एक निश्चित तापमान पर जब किसी जलीय विलयन में विलेय की और अधिक मात्रा घुल जाएँ तो उसे असंतृप्त विलयन कहते हैं |
चालन में चालनी का उपयोग किया जाता है । चालन में छोटे कण चालनी में से निकल जाते हैं जबकि बड़े कण चालनी में ही रह जाते हैं ।
मिश्रण
के दो गुण
1.
मिश्रण
में घटक किसी
भी अनुपात
में मिले
होते हैं ।
2.
मिश्रण
के घटकों को
पृथक किया जा
सकता है ।
जल के वाष्प में रूपान्तरण की प्रक्रिया वाष्पन कहलाती है । यह सभी तापमानों पर होती है । उदाहरण: जब समुद्री जल गड्ढों में भर जाता है तो जल सूर्य की ऊष्मा अवशोषित कर वाष्प में रूपांतरित हो जाता है एवं ठोस लवण शेष रह जाते हैं ।
हस्त चयन उस समय किया जाता है, जब मिश्रण के अवयव आकार, रंग आदि में अंतर के कारण स्पष्ट रूप से अलग-अलग दिखाई दे । इन्हें आसानी से अलग किया जा सकता है ।
मिश्रण में उपस्थित ठोस पदार्थों के भार में अंतर होने पर निष्पावन विधि का उपयोग किया जाता है ।
उदाहरण-
दाल या चावल में उपस्थित पत्थरों को हस्त-चयन से पृथक किया जा सकता है । जबकि अनाज से भूसे का पृथक्करण निष्पावन विधि से किया जाता है ।
हमें नींबू पानी में बर्फ चीनी मिलाने के बाद डालनी चाहिए क्योंकि उच्च तापमान पर चीनी को घोला जाना आसान होता है तथा बर्फ डालने पर नींबू पानी का तापमान कम हो जाता है और चीनी को घोलना आसान नहीं होता है |
जब मिश्रण के दो अवयव आपस में अघुलनशील होते हैं तो उन्हें पृथक करने के लिए निस्तारण विधि का उपयोग किया जाता है । अघुलनशील विलेय के कण तली में बैठ जाते हैं और द्रव को दूसरे पात्र में उड़ेल दिया जाता है ।
समुद्र जल से नमक प्राप्त करने के लिए वाष्पन विधि का उपयोग किया जाता है । द्रव के वाष्प में रूपान्तरण की प्रक्रिया वाष्पन कहलाती है ।
(i) वायु के प्रवाह का उपयोग कर मिश्रण के भारी एवं हल्के अवयवों को पृथक करने की विधि, निष्पावन कहलाती है ।
(ii) मिश्रण के अवयवों के भार में अंतर के कारण ही निष्पावन संभव हो पता है ।
(iii) किसान अनाज से भूसे को पृथक करने के लिए सामान्यतया निष्पावन विधि का उपयोग करते हैं ।
मिश्रण के ठोस अवयवों के आकार में अंतर होने पर इन्हें चालन विधि से पृथक किया जाता है । पदार्थ के छोटे कण चालनी के छिद्रों से निकल जाते हैं
(अ) इस विधि में डंडियों से अन्नकणों अथवा अनाज को पृथक किया जाता है। इसके लिए बैलों एवं मशीनों का उपयोग किया जाता है ।
(ब) (i) वाष्पन (iii) मंथन
(अ) रेत और जल का मिश्रण: यह एक विषमांगी मिश्रण है ।
(ब) निस्यंदन: निस्यंदन विधि का उपयोग द्रव से ठोस को पृथक करने के लिए किया जाता है । जबकि अन्य विधियाँ ठोसों के मिश्रण के पृथक्करण के लिए है ।
(स) निष्पावन में ठोस पदार्थ से ठोस को पृथक किया जाता है । जबकि अन्य तकनीकों में ठोस को द्रव से पृथक किया जाता है ।
मिश्रण के विभिन्न अवयवों को पृथक करने के निम्न कारण है:
A.
असंतृप्त विलयन है ।
B.
संतृप्त विलयन है ।
C.
मिश्रण है, जिसे पृथक नहीं किया जा सकता ।
D.
अशुद्धि है ।
एक संतृप्त विलयन में और अधिक चीनी नहीं घोली जा सकती है क्योंकि जल में पहले से ही चीनी की पर्याप्त मात्रा घुली हुई है ।
A.
मक्खन और क्रीम
B.
आटा और चीनी
C.
विभिन्न आकार के सिक्के
D.
जल में घुला हुआ नमक
चालन का उपयोग तब किया जाता है जब मिश्रण के घटकों का आकार भिन्न हो । जब हम चीनी और आटे के मिश्रण को चालनी में डालते हैं तो आटे के महीन कण चालनी के छिद्रों में से निकल जाते हैं जबकि चीनी के बड़े कण चालनी में रह जाते हैं ।
A.
पात्र के पैंदे में नीचे बैठ जाता है ।
B.
विलयन में निलंबित रहता है ।
C.
घुलना प्रारम्भ कर देता है ।
D.
विलायक (जल) के साथ अभिक्रिया कर लेता है ।
एक संतृप्त विलयन में समान ताप पर विलेय की और अधिक मात्रा नहीं घोली जा सकती है । अतिरिक्त लवण नीचे बैठ जाता है और पात्र के पैंदे में एकत्रित हो जाता है ।
A.
हस्तचयन द्वारा
B.
चालन द्वारा
C.
निष्पावन द्वारा
D.
मंथन द्वारा
चावल से कंकड़ के दानों को पृथक करने के लिए हस्तचयन उपयुक्त विधि है क्योंकि ये आकार में भिन्न और बहुत कम मात्रा में उपस्थित होते हैं ।
A.
80 डिग्री सेन्टीग्रेड पर
B.
150 डिग्री सेन्टीग्रेड पर
C.
0 डिग्री सेन्टीग्रेड पर
D.
100 डिग्री सेन्टीग्रेड पर
जल का वाष्प में परिवर्तन वाष्पीकरण कहलाता है, जो 100 डिग्री सेन्टीग्रेड ताप पर होता है । जब तक जल उपलब्ध रहता है वाष्पीकरण की प्रक्रिया चलती रहती है ।
A.
संघनन
B.
वाष्पीकरण
C.
थ्रेशिंग
D.
निस्यंदन
फलों के जूस के निर्माण में बीज और गूदे के ठोस भाग को पृथक करने के लिए निस्यंदन का उपयोग किया जाता है ।
A.
संघनन
B.
निस्यंदन
C.
वाष्पीकरण
D.
अवसादन
समुद्री जल को उथले गड्ढो में एकत्रित करके छोड़ दिया जाता है । कुछ दिनों बाद सूर्य के प्रकाश के कारण जल वाष्पित हो जाता है और नमक पीछे छूट जाता है । इस लवण में बहुत सी अशुद्धियाँ होती है, अतः इसका शुद्धिकरण किया जाता है और फिर इसका उपयोग साधारण नमक के रूप में किया जाता है ।
A.
चीनी पाउडर और नमक
B.
समान आकार की लाल और नीली गेंदे
C.
तेल और जल
D.
दूध और क्रीम
हस्तचयन विधि का उपयोग मिश्रणों के पृथक्करण में किया जाता है जबकि संघटक कणों का आकार, आकृति और रंग भिन्न हो । इसलिए हम हस्तचयन द्वारा लाल गेंदों को नीली गेंदों से पृथक कर सकते हैं ।
A.
हस्तचयन द्वारा
B.
चुम्बकीय पृथक्करण द्वारा
C.
चालन द्वारा
D.
मंथन द्वारा
वह मिश्रण जिसका एक घटक लोहा होता है, को चुंबक का उपयोग करके पृथक किया जाता है । जब चुंबक को ऐसे मिश्रण के ऊपर घुमाया जाता है तो लोहा उसकी तरफ आकर्षित होता है जबकि पात्र में अन्य संघटक समान रहते हैं ।
A.
निष्पावन द्वारा
B.
थ्रेशिंग द्वारा
C.
निस्यंदन द्वारा
D.
मंथन द्वारा
निष्पावन पद्धति संघटकों के भारों में अंतर पर आधारित है । किसान इस विधि का उपयोग भूसे से अनाज के दानों को पृथक करने में करते हैं ।
A.
वाष्पीकरण द्वारा
B.
संघनन द्वारा
C.
आसवन द्वारा
D.
ऊर्ध्वपातन द्वारा
संघनन वह प्रक्रिया है जिसमें एक द्रव की वाष्प ठंडी करने पर पुनः द्रव में परिवर्तित हो जाती है ।
A.
बटर पेपर
B.
साधारण पत्र
C.
टिशू पेपर
D.
फिल्टर पत्र
निस्यंदन में फिल्टर पत्र का उपयोग किया जाता है । यह एक विशेष प्रकार का पत्र होता है जिसमें अत्यंत सूक्ष्म छिद्र होते हैं जो अपने में से द्रव को पारगमित होने देते हैं जबकि ठोस अवशेष फिल्टर पत्र पर रह जाते हैं ।
A.
भारी कणों को पवन उड़ाकर ले जाती है ।
B.
हल्के भूसे के कणों को पवन उड़ाकर ले जाती है ।
C.
भूसे और अनाज़ को पवन की सहायता से मिलाया जाता है ।
D.
गेहूँ और अनाज़ को पवन उड़ाकर ले जाती है ।
A.
अवसादन द्वारा
B.
वाष्पीकरण द्वारा
C.
निस्यंदन द्वारा
D.
निस्तारण द्वारा
जब एक चीनी के विलयन को गर्म किया जाता है, जल वाष्पित हो जाता है और चीनी पात्र में रह जाती है।
समांगी मिश्रण एवं विषमांगी मिश्रण
द्रव में अघुलनशील ठोस के भारी कणों के नीचे तली में बैठ जाने के प्रक्रम को अवसादन कहते हैं |
निष्पावन विधि में मिश्रण के कणों के भार में अंतर का उपयोग किया जाता है ।
कीचड़ से स्वच्छ जल प्राप्त करने के लिए अवसादन एवं निस्तारण का उपयोग किया जाता है ।
विलयन में से घुलनशील ठोस को पृथक करने के लिए वाष्पीकरण विधि का उपयोग किया जाता है ।
विषमांगी मिश्रण
जालिकारूपी शिरा विन्यास ।
रेशेदार जड़े।
ऑक्सीज़न ।
स्टार्च ।
पत्तियाँ ।
मध्य शिरा ।
पत्तियाँ ।
शिराविन्यास पत्तियों में शिराओं की डिजाइन को दर्शाता है।
जड़े।
1. वाष्पोत्सर्जन- पत्तियों से वाष्प के रूप में अतिरिक्त जल हटाने का प्रक्रम वाष्पोत्सर्जन कहलाता है।
2. शिराविन्यास- पत्ती के पर्ण फलक में शिरा और शिरिकाओं की व्यवस्था शिराविन्यास कहलाती है।
1. पुष्प
2. पत्ती
3. तना
4. जड़
पर्णवृन्त पत्ती का एक भाग है या छोटा वृन्त है जिसके द्वारा पत्ती तने से जुड़ी होती है।
पर्णफलक, शिरा और शिरिकाओं के विशिष्ट तंत्र युक्त चपटा, पतला और चौड़ा भाग है।
पौधे तने के प्रकार तथा ऊंचाई और शाखाओं के प्रकार पर आधारित शाक, झाड़ी, वृक्ष, आरोही और विसर्पी लता में वर्गीकृत होते हैं।
(i) तना पौधों की जड़ों से पौधों के विभिन्न भागों में जल और खनिज पदार्थों को ले जाता है।
(ii) तना शाखाओं, पत्तियों, पुष्पों और फलों को सहारा प्रदान करता है।
(a) पर्वसंधि - वह स्थान जहाँ से पत्ती विकसित होती है उसे पर्वसंधि कहते हैं।
(b) संधि − दो पर्वसंधि के बीच के भाग को संधि कहते हैं।
वृक्ष -
• ये
अत्यधिक
मोटाई के साथ
काष्ठीय
पौधे होते हैं
और इनकी
ऊँचाई भी
अन्य पौधों
से लंबी होती है।
• भरपूर
शाखाएँ
दर्शाते
हैं।
• झाड़ियों
से अधिक ऊँची
शाखाएँ होती
हैं।
• उदाहरण
− आम और सेब के
वृक्ष
पुदीना निम्नलिखित लक्षण दर्शाता है -
उपरोक्त लक्षण शाक के ,हैं झाडी के नहीं इसलिए पुदीना एक शाक है।
|
विसर्पी लता |
आरोही |
|
तना पतला, नाज़ुक और कमजोर होता है तथा सीधे खड़ा नहीं हो पता है। |
तना लंबा, लचीला और सहारे के चारों ओर गूथ जाता है। |
|
भूमि पर फैल जाती है या ऊपरी मृदा में धस जाती है। |
चढ़ाई के लिए आसपास की वस्तु का सहारा लेती है। |
|
उयदहरण - कद्दू |
उदाहरण − मटर आदि । |
नहीं, वह सही नहीं है, गुलाब को एक झाड़ी की श्रेणी में रखा जाता है क्योंकि यह निम्न लक्षण दर्शाता है-
� पौधे कम मोटाई और ऊँचाई के साथ मध्यम आकार के हैं।
� तना काष्ठीय होता है।
� प्राय:अतिशाखित होते हैं।
� शाखाऐं जमीन से थोड़ा सा ही ऊपर से निकली होती हैं।
पौधे अनेक विशेषता के आधार पर वर्गीकृत हुए हैं उनमें से एक तने के प्रकार के आधार पर है।
वृक्ष − ये लंबे होते हैं और इनमें कठोर, मोटा और काष्ठीय तना होता है।
झाड़ी − इनकी मध्यम ऊंचाई होती है और इनका तना कठोर और काष्ठीय होता है।
शाक − ये छोटे होते हैं और इनका तना छोटा, हरा और कोमल होता है।
A.
कंदुक खल्लिका संधि
B.
घुराग्र संधि
C.
कब्जा संधि
D.
स्थिर संधि
कंदुक खल्लिका संधि कंधों में स्थित होती है। यह संधियाँ सभी दिशाओं में घूम सक्ने के कारण हम अपने हाथ सभी दिशाओं में घुमा सकते हैं।
A.
अनुमस्तिष्क
B.
कंकाल
C.
श्रोणि
D.
करोटि
करोटि सिर में अनेक अस्थियों की बनी संरचना है जो अनेक । स्थिर अस्थियाँ जुड़कर करोटि बनती हैं और मस्तिष्क को सुरक्षित रखती है।
A.
कब्जा संधि
B.
श्रोणि संधि
C.
स्थिर संधि
D.
कंदुक और खल्लिका संधि
सिर और ऊपरी जबड़े के बीच स्थित संधि स्थिर संधि का उदाहरण है। स्थिर संधि वह संधि है जिसमें कोई गति नहीं होती है।
A.
श्वसन
B.
उत्सर्जन
C.
गति
D.
पाचन
संधियाँ वे स्थान हैं जहां शरीर के दो भाग जुडते हैं। ये गमन के लिए आवश्यक हैं क्योंकि अस्थियाँ कठोर होती हैं और मुड़ नहीं सकती।
प्लावी पसलियाँ
कंडरा
कोमल कंकालीय ऊतक, जो कॉन्ड्राइटिन लवणों युक्त होता है। यह प्रत्यास्थ होती है।
ग्लीनोइड गुहा इसमें ह्यूमरस का सिर आकार फिट होता है।
कंधे की अस्थि स्केपुला या अंसफलक
करोटि का निचला जबड़ा, चल होता है।
पक्षियों में पाये जाने वाले उड्डयन के दो प्रमुख प्रकार पंख फड़फड़ा/फ्लैपिंग और ग्लाइडिंग/विसर्पण हैं।
कीट जैसे मक्खियों और मच्छरों में केवल एक जोड़ी पंख होते हैं।
चमगादड़
फ्लिपर
सर्प
कब्जा संधि, एक ऐसी संधि है जो केवल एक तल में घूमने देती है। जैसे- घुटने और कोहनी की संधि है। ये दोनों संधियाँ केवल आगे-पीछे घूमने देती हैं।
कंधे में उपस्थित चल संधि, कन्दुक खल्लिका संधि है और घुटने में उपस्थित चल संधि को कब्जा संधि के नाम से जाना जाता है।
साइनोवियल संधियों की दो मुख्य आवश्यकताऐं हैं-
i. साइनोवियल संधियों को अपनी स्थिति में मजबूती से जुड़ी होनी चाहिए।
ii. संपर्क सतहें घर्षण हटाने के लिए भली- भांति स्नेहन युक्त होनी चाहिए।
साइनोवियल तरल, साइनोवियल संधियाँ में उपस्थित एक स्नेहक द्रव है जो घर्षण को हटाता है।
कन्दुक खल्लिका संधि, सभी दिशाओं में घूमने देती है। उदाहरण- कूल्हे की संधि।
A.
वायु
B.
वन
C.
नदी
D.
तालाब
वन भूमि पर एक स्थलीय वास है और ये जीव के विकसित और जनन के लिए सभी परिस्थितियाँ प्रदान करता है।
A.
केवल दिन के समय सक्रिय होते हैं।
B.
केवल रात के समय सक्रिय होते हैं।
C.
केवल शाम के समय सक्रिय होते हैं।
D.
दिन और रात के समय सक्रिय होते हैं।
जन्तु जो केवल रात के समय सक्रिय होते हैं उन्हें निशाचर कहते हैं जैसे उल्लू, चमगादड़ आदि।
A.
जलीय वास
B.
स्थलीय वास
C.
मरुस्थल वास
D.
घास स्थल
तालाब एक जलीय वास का उदाहरण है, अन्य उदाहरणों में मुहाने, गहरे समुद्र, नदी आदि शामिल हैं।
A.
चमगादड़
B.
बिल्ली
C.
उल्लू
D.
कॉकरोच
बिल्ली निशाचर जन्तु नहीं है जबकि अन्य निशाचर जन्तु हैं।
A.
ऑक्सीज़न
B.
कार्बन डाइऑक्साइड
C.
नाइट्रोजन
D.
कार्बन मोनोऑक्साइड
पादप पर्णहरित और सूर्य के प्रकाश की उपस्थिति में जल और कार्बन डाइऑक्साइड की सहायता के साथ अपना भोजन बनाते हैं। इस प्रक्रिया को प्रकाश संश्लेषण कहते हैं।
A.
कोरल और अर्चिन समुद्र के तल पर पाए जाते हैं।
B.
अजैव घटकों को भौतिक कारक भी कहते हैं।
C.
शैवाल और समुद्री शैवाल मरुस्थल पौधे हैं।
D.
याक और ध्रुवीय भालू ठंड निवास स्थान के जंतु हैं।
शैवाल और समुद्री शैवाल जलीय पादप हैं क्योंकि ये समुद्र और महासागर के जल की सतह पर तैरते हैं।
A.
साँप
B.
उल्लू
C.
बंदर
D.
खरगोश
साँप को सुनाई नहीं देता है क्योंकि उनमें बाह्य कान अनुपस्थित होते हैं। ये अपनी उदर शल्कों से कंपन को महसूस करते हैं।
A.
पादपों को एक स्थान पर पकड़े रखना
B.
पोषक तत्वों को अवशोषित करना
C.
भोजन बनाना
D.
भोजन को संग्रहित करना
जलीय पादपों में जड़ों का मुख्य कार्य पादपों को एक स्थान पर कसकर पकड़े रखना है। ये आकार में छोटे भी होते हैं। ये स्थलीय पादपों से विपरीत है क्योंकि वहाँ पादप जड़ों के माध्यम से पोषक तत्वों को अवशोषित करते हैं।
A.
हाइड्रेशन
B.
अनुकूलन
C.
आवास
D.
वाष्पोत्सर्जन
अनुकूलन एक विशेष विशेषता है जो पादपों और जंतुओं को एक विशिष्ट आवास में रहने के लिए सक्षम बनाती है।
A.
तना
B.
पुष्प
C.
पत्ती
D.
जड़े
पत्तियाँ छोटे छिद्रों (रंध्र) के माध्यम से ऑक्सीज़न को लेते हैं और वायु में कार्बन डाइऑक्साइड को मुक्त करते हैं।
A.
गिल्स
B.
त्वचा
C.
फेफड़े
D.
नेफ्रीडिया
केंचुआ अपनी नम त्वचा के माध्यम से साँस लेता है। गैस अपने शरीर की श्लेष्म परत में पहुँच कर कोशिकाओं में प्रसारित हो जाती हैं।
A.
श्वसन
B.
पाचन
C.
जनन
D.
उत्सर्जन
उत्सर्जन एक महत्त्वपूर्ण जैव प्रक्रम है जो शरीर को स्वच्छ बनाए रखने के लिए अपशिष्ट पदार्थों को बाहर निकालता है।
A.
अकेशिया
B.
कैक्टस
C.
हाइड्रिला
D.
बेर
हाइड्रिला एक जलीय पादप है जबकि अन्य सूखे की स्थिति जैसे रेगिस्तान में पाये जाने वाले पादप हैं।
A.
जल और बैक्टीरिया
B.
वायु और मृदा
C.
पक्षी और मधुमक्खियाँ
D.
बैक्टीरिया और मृदा
पारिस्थितिकी तंत्र के निर्जीव घटकों को अजैव घटक कहते हैं। इसलिए वायु और मृदा अजैव घटक हैं।
A.
सूरजमुखी
B.
चमेली
C.
छुई मुई
D.
गुलाब
छुई मुई की पत्तियाँ उसे छूने पर खुलती और बंद होती है। यह जल की गति के कारण होता है।
A.
अपने शरीर के आकार
B.
सुखी घास की उपस्थिति
C.
अपने हल्के भूरे रंग
D.
अपने वैराग्य
शेर शिकार के दौरान अपने शरीर के हल्के भूरे रंग की सहायता से सुखी घास के मैदान में छुपने में सक्षम होता है क्योंकि इसके शरीर का रंग मैदान के समान होता है।
हिम भालू ।
ऑक्टोपस ।
मछलियों का धारारेखित शरीर जल में जीवन के लिए एक अनुकूलन है। यह आकार जल धाराओं के प्रवाह को कम से कम प्रतिरोध प्रदान करता है।
ऊष्णकटिबंधीय वर्षावन।
लाल आँखों वाले पेड़ पर रहने वाले मेंढक वृक्षवासी आवास के लिए अनुकूलित हैं।
जो पक्षी प्रतिकूल जलवायु परिस्थितियों में अपने निवास स्थान से दूसरे स्थान पर जाते हैं उन्हें प्रवासी पक्षी कहते हैं।
कवक ।
आवास एक जीव का निवास स्थान है। ये जीवों का परिवेश है जहाँ वे रहते हैं। जीव अपने आवास पर भोजन, घर, वायु और जल के लिए निर्भर रहते हैं।
जन्तु या पादपों में एक लक्षण या विशेष विशेषताओं की उपस्थिति जो उन्हें आवास में जीवित रहने में सहायता करते हैं उसे अनुकूलन कहते हैं।
डॉल्फिन नथुनों या ब्लोहोल्स जो उनके सिर के ऊपरी भाग में स्थित होते हैं उनके माध्यम से साँस लेती है।