जो ज्ञान प्राप्त व्यक्ति होते थे उन्हें बोधिसत्व कहा जाता था । एक बार जब उन्हें ज्ञान की प्राप्ति हो जाती थी तो वे एकांत जीवनयापन एवं शांत अवस्था में ध्यान लगा सकते थे, हांलाकी वे लोगों को शिक्षा देने एवं उनकी सहायतार्थ सांसारिक जीवन से जुड़े रहते थे, बोधिसत्व में विश्वास करना महायान बौद्ध धर्म का अंग था।
यह तीन सत्तारूढ़ परिवारों -चोल, चेर और पांड्य के प्रमुखों के लिए प्रयुक्त एक तमिल शब्द है जिसका अर्थ है -तीन प्रमुख । ये लगभग 2300 वर्ष पूर्व दक्षिण भारत में शक्तिशाली बन गए थे। इन तीनों प्रमुखों में से प्रत्येक के पास सत्ता के दो केंद्र हुआ करते थे पहला अंतर्देशीय और दूसरा समुंद्र तट पर । इन छह शहरों में से दो बहुत ही महत्वपूर्ण थे: 1)चोलो का बंदरगाह पुहार या कावेरिपत्तिनम और 2)पांड्य की राजधानी मदुरै। ये प्रमुख नियमित रूप से करों का संग्रह नहीं करते थे, इसके स्थान पर वे लोगों से उपहार की मांग करते थे और लोगों से विभिन्न भेंट प्राप्त किया करते थे। वे सैन्य अभियानों पर भी जाया करते थे और आसपास के इलाकों से शुल्क एकत्र करते थे।
लगभग 2000 वर्ष पूर्व कुषाणों ने मध्य एशिया और उत्तर-पश्चिम भारत पर शासन किया था। पेशावर और मथुरा उनकी सत्ता के दो प्रमुख केंद्र थे। तक्षशिला भी उनके राज्य का एक हिस्सा था। कुषाण सिल्क रूट पर नियंत्रण स्थापित करने वाले प्रसिद्ध शासक थे। उनके शासन के दौरान, सिल्क रूट की एक शाखा मध्य एशिया से निम्नस्थ सिंधु नदी के मुहाने पर स्थित बंदरगाहों तक विस्तृत थी, जहाँ से रेशम को पश्चिम में रोमन साम्राज्य के लिए भेजा जाता था। उन्होंने सोने के सिक्के भी जारी किए थे जो सिल्क रूट पर यात्रा करने वाले व्यापारियों द्वारा इस्तेमाल किये जाते थे।
गौतमीपुत्र श्री सातकर्णी सातवाहन वंश का सबसे महत्वपूर्ण शासक था। हमें गौतमीपुत्र श्री सातकर्णी के बारे में उसकी माता गौतमी बालाश्री द्वारा रचित एक शिलालेख से अत्यधिक जानकारी प्राप्त होती है। गौतमीपुत्र श्री सातकर्णी और अन्य सातवाहन शासक "दक्षिणापथ के स्वामी 'के रूप में जाने जाते थे । दक्षिणापथ दक्षिण की ओर जाने वाला मार्ग था। यह शब्द सम्पूर्ण दक्षिणी क्षेत्र के लिए एक नाम के रूप में भी प्रयुक्त होता था। तटों पर नियंत्रण स्थापित करने के लिए उसने पूर्वी, पश्चिमी और दक्षिणी तटों पर अपनी सेनाएं भेजी थी।
A.
अस्पृश्यता
B. सती
C. बहुविवाह
D. बाल विवाह
फ़ाहियान तथा ह्वेन त्सांग दोनों ही भारत में प्रचलित अस्पृश्यता की प्रथा को देखकर दंग रह गए। अछूत जो कि सभी अशुद्ध कार्य करते थे तथा वह शहरी सीमा से बाहर निवास करते थे।
A.
बारह शासक
B. दस शासक
C. बीस शासक
D. पन्द्रह शासक
दक्षिणापथ में 12 शासक थे, तथा इसकी जानकारी हरिषेन की प्रशस्ति से प्राप्त होती है। उन्होने पराजित होने के पश्चात समुद्रगुप्त के सामने आत्मसमर्पण कर दिया तथा समुद्रगुप्त ने उन्हें फिर से राज करने की अनुमति प्रदान कर दी।
A.
पराकृत
B. पाली
C. देवनागरी
D. संस्कृत
इलाहाबाद के पत्थर के स्तंभ समुद्रगुप्त के शासनकाल के बारे में जानकारी देने के एक महत्वपूर्ण स्त्रोत है। इन स्तंभ शिलालेखों पर हरिषेन ने संस्कृत में चन्द्रगुप्त की विजयों का वर्णन किया है।
A.
हिन्दुत्व
B. बुद्धिज्म
C. जैनिज्म
D. इस्लाम
फाह्यान, एक चीनी बौद्ध विद्वान, बौद्ध धर्म के बारे में अधिक जानने के लिए, चन्द्रगुप्त द्वितीय के शासनकाल में, चीन से भारत आया। वह छह वर्षों तक भारत में रहा, तथा उसके पुस्तक से हमें गुप्त वंश के अनेक अनछुए पहलू जानने को मिले।
A.
हर्षवर्धन
B. श्रीगुप्त
C. पुलकेशिन द्वितीय
D. राज्यवर्धन
हर्षवर्धन ने चीन के साथ राजनीतिक सम्बन्ध स्थापित किए। एक चीनी बौद्ध विद्वान जुआन झांग मध्य एशिया के रास्ते भारत आया। वह भारत में पन्द्रह वर्षों तक रहा। इस समय के दौरान वह अक्सर हर्ष के दरबार का दौरा करता था।
A.
बिम्बिसार
B. पुष्यामित्राशुंग
C. हर्षवर्धन
D. कनिष्क
चीनी बौर्द्ध तीर्थयात्री ह्वेन त्सांग जिसने 636 ईसवी में हर्षवर्धन के राज्य का दौरा किया के अनुसार हर्ष ने अनेक बुद्ध स्तूप का निर्माण करवाया। उसने हर्षवर्धन के शासनकाल के दौरान सामाजिक संरचना के बारे में लिखा है।
A.
जुआन जैंग
B. इतसिंग
C. फा जिआन
D. वंग ह्युन्तसे
फा जिआन चन्द्र्रगुप्त द्वितीय के बारे में जानकारी देने वाला प्रथम चीनी तिर्थयात्री था। उसने अपनु पुस्तिका में गुप्त शासकों सम्बन्धी सभी जानकारी एकत्रित की तथा उसे बाद में प्रकाशित किया।
A.
पुलकेशिन प्रथम
B. गोविन्द तृतीय
C. ध्रुव
D. पुलकेशिन द्वितीय
पुलकेशिन द्वितीय ने 642 ईसवी में नर्मदा नदी के किनारे हर्षवर्धन को पराजित किया, उसे पराजित करने के बाद उसने दक्षिणापठेश्वर की उपाधी उपाधि ग्रहण की। इसके साथ ही उसने परमेश्वर की शीर्षक भी ग्रहण किया।
A.
कविताओं के लिए
B. मंचन के लिए
C. संगीत के लिए
D. उपन्यास के लिए
कालीदास समुद्रगुप्त के राजमहल का श्रृंगार था। वह भारत का महान कवि व नाट्य कलाकार था। वह अपने नाटकों के लिए आज तक याद किया जाता है, जिनका मंचन राजा के दरबार में किया गया था। उसके प्रसिद्ध नाटक मालाविकागनीमित्रा, विक्रामोरवन्शीया तथा अभिजाना शकुन्तलम थे।
A. सूरज
B. चांद
C. मशाल
D. मोमबत्ती
गुफाओं के अंदर अंधेरा होने की वजह से, अधिकांश चित्र मशालों की रोशनी में बनाए गए थे।मशालें आसानी से एक स्थान से अन्यत्र स्थान पर ले जायी जा सकती थी। मशाल एक छड़ीनुमा लकड़ी का टुकड़ा होता था। इस पर सामान्यतः कपड़े का टुकड़ा लपेट कर उसे तारकोल में भिगो कर और साथ ही इसके एक छोर पर कुछ अन्य ज्वलनशील पदार्थ लगाकर प्रज्वलित किया जाता था।मशाल को दीवार में ऊंचाई पर बने कोष्ठक में लगा दिया जाता था ताकि यह पाषाण संरचनाओं में पर्याप्त रोशनी दे सके।
A. पाषाणों
B. रसायनों
C. मसालों
D. पौधों और खनिजों
चित्रकारी में पौधों और खनिजों से बनाए गए प्राकृतिक रंगों का प्रयोग किया जाता था।
A. गर्भगृह
B. स्मृति मंजूषा
C. रेलिंग
D. शिखर
प्रदक्षिणा पथ को रेलिंग से घेर दिया जाता था जिसे वेदिका कहते हैं। वेदिका में प्रवेश द्वार बने होते थे। रेलिंग तथा तोरण प्रायः मूर्तिकला की सुंदर कलाकृतियों से सजे होते थे। इनमें हरे अथवा सफ़ेद पाषाण परयुक्त होता था। साँची के महान स्तूप में रेलिंग सहित चार प्रवेशद्वार हैं।
मंडप, हिन्दू मंदिरों में एक सभागार जैसा स्थान हुआ करता था, जहां पर लोग प्रार्थना हेतु एकत्रित हुआ करते थे।
शिखर का निर्माण गर्भगृह के शीर्ष पर किया जाता है , जो इसे पवित्र स्थल के रूप में चिन्हित करता है ।
उपासक इस स्तूप के चारों ओर दक्षिणावर्त परिक्रमा करके, बुद्ध के प्रति अपनी भक्ति का प्रदर्शन करते हैं।
शब्द स्तूप का अक्षरशः अर्थ टीला होता है।
भारतीय गणितज्ञों ने शून्य के लिए एक विशेष प्रतीक का आविष्कार किया था।
आर्यभट्ट एक प्रसिद्ध गणितज्ञ और खगोलशास्त्री थे, उन्होंने संस्कृत में एक पुस्तक आर्यभट्टियम लिखी थी।
पुराणों और महाभारत का संकलन व्यास द्वारा किया गया था ।
महाभारत और रामायण दो प्रसिद्ध संस्कृत महाकाव्य हैं ।
कालिदास ने संस्कृत भाषा में अपने नाटकों की रचना की थी ।
एक प्रसिद्ध तमिल महाकाव्य, मणिमेखलई की रचना, 1400 साल पहले सत्तनर द्वारा की गई थी।
महाकाव्य दीर्घ रचनाएँ हैं । महाकाव्यों में उत्कृष्ट रचनाओं में स्त्री-पुरुषों की वीरगाथाएँ तथा देवताओं से जुड़ी कथाएँ हैं।
1800 साल पहले एक प्रसिद्ध तमिल महाकाव्य सिलप्पदिकारम की रचना इलांगो नामक कवि ने की थी।
पुराण का शब्दिक अर्थ है प्राचीन।
1.पुराणों में विष्णु, शिव, पुराणों में विष्णु, शिव, दुर्गा या पार्वती जैसे देवी-देवताओं से जुड़ी कहानियाँ हैं।
2.इनमें इन देवी-देवताओं की पूजा की विधियाँ दी गई हैं। इसके अतिरिक्त इनमें संसार की सृष्टि तथा राजाओं के बारे में भी कहानियाँ हैं।
यह युद्ध कुरु के सिंहासन और उनकी राजधानी हस्तिनापुर को नियंत्रित करने के लिए लड़ा गया था।
स्तूप के केन्द्र में एक छोटा सा पात्र विद्यमान होता है, जिसमें बुद्ध एंव उनके अनुयायियों के देह अवशेष (जैसे कि दाँत,अस्थि अथवा राख़) एवं उनके द्वारा उपयोगित वस्तुओं के साथ बहुमूल्य रत्न एवं सिक्के भी रखे होते हैं। यह पात्र अस्थिकलश के रूप में जाना जाता है ,यह अस्थि कलश, मिट्टी द्वारा ढका होता था।
एकाश्म मंदिर, पाषाण के एक विशाल टुकड़े को तराश कर निर्मित किया जाता है, महाबलीपुरम के मंदिर एकाश्म मंदिरों के उदाहरण हैं ।
मंदिर का सबसे महत्वपूर्ण भाग गर्भगृह होता है, जहां पर मुख्य देवता की प्रतिमा को स्थापित किया जाता था, यहाँ पर पुरोहित धार्मिक अनुष्ठानों का आयोजन किया करते थे ।
स्तुपों के चारों ओर प्रदक्षिणा पथ बना होता है, इसके चारों तरफ रेलिंग निर्मित हुआ करती थी । उपासक इस स्तुप के चारों ओर इस पथ पर दक्षिणावर्त परिक्रमा करके, बुद्ध के प्रति अपनी भक्ति का प्रदर्शन करते हैं।
स्तम्भ पर चंद्र शासक का नाम उत्त्कीर्ण है, इतिहासकारों के अनुसार शासक संभवतया गुप्त वंश से संबन्धित था।
महाकाव्य दीर्घ रचनाएँ हैं । महाकाव्यों में उत्कृष्ट रचनाओं में स्त्री-पुरुषों की वीरगाथाएँ तथा देवताओं से जुड़ी कथाएँ हैं।
1800 साल पहले एक प्रसिद्ध तमिल महाकाव्य सिलप्पदिकारम की रचना इलांगो नामक कवि ने की थी।
पुराण का शब्दिक अर्थ है प्राचीन।
1.पुराणों में विष्णु, शिव, पुराणों में विष्णु, शिव, दुर्गा या पार्वती जैसे देवी-देवताओं से जुड़ी कहानियाँ हैं।
2.इनमें इन देवी-देवताओं की पूजा की विधियाँ दी गई हैं। इसके अतिरिक्त इनमें संसार की सृष्टि तथा राजाओं के बारे में भी कहानियाँ हैं।
यह युद्ध कुरु के सिंहासन और उनकी राजधानी हस्तिनापुर को नियंत्रित करने के लिए लड़ा गया था।
इसमें कोवलन् नाम के एक व्यापारी की कहानी है। वह पुहार में रहता था। वह और कन्नगी पुहार छोड़कर मदुरै चले गए। वहाँ पांड्य राजा के दरबारी जौहरी ने कोवलन् पर चोरी का झूठा आरोप लगाया जिस पर राजा ने उसे प्राणदंड दे दिया। कन्नगी जो अभी भी उससे प्रेम करती थी, इस अन्याय के कारण दुःख और रोष से भर गई। उसने मदुरै शहर का विनाश कर कर दिया।
पुराणों की मुख्य विशेषताएं इस प्रकार हैं:
1.पुराण सरल संस्कृत श्लोक में लिखे गए हैं,
2. पुराण को सब सुन और समझ सकते थे। स्त्रियाँ तथा शूद्र जिन्हें वेद पढ़ने की अनुमति नहीं थी वे भी इसे सुन सकते थे।
3.पूर्ण संभवतया पुराणों का पाठ पुजारी मंदिरों में किया करते थे जिसे सुनने लोग मंदिर में आते थे।
महाकाव्य दीर्घ रचनाएँ हैं । महाकाव्यों में उत्कृष्ट रचनाओं में स्त्री-पुरुषों की वीरगाथाएँ तथा देवताओं से जुड़ी कथाएँ हैं।
1.करीब 1800 साल पहले एक प्रसिद्ध तमिल महाकाव्य सिलप्पदिकारम की रचना इलांगो नामक कवि ने की।
2.तमिल महाकाव्य, मणिमेखलई को करीब 1400 साल पहले सत्तनार द्वारा लिखा गया।
ये रचनाएँ कई सदियों पहले ही खो गई थीं। उनकी पाण्डुलिपियाँ दोबारा
लगभग एक सौ साल पहले मिलीं।
गणितज्ञ तथा खगोलशास्त्री आर्यभट्ट ने संस्कृत में आर्यभट्टीयम नामक पुस्तक लिखी। इसमें उन्होंने लिखा कि दिन और रात पृथ्वी के अपनी धुरी पर चक्कर काटने की वजह से होते हैं, जबकि लगता है कि रोज़ सूर्य निकलता है और डूबता है। उन्होंने ग्रहण के बारे में भी एक वैज्ञानिक तर्क दिया। उन्होंने वृत्त की परिधि को मापने की भी विधि ढूँढ़ निकाली, जो लगभग उतनी ही सही है, जितनी कि आज प्रयुक्त होने वाली विधि।
इस समय के आसपास निर्मित हिंदू मंदिरों की मुख्य विशेषताएं इस प्रकार थीं :
1 सभागार जहां पर मुख्य देवता की प्रतिमा को स्थापित किया जाता था, गर्भगृह के रूप में पहचाना जाता था । यह मंदिर का सबसे महत्वपूर्ण भाग होता था ।
2. शिखर का निर्माण गर्भगृह के शीर्ष पर किया जाता है , जो इसे पवित्र स्थल के रूप में चिन्हित करता था।
3. अधिकांश हिन्दू मंदिरों में एक सभागार जैसा स्थान हुआ करता था, जहां पर लोग प्रार्थना हेतु एकत्रित हुआ करते थे। यह सभागार मंडप कहलाता था।
दिल्ली में महरौली का लौह स्तम्भ प्राचीन भारतीय शिल्पकारों के कौशल का सर्वोत्तम उदाहरण है । इसकी मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित हैं :
1. यह 7.2 मीटर ऊँचा है, और 3 टन से अधिक वजन का है।
2. यह 1,500 साल पहले निर्मित किया गया था । इसका पता हमें, स्तम्भ पर उत्त्कीर्ण अभिलेख पर चंद्र शासक के नाम के उल्लेख से चलता है, जो कि पूर्ण संभवतया गुप्त शासक था।
3. इस लौह स्तंभ की एक उल्लेखनीय विशेषता यह है कि 1500 से अधिक वर्षों तक की अवधि में भी इस पर जंक नहीं लगा है ।
1. इस गद्यांश को प्रसिद्ध महाकाव्य शीलापद्दीकरम से लिया गया है।
2. इस महाकाव्य की रचना तमिल भाषा में की गई थी ।
3. इस महाकाव्य की रचना कवि इलंगो अदीगल द्वारा की गई थी ।
4. कन्नगी दु:ख से भर गई थी, क्योंकि राजा ने उसके पति को मृत्यु की सजा सुनाई थी ।
पुराण, हिंदू धार्मिक ग्रंथ थे, उनकी सरल संस्कृत श्लोकों में रचना की गई थी, और महिलाओं और शूद्रों सहित हर किसी को इन्हें सुनने की छूट प्राप्त थी, पुराणों का संभवतया पुजारियों द्वारा मंदिरों में उच्चारण किया जाता था। लोग उन्हें सुनने के लिए आया करते थे।
इसमें कोवलन् नाम के एक व्यापारी की कहानी है। वह पुहार में रहता था। वह और कन्नगी पुहार छोड़कर मदुरै चले गए। वहाँ पांड्य राजा के दरबारी जौहरी ने कोवलन् पर चोरी का झूठा आरोप लगाया जिस पर राजा ने उसे प्राणदंड दे दिया। कन्नगी जो अभी भी उससे प्रेम करती थी, इस अन्याय के कारण दुःख और रोष से भर गई। उसने मदुरै शहर का विनाश कर कर दिया।
पुराणों की मुख्य विशेषताएं इस प्रकार हैं:
1.पुराण सरल संस्कृत श्लोक में लिखे गए हैं,
2. पुराण को सब सुन और समझ सकते थे। स्त्रियाँ तथा शूद्र जिन्हें वेद पढ़ने की अनुमति नहीं थी वे भी इसे सुन सकते थे।
3.पूर्ण संभवतया पुराणों का पाठ पुजारी मंदिरों में किया करते थे जिसे सुनने लोग मंदिर में आते थे।
महाकाव्य दीर्घ रचनाएँ हैं । महाकाव्यों में उत्कृष्ट रचनाओं में स्त्री-पुरुषों की वीरगाथाएँ तथा देवताओं से जुड़ी कथाएँ हैं।
1.करीब 1800 साल पहले एक प्रसिद्ध तमिल महाकाव्य सिलप्पदिकारम की रचना इलांगो नामक कवि ने की।
2.तमिल महाकाव्य, मणिमेखलई को करीब 1400 साल पहले सत्तनार द्वारा लिखा गया।
ये रचनाएँ कई सदियों पहले ही खो गई थीं। उनकी पाण्डुलिपियाँ दोबारा
लगभग एक सौ साल पहले मिलीं।
गणितज्ञ तथा खगोलशास्त्री आर्यभट्ट ने संस्कृत में आर्यभट्टीयम नामक पुस्तक लिखी। इसमें उन्होंने लिखा कि दिन और रात पृथ्वी के अपनी धुरी पर चक्कर काटने की वजह से होते हैं, जबकि लगता है कि रोज़ सूर्य निकलता है और डूबता है। उन्होंने ग्रहण के बारे में भी एक वैज्ञानिक तर्क दिया। उन्होंने वृत्त की परिधि को मापने की भी विधि ढूँढ़ निकाली, जो लगभग उतनी ही सही है, जितनी कि आज प्रयुक्त होने वाली विधि।
स्तूप का निर्माण करने के लिए आदेश, राजा और रानी द्वारा दिया जाता था, क्योंकि यह एक अत्यंत खर्चीला कार्य होता था । एक स्तूप के निर्माण की प्रक्रिया में कई चरण होते थे-
1.सबसे पहले, अच्छी गुणवत्ता वाले पाषाणों को खोजा जाता था, फिर उनका उस स्थान पर परिवहन किया जाता था, जिसका नई इमारत के निर्माण हेतु प्रायः सावधानीपूर्वक चयन किया जाता था।
2.और फिर अपरिष्कृत पाषाण को, स्तम्भों, भित्तियों हेतु प्रकोष्ठ, फर्श और छत में तराशा जाता था।
3.उन नक्काशीदार चट्टानों को ठीक रीति से, सही धार्मिक स्थिति में स्थापित किया जाता था।
4.रानी और राजा, और कई अन्य व्यक्तियों के नाम स्तंभों, रैलिंग(जंगला) और इमारतों की भित्तियों पर उत्त्कीर्ण किया जाता था ।
अजंता चित्रकारी, गुफाओं के भीतर की गई थी, जो कि सदियों की प्रक्रिया के उपरांत, पहाड़ियों के खोखला होने पर निर्मित हुई थी। प्राकृतिक प्रकाश गुफाओं के अंदर प्रवेश नहीं कर सकता था, और उनमें भीतर अन्धकार रहता था। इसलिए, चित्रकारी, मशाल की रोशनी का उपयोग करके की जाती थी, चित्रकारी में पौधों और खनिजों से बनाए गए प्राकृतिक रंगों का प्रयोग किया जाता था, 1500 वर्षों के उपरांत भी ये रंग अभी भी उज्ज्वल और चमकदार हैं। हालांकि इन सुंदर चित्रों के कलाकार अभी भी अज्ञात हैं।
हरिषेण महा-दंड-नायक के रूप में जाना जाता था जिसका अर्थ मुख्य न्यायिक अधिकारी था ।
प्रशस्ति एक विशेष प्रकार का शिलालेख होता है जिसका तात्पर्य "की प्रशंसा में" होता है। प्रशस्ति की रचना शासकों की प्रशंसा में की जाती थी।
गुप्तकाल में विज्ञान के क्षेत्र में बहुत उन्नति हुई। इस युग में आर्यभट्ट,वाराहमिहिर व ब्रह्मगुप्त प्रमुख वैज्ञानिक थे। धन्वन्तरि नामक वैद्य अपनी प्रयोगशाला में विभिन्न प्रकार की औषधियों का निर्माण किया करता था। महान गणितज्ञ आर्यभट्ट ने धनमूल और वर्गमूल ज्ञात करने की विधि का आविष्कार किया। धातुकला में भी इस युग के वैज्ञानिक महारत हासिल किये हुए थे। दिल्ली के निकट महरौली में गुप्तकालीन लौह स्तम्भ विश्व प्रसिद्ध है जो 1600 वर्ष से धूप और वर्षा में बिना जंग लगे हुए खड़ा है। आर्यभट्ट एवं वाराहमिहिर आदि विद्वानों ने तारों एवं नक्षत्रों की सूक्ष्म गतिविधियों के सम्बन्ध में अनेक विश्वस्त सिद्धान्तों का निर्माण किया है।
हर्ष एक महान साहित्यकार एवं साहित्यकारों का संरक्षक था, उसने प्रियदर्शिका, रत्नावली एवं नागानंद नामक तीन संस्कृत के महान नाटकों की रचना की थी, इसके दरबार में रहने वाले संस्कृत के महान कवि एवं गद्यकार बाणभट्ट ने कादम्बरी, हर्षचरित,एवं चण्डीशतक नामक ग्रन्थ लिखे, कादम्बरी को बाणभट्ट के यशस्वी पुत्र भूषणभट्ट या पुलिन्दभट्ट ने पूर्ण किया जो हर्ष के ही काल में हुआ, मयूर ने सूर्यशतक लिखा, इसके अतिरिक्त उस काल के प्रसिद्द विद्वान एवं साहित्य्कार थे- शीलभद्र, उद्योतकर एवं ब्रह्मगुप्त नामक गणितज्ञ एवं ज्योतिषज्ञ, परवर्ती संस्कृत विद्वानों के अनुसार उसने बाणभट्ट आदि विद्वानों को प्रचूर मात्रा में धन दिया था।
हर्षचरित - यह वर्द्धन इतिहास का सर्वप्रमुख स्त्रोत है। इस ग्रन्थ की रचना सुप्रसिद्ध लेखक बाण भट्ट ने की थी। यह एक आख्यायिका है, जिसमें लेखक ने अपने समकालीन शासक तथा उसके पूर्वजों के जीवनवृत्त का वर्णन प्रस्तुत किया है। हर्षचरित में आठ अध्याय अथवा खण्ड हैं।
कादम्बरी - यह भी बाणभट्ट की ही कृति है। यह संस्कृत साहित्य का सर्वश्रेष्ट उपन्यास कहा जा सकता है। इसके अध्ययन से हम हर्षकालीन सामाजिक तथा धार्मिक जीवन का ज्ञान प्राप्त करते हैं।
दक्षिण भारतीय हिन्दू राजाओं ने अपनी-अपनी मान्यताओं के देवी-देवताओं के सम्मान में मन्दिर बनवाए । ये बड़े व भव्य मन्दिर ठोस चट्टानों को काट-काट कर निर्मित किए गए थे । इनके शिखर आयताकार, ऊँचे एवं कई मंजिलों के होते थे मंदिरों की दीवारों पर सुन्दर-सुन्दर मूर्तियाँ बनाई जाती थीं ।
अंकोरवाट का मन्दिर कम्बोडिया में स्थित है । यह विश्व की धरोहर है इस मन्दिर की दीवारों पर रामायण-महाभारत की कहानियाँ उभरी हुई मूर्तियों में अंकित हैं ।
चंद्रगुप्त गुप्त वंश का प्रथम शासक था, जिसने महाराज-अधिराज की भव्य उपाधि धारण की थी, उत्तरोत्तर समुद्रगुप्त द्वारा भी इस उपाधि को धारण किया गया था।
कालिदास का सर्वाधिक प्रसिद्ध नाटक अभिज्ञान शकुंतलम है जो दुष्यन्त नामक एक राजा और शकुंतला नामक एक युवा स्त्री के मध्य एक प्रेम कहानी है।
समुद्रगुप्त के बारे में जानकारी प्रदान करने वाला एक महत्वपूर्ण स्रोत लगभग 1700 वर्ष पूर्व उसके दरबारी कवि हरिसेन द्वारा संस्कृत में रचित एक कविता के रूप में एक लंबा शिलालेख है।
कवि ने उनकी प्रशंसा एक योद्धा के रूप में और युद्ध में अनेक विजय प्राप्त करने वाले एक राजा के रूप में करी है। वे विद्वान और कवियों में सर्वश्रेष्ठ थे। उन्हें देवताओं के समतुल्य रूप में भी वर्णित किया गया है।
शिलालेखीय स्त्रोतों के अनुसार, समुद्रगुप्त की माता कुमार देवी थीं जो एक लिच्छवी गण से थीं, जबकि उनके पिता चंद्रगुप्त गुप्त वंश के प्रथम शासक थे।
हम राजा हर्षवर्धन के विषय में जानकारी उनके दरबारी कवि, बाणभट्ट द्वारा संस्कृत में हर्षचरित नामक शीर्षक से लिखित उनकी जीवनी से प्राप्त करते हैं ।
कालिदास के नाटकों के अनुसार, राजा और ब्राह्मण संस्कृत एवं महिलाएँ और जन साधारण प्राकृत भाषा का प्रयोग करते थे।
साहित्य के क्षेत्र में उन्नति - गुप्तकाल संस्कृत साहित्य के इतिहास का स्वर्णयुग कहा गया है। इस काल में उच्चकोटि के लेखक, कवि तथा नाट्यकर हुए जिनमें से कालिदास, विशाखदत्त, शूद्रक, दण्डी, सुबन्धु, भट्टि भर्तहरि, अमरसिंह, वात्स्यायन तथा कामन्दक आदि ने अपनी साहित्य रचनाएँ लिखीं।
गणित तथा ज्योतिष - गुप्तकाल में भारत ज्योतिष, गणित, चिकित्सा, धातु शास्त्र इत्यादि सभी क्षेत्रों में संसार के अन्य देशों से आगे था। आर्यभट्ट उसका उससे बड़ा ज्योतिषी तथा गणितज्ञ था। ज्योतिषी वाराहमिहिर तथा ब्रह्मगुप्त की रचनाओं में अंकगणित, बीजगणित तथा रेखागणित के सिद्धान्तों का उल्लेख है। इसी में वर्गमूल तथा दशमलव के सिद्धान्तों का भी विवेचन है।
भूमि कर में उपज का 1/6 भाग वसूल किया जाता था।
चीनी यात्री के अनुसार आय को चार भागों में विभक्त किया जाता था।
प्रथम भाग, सरकारी कार्यों पर व्यय होता था,
द्वितीय कर्मचारियों पर,
तृतीय विद्वानों को दान आदि में तथा चतुर्थ धार्मिक पर्वों पर दान देने में व्यय होता था।
नगर-श्रेष्ठि: मुख्य बैंकर अथवा शहर का व्यापारी
सार्थवाह: व्यापारी कारवां का नेता
प्रथम-कुलिक: कायस्थ अथवा शास्त्रियों के मुख्य शिल्पकार और अध्यक्ष।
सामंत सैन्य नेता होते थे जो राजा को कभी भी आवश्यकता पड़ने पर सैनिक उपलब्द्ध कराते थे। उनकी इस सेवा के लिए उन्हें नियमित रूप से वेतन का भुगतान नहीं किया जाता था। इसके बजाय, वे राजा से भूमि का अनुदान प्राप्त किया करते थे। वे भूमी से राजस्व एकत्र करते थे और सैनिकों और घोड़ों के रखरखाव एवं युद्ध उपकरण उपलब्द्ध कराने के लिए इसका इस्तेमाल किया करते थे । जब भी राजा दुर्बल हो जाता था तो वे स्वतंत्र बनने का प्रयत्न किया करते थे।
हर्षवर्धन, 606 ई. में सिंहासन पर आसीन हुआ । हर्ष सर्वगुण संपन्न व्यक्ति था।
विजेता के रूप में हर्ष की विजय -
बंगाल विजय - प्रारम्भ में शशांक के विरूद्ध हर्ष को सफलता नहीं मिली, किन्तु अन्त में आसाम नरेश की सहायता से हर्ष शशांक को हराने में सफल हुआ।
अन्य विजयें - हर्ष ने सिन्ध तथा गुजरात पर भी अधिकार कर लिया तथा नेपाल नरेश भी उसके अधीन हो गया, किन्तु पुलकेशिन द्वितीय के विरूद्ध युद्ध में उसे सफलता नहीं मिली तथा नर्मदा उसके राज्य की सीमा रही।
हर्ष का शासन प्रबन्ध - सम्राट शासन का सर्वोच्च अधिकारी था। वह सभी विभागों का कार्य स्वयं देखता था। वह प्रान्तों के अधिकारियों तथा अन्य अधिकारियों की नियुक्ति करता था। वह प्रधान सेनापति व न्यायधीश भी था। सम्राट ने अपनी सहायता के लिये अनेक अधिकारी रखे तथा वह अधिकांश शान्ति का समय शिविरों एवं धार्मिक कार्यों में व्यतीत करता था।
न्याय - हर्ष की न्याय व्यवस्था अत्यन्त कठोर थी। राजद्रोहियों को आजीवन करावास की सजा दी जाती थी। साधारण मामलों में जुर्माना होता था, अंग भंग की सजा भी प्रचलित थी।
सेना - हर्ष के पास एक विशाल सेना थी। प्रसिद्ध चीनी यात्री ह्वेनसांग के अनुसार, उनकी सेना में 60,000 हाथी 50,000 पैदल और 1 लाख घुड़सवार थे। प्रधान सेनानायक को महाबलाधिकृत पुकारा जाता था।
साहित्य का संरक्षक - हर्ष एक विद्याप्रेमी सम्राट ही नहीं था वरन् रचयिता भी था। उसने प्रियदर्शिका, रत्नावली एवं नागानन्द तीन संस्कृत के महान् नाटक लिखे हैं। इसके दरबार में रहने वाले संस्कृत के महान् कवि एवं गद्यकार बाणभट्ट ने कादम्बरी, हर्षचरित एवं चण्डीशतक नामक ग्रन्थ लिखे।
निष्कर्ष - संक्षेप में कहा जा सकता है कि हर्ष प्राचीन भारत का एक महान् विजेता, साम्राज्य निर्माता तथा लोकहितकारी शासक था। जिसने एक विशाल साम्राज्य की स्थापना की थी और अपनी प्रजा के लिये न्यायपूर्ण शासन व्यवस्था की थी। वह परम विद्या प्रेमी तथा साहित्य प्रेमी एवं विद्वानों का संरक्षक था।
करीब 2000 वर्ष पूर्व रोम में शासकों और अमीर लोगों के बीच रेशम के वस्त्र पहनना काफी लोकप्रिय हो गया था।
ईसाई धर्म का आविर्भाव लगभग 2000 वर्ष पूर्व पश्चिम एशिया में हुआ था।
हम भक्ति की अवधारणा हिंदुओं के एक पवित्र ग्रन्थ भगवद गीता में प्राप्त कर सकते हैं।
शिव, विष्णु और देवी के रूप में दुर्गा की आराधना भक्ति काल के दौरान की जाती थी। इन देवताओं की स्तुति भक्ति के माध्यम से की जाती थी।
ह्वेनसांग ने भारत में नालंदा (बिहार) में अध्ययन कर समय व्यतीत किया था।
ह्वेनसांग ने भारत से चीन के लिए उत्तर-पश्चिम से वापसी का स्थल मार्ग लिया था।
तीर्थयात्री ह्वेनसांग भारत से चीन को लौटते समय एक तूफान में फस गया था।
तीर्थयात्री पवित्र स्थानों की यात्रा करने करने वाले पुरुष और महिलाएं होते हैं।
कनिष्क ने एक बौद्ध परिषद का आयोजन किया जहाँ विद्वानों ने भेंट की और महत्वपूर्ण मामलों पर चर्चा की।
सर्वाधिक प्रसिद्ध कुषाण शासक कनिष्क था,जिसने 1900 वर्ष पूर्व के आसपास शासन किया था।
यह तीन सत्तारूढ़ परिवारों -चोल, चेर और पांड्य के प्रमुखों के लिए प्रयुक्त एक तमिल शब्द है जिसका अर्थ है -तीन प्रमुख । ये लगभग 2300 वर्ष पूर्व दक्षिण भारत में शक्तिशाली बन गए थे।
गौतमीपुत्र श्री सातकर्णी और अन्य सातवाहन शासक "दक्षिणापथ के स्वामी 'के रूप में जाने जाते थे जिसका शाब्दिक अर्थ दक्षिण की ओर जाने वाला मार्ग था।
कुछ राजाओं ने सिल्क रूट को नियंत्रित करने की कोशिश इसीलिए की थी क्योंकि वे कर और शुल्क संग्रहण द्वारा और मार्ग से यात्रा करने वाले व्यापारियों द्वारा लाए जाने वाले उपहारों से लाभान्वित होते थे। बदले में ये राजा व्यापारियों की लुटेरों से रक्षा करते थे।
शब्द भक्ति संस्कृत शब्द भज से आया है जिसका तात्पर्य 'विभाजित अथवा साझा करना है।' इससे देवता और भक्त के मध्य एक अंतरंग, दोहरे रिश्ते का बोध होता है।
केरल के ईसाइयों को सीरियाई ईसाई के रूप में जाना जाता है क्योंकि वे संभवतया पश्चिम एशिया से आए थे ।
भक्ति मार्ग के अनुयायियों द्वारा विस्तृत कर्मकाण्डों के स्थान पर समर्पण एवं एक देवी अथवा देवता की स्तुति पर बल दिया गया था।
चीनी बौद्ध तीर्थयात्रियों के यात्रा विवरण निम्नलिखित पर प्रकाश डालते हैं -
1. उन खतरों का जिनका सामना उन्होंने अपनी यात्रा के दौरान किया था और
2. उन मठों और स्थानों का जिनकी उन्होंने यात्रा की थी ।
बौद्ध धर्म का प्राचीन स्वरूप थेरवाद बौद्ध धर्म के रूप में जाना जाता था। यह श्रीलंका, म्यांमार, थाईलैंड और इंडोनेशिया में अधिक लोकप्रिय था।
बोधिसत्वों ने सम्पूर्ण मध्य एशिया, चीन, और बाद में कोरिया और जापान में लोकप्रियता प्राप्त की थी।
बुद्धचरित संस्कृत में रचित बुद्ध की जीवनी है। इसकी रचना कनिष्क के दरबार में रहने वाले कवि अश्वघोष द्वारा की गई थी।
स्तूप,बौद्ध कला का एक अच्छा उदाहरण है, इसकी मुख्य विशेषताओं में से कुछ हैं:
1.इसमें विशाल ठोस गुंबद के साथ एक वृतीय आधार होता है।
2. सम्पूर्ण स्तूप में, इनके चारों ओर एक पथ निर्मित होता है ,यह पथ, प्रदक्षिणा पथ के रूप में पहचाना जाता है। यह पथ रैलिंग(जंगला) से घिरा हुआ होता था।
3. इस पथ में प्रवेश, प्रवेश-द्वार के माध्यम से हुआ करता था, सांची-स्तूप में चार प्रवेश-द्वार हैं।
A.
तारा
B.
ग्रह
C.
उपग्रह
D.
छोटा तारा
पृथ्वी एक ग्रह है क्योंकि इसका स्वयं का कोई प्रकाश नहीं है और यह सूर्य के चारों ओर चक्कर लगाती है|
A.
पूर्णिमा
B. कुबड़ा चांद (gibbous moon)
C. अमावस्या
D. हंसिया चांद (crescent moon)
अपनी कक्षा में चंद्रमा की स्थिति जब पृथ्वी और सूर्य के बीच में होती है,चंद्रमा का अंधकारमय भाग ही पृथ्वी के सम्मुख पड़ता है जिसके कारण रात में चंद्रमा अदृश्य रहता है। चंद्रमा की इस स्थिति को अमावस्या कहते हैं। अमावस्या पंचांग के अनुसार माह की ३०वीं और कृष्ण पक्ष की अंतिम तिथि है|
A.
सूर्य
B. मिल्की-वे
C. चन्द्रमा
D. उत्तरी तारा
ध्रुव तारे को उत्तरी तारा भी कहा जाता है| यह सदैव ही उत्तर दिशा को सूचित करता है|
A.
अपनी
कक्षाओं में
B. अपनी दिशाओं में
C. मिल्की-वे में
D. अपने अक्षों पर
गृह सूर्य के चारों ओर एक निश्चित पथ पर चक्कर लगाते हैं, जिसे कक्षा कहा जाता है|
A.
65%
B. 71%
C. 80%
D. 90%
पृथ्वी का 71 प्रतिशत हिस्सा पानी से ढका हुआ है| 1.6 प्रतिशत पानी ज़मीन के नीचे है और 0.001 प्रतिशत वाष्प और बादलों के रूप में है|
A.
चन्द्रमा
B. ध्रुव तारा
C. सूर्य
D. मंगल ग्रह