पुरातत्वविदों ने अतीत में लोगों की भोजन की आदतों की पहचान करने के लिए पशुओं, पक्षियों और मछलियों की हड्डियों का अध्ययन किया। यद्यपि पादप अवशेष कदाचित ही दीर्घकाल तक जीवित रहते हैं । किन्तु अनाज अथवा लकड़ी के टुकड़े के जल जाने पर वे जले रूप में शेष रह जाते हैं, अतएव जले हुए अनाज के दानों से उनके द्वारा पादप उत्पादों का उपभोग किये जाने की जानकारी प्राप्त होती है।
शिलालेख अपेक्षाकृत कठोर सतह जैसे कि पाषाण अथवा धातु पर उत्त्कीर्ण किये जाते हैं, ये कालक्रम के महत्वपूर्ण स्रोत होते हैं । कई बार, राजाओं द्वारा निम्नलिखित को आलेखबद्ध करने हेतु इन शिलालेखों का इस्तेमाल किया गया था -
1.भू-अनुदान,
2.शाही वंश की सूचियाँ,
3. अपने आदेश, ताकि लोग उन्हें देख, पढ़ सके और उनका पालन कर सके और
4.युद्ध में प्राप्त विजय।
ऋग्वेद ने श्लोकों के माध्यम से संवाद के रूप में कुछ साक्ष्य उपलब्ध कराए हैं, ऋषि विश्वामित्र एवं दो नदियों ब्यास और सतलुज के मध्य इस संवाद के अनुसार यह दर्शाया गया है कि इन नदियों को देवी के रूप में पूजा जाता था, सिंधु और उसकी सहायक नदियों और सरस्वती का भी उल्लेख किया गया है, गंगा और यमुना का केवल एक बार उल्लेख किया गया है।
यह संस्कृत, असमी, गुजराती, कश्मीरी और सिंधी, जैसी भारतीय भाषाओं और गोथिक, ग्रीक, इतालवी, लैटिन, ओल्ड अंग्रेजी, फ्रेंच, जर्मन और स्पेनिश जैसी कई यूरोपीय भाषाओं से निहित भाषाओं का एक समुदाय है, ये भाषाएँ इस रूप में जानी जाती हैं, क्योंकि वे भाषा के एक ही समुदाय से सम्बंधित हैं, और इसमें आम शब्दों का समावेश है
प्राचीन पुरुष और महिलाएं निम्नलिखित विभिन्न कारणों से विभिन्न स्थानों की यात्रा करते थे-
1. आजीविका की खोज में।
2. बाढ़ और अकाल जैसी प्राकृतिक आपदाओं से बचने के लिए।
3. व्यापारी उनके कीमती सामान के साथ एक वाणिज्यिक शहर से अन्य शहर की यात्रा कारवों या जहाजों में किया करते थे ।
4. धार्मिक शिक्षक धर्म पर निर्देश और सलाह प्रदान करने हेतु एक स्थान से अन्य स्थान पर जाया करते थे।
5. साहसीक यात्रा की भावना से प्रेरित हो , कुछ लोगों दूरस्थ नए एवं रोमांचक क्षेत्रों की यात्रा किया करते थे।
पांडुलिपि हमारे अतीत के बारे में पता करने का एक बहुत ही महत्वपूर्ण स्रोत हैं। वे आम तौर पर हाथ से, ताड़ के पत्ते पर या पेड़ की छाल पर लिखी गई थीं। ताड़ के पत्तों या एक पेड़ की छाल को पन्नों का रूप देकर उन्हें एक पुस्तक रूप में बाँध दिया जाता था। इन पुस्तकों में विज्ञान, चिकित्सा, धार्मिक विश्वासों और प्रथाओं और राजाओं के जीवन जैसे भिन्न-भिन्न विषयों का समावेश होता था। इसके अलावा इनमें महाकाव्यों, कविताओं और नाटकों का समावेश होता था। पांडुलिपियों में प्रयुक्त की जाने वाली भाषा संस्कृत, प्राकृत और तमिल होती थी।
शब्द स्रोत, पांडुलिपियों, शिलालेख, सिक्के और स्मारकों से मिली जानकारी को दर्शाता है। यह हमारे अतीत के पुनर्निर्माण में इतिहासकारों की सहायता करते हैं । ये स्रोत राजाओं, उनके राज्याभिषेक, उनके साम्राज्य की सीमा, उनके द्वारा लड़े गए युद्धों, उनके कल्याणकारी कार्यों आदि के बारे में कईं जानकारी प्रदान करते हैं क्योंकि इनमें उनके द्वारा किये गए सभी कार्यों की जानकारी निहित होती है।
लोग कई सैकड़ों हजार वर्षों तक नर्मदा नदी के किनारे रह चुके हैं। वे कुशल संग्रहक थे। वे उनके चारों ओर जंगल की विशाल सम्पदा के बारे में जानते थे। वे इन आसपास के जंगलों से उनके भोजन हेतु जड़, फल और अन्य वन उत्पादों को एकत्र करते थे। वे पशुओं का शिकार भी करते थे।
1.पांडुलिपि हस्त लिखित ग्रन्थ होते हैं।
2.अधिकाँश पांडुलिपियों की रचना शीघ्र नष्ट होने वाली सामग्री पर की गई थी। अतएव समय के साथ कई कीड़ों द्वारा इन्हें खा लिया गया और कुछ पूरी तरह से नष्ट हो गई थीं। फिर भी कई सुरक्षित रह गई हैं।
3.इन पांडुलिपियों को प्रायः मंदिरों और मठों में संरक्षित किया जाता है।
1. लिपि क्या होती है?
2. इस शिलालेख में किस भाषा का इस्तेमाल किया गया था?
3. किसके आदेशाधीन इस शिलालेख की रचना की गई थी?
4. कंधार कौनसे देश में स्थित है?
1. कुछ भी लिखने के लिए लिपि का प्रयोग किया जाता है। इसमें अक्षर और संकेत निहित होते हैं।
2. इस शिलालेख की रचना यूनानी और अरेमाइक के रूप में दो भिन्न लिपियों और भाषाओं में की गई थी।
3. इस शिलालेख की रचना अशोक नामक एक शासक के आदेशान्तर्गत की गई थी।
4. कंधार अफगानिस्तान में स्थित है।
लोग निम्नलिखित विभिन्न कारणों से उपमहाद्वीप के एक हिस्से से दूसरे हिस्से की यात्रा किया करते थे:
1.आजीविका की खोज में, पुरुष एवं महिलाएं निरंतर यात्रा करते थे। बाढ़ और अकाल जैसी प्राकृतिक आपदाओं से बचने के लिए, लोग नियमित रूप से अन्य देशों में चले जाया करते थे।
2. अन्य क्षेत्र को जीतने हेतु पुरुष सेनाओं में शामिल हो कूच किया करते थे।
3. साहसीक यात्रा की भावना से प्रेरित हो , कुछ लोगों दूरस्थ नए एवं रोमांचक क्षेत्रों की यात्रा किया करते थे।
4. व्यापारी उनके कीमती सामान के साथ एक वाणिज्यिक शहर से अन्य शहर की यात्रा कारवों या जहाजों में किया करते थे ।
इतिहासकार और पुरातत्वविद जैसे विद्वान उत्खनन की प्रक्रिया के माध्यम से अतीत में निर्मीत एवं उपयोगित वस्तुओं का अध्ययन करते हैं । पांडुलिपि, शिलालेख, उपकरण, सिक्के, स्मारक लोगों के अतीत के बारे में पता करने के लिए इन विद्वानों द्वारा उपयोग में लिए जाने वाले जानकारी के स्रोत हैं। एक बार जब ये स्रोत प्राप्त हो जाते हैं तो अतीत के बारे में सीखने का कार्य रोमांचक हो जाता है, और धीरे धीरे इतिहास की पुनर्रचना की जाती है। अतएव इतिहासकारों और पुरातत्वविदों द्वारा हमारे अतीत के विषय में अध्ययन करने के लिए विभिन्न स्रोतों का उपयोग किया जाता है।
A.
2 कक्षों
B. 3 कक्षों
C. 1 कक्ष
D. 4 कक्षों
मेहरगढ़ में खोजे गए भवन वर्गाकार व आयताकार थे तथा उनमें चार या उससे अधिक कक्ष होते थे।
A.
बुर्जहोम
B. मेहरगढ
C. भिम्बेटका
D. मैदन गरही
पुरातत्वविदों को बुर्जहोम में भवनों के अन्दर तथा बाहर दोनों ओर भोजन बनाने के चूल्हें मिले हैं। इससे यह निष्कर्ष निकलता है कि भोजन अन्दर बनाया जाय या बाहर यह मौसम पर निर्भर करता था।
A.
धातु
B. पुरातात्विक स्थल
C. पौधे का नाम
D. पत्थर का प्रकार
यह पत्थर चीन से आयात किया जाता था, जेडाइट, जेड नामक दो खनीजों में से एक है, दूसरा जेड खनीज नफ्राइट है। जो कि एक्टोनोलाइट की एक किस्म है। जेड को चीन में युगों तक उपयोग में लिया गया है।
A.
महाराष्ट्र
B. उत्तर प्रदेश
C. मध्य प्रदेश
निनुओ भारत के एक उत्तर पूर्वी राज्य में रहती है। वह अपने भ्रमण के दौरान मध्यप्रदेश से गुजरी, और उसे अनेक अलग-अलग प्रकार के व्यंजक परोसे गए जो कि जलवायु की विविधता के कारण उसके पैतृक स्थान पर उपलब्ध नहीं थे।
A.
भेंस
B. कुत्ते
C. बकरी
D. घोड़े
मेहरगढ़ में पुरातत्वविदों को प्रत्येक दफन मानव शरीर के साथ बकरी भी प्राप्त हुई, जो कि मेहरगढ़ के निवासियों की इस धारणा की ओर इंगित करता है कि मृत्यू के पश्चात भी जीवन होता है।
A.
कर्नाटक
B. गुजरात
C. आन्ध्रा प्रदेश
D. केरल
प्याम्पल्ली पुरास्थल दो सांस्कृतिक स्तरों पर प्रकाश डालती है, पहले नवपाषाण काल तथा उसके पश्चात मध्यपाषाण काल अवधि इसके अन्तर्गत आती है।
A.
कोल्दीवा
B. मेहरगढ़
C. बुर्जहोम
D. कालीबंगा
चांवल की कृषि के प्रथम साक्ष्य इस पुरास्थल से ही प्राप्त हुए हैं। यह स्थल माडर्न इलाहाबाद शहर के निकट स्थित है। यह एक नवपाषाण पुरास्थल था जो कि बाद में ताम्रपाषाण काल में उन्नत हुआ।
A. उत्तर प्रदेश
B. आंध्र प्रदेश
C. कश्मीर
D. कर्नाटक
गुफक्राल और बुर्जहोम कश्मीर में स्थित दो स्थल थे । इन दो स्थलों से दलहन के साक्ष्य प्राप्त किए गए हैं।
A. उत्तर प्रदेश
B. ओडिशा
C. पाकिस्तान
D. आंध्र प्रदेश
पैय्यमपल्ली दक्षिण आंध्र प्रदेश में स्थित है।
A. गुफक्राल
B. चिराँद
C. मेहरगढ़
D. कोल्डिहवा
मेहरगढ़ बोलन दर्रे के पास स्थित है। यह ईरान जाने वाले महत्वपूर्ण मार्ग पर स्थित है। यह पूर्व हड़प्पा संस्कृतियों में पशुपालन एवं पशुचारण के साक्ष्य उपलब्द्ध कराने वाला प्राचीनतम स्थल है। यहाँ से कपास-उत्पादन का भी प्राचीनतम प्रमाण मिलता है।
A. मेहरगढ़
B. दाओजली हेडिंग
C. बुर्जहोम
D. चिराँद
दाओजली हेडिंग त्रिपुरा में स्थित है। यहाँ पुरातत्ववेताओं द्वारा जीवाश्म काष्ठ से निर्मित उपकरणों की अनूठी खोज की गई है। ‘जीवाश्म काष्ठ’ लकड़ी का रूपांतरित प्रकार होता है। उच्च तापमान और उच्च दबाव के कारण लकड़ी के भौतिक गुणों में परिवर्तन हो जाता है।
A. ओडिशा
B. उत्तर प्रदेश।
C. बिहार।
D. मध्य प्रदेश।
पुरातात्विक स्थल कोल्डीहवा इलाहाबाद के समीप स्थित है। यह क्षेत्र सराय नाहर राय के रूप में जाना जाता है। इस स्थल से भारत में चावल के उत्पादन और उपभोग के प्राचीनतम साक्ष्य प्राप्त होते हैं।
A. खैबर दर्रा।
B. नाथूला दर्रा।
C. जोजिलादर्रा।
D. बोलन दर्रा।
बोलन दर्रा हिमालय की सुलेमान पर्वत श्रुंखला में स्थित है। यह भारतीय उपमहाद्वीप को ईरान के साथ जोड़ता है। व्यापारियों और आक्रमणकारियों द्वारा भारत तक पहुँचने के लिए इस दर्रे का इस्तेमाल किया गया था।
A. खैबर दर्रा।
B. बोलन दर्रा।
C. ज़ोजिला दर्रा।
D. नाथूला दर्रा।
: "बोलन दर्रा" पश्चिमी पाकिस्तान में "टोबा ककड़ " पर्वत श्रृंखला के मध्य एक पर्वतीय दर्रा है।
A. जम्मू-कश्मीर।
B. : बिहार।
C. राजस्थान।
D. तमिलनाडु।
" चिराँद" एक नवपाषाणकालीन स्थल है। चावल, गेहूं, जौ, भैंस और गाय-बैल जैसे पशुओं के जीवाश्म और पशुओं का शिकार करने के काम में आने वाले उपकरण इस स्थल से प्राप्त हुए थे।
A. धातु
B. पुरातात्विक स्थल
C. एक पौधे का नाम
D. एक प्रकार का पाषाण
प्राचीन काल में यह पाषाण संभवतः चीन से आयातीत होता था। जेडाइट हरे रंग का पत्थर (हरिताश्म) नामक खनिज होता है।
A. गंगा घाटी।
B. ब्रह्मपुत्र घाटी।
C. लोहित घाटी।
D. यमुना घाटी।
दाओजली हदिंग ब्रह्मपुत्र घाटी में कछार हिल्स में स्थित है। यह चीन और म्यांमार को जोड़ने वाले मार्ग पर स्थित। पाषाण उपकरण, ओखली-मूसल आदि इस स्थल से प्राप्त हुए हैं।
A. पट्टिका।
B. खाना पकाने के चूल्हे।
C. बर्तन।
D. मिटटी के चूल्हे।
साक्ष्य के रूप में प्राप्त हुए खाना पकाने के चूल्हे से यह सुनिश्चित होता है कि । मकान के बाहर और अंदर दोनों जगह कुछ तरह के व्यंजन पकाए जाते थे।
A. नवपाषाण उपकरण।
B. पुरापाषाण उपकरण।
C. मध्य पाषाण उपकरण।
D. आधुनिक उपकरण।
के रूप में वे उन्नत और एक ठीक काटने के किनारे गए थे नवपाषाण उपकरण उनके पूर्ववर्ती औजारों से भिन्न थे क्योंकि वे अधिक प्रोन्नत थे एवं उनकी धार अधिक पैनी थी।
A. शिकार में ।
B. अनाज पीसने में ।
C. मांस काटने में ।
D. जड़ों की खुदाई में।
कईं हजारों सालों बाद आज भी ओखली और मूसल जैसे उपकरणों का प्रयोग अनाज पीसने में किया जाता है।
A. सब्जि।
B. फल।
C. पशु।
D. पानी।
पशुओं से आखेटक-खाद्य संग्राहकों को विविध भोजन प्राप्त होता था। इनसे उन्हें दूध, मछली और मांस मिलता था। इसके अलावा पौधों की तुलना में उनमें स्वाभाविक रूप से प्रजनन होता था और उनकी संख्या में बिना अधिक प्रयास के वृद्धि होती थी इसलिए, पशुओं को 'खाद्य-भंडार’ के रूप में माना जाता है।
A.
मेहरगढ़
B. कोल्दीवा
C. बुर्जहोम
D. चिराण्ड
यह पुरास्थल उत्तर प्रदेश में स्थित है। यहाँ हमें मिट्टी सतह पर मवेशियों के खुरों के निशान पाए गए हैं। इसके अतिरिक्त यहाँ चाँवल की कृषि के तथ्य भी प्राप्त हुए हैं।
A.
जम्मू कश्मीर
B. बिहार
C. राजस्थान
D. तमिलनाडू
चिराण्ड एक नवपाषाण काल सभ्यता है, चाँवल, गेंहू, जौ, जानवरों जैसे भैंस व बैल के जीवाश्म और जानवरों को मारने के लिए उपयोग में लिए जाने वाले उपकरण यहाँ प्राप्त हुए हैं।
A.
12000 वर्ष पूर्व
B. 11000 वर्ष पूर्व
C. 10000 वर्ष पूर्व
D. 9000 वर्ष पूर्व
आज जो भी पौधे व पशु हमें भोजन के रूप में प्रदान करते हैं वह उन्हें पालतू बनाने का परिणाम है। कुछ पौधे जो सर्वप्रथम उगाए गए वह गेहूँ तथा जौ थे। इसी प्रकार सर्वप्रथम पालतू बनाए जाने वाले जानवर भेड़ व बकरी थे।
A.
जौ
B. चना
C. ज्वार
D. बाजरा
नवपाषाण काल अपने कृषि विकास कार्यों के लिए पहचाना जाता है। गेंहू के अलावा जौ की भी जबरदस्त वृद्धि देखी गई है।
A.
गंगा खाड़ी
B. ब्रह्मपुत्र खाड़ी
C. लोहित खाड़ी
D. यमुना खाड़ी
दाओजली हैडिंग ब्रह्मपुत्र खाड़ी की चाचर पहाडियों में स्थित है। यह उस मार्ग पर स्थित है जो चीन व म्यांमार को जोड़ता है। यहाँ पत्थर के बने उपकरण, ओखली तथ मूसली प्राप्त हुए हैं।
A.
कोल्दीवा
B. प्याम्पल्ली
C. चिराण्ड
D. मेहरगढ़
प्याम्पल्ली पुरास्थल ने दो सांस्कृति स्तरों पर प्रकाश डाला है, सर्वप्रथम पूर्व जो कि नवपाषाण काल से सम्बन्धित है तथा दूसरा जो कि मध्यपाषाण काल से सम्बन्धित है, इस स्थान से प्राप्त हुए अन्य वस्तुओं में गेंहू, बाजरा तथा मवेशियों तथा भेड़ों की हड्डियाँ शामिल हैं।
A.
कोल्दीवा
B. प्याम्पल्ली
C. चिराण्ड
D. मेहरगढ़
चिराण्ड पुरास्थल नवपाषाण युग का हिस्सा था, यहाँ से चांवल, जानवरों के जीवाश्म व जानवरों को मारने के उपकरण प्राप्त हुए हैं।
A.
कोल्दीवा
B. प्याम्पल्ली
C. चिराण्ड
D. मेहरगढ़
प्याम्पल्ली पुरास्थल दो सांस्कृतिक स्तरों पर प्रकाश डालती है, एक पूर्व जो की नवपाषाण काल के अन्तर्गत आता है तथा दूसरा उसके पश्चात जो मध्य पाषाणकाल की अवधि में आता है।
A.
नवीनतम स्तर
B. मध्यम स्तर
पुरातत्वविदों को मेहरगढ़ में जानवरों की हड्डियाँ ढूंढने में सफलता प्राप्त हुई। इस स्थान से आदिकाल में गेंहू तथा जौ की खेती के तथ्य प्राप्त हुए, साथ ही पशुपालन में भेड़ व बकरी जैसे जानवरों के पाले जाने की जानकारी भी प्राप्त हुई है।
A.
शहर
B. कस्बा
C. व्यापारिक कस्ब
D. गाँव
मेहरगढ़ एक गाँव था, यहाँ से हमें आदिकाल में जौ तथा गेंहू की खेती व जानवरों जैसे भेड़ व बकरी को पालतू बनाए जाने के महत्त्वपूर्ण तथ्य प्राप्त हुए हैं।
A.
खैबर मार्ग
B. नाथूला मार्ग
C. जोजिला मार्ग
D. बोलन मार्ग
बोलन मार्ग हिमालय की सुलेमान श्रंखलाओं में स्थित है, यह भारतीय उपमहाद्वीप को ईरान से जोड़ता है। यह मार्ग व्यापारियों तथा आक्रमणकारियों ने भारत पहुंचने के लिए उपयोग में लिया।
A.
खैबर मार्ग
B. बोलन मार्ग
C. जोजिल्ला मार्ग
D. नाथूला मार्ग
बोलन मार्ग एक पहाड़ी मार्ग है जो कि पश्चिमी पाकिस्तान की तोबा काकर पर्वत श्रंखला से होकर गुजरता है।
A.
मैदान में
B. विच्छेदित मैदान में
C. पहाड़ों से घिरे मैदान में
D. उपजाऊ मैदान में
मेहरगढ़ सिन्धु नदी के पश्चिम में स्थित था, वर्तमान में यह स्थान पाकिस्तान में है।
A.
बुर्जहोम
B. चिराण्ड तथा गुफक्राल
C. बनवाली
D. कुर्नूल की गुफाऐं
हमें इस स्थान पर चमकीले पत्थर के उपकरण भी प्राप्त हुए हैं।
A.
पुराना पाषाण युग
B. पाषाण युग
C. नया पाषाण युग
D. ताम्र युग
यह प्राचीन इतिहास की एक महत्त्वपूर्ण अवधि है।
A.
पुरापाषाण
B. मध्य पाषाण
C. नवपाषाण
D. मध्यपाषाण
मानव जाति ने भोजन बनाना नवापाषाण काल में सीखा।
A.
एक शहर
B. आश्रय का स्थान
C. कृषि का स्थान
D. जल का स्थान
यह एक अतिमहत्त्वपूर्ण स्थान है जहाँ आदि मानव द्वारा कृषि कार्यों को सीखने के महत्त्वपूर्ण तथ्य प्राप्त हुए हैं।
A.
कश्मीर
B. उड़ीसा
C. उत्तर प्रदेश
D. बिहार
यह एक महत्त्वपूर्ण स्थान है जहाँ आदिमानव द्वारा कृषि कार्य किए जाने के तथ्य प्राप्त हुए हैं। यहाँ गेहूँ तथा दालों की कृषि की जाती थी।
A.
गेंहू और दाल
B. चावल
C. कपास
D. बाजरा
यह एक महत्त्वपूर्ण स्थान है जहाँ से हमें मानव द्वारा भोजन निर्माण के तथ्य प्राप्त हुए हैं।
A.
आन्ध्रा प्रदेश में
B. कश्मीर में
C. बोलन पास में
D. बिहार में
मेहरगढ़ बोलन पास के उपजाऊ मैदानों में स्थित है, यह एक महत्त्वपूर्ण स्थान है जहाँ आदिमानव के सम्बन्ध में अनैक जानकारियाँ प्राप्त हुई हैं।
A.
दाओजली हाडिंग
B. बुर्जहोम
C. चिराण्ड
D. मेहरगढ़
यह स्थान पर्वतों पर ब्रह्मपुत्र खाड़ी के समीप तथा चीन व म्यांमार के प्रमुख मार्गों के समीप स्थित है। यहाँ मूसली व ओखली सहित पत्थर के उपकरण भी पाए गए हैं। यह दर्शाता है कि आदिमानव कृषि करते थे तथा इससे भोजन तैयार करते थे।
A.
मेहरगढ़
B. दाओजली
C. बुर्जहोम
D. चिराण्ड
दाओजली ब्रह्मपूत्र खाडी के समीप स्थित है।
A.
जौ तथा गेंहू उगाना
B. चांवल उगाना
C. सब्जियाँ उगाना
D. सेब उगाना
मेहरगढ़ भारतीय सभ्यता का एक अति महत्त्वपूर्ण स्थल है जहां विकास के अनेक उदाहरण प्राप्त हुए हैं।
A.
पशुपालन
B. एक व्यापारी होना
C. एक खाद्य निर्माता होना
D. एक कुशल धातु निर्माता होना।
एक ग्रामीण की सबसे विशिष्ट विशेषता उसका एक कुशल खाद्य निर्माता होना है।
A.
वह जंगल में रहते हैं।
B. वह नदियों के पास रहते हैं।
C. वह आधुनिक जीवन नहीं जीते।
D. राष्ट्र मण्डल सदस्यों के बीच बंटा हुआ है।
धन, जल, जंगल और घास के मैदानों को आदिवासियों ने आम सम्पत्ती माना है इसलिए वह इसका बटवारा सभी में समान रूप से करते हैं।
A.
नवपाषाण
B. मध्यपाषाण
C. माइक्रोलिथिक
D. पुरापाषाण
इन क्षेत्रों के उपकरणों को नवपाषाण कहा जाता है, क्योंकि यह पुरापाषाण काल के सामान्य उपकरणों के समान नहीं थे।
A.
जानवरों की हड्डियों के माध्यम से
B. उस काल की पुस्तकों में उनके उल्लेख से
C. राख से
D. चित्र निरूपण के माध्यम से
वैज्ञानिकों ने विभन्न क्षेत्रों में विभिन्न जानवरों की हड्डियों के मिलने की जानकारी दी है।
A.
जले हुए अनाज की खोज
B. फसलों की खोज
C. जानवरों की हड्डियों की खोज
D. पशु दांत की खोज
वैज्ञानिक द्वारा प्रमाणित है कि कृषि की खोज में जले हुआ अनाज प्राप्त हुआ है।
A.
उत्तर-पूर्व
B. कश्मीर
C. उत्तर पश्चिम, पूर्व और दक्षिण भारत तथा कश्मीर
पुरातत्वविदों को इन स्थानों पर मानव द्वारा कृषि कार्य किए जाने के तथ्य प्राप्त हुए हैं।
A.
दूध, मांस तथा छुपने के लिए
B. व्यापार के लिए
C. वस्तु विनिमेय के लिए
D. परिवहन के लिए
लोगों के जीवन में जानवरों को महत्ता को देखते हुए उनको पालतू बनाया जाता था।
A.
छत पर
B. बाहर व अन्दर
C. तहखाने में
D. केवल आंगन में
यह मौसम पर निर्भर करता था कि चूल्हे पर भोजन बाहर बनेगा या अन्दर
A. गेंहू तथा जौ
B. चावल तथा बाजरा
C. चांवल तथा जौ
D. गेंहू तथा बाजरा
कृषि लगभग 12000 वर्ष पूर्व आरम्भ हुई।
A.
कश्मीर
B. बिहार
C. राजस्थान
यह एक महत्त्वपूर्ण स्थान है क्योंकि यहाँ वैज्ञानिकों को आदिमानवों की जीवनशैली से सम्बन्धित अनेक तथ्य प्राप्त हुए हैं।
A. पशुपालन
B. शिकार
C. मत्स्य पालन
D. सिंचाई
प्रायः महिलाऐं कृषि सम्बन्धी सभी कार्य जैसे - जमीन को तैयार करना, बीज बोना, विकसित पौधों की देखरेख करना और अनाज की कटाई करने में निपुण थीं।
A.
कमजोर लोगों के लिए
B. मोटापे से ग्रस्त लोगों के लिए
C. मृत लोगों के लिए
मेहरगढ़ में अनेक कब्रिस्तान प्राप्त हुए हैं।
A.
मवेशी
B. ऊँट
C. कुत्ता
D. बिल्ली
मेहरगढ़ में बहुत अधिक संख्या में मवेशियों की हड्डियाँ प्राप्त हुई हैं।
A.
मेहरगढ़
B. चिराण्ड
C. मेहगारा
D. हल्लूर
सम्भवतः मेहरगढ़ वह पहला स्थान था जहाँ पुरूष तथा स्त्री ने जौ तथा गैंहू को उगाना सीखा तथा सर्वप्रथम भेड़ व बकरी को पालतु बनाया।
A.
10000 वर्ष पूर्व
B. 12000 वर्ष पूर्व
C. 13000 वर्ष पूर्व
D. 14000 वर्ष पूर्व
पशुपालन एक क्रमिक प्रक्रिया थी जो कि विश्व के विभिन्न भागों में हुई।
A.
उत्तर प्रदेश
B. उड़ीसा
C. पाकिस्तान
D. आन्ध्र प्रदेश
प्याम्पल्ली आन्ध्र प्रदेश के दक्षिण में स्थित है।
A. A–(i), B–(ii), C–(iii), D–(iv)
B. A–(iv), B–(iii), C–(ii), D–(i)
C. A–(ii), B–(i), C–(iv), D–(iii)
D. A–(i), B–(iv), C–(iii), D–(ii)
गर्त-मकानों के चिन्ह बुर्जहोम में प्राप्त किये गए हैं। इन मकानों को इनमें पहुँचने वाली सीढ़ियों के साथ जमीन में खोदा जाता था।
शब्द चाल्कोलिथिक ग्रीक भाषा के खाल्कोस से है जिसका अर्थ "तांबे" (ताम्र) एवं लिथोस जिसका अर्थ पाषाण होता है से लिया गया है (इसका अर्थ है 'कॉपर एज' )।
नव पाषाण युग के मानव द्वारा मृदा को खोदने हेतु खंती खननी (डिगिंग स्टिक) एवं फसलों की कटाई करने के लिए पाषाण की छड़ का इस्तेमाल किया जाता था ।
उन प्रारम्भिक पशुओं में भेड़ और बकरी थे जिन्हें आदि मानव द्वारा पालतू बनाया गया था।
यह ब्रह्मपुत्र घाटी के निकट पहाड़ियों पर स्थित है।
अन्न, बड़े मिट्टी के बर्तन, गुथी हुई टोकरियों एवं बड़े गड्ढों में जमा किया जाता था।
गेहूं और जौ सबसे पहले उगाये जाने वाले पौधे थे।
पहला पालतू बनाया जाने वाला पशु कुक्कुर का वन्य पूर्वज था।
गर्त-मकानों के चिन्ह बुर्जहोम में प्राप्त किये गए हैं। इन मकानों को इनमें पहुँचने वाली सीढ़ियों के साथ जमीन में खोदा जाता था।
नवपाषाण उपकरण एक तेज धार किनार प्राप्त करने हेतु पॉलिश किये जाते थे ।
जीवाश्म लकड़ी और मृदभांड से निर्मित औजार दाओजली हेडिंग से प्राप्त किये गए हैं।
आदि मानव के लिए पशु, भोजन और मांस का एक महत्वपूर्ण स्रोत थे।
मानव ने पाषाण के दो टुकड़ों को परस्पर रगड़ कर आग का उत्पादन करना सीखा। यह खोज एक दुर्घटनास्वरूप हुआ आविष्कार था। मानव ने आग का प्रयोग भोजन पकाने, रोशनी प्राप्त करने,गर्माहट प्राप्त करने के लिए एवं भोजन पकाने के लिए किया था।
भिन्न पौधे भिन्न परिस्थितियों में उत्त्पन्न होते हैं । उदाहरण के लिए, चावल को गेहूं और जौ की तुलना में अधिक जल की आवश्यकता होती है, अतः इसकी पैदावार उन क्षेत्रों में की जाती है जहाँ पर जल प्रचूर मात्रा में उपलब्ध होता है।
लोगों द्वारा भोजन पकाने के लिए बर्तनों को उपयोग में लेना शुरू किया गया था। चावल, गेहूं और दाल जैसे अनाज उनके द्वारा पकाया जाता था । इन बर्तनों को कभी कभी सजाया भी जाता था।
हम अतीत के बारे में स्त्रोत के रूप में पहचाने जाने वाले सुरागों के द्वारा ज्ञान प्राप्त करते हैं। स्रोत जिनका अतीत का अध्ययन करने के लिए उपयोग किया जाता है, वे हैं - सिक्के,शिलालेख,पांडुलिपियां,मृदभांड,खिलौने, आभूषण आदि।
पाषाण युग का मानव पहाड़ी क्षेत्रों में नदियों अथवा झील के किनारे रहता था। शुरुआत में उन्होंने गुफाओं, शैल आश्रयों में और बाद में मिटटी की झोपड़ियों में आश्रय लिया। वह झील या नदी के किनारे उनकी प्यास बुझाने और भोजन यानी पशु और मछली हेतु रहता था।
हम अतीत के बारे में स्त्रोत के रूप में पहचाने जाने वाले सुरागों के द्वारा ज्ञान प्राप्त करते हैं। स्रोत जिनका अतीत का अध्ययन करने के लिए उपयोग किया जाता है, वे हैं - सिक्के,शिलालेख,पांडुलिपियां,मृदभांड,खिलौने एवं आभूषण आदि।
लोगों द्वारा भोजन पकाने के लिए बर्तनों को उपयोग में लेना शुरू किया गया था। चावल, गेहूं और दाल जैसे अनाज उनके द्वारा पकाया जाता था। इन बर्तनों को कभी-कभी सजाया भी जाता था।
भिन्न पौधे भिन्न परिस्थितियों में उत्त्पन्न होते हैं । उदाहरण के लिए, चावल को गेहूं और जौ की तुलना में अधिक जल की आवश्यकता होती है, अतः इसकी पैदावार उन क्षेत्रों में की जाती है जहाँ पर जल प्रचूर मात्रा में उपलब्ध होता है।
मानव ने पाषाण के दो टुकड़ों को परस्पर रगड़ कर आग का उत्पादन करना सीखा। यह खोज एक दुर्घटनास्वरूप हुआ आविष्कार था। मानव ने आग का प्रयोग भोजन पकाने के लिए, रोशनी प्राप्त करने एवं गर्माहट प्राप्त करने के लिए किया था।
आदि मानव की कला व रुचियाँ पुरावशेषों के माध्यम से पता चलती हैं । मानव ने जैसे जैसे प्रगति की उसका पता उसके पुरावशेषों से पता चल जाता है । जैसे की मानव ने चित्रकारी की इसका पता गुफाओं में बने चित्रों से चलता है । मिट्टी के पात्रों पर बनाये गए चित्र उसकी कला एवं रुचियों के द्योतक हैं ।