक्ष से चंगेज खां के वंशज। उनकी मातृ भाषा तुर्की थी।
मंगोल शब्द से।
जहीरुदीन बाबर
पितृपक्ष से तैमूर के वंशज होने के कारण मुगल शासक स्वंय को तैमूरी कहते थे।
हुमायूँनामा गुलबदन की कृति है ।
मनसबदारी प्रथा का प्रचलन मुग़ल काल में था ।
A. सिंहली राजा।
B. चालुक्य राजा।
C. बौद्ध भिक्षु।
D. चीनी यात्री।
इतिहासकार धम्मकित्ति ने पांडय राजा द्वारा श्री लंका पर आक्रमण का उल्लेख किया है । उन्होने उल्लेखित किया है कि अन्य बहुमूल्य वस्तुओं के साथ पांडय राजा बुद्ध की सोने की मूर्ति भी ले गए थे। उन्होने आगे लिखा है कि अगले शासक सेन द्वितीय ने उसके सेनापति को पराजय का बदला लेने के लिए पांडयों की राजधानी मदुरै पर आक्रमण करने का आदेश दिया।
A. चिकनी
B. घुमावदार और कोणीय।
C. घनाकार
D. बेलनाकार और चिकनी।
घुमावदार और कोणीय सतह का निर्माण उस युग की निर्माणाकृतियों को नया आयाम देने के लिए किया गया था।
A. चौकी जिस पर राजा का सिंहासन रखा जाता था।
B. शाही प्रहरी के खड़े होने का स्थान।
C. राज्य का प्रवेश द्वार।
D. दिशा जिस ओर मुसलमान प्रार्थना करते हैं।
'क़िबला' एक दिशा होती है जिसकी ओर मुख करके सभी मुसलमान मस्जिद में प्रार्थना करते हैं।
A. गंगा
B. यमुना
C. गोमती
D. हिंडोन
ताजमहल का निर्माण शाहजहाँ द्वारा यमुना नदी के तट पर करवाया गया था । स्थापत्य की सुंदरता में वृद्धि करने हेतु इस स्थल का चुनाव किया गया था । .
A. कुतुबुद्दीन बख्तियार काकी
B. कुतुबुद्दीन ऐबक
C. इल्तुतमिश
D. फिरोज शाह
दिल्ली के प्रथम मुस्लिम शासक कुतुबुद्दीन ऐबकए ने कुतुब मीनार का निर्माण सन 1199 में आरम्भ करवाया था परन्तु केवल इसका आधार ही बनवा पाया। उसके उत्तराधिकारी इल्तुतमिश ने इसमें तीन मंजिलों को बढ़ाया और बाद में फीरोजशाह तुगलक ने इसकी पाँचवीं और अन्तिम मंजिल बनवाई। कुतुब मीनार यूनेस्को की विश्व धरोहर सूची में शामिल है। यह भारत-इस्लामी वास्तुकला का प्राचीनतम उदाहरण है।
A. स्थापत्य
B. नृत्य
C. चित्रकला
D. परिधान
7 वीं शताब्दी से 10 वीं शताब्दी के मध्य में खिड़कियो और दरवाजों का निर्माण अभी भी दो खड़े स्तंभों पर आड़ी बल्ली को रखकर किया जाता था। इस शैली को ट्रीबीएट अथवा कॉर्बल्ड कहा जाता था ।
A. एक विशाल बगीचा
B. नदी पर स्थित एक बगीचा
C. चार बगीचे
D. पाँच बगीचे
कृत्रिम नहरों द्वारा चार समान हिस्सों में बँटे होने के कारण ये चारबाग कहलाते थे ।
A. वास्तुकलात्मक तकनीक
B. लेखा रजिस्टर
C. आठ लेखकों की परिषद
D. फारसी ग्रंथ का नाम ।
अकबर के शासनकाल में वास्तुकारों द्वारा इस वास्तुकलात्मक तकनीक को अपनाया गया था। इनकी प्रेरणा अकबर के वास्तुशिल्पियों ने उसके मध्य एशियाई पूर्वज तैमूर के मकबरों से ली। इस तकनीक में एक केंद्रीय कक्ष, आठ कमरों से घिरा होता था। हुंमायु के मकबरे में सबसे पहली बार इस तकनीक को देखा गया था।
A. बाग
B. कक्ष
C. ऊंचे प्रवेशद्वार
D. अनुष्ठानिक सभागार
केंद्रीय गुंबद, जो बहुत ऊँचा था और ऊँचा मेहराबदार प्रवेशद्वार जिसे पिश्तक कहा जाता था मुगल वास्तुकला के महत्त्वपूर्ण रूप बन गए। हुंमायु के मकबरे में सबसे पहली बार इस तकनीक को देखा गया था।
A. जट्वर्मन सुंदर पाण्डेय
B. श्रीमर श्री वल्लभ
C. नेदूंजेलियन
D. नन मारन
बोद्ध परंपरा के अनुसार पांडय राजा श्रीलंका राज्य की बहुमूल्य वस्तुओं के साथ बुद्ध की सोने की मूर्ति भी ले गए थे। श्रीलंका पर आक्रमण राजा सेन प्रथम (831-851) के समय में हुआ था।
A. कलिंग
B. पाल
C. चालुक्य
D. सेन
चोल राजा राजेंद्र प्रथम ने गंगा क्षेत्र के अनेक शासकों को पराजित किया था। चोल राजा राजेंद्र प्रथम ने अपनी राजधनी में शिव मंदिर का निर्माण करवाया था तो उसने पराजित शासकों से जब्त की गई उत्कृष्ट प्रतिमाओं से इसे भर दिया।
A. वावड़ी
B. मेहराब
C. छत
D. बालकनी
7 वीं शताब्दी से 10 वीं शताब्दी के मध्य में खिड़कियो और दरवाजों का निर्माण अभी भी दो खड़े स्तंभों पर आड़ी बल्ली को रखकर किया जाता था। इस शैली को ट्रीबीएट अथवा कॉर्बल्ड कहा जाता था ।
A. राजेन्द्र प्रथम
B. राज राज चोल
C. कारिकाल चोल
D. गंगैकोण्ड चोल
महमूद गजनी ने भारत पर 17 बार आक्रमण किया था । उसके आक्रमण का उद्देश्य भारत के खजाने को लौटना और लूटे गए धन का प्रयोग कर गजनी की सुंदरता में वृद्धि करना था। राजेन्द्र चोल , चोल वंश के शक्तिशाली राजाओं में से एक था। उसने श्री विजय साम्राज्य को पराजित किया और एक शक्तिशाली सेना खड़ी कर साम्राज्य को सशक्त बताया।
A. इंद्रा
B. शिव
C. विष्णु
D. ब्रह्मा
मध्यकाल के पूर्वार्द्ध में, कई लघु देवत और आदिवासीयों के देवताओं को प्रमुख देवताओं के साथ सम्बद्ध किया जाने लगा था। उदाहरण के लिए, जगन्नाथ भगवान को विष्णु के साथ सम्बद्ध किया गया इसी तरह, भैरव को भगवान शिव के साथ सम्बद्ध किया गया था।
A. औरंगजेब।
B. बलबन।
C. मुहम्मद बिन साम।
D. महमूद गजनी।
महमूद गजनी ने भारत पर 17 बार आक्रमण किया था । उसके आक्रमण का उद्देश्य भारत के खजाने को लौटना और लूटे गए धन का प्रयोग कर गजनी की सुंदरता में वृद्धि करना था। मंदिरों को विनष्ट करने के कारण उसे बुतशिकन की उपाधि प्राप्त थी। साथ ही उसे इस्लाम के महान नायक होने का श्रेय भी प्राप्त है।
A. ईंट के कुएं
B. झीलें
C. सीढ़ीदार कुएं
D. तालाब
आठवीं से तेरहवीं शताब्दी के बीच हर भवन सीढ़ीदार कुंओं (बावली) से जुड़े होते थे। ये कुएं इस काल के भवनों की एक महत्वपूर्ण विशेषता बन गए थे।
A. भगवान राजराजेश्वरम
B. भगवान शिव।
C. भगवान कृष्ण।
D. भगवान बुद्ध।
एक अभिलेख से इस बात का संकेत मिलता है कि तंजावूर में राजराजेश्वर मंदिर का निर्माण राजा राजदेव ने अपने देवता राजराजेश्वरम की उपासना हेतु किया था।
A. सिंहली राजा।
B. चालुक्य राजा।
C. बौद्ध भिक्षु।
D. चीनी यात्री।
इतिहासकार धम्मकित्ति ने पांडय राजा द्वारा श्री लंका पर आक्रमण का उल्लेख किया है । उन्होने उल्लेखित किया है कि अन्य बहुमूल्य वस्तुओं के साथ पांडय राजा बुद्ध की सोने की मूर्ति भी ले गए थे। उन्होने आगे लिखा है कि अगले शासक सेन द्वितीय ने उसके सेनापति को पराजय का बदला लेने के लिए पांडयों की राजधानी मदुरै पर आक्रमण करने का आदेश दिया।
A. तंजावूर
B. चेन्नई
C. मदुरै
D. कन्याकुमारी
वास्तुकारों ने मंदिर के शीर्ष तक भारी पत्थर पहुँचाने के लिए चढ़ाईदार रास्ता बनवाया जाता था । रोलरों द्वारा भारी पत्थरों को इस रास्ते से ऊपर ले जाया जाता था। आज भी मंदिर के पास के एक गाँव को चारूपल्लम कहा जाता है, जिसका शाब्दिक अर्थ है -चढ़ाईदार रास्ते का गाँव।
A. स्वर्ण मंदिर
B. सिस गंज गुरुद्वारा
C. बंगला साहिब
D. हेमकुंड साहिब
सिखों द्वारा हरमंदर साहब को पवित्र समझा जाता है क्योंकि सिख धर्म के सनातन गुरु श्री गुरु ग्रंथ साहिब सर्वदा यहाँ उपस्थित रहते हैं ।
मुग़ल वंश का संस्थापक बाबर था |
सम्राट अकबर ने हिन्दुओं पर लगने वाला जजिया कर समाप्त कर दिया था ।
पानीपत का प्रथम युद्ध 1526 ईसवीं में लड़ा गया था।
पानीपत के प्रथम युद्ध में बाबर की सफलता के लिए निम्नलिखित कारण उत्तरदायी थे:
1. मजबूत तोपखाना जो सैन्य युद्ध सामग्री में एक नई शुरूआत थी और एक सुप्रशिक्षित घुड़सवार सेना।
2 अच्छा रणकौशल- बाबर ने अपने सैनिकों की व्यवस्था इस तरह से की थी कि वे आसानी से एक स्थान से दूसरे स्थान पर पहुँच सकते थे।
बाबर और राजपूतों के बीच निम्न दो युद्ध लड़े गए थे जिसमें बाबर ने राजपूतों को पराजित किया था-
1. 1527 में खानवा के युद्ध में।
2. 1528 में चंदेरी के युद्ध में।
बाबर ने पानीपत के प्रथम युद्ध में इब्राहिम खान लोदी को पराजित किया। युद्ध में इब्राहिम और उसके 15,000 सैनिकों की मृत्यु हो गई। बाबर दिल्ली और हिंदुस्तान का सम्राट बन गया।