चांदी का टंका, दिल्ली सल्तनत के प्रथम वास्तविक शासक इल्लतुत्मिश द्वारा प्रारम्भ किया गया था और कांसे का सिक्का,मोहम्मद बिन तुगलक द्वारा सांकेतिक मुद्रा के रूप में चलाया गया था।
राल्फ फिच, मुगल काल में भारत आया था और उसने कहा था कि फतेहपुर सीकरी और आगरा दोनों लंदन से बड़े थे।
इब्नबतूता 14 वीं सदी में भारत आया था और वह आठ वर्षों तक मोहम्मद बिन तुगलक के दरबार में रहा था।
शिल्प और वाणिज्य में वृद्धी से और धन के उपयोग में वृद्धि से मध्ययुगीन काल के दौरान कई शहरों की अर्थव्यवस्था और समृद्धि में अभिवृद्धी की। उत्तर भारत में महत्वपूर्ण शहर थे, आगरा, दिल्ली, ग्वालियर, कन्नौज, और पूर्वी भारत में, ढाका, राजमहल और पटना, दक्षिण भारत में, मालाबार, तमिलनाडु, दौलताबाद, दाभोल, और आगे पश्चिम भारत में, अहमदाबाद, खंभात और गुजरात के अधिकांश भाग समृद्ध हो गए।
तीन भिन्न प्रकार के नगरीय केन्द्रों की पहचान निम्न रूप में की जा सकती है :
1.प्रशासनिक शहर- दिल्ली, आगरा, लाहौर, आदि।
2.वाणिज्यिक और उत्त्पादक कस्बे -दौलताबाद, पटना, अहमदाबाद, मुज़िरिस,आदि।
3.तीर्थ शहर-बनारस, कांचीपुरम, मथुरा,
हम्पी, विजयनगर साम्राज्य की राजधानी, की वास्तुकला प्रकृति में कुछ विशिष्ट थी।वहां के शाही भवनों में शानदार मेहराब और ऊँचे गुंबद बने हुए थे।वहा स्तम्भ वाले र्कइ विशाल हाल थे जिनमें मूर्तियाँ रखने के लिए आले बने हुए थे। वहां सुनियोजित बाग़-बगीचे भी थे, जिनमें कमल और टोडो की आकृति वाले मूर्तिकला के नमूने थे।
मसूलीपट्टनम नगर 17 वीं सदी के दौरान गहन गतिविधि का एक केंद्र था। हॉलैंड आरै इंग्लैंड दोनों देशों की ईस्ट इंडिया कंपनियों ने मसूलीपट्टनम पर नियंत्रण प्राप्त करने का प्रयत्न किया, क्योंकि तब तक वह आंध्र तट का सबस महत्वपूर्ण पतन बन गया था।
विभिन्न व्यापारिक समूहों के बीच कड़े मुकाबले– गोलकुंडा के कुलीन वर्गों, फारसी सौदागरों, तेलेगु कोमटी चेट्टियार और यूरोपीय व्यापारियों ने नगर को घनी आबादी वाला और समृद्धशाली बना दिया।
इस तकनीक में सबसे पहले मोम की एक मूर्ति बनाई जाती थी। इसे चिकनी मिट्टी से पुरी तरह लीप कर सूखने के लिए छोड़ दिया जाता था। जब वह पूरी तरह सूख जाती थी तो उसे गर्म किया जाता था आरै उसके मिट्टी के आवरण में एक छोटा-सा छेद बना कर उस छदे के रास्तेसारा पिघला हुआ मोम बाहर निकाल लिया जाता था। फिर चिकनी मिट्टी के खाली साँचे में उसी छेद के रास्ते पिघली र्हुइ धातु भर दी जाती थी। जब वह धातु ठंडी होकर ठासे हो जाती थी, तो चिकनी मिट्टी के आवरण को सावधानीपवूर्क हटा दिया जाता था आरै उसमें से निकली मूर्ति को साफ करके चमका दिया जाता था।
सोलहवीं और सत्रहवीं शताब्दियों में, जहाँ यूरोपीय कंपनियों की शक्ति में वृद्धि देखि गयी, वहीँ शिल्पकारों की स्वतंत्रता को भी ख़त्म होते देखा गया। शिल्पीजन पेशगी की प्रणाली पर काम करन लगे, जिसका अर्थ यह था कि उन्होंने जिन यूरोपीय एजेंटों से पहले ही पेशगी ले ली थी, उन्ही के लिए उन्हें कपड़ा बनुना हातेा था। अब बनुकरों को अपना कपडा़ या बर्नुाइ के नमूने बेचने की स्वतंत्रता नहीं थी। उन्हें तो कंपनी के एजेंटों द्वारा निर्धारित डिजाईन के कपड़े उन्ही की मांग के अनुसार बनाने पड़ते थे।
शिल्प और वाणिज्य में वृद्धि से और धन के उपयोग में वृद्धि से मध्ययुगीन काल के दौरान कई शहरों की अर्थव्यवस्था और समृद्धि में अभिवृद्धि की। उत्तर भारत में महत्वपूर्ण शहर थे, आगरा, दिल्ली, ग्वालियर, कन्नौज, और पूर्वी भारत में, ढाका, राजमहल और पटना, दक्षिण भारत में, मालाबार, तमिलनाडु, दौलताबाद, दाभोल, और आगे पश्चिम भारत में, अहमदाबाद, खंभात और गुजरात के अधिकांश भाग समृद्ध हो गए।
तीन भिन्न प्रकार के नगरीय केन्द्रों की पहचान निम्न रूप में की जा सकती है :
1.प्रशासनिक शहर- दिल्ली, आगरा, लाहौर, आदि।
2.वाणिज्यिक और उत्त्पादक कस्बे -दौलताबाद, पटना, अहमदाबाद, मुज़िरिस,आदि।
3.तीर्थ शहर-बनारस, कांचीपुरम, मथुरा, आदि।
1.चोल कांस्य मूर्तियों में कौनसी तकनीक का इस्तेमाल किया गया था?
2.कांसे का निर्माण कैसे किया जाता है?
3.घंटा(बेल) धातु, कांसे से भिन्न कैसे होता है? [1+1+2=4]1.“
2.कांसा, तांबा और टिन की एक मिश्र धातु है।
3.घंटा(बेल) धातु
यह एक घंटी की तरह ध्वनि उत्त्पन्न करता है ।
मध्य एशिया के महान सूफी ग़ज़्ज़ली, रूमी और सादी थे।
संचरित्र लेखन आमतौर पर एक संत या साधु व्यक्ति की जीवनी होती है, यह आमतौर पर उनके जीवन के आदर्श रूप को प्रस्तुत करने अथवा उनकी साधुता का औचित्य सिद्ध करने हेतु लिखी जाती है।
अप्पार, सुन्दरर, सम्बन्दर और मणिक्कवसगर कुछ प्रसिद्ध नयनार संत थे।
63 नयनार संत थे, वे विभिन्न जाति पृष्ठभूमि और व्यवसायों से आये थे। उनमें से कुछ कुम्हार, किसान, शिकारी, सैनिक, ब्राह्मण और मुख्याधिकारी थे।
शिव, विष्णु और दुर्गा ईस्वी सन के दौरान लोगों द्वारा पूजे जाने वाले प्रमुख देवता थेA
शंकरदेव असम से थे और उन्होंने विष्णु की भक्ति एवं समर्पण पर बल दिया था
12 अलवार संत थे, सर्वाधिक विख्यात अलवार संतों में पेरियालवार एवं उसकी पुत्री अनादल, तोंदरादिप्पोडी अलवार एवं नम्मालवार थे, इनके गीत दिव्य प्रबन्धम् में संकलित किये गए थे, ये आज भी अनेक मंदिरों में गाये जाते हैं।
अलवार एवं नयनार संत बौद्ध एवं जैन के आलोचक थे और उन्होंने प्रचार किया कि शिव और विष्णु के प्रति भक्ति मोक्ष का मार्ग है ।
सातवीं और नौवीं सदियों के दौरान नए धार्मिक आंदोलनों का नेतृत्व नयनार संतों जो शिव के प्रति एवं अलवार संतों जो विष्णु के प्रति समर्पित थे, ने किया था ।
सातवीं और नौवीं सदियों के दौरान नए धार्मिक आंदोलनों का उदभव हुआ जिसका नेतृत्व नयनार एवं अलवार संतों ने किया थाA ये धार्मिक नेता पुलैयर और पानर जैसी अछूत जातियों सहित भिन्न जातियों से सम्बंधित थे
बहुत से लोग मनुष्य के जन्मजात कुलीन और उच्च जाति से होने की धारणा से संतुष्ट नहीं थे, इसलिए अधिकाँश लोगों ने बौद्ध धर्म और जैन धर्म का अनुसरण करना आरम्भ कर दिया था, बाद शुरू कर दिया यही कारण है कि था, इन दोनों धर्मों ने इस धारणा पर काबू पाने में उनकी सहायता की
स्थान जहाँ पर सिख धार्मिक मण्डली और गुरु नानक के अनुयायियों के धार्मिक समारोह आयोजित किये जाते थे, धर्मसाल कहलाते थे, यहाँ पर निर्धनों को भोजन भी कराया जाता था, अंततः हर सिख घर एक धर्मशाला बन गया था, अब यह गुरुद्वारा के रूप में जाना जाता है
सत्रहवीं शताब्दी में सिक्ख आन्दोलन का राजनीतिकरण शुरू हो गया, जिसका दूरगामी परिणाम यह हुआ कि 1699 में गुरु गोबिंद सिंह ने खालसा की सस्ंथा का निर्माण किया। ‘खालसा पंथ’ के नाम सेजाना जाने वाला सिक्ख समदुाय अब एक राजनैतिक सत्ता बन गया।
दसवीं से बारहवीं सदियों के बीच, चोल और पांड्यन राजाओं ने अनेक धार्मिक स्थलों पर विशाल मंदिर बनवाये, जहाँ की संत-कवियों ने यात्रा की थी। इस प्रकार भक्ति परंपरा और मंदिर पूजा के बीच गहरे सम्बन्ध स्थापित हो गए।
शंकरदेव असम से थे और उन्होंने विष्णु की भक्ति एवं समर्पण पर बल दिया था। उन्होंने असमिया में कविताओं और नाटकों की रचना की और नामघर अथवा सस्वर पाठ और प्रार्थना गृहों की स्थापना की थी। जहाँ सब समतुल्य थे और सब ईश्वर का सामीप्य प्राप्त करना चाहते थे।
वीरशैव आंदोलन बारहवीं शताब्दी के मध्य में कर्नाटक में शुरू हुआ था। यह बसावन्ना और उनके साथियों यथा अल्लामा प्रभु और अक्कामहादेवी द्वारा शुरू किया गया था।
12 अलवार संत थे। सर्वाधिक विख्यात अलवार संतों में पेरियालवार एवं उसकी पुत्री अनादल, तोंदरादिप्पोडी अलवार एवं नम्मालवार थे। इनके गीत दिव्य प्रबन्धम् में संकलित किये गए थे। ये आज भी अनेक मंदिरों में गाये जाते हैं।
अलवार एवं नयनार संत बौद्ध एवं जैन के आलोचक थे और उन्होंने प्रचार किया कि शिव और विष्णु के प्रति भक्ति मोक्ष का मार्ग है।
सातवीं और नौवीं सदियों के दौरान नए धार्मिक आंदोलनों का नेतृत्व नयनार संतों जो शिव के प्रति एवं अलवार संतों जो विष्णु के प्रति समर्पित थे, ने किया था।
A. कथक।
B. कुचिपुड़ी।
C. ओडिसी।
D. भरतनाट्यम।
ओडिसी नृत्य उड़ीसा राज्य में लोकप्रिय है|
A. मुगल चित्र।
B. लघु चित्र।
C. शैव परंपरा।
D. वैष्णव परंपरा।
कांगड़ा चित्रों में प्रेरणा का स्रोतवैष्णव परंपराथा|
नाथ संन्यासि थे|
बंगाल के ब्राह्मणों द्वारा मछली का उपभोग करने की अनुमति ब्रिहद्धार्मा पुराण में दी गई है|
A. ओडिशा।
B. राजस्थान।
C. बिहार।
D. छत्तीसगढ़।
जगन्नाथ मंदिर ओडिशा राज्य में स्थित है|
A. तमिल भाषा।
B. तेलुगु भाषा।
C. कन्नड़ भाषा।
D. संस्कृत भाषा।
मलयालम की पहली साहित्यिक कृतिया संस्कृत भाषाजैसी दिखती है|
A. कोटा।
B. कांगड़ा।
C. बसोहली।
D. पहाड़ी।
बसोहली चित्रकला शैली १७ वी सदी में हिमालय की पहाड़ी के पास विकसित किया गया था|
A. नृत्य रूप।
B. पारंपरिक चित्र।
C. लोक नाटक।
D. संगीत के रूप में।
राधा-कृष्ण की रासलीला को लोक नाटकों द्वारा प्रस्तुत किया गया ।
अवध का आखिरी नवाब वाजिद अली शाह था|
ब्राह्मण अधिकारियों ने बंगाल के ब्राह्मणों को मछली खाने की अनुमति दी|
लिलातिलाकम व्याकरण और काव्यशास्त्र पर आधारित है|
कथक जाति पारंपरिक रूप से कहानी वाचक होते थे |
रसमंजरी के लेखक भानुदत्त थे|
लिलातिलाकम 14 वी शताब्दी में लिखी गए थी |
A. चोल
B. पन्दयास
C. चेर
D. चालुक्यों
महोदयापुरम राज्य चेरद्वारा स्थापित किया गया था|
A. नाथ साहित्य।
B. हरि साहित्य।
C. शिव साहित्य।
D. ओम साहित्य।
माय्नामती और गोपीचन्द्र के गीत एक साथ नाथ साहित्य बनाते है|
नादिर शाह के आक्रमण और 1739 में दिल्ली की विजय के परिणामस्वरूप, मैदानों की संदिग्धता से बचने के लिए, मुगल कलाकारों ने पहाड़ियों की ओर पलायन किया था
लघुचित्र, सूक्ष्म आकार के चित्र होते हैं, प्रायः कपड़े या कागज पर जलीय रंगों (वॉटर कलर)के साथ बनाये जाते हैं
लघु चित्रों में, दरबार के दृश्य, युद्ध अथवा शिकार के दृश्य, और सामाजिक जीवन के अन्य पहलुओं को दर्शाया जाता था।
साधारण महिला एवं पुरुष, बर्तन, दीवारों, फर्श और कपड़ों पर चित्रकारी करते थे, ये कलात्मक कार्य,महलों में सावधानीपूर्वक संरक्षित लघु चित्रों की तुलना में कभी कभी जीवित(सुरक्षित)रह पाते हैं
1586 में जब अकबर ने बंगाल को जीत लिया, तो उसे ‘सूबा’ माना जाने लगा। उस समय प्रशासन की भाषा तो फारसी थी, लेकिन बंगाली एक क्षेत्रीय भाषा के रूप में विकसित हो रही थी।
घास फूस से निर्मित झोपड़ियों की दोहरी छप्परदार संरचना डोचला कहलाता है।
बंगाल के तेरहवीं सदी के संस्कृत ग्रन्थ बृहद् धर्म पुराण ने स्थानीय ब्राह्मणों को मछली की कुछ किस्मों को खाने की अनुमति प्रदान की थी।
कोलू तेल निकालने वाले एवं कंसारी घंटा-धातु के निर्माण में योगदान करने वाले कार्यकर्ता होते हैं। उन्होंने बंगाल में मंदिरों के निर्माण में अपना योगदान दिया था।
पीर, संत अथवा सूफी और अन्य धार्मिक व्यक्तित्व होते हैं। उनका पंथ बहुत लोकप्रिय हो गया था एवं उनके धार्मिक स्थलों को बंगाल में हर स्थान पर पाया जा सकता है।
लघुचित्र, सूक्ष्म आकार के चित्र होते हैं। प्रायः कपड़े या कागज पर जलीय रंगों (वॉटर कलर)के साथ बनाये जाते हैं।
लघु चित्रों में, दरबार के दृश्य, युद्ध अथवा शिकार के दृश्य, और सामाजिक जीवन के अन्य पहलुओं को दर्शाया जाता था।
साधारण महिला एवं पुरुष, बर्तन, दीवारों, फर्श और कपड़ों पर चित्रकारी करते थे, ये कलात्मक कार्य,महलों में सावधानीपूर्वक संरक्षित लघु चित्रों की तुलना में कभी-कभी जीवित(सुरक्षित) रह पाते हैं।
अकबर, जहांगीर और शाहजहां जैसे मुगल सम्राटों ने लघु चित्रकारी को संरक्षण प्रदान किया था
कथक, अवध के नवाब, वाजिद अली शाह के संरक्षण में एक प्रमुख कला के रूप में विकसित हुआ था
शब्द कथक संस्कृत शब्द 'कथा' से लिया गया है, जिसका अर्थ "एक कहानी" होता है और इस प्रकार शब्द कत्थक का अर्थ कथाकार होता है, जो मंदिरों में पौराणिक कथाएँ सुनाता है, एवं परमानंद की स्थिति में उन पर नृत्य करता है।
1230 में, राजा अनंगभीम तृतीय ने, उड़ीसा के पुरी में जगन्नाथ के देवता को अपना राज्य समर्पित किया था है और स्वयं को ईश्वर का प्रतिनिधि घोषित किया था।
चेर शासको ने शिलालेखों में मलयालम भाषा एवं लिपि की शुरुआत की गई थी।
1586 में जब अकबर ने बंगाल को जीत लिया, तो उसे ‘सूबा’ माना जाने लगा। उस समय प्रशासन की भाषा तो फारसी थी, लेकिन बंगाली एक क्षेत्रीय भाषा के रूप में विकसित हो रही थी।
घास फूस से निर्मित झोपड़ियों की दोहरी छप्परदार संरचना डोचला कहलाता है।
बंगाल के तेरहवीं सदी के संस्कृत ग्रन्थ, बृहद् धर्म पुराण ने स्थानीय ब्राह्मणों को,मछली की कुछ किस्मों को खाने की अनुमति प्रदान की थी।
कोलू तेल निकालने वाले एवं कंसारी घंटा-धातु के निर्माण में योगदान करने वाले कार्यकर्ता होते हैं। उन्होंने बंगाल में मंदिरों के निर्माण में अपना योगदान दिया था।
पीर, संत अथवा सूफी और अन्य धार्मिक व्यक्तित्व होते हैं, उनका पंथ बहुत लोकप्रिय हो गया था एवं उनके धार्मिक स्थलों को बंगाल में हर स्थान पर पाया जा सकता है।
भानुदत्ता द्वारा लिखित सर्वाधिक लोकप्रिय ग्रन्थ रसमंजरी का हिमाचल प्रदेश की लघु चित्रकला में वर्णन किया गया है।
कत्थक, उत्तर भारत के मंदिरों में कहानीकारों की एक जाति होती थी, वे ग्रामीण इलाकों और मंदिर प्रांगण में अपना प्रदर्शन किया करते थे,वे ज्यादातर शास्त्रों से पौराणिक और नैतिक कथाओं को सुनाने में पारंगत हुआ करते थे, वे, अपने हाथ की मुद्राओं एवं चेहरे के हाव-भाव के साथ अपने गायन को अलंकृत किया करते थे।
अकबर, जहांगीर और शाहजहां जैसे मुगल सम्राटों ने लघु चित्रकारी को संरक्षण प्रदान किया था
कथक, अवध के नवाब, वाजिद अली शाह के संरक्षण में एक प्रमुख कला के रूप में विकसित हुआ था
शब्द कथक संस्कृत शब्द 'कथा' से लिया गया है, जिसका अर्थ "एक कहानी" होता है, और इस प्रकार शब्द कत्थक का अर्थ कथाकार होता है, जो मंदिरों में पौराणिक कथाएँ सुनाता है, एवं परमानंद की स्थिति में उन पर नृत्य करता है।
1230 में, राजा अनंगभीम तृतीय ने, उड़ीसा के पुरी में जगन्नाथ के देवता को अपना राज्य समर्पित किया था है और स्वयं को ईश्वर का प्रतिनिधि घोषित किया था।
चेर द्वारा,शिलालेखों में मलयालम भाषा एवं लिपि की शुरुआत की गई थी।
1586 में जब अकबर ने बंगाल को जीत लिया, तो उसे ‘सूबा’ माना जाने लगा। उस समय प्रशासन की भाषा तो फारसी थी, लेकिन बंगाली एक क्षेत्रीय भाषा के रूप में विकसित हो रही थी।
बंगाल के तेरहवीं सदी के संस्कृत ग्रन्थ, बृहद् धर्म पुराण ने स्थानीय ब्राह्मणों को,मछली की कुछ किस्मों को खाने की अनुमति प्रदान करी थी।
घास फूस से निर्मित झोपड़ियों की दोहरी छप्परदार संरचना, दोचला कहलाता है
कोलू तेल निकालने वाले एवं कंसारी घंटा-धातु के निर्माण में योगदान करने वाले कार्यकर्ता होते हैं, उन्होंने, बंगाल में मंदिरों के निर्माण में अपना योगदान दिया था
पीर, संत अथवा सूफी और अन्य धार्मिक व्यक्तित्व होते हैं, उनका पंथ बहुत लोकप्रिय हो गया था एवं उनके धार्मिक स्थलों को बंगाल में हर स्थान पर पाया जा सकता है
नादिर शाह के आक्रमण और 1739 में दिल्ली की विजय के परिणामस्वरूप, मैदानों की संदिग्धता से बचने के लिए, मुगल कलाकारों ने पहाड़ियों की ओर पलायन किया था
नादिर शाह के आक्रमण और 1739 में दिल्ली की विजय के परिणामस्वरूप मैदानों की संदिग्धता से बचने के लिए मुगल कलाकारों ने पहाड़ियों की ओर पलायन किया था।
लघुचित्र, सूक्ष्म आकार के चित्र होते हैं। प्रायः कपड़े या कागज पर जलीय रंगों (वॉटर कलर) के साथ बनाये जाते हैं।
लघु चित्रों में दरबार के दृश्य, युद्ध अथवा शिकार के दृश्य और सामाजिक जीवन के अन्य पहलुओं को दर्शाया जाता था।
साधारण महिला एवं पुरुष, बर्तन, दीवारों, फर्श और कपड़ों पर चित्रकारी करते थे, ये कलात्मक कार्य महलों में सावधानीपूर्वक संरक्षित लघु चित्रों की तुलना में कभी कभी जीवित(सुरक्षित) रह पाते हैं।
अकबर, जहांगीर और शाहजहां जैसे मुगल सम्राटों ने लघु चित्रकारी को संरक्षण प्रदान किया था।
कथक अवध के नवाब वाजिद अली शाह के संरक्षण में एक प्रमुख कला के रूप में विकसित हुआ था।
शब्द कथक संस्कृत शब्द 'कथा' से लिया गया है, जिसका अर्थ "एक कहानी" होता है और इस प्रकार शब्द कत्थक का अर्थ कथाकार होता है, जो मंदिरों में पौराणिक कथाएँ सुनाता है एवं परमानंद की स्थिति में उन पर नृत्य करता है।
1230 ई0 में, राजा अनंगभीम तृतीय ने उड़ीसा के पुरी में जगन्नाथ के देवता को अपना राज्य समर्पित किया था है और स्वयं को ईश्वर का प्रतिनिधि घोषित किया था।
चेर द्वारा,शिलालेखों में मलयालम भाषा एवं लिपि की शुरुआत की गई थी।
आदिवासी समाज की मुख्य विशेषताएं निम्नानुसार हैं:
1 जनजातीय समाज नातेदारी सम्बन्धों द्वारा एकजुट होते हैं।
2 आदिवासी समाज में पुरुषों और समूहों के बीच कोई पदानुक्रम नहीं होता है।
3 आदिवासी समाजों में मजबूत, जटिल, औपचारिक संगठन अनुपस्थित होता है।
4 आदिवासी समाजों में भूमि पर सामुदायिक स्वामित्व होता है।
प्राचीन अहोम राज्य की एक साधारण अर्थव्यवस्था थी, अहोमों का प्राथमिक व्यवसाय कृषि था, उन्होंने आर्द्र चावल की खेती करने का एक नया तरीका ईजाद किया, युद्ध के दौरान लगभग अधिकांश पुरुष सेना में अपनी सेवाएं देते थे। सामान्य स्थिति में वे स्वयं को तटबंधों, सिंचाई प्रणाली के निर्माण और अन्य सार्वजनिक कार्यों के निर्माण में व्यस्त रखते थे।
पंजाब की दो प्रभावशाली जनजातियां थीं :
(क) खोखर जनजाति- यह 13 वीं और 14 वीं सदी में एक प्रभावशाली जनजाति थी।
(ख) गक्खर जनजाति।
जनजातिय समाज की मुख्य विशेषताएं इस प्रकार हैं: 1. प्रत्येक जनजाति के सदस्य नातेदारी के बंधन से जुड़े होते थे 2. जनजातिय समाजों में पुरुषों और समूहों के बीच कोई पदानुक्रम नहीं होता है। 3. सशक्त, जटिल, औपचारिक संगठन जनजातिय समाजों में अनुपस्थित रहे हैं।
4. जनजातीय समहू, संयुक्त रूप से भूमि आरै चरागाहों पर नियंत्रण रखतेथेआरै अपनेखदु के बनाये नियमों के आधार पर परिवारों के बीच इनका बटँवारा करते थे।
शुरुआत में अहोम लोग, अपने जनजातीय देवताओं की उपासना करते थे। लेकिन धीरे-धीरे, उन्होंने उस समय में ब्रह्मपुत्र घाटी में प्रचलित वैष्णव धर्म को अपनाया।
राजाओं द्वारा मंदिरों और ब्राह्मणों को भूमि अनुदान में दी गयी।सिब सिंह (1714-44)के काल में हिन्दू धर्म वहाँ का प्रधान धर्म बन गया था। लेकिन अहोम राजाओं ने हिन्दू धर्म को अपनाने के बाद अपनी पारंपरिक आस्थाओं को पूरी तरह से नहीं छोड़ा था और उनके पैतृक धर्म के संरक्षण के द्वारा एक सामंजस्यपूर्ण संतुलन बनाये रखा।
अहोम समाज, कुलों में विभाजित था, जिन्हें ‘खले’ कहा जाता था। वहाँ दस्तकारों की बहुत कम जातियाँ थीं। इसलिए, अहोम क्षेत्र में दस्तकार निकटवर्ती क्षेत्रों से आए थे। एक खेल के नियंत्रण में प्रायः कई गाँव होते थे। किसान को अपने ग्राम समुदाय के द्वारा जमीन दी जाती थी। समुदाय की सहमति के बगैर राजा तक इसे वापस नहीं ले सकता था।
गोंड समाज का स्वरूप बड़े राज्यों के उदभव के साथ परिवर्तित हो गया था-
1 इससे कबीले की पहचान कमजोर पड़ गई थी एवं गोंड समाज का असमान सामाजिक वर्गों में क्रमिक विभाजन हो गया था।
2. ब्राह्मण समाज में एक प्रमुख वर्ग बन गया था क्योंकि उन्हें गोंड राजाओं से भूमि अनुदान के रूप में प्राप्त हुई थी।
3 गोंड राजा, राजपूतों के रूप में मान्यता प्राप्त करने हेतु इच्छुक थे, उन्होंने राजपूतों के साथ वैवाहिक संबंध बनाने शुरू कर दिए।